( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
(क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण)
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् । 35।।
महारथी जो समझते , तुझको वीर महान
तुझे हटे रणभूमि से देंगे क्या सम्मान ?।।35।।
भावार्थ : और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे।।35।।
The great car-warriors will think that thou hast withdrawn from the battle through fear; and thou wilt be lightly held by them who have thought much of thee. ।।35।।
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
I teach what everyone seeks but finds it difficult to achieve. It remains more and more elusive as one chases it. Everyone believes he knows everything about it but is, in fact, ignorant and often misguided. I am talking about happiness and well-being.
According to Sonja Lyubomirsky, Professor of Psychology at the University of California, Riverside, “One of the greatest obstacles to attaining happiness is that most of our beliefs about what will make us happy are in fact erroneous. Yet they have been drummed into us, socialized by peers and families and role models and reinforced by the stories and images ever present in our culture. Many of the presumed sources of happiness seem so intuitive and commonsensical that all of us – even happiness researchers! – are prone to fall under their spell.”
The happiness myths need to be understood and overcome. You can teach yourself to be happy. The art and science of happiness and well-being can be learned and taught.
At LifeSkills, we have gone deep to blend the best of the modern science of Positive Psychology with the ancient wisdom of Yoga and Meditation. We have added a dash of Laughter Yoga into the cask to make it sparkle. Our programmes show the pathway to authentic happiness, well-being and fulfillment. We help you to flourish!
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के एक प्रश्न का विभिन्न लेखकों के द्वारा दिये गए विभिन्न उत्तरआपके ज्ञान चक्षु तो अवश्य ही खोल देंगे। तो प्रस्तुत है यह प्रश्नोत्तरों की श्रंखला।
वर्तमान समय में ठकाठक दौड़ता समाज घोड़े की रफ्तार से किस दिशा में जा रहा, सामूहिक द्वेष और स्पर्द्धा को उभारकर राजनीति, समाज में बड़ी उथल पुथल मचा रही है। ऐसी अनेक बातों को लेकर हम सबके मन में चिंताएं चला करतीं हैं। ये चिंताएं हमारे भीतर जमा होती रहतीं हैं। संचित होते होते ये चिंताएं क्लेश उपजाती हैं, हर कोई इन चिंताओं के बोझ से त्रास पाता है ऐसे समय लेखक त्रास से मुक्ति की युक्ति बता सकता है। एक सवाल के मार्फत देश भर के यशस्वी लेखकों की राय पढें इस श्रृंखला में………
तो फिर देर किस बात की जानिए वह एकमात्र प्रश्न और उसके अनेक उत्तर। प्रस्तुत है चौथा उत्तर दैनिक विजय दर्पण टाइम्स ,मेरठ से कार्यकारी संपादक श्री संतराम पाण्डेय जी की ओर से –
सवाल : आज के संदर्भ में, क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम ?
मेरठ से श्री संतराम पाण्डेय जी ___4
(श्री संतराम पाण्डेय जी मेरठ से दैनिक विजय दर्पण टाइम्स के कार्यकारी संपादक हैं।)
सवाल-आज के संदर्भ में, क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम?
-संतराम पाण्डेय-
मूल प्रश्न पर आने से पहले हम एक अन्य तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं। लेखक है क्या? वह क्या कर सकता है? इसका जवाब यही है कि लेखक में बहुत शक्ति है। वह कुछ भी कर सकता है।
