हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०० – कथा कहानी – घुटनों के बल बैठी इंसानियत ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा- घुटनों के बल बैठी इंसानियत)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०० – कथा कहानी  – घुटनों के बल बैठी इंसानियत ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

चमकती हुई कांच की दीवारों और मखमली कालीनों से सजे उस बड़े से शोरूम में वीआईपी ग्राहकों का हुजूम हमेशा वैसे ही उमड़ता था जैसे मुफ़्त के चंदन को घिसने के लिए पूरी बारात तैयार खड़ी हो। रामसरन वहां पिछले बीस साल से इस देश के लोकतंत्र की तरह घुटनों के बल बैठा था जिसका मुख्य और इकलौता काम वीआईपी पैरों के तलवों का नाप लेना था ताकि बड़े साहबों को कॉर्पोरेट की सीढ़ियां चढ़ने में कोई तकलीफ़ न हो। जब वह किसी बड़े साहब के पैर में पांच हजार का जूता डालने के लिए अपनी रीढ़ को नब्बे डिग्री पर मोड़ता तो उसकी हड्डियों से एक अजीब सी कराह उठती थी जो शोरूम के उस धीमे विदेशी संगीत में वैसे ही विलीन हो जाती थी जैसे चुनाव के बाद जनता के वादे। शोरूम के बड़े मालिक अक्सर मुस्कुराते हुए कहते थे “रामसरन तुम्हारे हाथों में जादू है क्योंकि तुम पैर देखकर ही इंसान की औकात और उसके बैंक बैलेंस का सही साइज बता देते हो।” रामसरन बस अपनी फीकी मुस्कान का विज्ञापन बिखेर कर रह जाता और उसकी आंखें काउंटर के पीछे रखे उस बड़े से चमड़े के बक्से पर टिक जातीं जिस पर हमेशा एक बड़ा सा ताला वैसे ही जड़ा रहता था जैसे हमारी व्यवस्था पर जवाबदेही का ताला। उस बक्से में क्या था यह रहस्य शोरूम के किसी पढ़े-लिखे कर्मचारी को नहीं पता था क्योंकि उसकी चाबी हमेशा रामसरन के गले में एक गंदे से धागे में लिपटी रहती थी। लोग कहते थे कि रामसरन ने इस दुकान में अपनी जिंदगी की सारी खुशियां दफन कर दी हैं और अब वह बस एक जिंदा लाश की तरह दूसरों के तलवे चाटने और सहलाने की कला में पीएचडी कर रहा है। आज भी जब शहर के सबसे बड़े बिजनेसमैन कपूर साहब अपनी चमचमाती कार से उतरे तो रामसरन पहले से ही फर्श पर घुटने टेक कर उनका स्वागत करने के लिए तैयार बैठा था मानो वह किसी राजा के सामने झुका हुआ कोई बंधुआ मजदूर हो जिसका अपनी परछाई पर भी कोई हक नहीं था।

कपूर साहब ने अपने भारी पैर को रामसरन के घुटने पर वैसे ही टिका दिया जैसे सरकारें जनता के सिर पर टैक्स का बोझ टिका देती हैं और बड़े घमंड से कहा “रामसरन इस बार कोई ऐसा जूता दिखाओ जो मेरी इस नई बिजनेस डील की तरह बिल्कुल शाही और बेदाग हो जिसमें सामने वाले की औकात नीचे दबी दिखे और पैसों की फिक्र मत करना।” रामसरन ने उनके मोजे को उतारते हुए बहुत धीरे से कहा “साहब पैर का नाप तो वही रहेगा जो पिछले साल था पर इस बार आपके तलवों की चमड़ी थोड़ी ज्यादा सख्त हो गई है शायद दूसरों का हक दबाते-दबाते वहां की संवेदनशीलता ही मर गई है।” कपूर साहब इस गहरे कटाक्ष को समझ नहीं पाए और जोर से हंसे और बोले “तुम बस पैर का साइज नापो रामसरन मेरी जिंदगी का नाप लेने की औकात मत बनाओ।” तभी काउंटर पर बैठे मैनेजर ने अपनी ऊंची गर्दन को और तानते हुए आवाज लगाई “रामसरन जल्दी करो अपनी इस दार्शनिक बकवास को बंद करो और अंदर के केबिन से वह खास इटालियन लेदर वाला पीस निकाल कर लाओ जो सिर्फ बड़े साहब की शान के लिए ही स्पेशल इम्पोर्ट किया गया है।” रामसरन उठा और हांफते हुए अंदर के अंधेरे कमरे की तरफ चला गया जहां जूतों के डिब्बों का एक ऐसा पहाड़ खड़ा था जो हमारे देश के विकास के दावों जैसा खोखला था। वहां पहुंचते ही उसने अपनी फटी कमीज के अंदर से वह चाबी निकाली और उस रहस्यमयी बक्से को एक पल के लिए सहलाया पर तभी मैनेजर के चिल्लाने की आवाज आई जो किसी भूखे भेड़िए की दहाड़ जैसी थी। उस बंद केबिन में घुटन और मुनाफे की बू इतनी ज्यादा थी कि रामसरन का दम फूलने लगा और उसकी आंखों के सामने कॉर्पोरेट गुलामी की धुंध छा गई पर वह खुद को संभालते हुए उस कीमती जूते का डिब्बा लेकर बाहर आ गया।

कपूर साहब के पैरों में वह नया इटालियन जूता पहनाते समय रामसरन के हाथ ऐसे कांप रहे थे जैसे रिश्वत लेते हुए किसी नए क्लर्क के हाथ कांपते हैं और उसकी आंखों से पानी की एक बूंद चुपके से गिरकर जूते के चमकदार फीते पर ठहर गई। कपूर साहब ने चिढ़कर अपना पैर पीछे खींचा मानो उनका पवित्र पैर किसी अछूत की भावना से दूषित हो गया हो और बोले “यह क्या बदतमीजी है रामसरन तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे पांच हजार के ब्रांडेड जूते पर अपने इन मुफ्त के आंसुओं को गिराने की क्या तुम्हारी बची-कुची अक्ल भी घास चरने गई है।” रामसरन ने तुरंत अपने फटे हुए अंगोछे से उस बूंद को पोंछा और गिड़गिड़ाते हुए कहा “माफ करना साहब बस इस पांच सितारा शोरूम की चकाचौंध से आंखों का पानी मर गया है और वही बाहर आ रहा है वैसे यह जूता आपकी झूठी शान में चार चांद लगा देगा।” तभी शोरूम का कांच वाला दरवाजा खुला और एक बूढ़ा भिखारी अंदर आने की हिमाकत करने लगा जिसे वहां खड़े सूट-बूट वाले सिक्योरिटी गार्ड ने तुरंत ऐसे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जैसे बजट से गरीब को बाहर निकाला जाता है। उस भिखारी को देखकर रामसरन के चेहरे का रंग बिल्कुल सफेद पड़ गया जैसे उसके शरीर का सारा खून किसी ने चूस लिया हो और उसके हाथ से पैर नापने वाला वह लोहे का स्केल फर्श पर गिर गया जिससे पूरा शोरूम गूंज उठा। मैनेजर ने गुस्से में आकर रामसरन को डांटते हुए कहा “अगर यह नाटक ही करना है तो सीधे सड़क पर भीख मांगो इस तरह हमारे वीआईपी ग्राहकों के सामने अपनी कंगाली का तमाशा मत बनाओ।” रामसरन ने चुपचाप अपना सिर झुका लिया क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि इस आलीशान दुकान में जूते बिकते हैं इंसानी जमीर तो यहां मुफ़्त में गिरवी पड़ा रहता है।

दोपहर ढल चुकी थी और शोरूम में उन रईसों की भीड़ थोड़ी कम हुई जो अपनी बोरियत मिटाने के लिए लाखों की शॉपिंग करते हैं तो रामसरन चुपके से उस अंदर वाले अंधेरे केबिन में गया और उसने उस रहस्यमयी बक्से का ताला खोल दिया। बक्से के अंदर कोई सोने-चांदी के सिक्के नहीं थे बल्कि उसके अंदर धूल से सनी हुई एक बहुत पुरानी फटी हुई हवाई चप्पल की जोड़ी और कुछ पुराने अखबार के टुकड़े रखे थे जो इस देश की गरीबी के आंकड़ों की तरह फटे हुए थे। रामसरन ने उन चप्पलों को अपनी छाती से लगा लिया और इस तरह फूट-फूटकर रोने लगा जिससे उसकी सिसकियां उस बंद कमरे की वातानुकूलित दीवारों से टकराकर वापस आने लगीं क्योंकि एयर कंडीशनर हवा को तो ठंडा कर सकते हैं पर किसी के कलेजे की आग को नहीं। उसने उस चप्पल को चूमते हुए कहा “मैं रोज सुबह यहां दूसरों के पैर नापता हूँ उनकी हैसियत का अंदाजा लगाता हूँ पर तुम्हारे पैरों का सही नाप आज तक इस शोरूम से खरीद नहीं पाया।” तभी मैनेजर अचानक बिना दस्तक दिए अंदर आ गया और उसने रामसरन को इस हालत में देखकर अपनी भौहें सिकोड़ते हुए पूछा “रामसरन यह तुम क्या पागलों जैसी हरकत कर रहे हो और इस बदबूदार कबाड़ को इस वीआईपी शोरूम की नाक के नीचे क्यों छुपा कर रखा है।” रामसरन ने अपनी गीली आंखों को पोंछते हुए एक तीखा व्यंग्य कसा “साहब यह कबाड़ नहीं है यह मेरी औकात का वह आईना है जिसे मैं रोज रात को देखता हूँ ताकि कहीं इन बड़े साहबों के जूते चमकाते-चमकाते मैं यह न भूल जाऊं कि मैं भी एक इंसान हूँ।” मैनेजर ने उसकी इस गहरी बात को एक अनपढ़ की बकवास समझते हुए कहा “चलो अपनी यह फिलॉसफी बाहर फुटपाथ पर बेचना अभी एक नए साहब आए हैं जो अपने लाडले के लिए सबसे महंगा जूता खरीदना चाहते हैं।”

रामसरन फिर से अपनी उसी चिरपरिचित मुद्रा में घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया और उस नए साहब के छोटे बच्चे के पैर का नाप लेने लगा जो लगातार अपनी मां की गोद में वैसे ही मचल रहा था जैसे सत्ता के लिए नेता मचलते हैं। बच्चे की मां ने रामसरन की झुकी हुई पीठ और फटे हुए कपड़ों की तरफ देखते हुए बहुत तिरस्कार और घमंड से कहा “देखो बेटा अगर अच्छे से पढ़ाई नहीं करोगे और बड़े होकर साहब नहीं बनोगे तो तुम्हें भी इसी तरह लोगों के पैरों में बैठकर उनके जूते साफ करने पड़ेंगे और यही तुम्हारी औकात होगी।” रामसरन के दिल पर यह बात किसी जलती हुई कील की तरह चुभ गई पर उसने बिना कुछ कहे बच्चे के पैर में वह सुंदर सा मखमली जूता पहना दिया जो उस बच्चे की पूरी जिंदगी की कमाई से भी महंगा था। तभी उस बिगड़ैल बच्चे ने रामसरन के चेहरे पर एक जोर की लात मार दी जिससे रामसरन के सूखे होठों से खून की एक पतली धारा बह निकली और फर्श पर गिर गई। पूरा शोरूम एक पल के लिए शांत हो गया पर बच्चे के पढ़े-लिखे माता-पिता ने माफी मांगने की जहमत उठाने के बजाय हंसते हुए कहा “बच्चा है थोड़ा नटखट है वैसे भी इसे आदत है सबको अपनी उंगलियों पर नचाने की और बड़े बाप का बेटा है तो लात मारना तो इसका जन्मसिद्ध अधिकार है।” रामसरन ने जमीन पर गिरे अपने उस खून को अपनी कांपती उंगली से साफ किया और एक दर्दनाक मुस्कान के साथ बोला “कोई बात नहीं मेमसाब बड़े लोगों के बच्चों की लात भी हमारे जैसे गरीबों के लिए किसी शाही आशीर्वाद से कम नहीं होती।” इस मार्मिक और कड़वे दृश्य को देखकर वहां खड़े कुछ नए सेल्समैन की आंखों में भी शर्म के आंसू आ गए पर इस शोरूम के सिस्टम में रामसरन की लाचारी का अंत अभी बहुत दूर था।

शाम को जब शोरूम के बंद होने का वक्त आया और कांच के दरवाजों पर ताले लटकने लगे तो मालिक ने रामसरन को अपने केबिन में बुलाया और उसके हाथ में एक सफेद लिफाफा थमाते हुए बहुत ही ठंडे लहजे में कहा “रामसरन तुम्हारी उम्र अब हो चुकी है और तुम्हारे कांपते हाथों की वजह से हमारे वीआईपी ग्राहकों को बहुत असुविधा होती है इसलिए यह तुम्हारी सैलरी का आखिरी हिसाब है और कल से आने की जरूरत नहीं है।” रामसरन ने उस लिफाफे को देखा जिसमें उसकी बीस साल की वफादारी की कीमत चंद नोटों के रूप में बंद थी और फिर उसने अपने गले से वह चाबी निकालकर मालिक की कांच वाली मेज पर रख दी और कहा “साहब बस मुझे वह बक्सा ले जाने की इजाजत दे दीजिए जो अंदर रखा है क्योंकि मेरा हिसाब तो उसी में बंद है।” मालिक ने एक अमानवीय हंसी हंसते हुए कहा “ले जाओ वह कबाड़ वैसे भी वह हमारे इस ब्रांडेड शोरूम के स्टैंडर्ड को खराब कर रहा था पर जाते-जाते यह तो बता जाओ कि उस फटी चप्पल से तुम्हारा ऐसा क्या आशिकाना रिश्ता है।” रामसरन ने उस भारी बक्से को अपने बूढ़े और झुके हुए कंधों पर उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए रोते हुए कहा “साहब बीस साल पहले मेरा इकलौता बेटा इसी शोरूम के बाहर नंगे पैर घूम रहा था और मैंने उसे वीआईपी ग्राहकों के महंगे जूतों पर दाग लगने से बचाने के लिए और अपनी नौकरी बचाने के डर से बहुत दूर भगा दिया था जो बाद में एक तेज रफ्तार अमीर की कार के नीचे कुचल कर मर गया। यह चप्पल उसी के नंगे पैरों की है जिसका नाप लेने के लिए मैं आज तक हर आने वाले अमीर बच्चे के पैर में अपनी जिंदगी ढूंढता रहा ताकि अपने मरे हुए बेटे को एक बार सही साइज का जूता पहना सकूं पर इस शोरूम ने मुझे सिर्फ दूसरों के पैर मापना सिखाया अपने बेटे का कफ़न सिलना नहीं।” रामसरन की यह बात सुनते ही मालिक के पैरों के नीचे से मखमली कालीन खिसक गया और वह आलीशान शोरूम उस बूढ़े बाप के आंसुओं के समंदर में ऐसे डूब गया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २८ – हास्य-व्यंग्य – “पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २८