संत तुलसीदास का कार्यकाल (1511-1623 ई.) ऐसा समय था, जब भारतीय समाज भटका हुआ था। इतिहास की जानकारी रखने वाले जानते हैं कि उस वक्त देश में लोदी वंश, सूरी वंश, मुगल वंश (1526 से लेकर 1857 तक, जब मुगल वंश का शासन समाप्त हुआ) का शासन था। भारतीय समाज बिखरा हुआ था। उसमें एक डर बसा हुआ था। वह खुलकर अपनी बात भी नहीं कह सकता था। ऐसे वक्त में उसे कोई राह दिखाने वाला भी नहीं था। तब संत तुलसीदास का जन्म हुआ। संत बनने के बाद निश्चित रूप से उन्होंने समाज की दयनीय हालत को देखा होगा। लेकिन, एक संत क्या कर सकता था। वह किसी से न तो खुद लड़ सकता था और न ही किसी को लडने की सलाह दे सकता था। ऐसे में उन्हें यह समझ में आया होगा कि इस वक्त भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधने और उसके मन से डर निकालने की जरूरत है और उसी वक्त उनके द्वारा राम चरित मानस की रचना की गई। भारतीय समाज उसमें रच बस गया। वह कहीं एकत्र होता तो अपनी गुलामी की बात न करके राम के प्रति भक्ति की बात करता। उन्होंने समाज को एक दिशा दी। समाज बदलने लगा था।
आते हैं लेखक के समाज के घोडे की आंख होने या लगाम होने की। एक लेखक निश्चित रूप से समाज के घोड़े की आंख है। शर्त यही है कि उसका लक्ष्य तय हो। समाज के घोड़े की आंख। यानी, घोड़े की आंख आजाद नहीं होती। इच्छा यही रहती है कि वह उतना ही देखे, जितना समाज चाहे। इसे इस तरह समझ सकते हैं कि समाज की जरूरत के हिसाब से ही घोड़ा देखे। घोड़े की आंख की प्रकृति यह है कि उसकी दृष्टि का दायरा लगभग 180 डिग्री तक है। इसलिए घोड़े की दृष्टि में आसपास का क्षेत्र और कुछ हद तक पीछे का भी रहता है। ऐसे में घोड़ा बहुत कुछ देखता है। इसलिए उसके भटकने की संभावना ज्यादा रहती है। बहुत कुछ देखकर घोड़ा बिदक जाता है और इससे नुकसान की गुंजाइश बन ही जाती है।
घोड़ा तो घोड़ा है। लेखक में घोड़े की प्रकृति तो है लेकिन वह आत्मनियन्ता है। उसमें स्वयं को नियंत्रित करने की क्षमता होती है, घोड़े में नहीं। जिस लेखक में स्वयं को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं होती, उसके भटकने की प्रबल संभावना रहती है और समाज को नुकसान पहुंचाने का कारण बन जाता है। इसलिये यह कहना उपयुक्त है कि लेखक सशर्त समाज के घोड़े की आंख है।
अब लगाम की बात करते हैं। एक लेखक अपनी लेखनी से समाज की दिशा तय करने की सामथ्र्य रखता है। वह समाज को नियंत्रित भी करता है। समाज को भटकने से बचाता भी है। जैसे कि संत तुलसीदास ने अपने समय में समाज को भटकने से बचाया। क्या लेखक समाज के घोड़े की आंख है या लगाम? तो माकूल जवाब मेरी नजर में यही है कि एक आदर्श लेखक समाज के घोड़े की आंख भी है और लगाम भी।
आज के संदर्भ की बात करते है तो पाते है कि कुछ लेखक न तो समाज के घोड़े की आंख ही बन पा रहे है और न ही लगाम। वह न घर के हो रहे हैं और न ही घाट के। स्वार्थ ने ऐसे लेखकों को भटका दिया है। इसके बावजूद अधिकांश लेखक ऐसे हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से समझौता नहीं किया और वह समाज के घोड़े की आंख भी बने और लगाम भी। घोड़े की आंख पर चश्मा बांधकर उसकी दृष्टि के दायरे को 30 डिग्री तक सीमित किया जा सकता है लेकिन एक लेखक की दृष्टि के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता। उसकी आंख पर पट्टी नहीं बंधी जा सकती। वह सब कुछ देखता है और विषम परिस्थितियों में भी वह अपने भटकने की संभावना को स्वयं ही खारिज कर देता है। समाज हित में भी यही है कि एक लेखक समाज की आंख का घोड़ा भी बना रहे और लगाम भी।
बता दें कि इंसानी जीवन में घोड़े का इस्तेमाल इंसान अपने फायदे के लिए करता आया है और लेखक का भी इस्तेमाल समाज हित में ही हुआ है। वर्तमान संदर्भ में लेखक बहु उद्देशीय बन गया है। वह बहुत कुछ एक साथ करना चाहता है और देखना चाहता है। ऐसे में वह भटकाव का शिकार भी हुआ है। इससे बचने की जरूरत है। जरूरत यह भी है कि लेखक समाज के घोड़े की आंख भी बना रहे और लगाम भी।
(प्रस्तुत है श्रीमति सुजाता काले जी की एक भावप्रवण कविता जो उजागर करती है शायद आपके ही आसपास के पोस्टर्स की दुनिया की एक झलक।)
वर्षा ऋतू खत्म हुई,
पुनः स्वच्छता अभियान शुरू हुआ है,
पालिका द्वारा रास्ते, गलियों की
सफाई जोरों से हो रही है ।
शैवाल चढ़े झोपड़ों की
दीवारें पोंछी गई हैं …!
सुन्दर बंगलों की चारदीवारी
साफ़ की गई हैं … !
उन्हें रंगकर उनपर गुलाब, कमल
के चित्र बनाये गए हैं … !
दीवारों पर रंगीन घोष वाक्य लिखे गए हैं :
‘स्वस्थ रहो, स्वच्छ रहो।’
‘जल बचाओ, कल बचाओ।’
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।’
जगह- जगह पोस्टर्स लगे हुए हैं;
सूखा और गीला कचरा अलग रखें !