☆ व्यंग्य ☆ “पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं रात्रि का भोजन करने के बाद पान खाने के मूड में टहलता हुआ झब्बूलाल की दुकान की ओर बढ़ रहा था। कुछ आगे बढ़ा तो झब्बू की दुकान का रेडियो साफ सुनाई देने लगा, “झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में। ” मैंने सोचा कि आखिर बरेली की धरती में ऐसा क्या है कि वहां महिलाओं के सिर्फ झूमके ही गिरते हैं बेंदा, हार, करधन, पायल आदि गिरने की जानकारी कभी नहीं आई ! मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्कार किया और मेरा पान तैयार करते हुए बोला – भाई साहब आपसे बहुत जरूरी काम है। मैंने कहा भाई जी अचानक क्या काम आ गया ? झब्बू बोला, आप मुझे और मेरे लगाए पान की क्वालिटी जानते ही हैं, मैंने कभी भी पान की गुणवत्ता और स्वाद से समझौता नहीं किया, सदा अपने ग्राहकों का हित सोचा, सबके साथ हमेशा मधुर व्यवहार किया। झब्बू जैसे ही सांस लेने रुका, मैंने बिना विलंब कहा, भाई मैं वर्षों से तुम्हें जानता हूं तुम मुझे यह सब क्यों बता रहे हो? मेरी बात को अनसुना करते हुए झब्बू ने बात आगे बढ़ाई बोला – भाई साहब आप वरिष्ठ पत्रकार हैं, साहित्यकार हैं, अनेक संस्थाओं से जुड़े हैं, बड़े – बड़े नेताओं से आपकी जान – पहचान है। मैंने कहा बस भाई बस। आखिर तुम्हें मुझसे ऐसा कौन सा काम आ गया है जिससे तुम मेरी इतनी तारीफ कर रहे हो !

 झब्बू लाल का दिया पान मैं अपने मुंह के हवाले करने ही वाला था कि उसकी बात सुनकर मेरा मुंह खुला रह गया। झब्बू ने कहा, भाई साहब मेरी इच्छा है कि जब भी अपने प्रधानमंत्री मोदी जी का जबलपुर आगमन हो तो वे मेरी दुकान पर आकर पान खाएं। इसके लिए मुझे आपकी मदद चाहिए। मेरे खुले मुंह के सामने हाथ में पान देखकर झब्बू बोला भैया क्या हुआ, मुंह खोले हो पान को तो अंदर भेजो। मैंने झटके से पान को मुंह में एक ओर खोंसते हुआ कहा, भाई कैसी असंभव सी बात कह रहे हो ! झब्बू ने तर्क रखा – जब मोदी जी कोलकाता में दुकान से खरीद कर झालमुड़ी खा सकते हैं तो मेरा पान क्यों नहीं खा सकते। मैंने कहा, प्यारे भाई जब उन्होंने झालमुड़ी खाई तब वहां चुनाव थे। यहां क्या है जो मोदी जी आकर तुम्हारा पान खायेंगे ? इससे उनको क्या फायदा ? झब्बू हंस कर बोला – भाई साहब पूरी दुनिया जानती है कि मोदी जी अपने फायदे के लिए कभी कुछ नहीं करते वो सिर्फ देश का फायदा सोचते हैं। मैंने कहा चलो ठीक है – अब यह बताओ कि यदि मोदी जी तुम्हारी दुकान पर आकर पान खा लें तो देश को क्या फायदा होगा ? झब्बू बोला भैया पान के शौकीन बढ़ेंगे तो पान का व्यापार बढ़ेगा, पान विक्रेता सम्पन्न होंगे। पान से जुड़ी सामग्री का उत्पादन बढ़ेगा, इससे जुड़ा रोजगार बढ़ेगा। मैं इस पर कोई टिप्पणी करता इससे पहले ही झब्बू बोला, भाई साहब मेरी समझ से तो यदि मोदी जी ने इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को मेलोडी चॉकलेट की जगह औषधीय गुणों से भरपूर मुख को शुद्ध और होंठों को लाल करने वाला अपने देश का पान खिलाया होता तो बात ही कुछ और होती। वो गाना है न “खई के पान बनारस वाला खुल जाए बंद अकाल का ताला”। मैं मेलोनी जी की अकल या बुद्धिमानी पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहा लेकिन बुद्धि तो जितनी बढ़े उतना ही अच्छा। मैं झब्बू की बात पर हँसा उसने फौरन बात सम्हाली और बोला, भाई साहब मेलोनी को पान खिलाना व्यापारिक दृष्टिकोण से भी अपने देश के लिए अधिक लाभ दायक होता। जरा सोचें कि यदि पूरी दुनिया पान खाने लगे तो पान और उससे संबंधित सामग्री का हमें कितना निर्यात और उत्पादन करना पड़ेगा। मैंने कहा झब्बू वह सब ठीक है लेकिन देखते नहीं कि हमारे देश के ऑफिसों – अस्पतालों सहित कितनी महत्वपूर्ण इमारतों के कोने, सीढ़ियां, सड़कें, बगीचे पान की पीक से गंदे और बदबूदार हो गए हैं। क्या तुम चाहते हो कि सारी दुनिया की हालत ऐसी हो जाए ? मेरी बात सुनकर झब्बू बेशर्मी से हंसते हुए बोला भैया जब पूरी दुनिया ही पान की पीक से भर जाएगी तब हमारे पीकों वाले देश पर कौन उंगली उठाएगा ? झब्बू से बच कर निकलने का एक ही उपाय था उसकी हां में हां मिलना। मैंने कहा प्यारे भाई मैं प्रयास करूंगा कि मोदी जी आपकी दुकान पर पान खाने आयें और अबकी बार इटली जाने के पहले पानों की कुछ पुड़ियां मेलोनी जी के लिए भी ले जाएं। मैं आगे बढ़ने लगा तो झब्बू ने रिश्वत रूपी एक मीठा पान मुझे भेंट करते हुए कहा कि ये मेरी भाभी जी को खिलाइए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता बेटियां…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६८ ☆

☆ # “बेटियां…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

हमारा एक मित्र सुबह मॉर्निंग वॉक में मिला

मिलते ही  करने लगा

आजकल नहीं मिलने का गिला

यार दिन भर क्या करते हो ?

क्या यहां पर नहीं रहते हो ?

 

मैंने कहा मित्र

मैं अपनी पत्नी के संग बच्चों के पास चला जाता हूं

कुछ दिन वहां रहता हूं

इसलिए रोज नहीं आता हूं

उसने पूछा,

बच्चे कहां पर रहते है?

मैंने कहा,

एक बेटा और तीन बेटियां हैं

सभी विवाहित है

वे देश के तीन कोने में है

और हम यहां इस कोने में है

 

उसने लंबी सांस भरी

और बोला,

एक बात करूं खरी खरी

तुम बहुत भाग्यशाली हो

जो बच्चों के साथ समय बिताते हो

खुशी खुशी रिटायरमेंट के दिन बिताते हो

 भाई,

हमारे साथ तो प्रश्न चिन्ह है

परिस्थितियों बहुत भिन्न है

एक ही बेटा और बेटी है

दोनों अपने परिवार में व्यस्त है

अपने परिवार संग मस्त है

हम जब भी बहु बेटे के पास जाते हैं

कुछ दिन मुश्किल से रह पाते हैं

हमारी पत्नी और बहू में

रोज होती जंग है

पारिवारिक शांति होती भंग है

वैसे ही वृद्धावस्था में बीमारियों की समस्याएं क्या कम है

बेटे का उदास चेहरा देखकर

लगता है कि अपराधी हम है

मन मारकर घर वापस आ जाते हैं

दोबारा नहीं जा पाते है

आप ही बताओ यार

कहां जाए ?

कहां मान सम्मान और प्यार पायें ?

क्या सब कुछ हमारे लिए छलावा है ?

रिश्तो में प्यार बस एक दिखावा है ?

 

मैंने कहा नहीं मित्र

तुम्हें प्यार, सम्मान, अपनापन

इज्जत, प्रतिष्ठा, आदर और मान

एक ही जगह मिल सकता है

तुम्हारे जीवन में खुशियों का फूल खिल सकता है

तुम्हें खुशी प्रसन्नता मन से सत्कार

दिल से तुम्हें प्रेम का व्यवहार

तुम्हें मनपसंद व्यंजन

मनपसंद सुकून भरी रातें

मन में ताजगी भर दें

ऐसी ममतामयी बातें

एक ही जगह मिल सकती है

जो तुम्हें अपना समझती है

वह है तुम्हारी बेटी

उसका परिवार

जो करती है तुमसे मन से प्यार

बाकी सब रिश्ते पानी के बुलबुले है

जो स्वार्थ में अपने तुमको जीवन भर छले है

 

आजकल बेटिंया

जीते जी  बेटे का फर्ज निभा रही है

और

मरने के बाद भी अंतिम संस्कार का भार

खुद के कंधे पर उठा रही है

 

मित्र वह लोग धन्य है

जिनकी बेटियां है

वह बुढ़ापे का सहारा ही नहीं

घी, शक्कर में लिपटी

रोटियां है

यह आज की

कटु सच्चाई है

जो स्वार्थी संसार ने

हमें दिखाई है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कथाकार सुश्री मृदुल कोस्टा की लघु कथा कृति – मृदुल दृष्टि’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ कथाकार सुश्री मृदुल कोस्टा की लघु कथा कृति – मृदुल दृष्टि ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

यह सर्व मान्य है कि जबलपुर के पाथेय प्रकाशन ने पिछले वर्षों में अधिकाधिक साहित्यिक कृतियों को प्रकाशित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। इसी तारतम्य में पिछले दिनों पाथेय प्रकाशन ने चर्चित लेखिका सुश्री मृदुल कोस्टा की एक ऐसी पठनीय कृति की प्रभावी प्रस्तुति की है जिसमें पाठकों को अपनी अपनी रुचि के अनुसार गद्य और पद्य की विभिन्न रचनायें पढ़ने को मिल सकती है।

 मृदुल दृष्टि संकलन की अनेक रचनाएं ऐसी हैं जो लेखिका के हृदय में सहज मानवीय संवेदना से उत्पन्न हुई प्रतीत होती हैं। कृति का गहनता से अध्ययन मनन करने के बाद यह बात तो सामने आती है कि लेखिका की दृष्टि अत्यंत व्यापक है और उन्होंने पाठकों के प्रत्येक वर्ग की रुचि और पसंद के अनुरूप अपनी सृजित रचनाओं को पुस्तक में शामिल किया है। इस संग्रह में विभिन्न सारगर्भित और सामयिक विषयों पर आलेख, कहानियां, संस्मरण, कविताओं इत्यादि ऐसी रचनाओं सम्मिलित हैं जो कि पाठकों के लिए पठनीय तो हैं ही साथ में उनके जीवन के लिए दिशा दर्शक और प्रेरणा का विषय भी बन सकती हैं। इस कृति की एक अन्य खूबी यह भी है कि वह पाठकों को भटकाव या पलायन से रोकती है और परिस्थितियों से संघर्ष करने की अपील करती है। कुरीतियों में जकड़ी नारी हो या संघर्ष से घबराया – थका पुरुष, सभी के लिए अधिकांश रचनाओं में अविराम संघर्षजयी बनने का प्रोत्साहन देने की लालसा भी लेखिका में विद्यमान है और इस कारण वे प्रायः सकारात्मक दृष्टिकोण कायम रखती हैं। यद्यपि कहीं कहीं विषमताओं और विद्रूपताओं के प्रति खीझ भी स्पष्ट दिखती है लेकिन उसके बाद भी अनौचित्य से संघर्ष की उनकी मानसिक दृढ़ता कहीं कमजोर दिखाई नहीं देती है। मुझे विश्वास है कि यह कृति समाज के सभी वर्गों के लिए उपयोगिता और पठनीयता की दृष्टि से एक श्रेष्ठ कृति साबित होगी।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभिव्यक्ति # -१११ – पांडव और पांच गाँव … ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता पांडव और पांच गाँव…।)

☆ अभिव्यक्ति # १११ ☆

☆  आलेख – पांडव और पांच गाँव☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

युद्ध का शंखनाद हो चुका था, दोनों पक्ष, युद्ध की तैयारियां कर रहे थे, तभी भगवान कृष्ण ने, पांडवों से कहा, कि मैं एक बार शांति के लिए, अंतिम प्रयास करना चाहता हूं, ताकि युद्ध ना हो, और उनकी सहमति से वे कौरव राजसभा में पहुंचे. वहां पर सम्राट धृतराष्ट्र द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, सभी लोग उपस्थित थे. भगवान कृष्ण ने सभा में महाराज धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, कि पांडवों ने 12 वर्ष का वनवास काट लिया है, और एक वर्ष का अज्ञातवास भी व्यतीत कर लिया है, अब उन्हें उनका राज्य लौटा दिया जाए, युवराज दुर्योधन ने तत्काल खड़े होकर कहा, मैं पांडवों को राज्य नहीं दूंगा, भगवान कृष्ण ने कहा, अगर आधा राज्य ना सही, तो उन्हें केवल पांच गांव ही दे दिए जाएं, वह उन पांच ग्रामों में ही अपना गुजारा कर लेंगे, भगवान कृष्ण ने जो पांच गांव मांगे थे वह पांच गांव हैं,

1, गजप्रस्थ – गाजी खान ने उसका नाम बदलकर गाजियाबाद रख दिया था.

2, तिलप्रस्थ – जिसका नाम मुगलों ने फरीदाबाद रख दिया था.

3, इंद्रप्रस्थ – जिसका नाम दिल्ली किया गया.

4, सोनप्रस्थ – जिसका नाम सोनीपत हो गया था.

4, पानप्रस्थ – जिसे बाद में बदलकर पानीपत कर दिया गया था.

परंतु दुर्योधन ने कहा, मैं सुई की नोक के बराबर भी भूमि पांडवों को नहीं दूंगा, अहंकार बहुत कष्टदायक होता है, सब कुछ नष्ट कर देता है, और यहीं से महाभारत युद्ध की नींव रखी गई, और युद्ध में दुर्योधन दुशासन, सभी कौरव, मारे गए, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य इन सभी का देहावसान हुआ.

 युद्ध विनाशकारी होता है, दोनों पक्षों की हानि होती है.