पांच ━ छह वर्ष के बच्चें ,
कचड़े में अन्न ढूँढ रहे हैं… !
झोंपड़ी की बाहरी रंगीन दीवार देखकर,
दातुन वाले दाँत हँस रहे हैं !
अंदरूनी दीवारों की दरारें,
गले मिल रही हैं !
कहीं-कहीं दीवारों की परतें,
गिरने को बेताब हैं !
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ लिखी –
दीवार के पीछे सोलह वर्ष की
लड़की प्रसव वेदना झेल रही है !
बारिश में रोती हुई छत के निचे,
रखने के लिए बर्तन कम पड़ रहे हैं।
‘जल बचाओ’ लिखी हुई दिवार,
चित्रकार पर हँस रही है…..!
बस्ती के कोने में कचड़े का ढेर है ।
सूखे और गीले कचड़े के डिब्बे,
उलटे लेटे हुए हैं !
पालिका का सफाई कर्मचारी,
तम्बाकू मल रहा है !
‘जब पढ़ेगा इंडिया, तब आगे बढ़ेगा इंडिया’
का पोस्टर उदास खड़ा है …..!
यह कैसी विसंगति लिखने में है !!
इन झोपड़ियों के अंदर का विश्व,
पोस्टर्स छिपा हुआ है,
कोई कहीं से दो पोस्टर्स ला दे मुझे
जो गरीबी और बेकारी
ढूँढकर ……. हटा दे उन्हें !!!
(श्री सुजित कदम जी की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं। इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं।)
काल खूप वर्षांनंतर एक ओळखीचे काका भेटले, मस्त गप्पा मारल्या…!
मला म्हटले ,”काय करतोस..?” मी म्हटलं…”.छोटसं दुकान आहे…”
मी काही बोलायच्या आधीच.. त्यांनी बोलायला सुरुवात केली..;
”ह्या सोसायटीत माझा मोठा फ्लॅट आहे..,
घरात धुणं भाड्यांला कामवाली आहे..,
फोर व्हिलर ही आहे..; पण ह्या वयात चालवायला भिती वाटते, आम्ही दोघंच असतो बघ इथे रहायला…!
पेन्शन मध्ये जेवढं भागवता येईल तेवढं भागवतो .
मोठा मुलगा अमेरिकेत असतो…
दुसरा मुलगा ईथे जवळजच राहतो …,
दोघांनाही त्यांच्या मनासारखं शिकवलं..
आता ते दोघेही *वेल सेटल* आहेत…”
काका मनसोक्त बोलत होते मी ऐकत होतो…,
”वर्षां दोन वर्षांनी मोठा अमेरिकेतून मुलगा येतो भेटायला.. काही दिवस राहतो.. त्याची इथली कामे झाली की विचारतो, ” किती पैसे देऊ? ”
”बेटा पैसाच आता आमच्यातला दुरावा बनत चाललाय बघ. आमच्या गरजा आता भावनिक आहेत. ”
”दुसरा मुलगा खूपच बिझी असतो त्याला तर अजिबात वेळ मिळत नाही… मीच दिवसभर एखादी चक्कर मारतो त्याच्याकडे..!”
“मुलं मोठी झाल्यावर… थोडं आपणच समजून घ्यायला हवं..आपणच..,मुलांना आभाळ मोकळं करून दिलंय किती उंच उडायचय हे त्यांच त्यांनी ठरवायचं….;फक्त उडताना त्यांनी घरचा रस्ता विसरू नये एवढंच…!”
“बरं माझ सोड …
तू सांग तूझ कस चाललय …?
मी म्हटलं..” छान चाललयं….”
“दोन मुलं आहेत… लहान आहेत अजून..”
यावर ते म्हणाले , “वाह… छान..
त्यांना ही आभाळ मोकळ करून दे…!
तुझ्या मुलांना ते म्हणतील ते सारं काही दे पण दुसर्या साठी वेळ द्यायचा असतो हे देखील शिकवता आलं तर जरूर शिकव या नव्या पिढीला. . . !
तुझ्या लेकरांना दैदीप्यमान भरारी घेण्यासाठी दशदिशा खुल्या करून दे पण त्यांना घरी परतण्यासाठी रस्ता मात्र एकच ठेव…;
पुस्तके वाचायला शाळेत शिकतीलच . . पण या दुनियेत जगण्यासाठी माणसं वाचायला शिकव. म्हातारपणी आधार हवा असतो बेटा. . डेबिट कार्ड नको असतं . . आपल माणूस आपल्या शिलकीत पाहिजे. . . यशोकीर्तीच्या घडणावणीत आपल लेकरू आपल रहात नाही आणि मग सुरु होतं वाट पहाणं.