 शांति बनाए रखनी चाहिए.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१९ ⇒ भरे पेट का ज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भरे पेट का ज्ञान ।)

?अभी अभी # १०१९ ⇒ आलेख – भरे पेट का ज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ज्ञान बांटने, और ग्रहण करने के लिए, पेट का भरा होना अत्यावश्यक है। जब भूखे पेट भजन नहीं हो सकता, तो ज्ञानार्जन अथवा ज्ञान का विसर्जन कैसे संभव है।

भक्ति और ज्ञान की भूख किसे नहीं होती। होते हैं कुछ दानवीर, जो खुद भूखे रहकर भी औरों की भूख मिटाते हैं। ज्ञान का भी ऐसा ही है। सुना है, ज्ञान बांटने से बढ़ता है। इसलिए आपके पास ज्ञान हो या न हो, बांटने में ही इतना ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि मस्तिष्क में ज्ञान का भंडार जमा हो जाता है। ।

मंदिरों में आरती, प्रसाद, भंडारे का भी कारण यही है कि प्रसाद की आस में हमें कई आरतियां, प्राथनाएं याद हो गई ! आंख बंद करके जब आरती गाते थे, तब आंखों के सामने प्रसाद तैर जाता था। कभी पंडित जी प्रसन्न हुए तो पूरा लड्डू, कभी सिर्फ थोड़ा सा चूरा। तब से ही संतोष की आदत सी पड़ गई है। जिस दिन पंजेरी और ककड़ी का प्रसाद होता था, हथेली इतनी छोटी पड़ जाती थी, कि प्रसाद लेकर बाहर ग्रहण करते ही, कमीज़ से हथेली पोंछकर पुनः प्रसाद की लाइन में लग जाया जाता था।

ज्ञान की भूख इंसान को कहां कहां ले जाती है। कभी लाइब्रेरी तो कभी सरस्वती पुस्तक सदन और कभी काफी हाउस। कॉफी में ऐसा क्या है जो ज्ञान की भूख बढ़ाता है। कॉफी हाउस की कुछ कुर्सियां तो साक्षात व्यास पीठ नजर आती हैं। पूरा कॉफी हाउस किसी कथा के पांडाल की तरह, उनकी प्रतीक्षा किया करता है। उनकी सीट भी आरक्षित होती है। सभी जानते हैं, वे बहुत बड़े लेखक हैं। उनका आज का ज्ञान कल किसी पुस्तक का ज्ञान बनने वाला है, जिसे साहित्यिक पुरस्कार मिलना तय है। उनकी ओछी हरकतों और अश्लील इशारों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। ।

उम्र के साथ साथ पेट की जठराग्नि कम होती चली जाती है और बात बात पर खाने को उतारू आदमी, कम और गम खाने लगता है। आसाराम से जला आदमी, हर संत की ओर फूंक फूंक कर कदम रखता है। लेकिन ज्ञान मार्ग की ओर एक बार उठे कदम, कभी वापस नहीं लिए जाते।

जब तक इंसान का पेट भरा रहेगा, संसार में ज्ञान का आगार कायम रहेगा। जब भी किसी को ज्ञान पेलें, यह ध्यान रखें, कहीं वह भूखा न हो, वर्ना खाने को दौड़ पड़ेगा। इसीलिए कवि गोष्ठियों में आजकल चाय नाश्ते का प्रबंध भी रखा जाने लगा है। नेताओं को तो भाषण के बीच सड़े टमाटर और अंडे खाने की आदत पड़ चुकी है। लेकिन आजकल वे भी समझदार हो गए हैं। टीवी और सोशल मीडिया पर ही ज्ञान बांटते हैं। अब आप टीवी का स्क्रीन फोड़ने से तो रहे। ।

डिजिटल जगत में दुनिया का सारा ज्ञान सिमटकर फेसबुक पर आ गया है। सभी तरह के बौद्घिक विमर्श और कविता पाठ फेसबुक पर लाइव चल रहे हैं। जब तक आपका मुंह चलता रहे, पेट पूजा होती रहे, अपनी रुचि एवं स्वादानुसार इसे ग्रहण करते रहिए। उम्मीद है इसमें सब सार सार ही है, थोथा बिल्कुल नहीं। क्या भरोसा कभी आपको भी इस प्रकार का ज्ञान बांटने का अवसर मिल जाए …!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (15 जून से 21 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (15 जून से 21 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

 जय श्री राम। वर्तमान में गुरु कर्क राशि में विचरण कर रहे हैं। अर्थात उच्च के हैं। उच्च का गुरु कई लोगों को बहुत अच्छा फल देगा और कुछ राशियों के लिए यह भी अच्छा नहीं रहेगा। परंतु अगर हम श्री हनुमान जी की आराधना करें तो हमारे सभी प्रकार के कष्ट दूर होंगे तथा कोई भी ग्रह हमें दुख या तकलीफ नहीं दे सकता है। आज की हनुमान चालीसा की चौपाई है :-

संकट तें हनुमान छुड़ावै |

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ||

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से जातक सभी प्रकार के संकटों से मुक्त रहता है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 15 जून से 21 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह बुध मिथुन राशि में, गुरु और शुक्र कर्क राशि में शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। सूर्य प्रारंभ में वृष राशि में रहेगा तथा 15 जून के 8:01 रात से मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। इसी प्रकार मंगल प्रारंभ में मेष राशि में रहेगा तथा 20 तारीख के 10:48 रात से वृष राशि में प्रवेश कर जाएंगे।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। अच्छे कामों में धन का व्यय होना स्वाभाविक है। भाग्य से आपको मदद मिल सकती है। आपके जीवनसाथी को रक्त संबंधी कोई बीमारी जैसे ब्लड प्रेशर डायबिटीज आदि हो सकती है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 17, 18 और 19 तारीख कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान दें एवं शुक्रवार को मंदिर में जाकर सफेद वस्त्रो का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। व्यापार में वृद्धि होगी। कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। आपके पराक्रम में भी वृद्धि होगी। प्रतिष्ठा पहले जैसी ही रहेगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको कम मदद मिलेगी। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना पड़ेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। शत्रुओं को पराजित करने में आपको इस सप्ताह थोड़ी ज्यादा मेहनत लगेगी। मगर आपके प्रयासों के बाद शत्रु समाप्त हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 19 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर 20 और 21 तारीख किसी भी कार्य में सफलता प्रदान करने वाले हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत उच्च कोटि का रहेगा। आपका व्यापार उत्तम चलेगा। धन आने की अच्छी संभावना है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिलेगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। उनको अपने नीचे कार्य करने वाले लोगों से थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 15, 16 और 17 तारीख उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपकी कुंडली के गोचर में बहुत सुंदर गज केसरी योग बन रहा है। जिसके कारण आपको कई कार्यो में सफलता प्राप्त होगी। कचहरी के कार्यों में भी आपको धन खर्च करने के बाद सफलता मिल सकती है। अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। भाग्य के स्थान पर आपको इस सप्ताह अपने परिश्रम पर विश्वास करना चाहिए इस सप्ताह आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है इस सप्ताह आपके लिए 17, 18 और 19 तारीख विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। 15, 16 और 17 तारीख की दोपहर तक का समय आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस वर्ष आपके घर में कोई शुभ कार्य होगा जिसमें कि आपका काफी धन व्यय होगा। इस सप्ताह धन आने का भी अच्छा योगहै। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। व्यापार में धन लाभ भी है। भाग्य से भी आपको इस सप्ताह मदद मिलेगी। इस सप्ताह आपको शेयर आदि में धन लगाना चाहिए। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। आपको अपने संतान से इस सप्ताह अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपके पेट में पीड़ा हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 तारीख विभिन्न प्रकार के मामले में फल दायक हैं। 17, 18 और 19 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग है। अधिकारी एवं कर्मचारियों का समय अपने कार्यालय में बहुत अच्छा रहेगा। उनको कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर प्रमोशन का समय है तो प्रमोशन भी प्राप्त हो सकता है। व्यापार अच्छा चलेगा। प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। आपको अपने संतान से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े खट्टे और मीठे रहेंगे। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 15, 16 और 17 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए ठीक है। 20 और 21 तारीख को आपको सजग रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपके राज्य भाव में गजकेसरी योग बन रहा है। इस योग के कारण आपको अपने कार्यालय में अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। भाग्य से आपको इस सप्ताह लाभ होगा। व्यापार में भी आपको लाभ होगा। आपके संतान को इस सप्ताह थोड़ा कष्ट हो सकता है। उसका सहयोग पर्याप्त मात्रा में आपको प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। धन आने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए 17, 18 और 19 तारीख लाभदायक हैं। सप्ताह के बाकी दिन सामान्य है अर्थात ना बहुत ज्यादा अच्छे हैं और ना बहुत ज्यादा बुरे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका साथ देगा। इस सप्ताह आपको अपने दुश्मनों को पराजित करने पर पूरा ध्यान देना चाहिए। आपके थोड़े से प्रयास से ही आपकी दुश्मन परास्त हो सकते हैं। इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से मामूली मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। जरा सी असावधानी से भी कार्य खराब हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 19, 20 और 21 तारीख फलदायक है। 15, 16 और 17 तारीख को कार्यों को करने के पहले आपको पूरी सावधानी बरतना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए उत्तम है। उनकी मानसिक दशा अत्यंत अच्छी रहेगी। उनके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आपका व्यापार बहुत अच्छा चलेगा। धन आने का सामान्य योग है। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरते। आपको अपने संतान से सहायता मिल सकती है। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। भाई बहनों के साथ संबंध खराब हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 15, 16 और 17 तारीख की दोपहर तक का समय कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। 17 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर 18 और 19 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके सप्तम भाव में गजकेसरी योग बन रहा है जिसके कारण आपको प्रेम संबंधों में लाभ होगा। आपकी पारिवारिक स्थिति भी अच्छी रहेगी। जीवनसाथी से आपके संबंध बहुत अच्छे रहेंगे। व्यापार आपका ठीक चलेगा। अगर आप अविवाहित हैं तो विवाह के नए-नए प्रस्ताव आ सकते हैं। नए-नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। पुराने प्रेम संबंध प्रगाढ़ हो सकते हैं। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके दुश्मन इस सप्ताह शांत रहेंगे और अगर आप ज्यादा प्रयास करेंगे तो वह समाप्त भी हो सकते हैं। आपको अपने क्षेत्र में इस सप्ताह प्रतिष्ठा मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 17 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर 18 और 19 तारीख की दोपहर तक का समय कार्यों को करने के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन कल उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों के साथ अच्छा संबंध रहेगा। यह सप्ताह आपके संतान के लिए भी उत्तम है। आपके व्यापार में भी वृद्धि होगी। धन आने का योग है। गलत और सही दोनों रास्तों से धन आएगा। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं से थोड़ा सावधान रहना चाहिए। विशेष रूप से स्त्री शत्रुओं से। भाग्य से इस सप्ताह आपको विशेष लाभ नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 19 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर 20 और 21 तारीख लाभप्रद हैं। 17 तारीख की दोपहर से लेकर 18 और 19 तारीख की दोपहर तक का समय आपके लिए सचेत रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आएगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपका व्यापार ठीक रहेगा। आपके संतान को भी लाभ होगा। संतान से आपको अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई उत्तम चलेगी और उनको विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं में सफलता भी प्राप्त होगी। भाग्य साथ देगा। आपके कई कार्य भाग्य के सहारे हो सकते हैं। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा मगर गरदन या कमर में दर्द की शिकायत हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 15 16 और 17 तारीख प्रभावशाली है। 19, 20 और 21 तारीख को आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचना/Information ☆ डॉ मीना श्रीवास्तव – अभिनंदन – ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

डॉ मीना श्रीवास्तव 

🌺 अ  भि  नं  द  न  🌺

आपल्या समूहातील ज्येष्ठ लेखिका आणि अनुवादिका डॉ. मीना श्रीवास्तव यांच्या ‘एक चिरंतन चित्रपट : मुग़ल ए आझम’ या ग्रंथाला नुकताच ‘तितिक्षा आंतरराष्ट्रीय ग्रंथ पुरस्कार २०२६‘ अंतर्गत सर्वोत्कृष्ट लेखसंग्रह हा मानाचा पुरस्कार प्रदान करण्यात आला.

‘एक चिरंतन चित्रपट : मुग़ल ए आझम’ हे डॉ. मीना श्रीवास्तव यांचे पहिले मराठी पुस्तक आहे.

भारतीय चित्रपटसृष्टीतील सुवर्णपान मानल्या जाणाऱ्या ‘मुग़ल ए आज़म’ या कालजयी चित्रपटाच्या निर्मितीमागील तब्बल बारा वर्षांहून अधिक काळाचा संघर्ष, कलात्मकता, समर्पण आणि ऐतिहासिक प्रवास यांचा वेध या पुस्तकात घेण्यात आला आहे. या विषयावर मराठी भाषेत प्रकाशित झालेल्या मोजक्या आणि अभ्यासपूर्ण ग्रंथांपैकी हा एक महत्त्वाचा ग्रंथ मानला जातो. या बहुप्रतिष्ठित पुरस्कारामुळे मराठीतील चित्रपटविषयक अभ्यासपूर्ण लेखनाला न्याय मिळाल्याची भावना व्यक्त केली जात आहे.

या पुरस्काराबद्दल आपल्या सर्वांतर्फे डॉ. मीनाताईंचे मनःपूर्वक खूप खूप अभिनंदन आणि त्यांच्या पुढील अशाच यशस्वी साहित्यिक वाटचालीसाठी असंख्य हार्दिक शुभेच्छा.💐🙏

त्यांची पुरस्कार प्राप्त  पुस्तक ‘एक चिरंतन चित्रपट : मुग़ल ए आझम’  पुस्तक परिचय आज प्रकाशित करत आहोत.

संपादक मंडळ

 ई-अभिव्यक्ती मराठी

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ भैरवी… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ भैरवी… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

(स्त्रग्विणी – गालगा गालगा गालगा गालगा)

 चूक जाणून घे पाप वाटून घे

ताप झाला तरी शाप भोगून घे

काय आहे कमी सांग सारेच तू

लाज पाळू नको काम मागून घे

 *

खेळ खेळून जा मागचा तू पुन्हा

नेमका एक तू डाव टाकून घे

 *

पाहणारा नवी आस ठेवील ना

श्वास रोखून घे अंग झाकून घे

 *

आठवांचा तुझ्या बांध फोडू नको

खोल पाणी तिथे शांत न्हाऊन घे

 *

जीवनाची नशा वेड लावी मना

ताल सोडू नको फक्त नाचून घे

 *

अंत आहे पुढे टाळ त्याला जरा

सांग थांबायला वेळ टाळून घे

 *

थोरवी तू तुझी फार सांगू नको

जाणत्यांच्या पुढे मौन पाळून घे

 *

व्यर्थ कोणासही दोष लावू नको

कोण आहेस तू हेच पाहून घे

 *

ध्यास आहे तुला भैरवी गायचा

सूर छेडायला साज लावून घे

 

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ अश्रु ढाळले किती… कवी : डॉ. निशिकांत श्रोत्री ☆ रसग्रहण – नीलिमा खरे ☆

नीलिमा खरे

? काव्यानंद ?

☆ अश्रु ढाळले किती… कवी : डॉ. निशिकांत श्रोत्री ☆ रसग्रहण – नीलिमा खरे ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

☆ अश्रु ढाळले किती  ☆

तुला न जाणिव स्मृतीत तुझिया अश्रु ढाळले किती

भान विसरले सुन्न जाहले रडले मी एकांती ||ध्रु||

*

पुष्प बहरल्या उपवनातुनी लपेटून गंध

भृंग-कळ्यांना खिजवित दावून अपुली प्रीत धुंद

उरात जपुनी धुंद आठवणी दिवस कंठले किती

अश्रु ढाळले किती ||१||

*

तरूतळी संध्यालाली पसरे मृद्गंधाची साथ

आणा भाका कितीक शपथा हाती होते हात

आता अंधुक सांजेपाठी काजळलेल्या राती

अश्रु ढाळले किती ||२||

*

प्रेम आपुले शोभतसे ते मनिच्या क्षितिजावरती

सौंदर्याची केवळ पखरण काही नाही हाती

जीवन झाले आता मृगजळ उगीच आशा होती

 अश्रु ढाळले किती ||३||

*

तुझ्याचसाठी जीवन जगणे जपले स्वप्न उरी

तुझ्याविना हा काळ कंठला मुग्ध राहुनी जरी

कवटाळुनिया मरण उराशी जगत राहिले अति

अश्रु ढाळले किती ||४||


©️ डॉ. निशिकान्त श्रोत्री
एम.डी., डी.जी.ओ.

रसग्रहण: अश्रु ढाळले किती

माणसाचे आयुष्य म्हणजे केवळ वय वाढणे नक्कीच नाही. नानाविध भावनांची अनुभूती व त्यांचा अविष्कार जीवनात होत असतो.. या भावनांचे प्रकटीकरण करणे, त्यांचे विवरण यथार्थ शब्दातून मांडणे ही आंतरीक भावना सर्वांना असते. कवी मनाच्या लोकांना तर ती नेहमीच खुणावते.. अर्थात काही वेळा हे असे अनुभव कवीचे स्वतःचे ही असूच शकतात.. भावनांना शब्दांचे साज देऊन कवी कविता रुपात ही अनुभूती काव्यरसिकांसमोर सादर करतो. यथार्थ, अर्थवाही, अर्थपूर्ण काव्यरचना करताना कवी त्याच्याकडील शब्दभांडार कवितेच्या रूपावर उधळून देतो. कवितेचे हे शृंगारलेले रूप पाहून, वाचून वाचक /रसिक सहजपणे मोहित होतो. भावनेची प्रांजलता आणि तिचे हे साजिरे रूप घेऊन आलेली, मनावर गारुड करणारी अशीच एक भावकविता वाचण्यात आली. कवी आहेत डॉक्टर निशिकांत श्रोत्री… त्यांच्या निशिगंध या काव्यसंग्रहातील हे भावगीत. आज या कवितेचा आस्वाद घेऊ या.

 “अश्रु ढाळले किती” या शीर्षकावरून या कवितेत विरह /दुःख भावनांचा आविष्कार असणार हे रसिक वाचकांच्या लक्षात येतेच. यथार्थ व अर्थपूर्ण काव्यशीर्षकामुळे वाचकांच्या मनात मनोज्ञ भावनेचे शब्दचित्र नक्कीच तयार होते. या जाणिवेला अतिशय उच्च स्तरावर नेणारी आणि तितकीच भावगर्भितता देणारी ही कविता. काव्यशीर्षकातून उमगलेल्या भाववृत्तीचे अतिशय सुंदर शब्दचित्रण या कवितेत केलेले दिसते.

सर्वप्रथम या ठिकाणी मुद्दाम नमूद करावेसे वाटते की ही संपूर्ण कविता “तिच्या” भावनेशी निगडित आहे. तिच्या अंतरंगातून उमटलेल्या आवाजांचा नाद आहे. कवी पुरुष असूनही त्यांनी या स्त्रीच्या भावनेला पूर्णपणे न्याय देऊन त्या प्रकारची शब्दयोजना आणि भाव या कवितेतून व्यक्त केले आहेत. त्यासाठी लागणारे तरल मन कवीपाशी असल्यामुळेच हे शक्य झाले आहे हे निश्चित…

 

तुला न जाणिव स्मृतीत तुझिया अश्रु ढाळले किती

भान विसरले सुन्न जाहले रडले मी एकांती ||ध्रु||

 

कवितेतील “ती” परिस्थितीवश एकांत भोगते आहे खरं तर एकटी पडली आहे हे म्हणणे योग्य ठरेल. कारण हा एकांत तिच्या दृष्टीने अजिबात सुखावह नाही. तिला अतीव प्रिय असलेल्या प्रियकराचा शाश्वत विरह घडवून नियतीने हा तिच्यावर लादलेला आहे. साहजिकच या नकोनकोशा एकांतात ती स्वतःबरोबरच आजूबाजूच्या लोकांचे ही भान विसरली आहे. “भान हरपणे” न म्हणता “भान विसरले” अशी शब्दयोजना केल्याने कवीचे साहित्यिक भान लक्षात येते. दुःखामध्ये सर्व गोष्टींचा विसर पडतो हे लक्षात घेऊन अशी सुयोग्य शब्दरचना केली आहे. विरहाचा दुःखद धक्का प्राक्तनाने जीवनात तिला दिला आहे. अशा परिस्थितीत अटळ सत्याचे भान ती विसरली आहे हे गर्भित अर्थाने सूचित केले आहे. वरवर साधा सोपा सरळ अर्थ वाटतो पण कवीने सहजपणे गहन अर्थ यातून व्यक्त केला आहे. या सहेतुकपणामुळे कवितेतील तिच्या भावावस्थेकडे प्रकर्षाने लक्ष जाते. ती सुन्न, बधिर होवून जाणिवेच्याही पलीकडे गेलेली आहे. एकांतात ती केवळ रडली आहे. त्याच्या नसण्याने त्याच्या स्मृती तिच्या मनात प्रकर्षाने उचंबळून येतात. आपसूकच तिने अश्रू ढाळले आहेत. “किती” या शब्दांतून अगणित, गणना करता न येणारे हा सूचक भावार्थ अपेक्षित आहे. तिच्या या जाणिवेची त्याला जाणीव नसणारच कारण तो या “अशा” भावनिक जाणीवेच्या पलीकडे गेलेला आहे. ही जाणीव आता त्याला कधीच जाणवणार नाहीये. अतिशय सहजपणे साध्या, सोप्या शब्दांतून मृत्यूचे अटळ सत्य उलगडले आहे. मोजक्या व यथार्थ शब्दातून तिच्या भावनेचा स्तर आणि तीव्रता या ध्रुवपदातून लक्षात येते. अन् म्हणूनच सहजपणे वाचक तिच्या भावनांशी नकळतच जोडला जातो.

 

पुष्प बहरल्या उपवनातुनी लपेटून गंध

भृंग-कळ्यांना खिजवित दावून अपुली प्रीत धुंद

उरात जपुनी धुंद आठवणी दिवस कंठले किती//१//

 

सुमनविकसित उपवनात गंधांची उधळण झालेली असणार हे गृहीत आहे. येथे पुष्पबहर म्हणजे प्रीतीचा बहर. प्रेमाच्या उपवनी प्रीतपुष्पे बहरली.. त्यांचा

गंधदरवळ तनामनावर/तनामनाशी लपेटून घेतला. “लपेटून”शब्द फारच सुंदर व सुयोग्य.. भरपूर प्रमाणात उपलब्ध असलेला व काळजाजवळ असलेला गंध.. लपेटून हा अर्थपूर्ण व अर्थवाही शब्द यासाठी वापरला आहे. विकसित फुलांवर रुंजी घालणारे भुंगे तसेच इतर

अविकसित, अजून न फुललेल्या कळ्या यांना आपल्या धुंद प्रीतीचे प्रदर्शन करुन या युगुलाने खिजवले आहे. इथे भुंगे म्हणजे इतरेतर जे प्रीतीचा गंध व अनुभव घेत आहेत. त्यांच्यापेक्षा आपली प्रीती उच्च दर्जाची तसेच अधिक गहिरी आहे हे जाणवून दिले आहे. कळ्यांचा संदर्भ ज्यांनी अजून प्रेमाचा अनुभव घेतला नाही त्यांच्याशी आहे. “खिजवित” या शब्दातून स्वतःच्या गहिऱ्या प्रेमाचे जाणूनबुजून प्रदर्शन केले हा भाव व्यक्त केला आहे.

या कडव्यात अतिशय कल्पकतेने रूपक, चेतनागुणोक्ती तसेच अतिशयोक्ती अलंकारांचा वापर करून कवीने प्रेमाचा अनोखा स्तर वर्णिला आहे. अशा या धुंद प्रीतिच्या धुंद आठवणी मनात नव्हे तर उरात जपून तिने कितीतरी (अनेक असा अर्थ)दिवस कंठले आहेत.. “उरात”शब्दातून आत्यंतिक जवळ हा अर्थ लक्षात येतो. “कंठणे”म्हणून नाईलाजास्तव ती जगत आहे याकडे निर्देश केला आहे. पहिल्या दोन चरणातले यमक व तिसऱ्या चरणाचे ध्रुवपदाशी साधलेले यमक सहज सुंदर… साहजिकच कवितेला मोहक लय व गेयता लाभली आहे.

 

तरूतळी संध्यालाली पसरे मृद्गंधाची साथ

आणा भाका कितीक शपथा हाती होते हात

आता अंधुक सांजेपाठी काजळलेल्या राती

अश्रु ढाळले किती ||२||

समय /काळ सरत राहिला. सांजवेळ सामोरी आली. अशावेळी झाडाच्या मुळात/अंतरंगात संध्येची लाली पसरते. अन् कातरवेळी कातर झालेल्या काळजाला जणू काही फक्त ओलावलेले डोळे साथ व साद देतात, घालतात. हे वाहणारे अश्रूं जमिनीवर पडून त्याचा गंध (मृद्गंध) मनाला साथ देतो. झाडाची मुळे जशी जमिनीत खोलवर जातात तसेच तिच्या ही मनात प्रीत खोलवर रूजलेली आहे. येथे तरू म्हणजे ती व संध्या म्हणजे वाढलेले वय/आयु… तसेच केवळ त्याच्या आठवणीने तिच्या गाली लाली पसरली असा अजून एक अर्थ.. माणूस अंतिमतः मातीत मिसळतो हे सत्य नाकारता येत नाही. तो गंध तिला साद घालतो आहे असा ही भावार्थ… अतिशय सुंदर रूपक… कवितेतील भावनेला अधिक अर्थ देणारे.. तिला अशा वेळी मनात जाग्या असलेल्या, कधी काळी घेतलेल्या साऱ्या आणाभाका, शपथा पुन्हा एकदा आठवतात. तेव्हा एकमेकांचे हात हातात होते… एकमेकांना एकमेकांची साथ होती, संगत, सोबत होती. आता मात्र अंधुक सांजेपाठी अटळपणे येणाऱ्या काजळलेल्या, काळोख्या रात्री नजरेतून, काळजातून व्यक्त होत आहेत. त्याच्या नसण्याने तिचे आयुष्य अंध:कारमय झाले आहे. प्रीतिचा अस्त म्हणजे रात्र झाली आहे.

 

प्रेम आपुले शोभतसे ते मनिच्या क्षितिजावरती

सौंदर्याची केवळ पखरण काही नाही हाती

जीवन झाले आता मृगजळ उगीच आशा होती

 अश्रु ढाळले किती ||३||

 

या साऱ्या सुखद व दु:खद आठवात तिला प्रकर्षाने जाणवते की त्यांचे हे प्रेम तिच्या मनाच्या क्षितिजावरती शोभून दिसते आहे. अर्थात क्षितिजाप्रमाणे आता ते भासमान व दूरवर आहे. थोडक्यात तिला वास्तवाची जाणीव ही आहे. या रम्य आठवणी आता केवळ मनात जाग्या आहेत. प्रीतिच्या सौंदर्याची काल्पनिक पखरण फक्त हृदयात व हृदयातून आहे. यातले काहीच आता पुन्हा प्रत्यक्षात घडणार नाही. “काही नाही हाती”यातून हातात हात नाहीत, सोबत उरली नाही. शब्दशः हातात हात नाहीत हे जाणवून दिले आहे. तसेच “हाती न लागणे”म्हणजे न गवसणे.. श्लेष फारच छान… प्रीतभावनेने समृद्ध झालेले भावविश्व आता काळाआड गेले आहे.

जीवन हेच मृगजळाप्रमाणे भासमान झाले आहे. त्याच्या प्रत्यक्ष अस्तित्वाची भावना खरी नाही हे तृषार्त मनाला जाणवले आहे. मृगजळाची आशा जशी खोटी असते तशीच आशा आता जीवनाविषयी वाटते आहे. जीवन या शब्दावरील श्लेषही अत्यंत समर्पक. जीवन म्हणजे पाणी व आयुष्य. तिच्या जीवनाला लागलेली प्रेमाची तहान कधीच भागणार नाही हे सत्य तिच्या मनाने स्वीकारले आहे.

 

तुझ्याचसाठी जीवन जगणे जपले स्वप्न उरी

तुझ्याविना हा काळ कंठला मुग्ध राहुनी जरी

कवटाळुनिया मरण उराशी जगत राहिले अति

अश्रु ढाळले किती ||४||

 

त्याच्या अनुपस्थितीत केवळ त्याच्याचसाठी जीवन जगणे हे स्वप्न तिने उरात बाळगले होते. तुझ्याचसाठी मधील “च” भावनेची सत्यता व तीव्रता जाणवून देणारा. तिला स्वतःला जीवनाविषयी कुठल्याही प्रकारची आस राहिलेली नाही. केवळ त्याच्यासाठी जगणे हाच तिच्या जीवनाचा उद्देश होता, ते तिचे स्वप्न होते. ते तिने प्रामाणिकपणे उरात जपले. त्याच्याशिवाय जगताना हा सर्वकाळ तिने मुग्ध राहून, अबोल राहून कंठला. मुग्ध

शब्दातून एखाद्या कळी प्रमाणे ती विकसित न होता जगली. नाईलाजाने जगताना जाणीवपूर्वक मुग्धता राखली. परंतु हा काळ बिलकुल सोपा नव्हता. मरणाला उराशी कंटाळून ती जगत होती. “अति”, या शब्दातून तिला नकोसे असताना व तिला वाटणाऱ्या गरजेपेक्षाही जास्त ती जगली अशी तिची भावना जाणवते. अर्थात त्याच्या शिवाय जगताना सारे आयुष्य “अति” झाले, जास्त झाले. एखादी गोष्ट नको असताना जेव्हा प्रमाणाबाहेर घडते तेव्हा हे “अति झाले” असे आपण म्हणतो.

“जीवन जगणे जपले”, “काळ कंठला” यातील अनुप्रास, पहिल्या दोन चरणातील यमक व शेवटच्या चरणातील ध्रुवपदाशी साधलेले यमक सहज व अर्थपूर्ण वाटते.

 

मनातल्या प्रांजल प्रीतीच्या प्रांजळ भावनेला व आपल्या प्रियकर / पतीच्या शिवाय जगताना जाणवलेल्या अंतरीच्या अनुभूतीला अतिशय काव्यात्मतेने, विविध साहित्यालंकारांनी नटवून या कवितेत प्रस्तुत केले आहे. नैसर्गिक भावनेतील खरेपणा जपून तो लयबद्ध पद्धतीने व्यक्त केला आहे. ही कविता सूर्यकांत या मात्रावृत्तात रचली आहे. काव्यवाचकांना हृदयाला थेट भिडणारे हे सुंदर भावगीत नक्कीच आवडेल. कवीचे तरल मन व साहित्यिक जाणीव कौतुकास्पद.. , मनाला भुरळ घालणारी…

 

© नीलिमा खरे

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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