तुझ्या मुलांना पैसा कमवायला आणि प्रेम वाटायला शिकव म्हणजे मग माझ्यासारखी तुला वाट पहावी लागणार नाही…! ”
(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
Happiness and well-being is not a thing. The modern science of happiness and well-being describes it as a ‘construct’.
For example, ‘weather’ is a construct. Ask any meteorologist, and he will tell you: weather is not a thing, it is a construct – a construct of temperature, humidity, barometric pressure, wind speed and a host of other factors.
The elements of well-being include positive emotion, engagement or flow, positive relationships, meaning and accomplishment.
A couple of additional features from out of self-esteem, optimism, resilience, vitality and self-determination are required to really flourish.
This means you have to dig a bit deeper to understand fully what is happiness and well-being. It’s not as simplistic as saying: happiness is within us.
Happiness does not come to you on its own. You have to act in order to achieve it.
The good news is that we can learn to enhance our levels of happiness and well-being.
Everyone wants to be happy. Here are some simple happiness mantras:
Every morning, do yoga and meditation – or walk and exercise.
During the day, smile and be kind to all.
In the evening, look back at 3 things that went well in the day.
During the week-end, spend quality time with your family and friends.
Engage deeply in work, studies, play, love and parenting.
Devote yourself to a meaningful humanitarian or social cause.
Share an occasional ice-cream or chocolate with a child.
हिन्दू नववर्ष, चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा वर्ष प्रतिपदा
(हिन्दू नववर्ष, चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा वर्ष प्रतिपदापर्व पर डॉ उमेश चंद्र शुक्ल जी का विशेष आलेख उनके व्हाट्सएप्प से साभार। )
*हिन्दू नववर्ष, चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा वर्ष प्रतिपदा पर आपको एवम् आपके परिवार को ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं*
*चैत्र शुक्ल प्रतिपदा,*
*विक्रमी संवत् २०७६*
*सृष्टि संवत् १९६०८५३१२० वर्ष*
*दिनांक – ६ अप्रैल शनिवार २०१९ ई.
*सनातन महत्व-*
सृष्टि संवत्
मनुष्य उत्पत्ति संवत्
वेद संवत्
देववाणी भाषा संवत्
सम्पूर्ण प्राणी उत्पत्ति संवत्
*ऐतिहासिक महत्व -*
विक्रम संवत्
शक संवत्
आर्य सम्राट विक्रमादित्य जन्मदिवस
युधिष्ठिर राज्याभिषेक दिवस
आर्यसमाज स्थापना दिवस
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव वर्ष प्रारंभ होता है। इसी दिन सूर्योदय के साथ सृष्टि का प्रारंभ परमात्मा ने किया था। अर्थात् इस दिन सृष्टि प्रारंभ हुई थी तब से यह गणना चली आ रही है।
यह नववर्ष किसी जाति, वर्ग, देश, संप्रदाय का नहीं है अपितु यह मानव मात्र का नववर्ष है। यह पर्व विशुद्ध रुप से भौगोलिक पर्व है। क्योकि प्राकृतिक दृष्टि से भी वृक्ष वनस्पति फूल पत्तियों में भी नयापन दिखाई देता है। वृक्षों में नई-नई कोपलें आती हैं। वसंत ऋतु का वर्चस्व चारों ओर दिखाई देता है। मनुष्य के शरीर में नया रक्त बनता है। हर जगह परिवर्तन एवं नयापन दिखाई पडता है। रवि की नई फसल घर में आने से कृषक के साथ संपूर्ण समाज प्रसन्नचित होता है। वैश्य व्यापारी वर्ग का भी आर्थिक दृष्टि से यह महीना महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे यह पता चलता है कि जनवरी साल का पहला महीना नहीं है पहला महीना तो चैत्र है, जो लगभग मार्च-अप्रैल में पड़ता है। १ जनवरी में नया जैसा कुछ नहीं होता किंतु अभी चैत्र माह में देखिए नई ऋतु, नई फसल, नई पवन, नई खुशबू, नई चेतना, नया रक्त, नई उमंग, नया खाता, नया संवत्सर, नया माह, नया दिन हर जगह नवीनता है। यह नवीनता हमें नई ऊर्जा प्रदान करती है।
नव वर्ष को शास्त्रीय भाषा में नवसंवत्सर (संवत्सरेष्टि) कहते हैं। इस समय सूर्य मेष राशि से गुजरता है इसलिए इसे *”मेष संक्रांति”* भी कहते हैं।
प्राचीन काल में नव-वर्ष को वर्ष के सबसे बड़े उत्सव के रूप में मनाते थे। यह रीत आजकल भी दिखाई देती है जैसे महाराष्ट्र में गुडीपाडवा के रुप में मनाया जाता है तथा बंगाल में पइला पहला वैशाख और गुजरात आदि अनेक प्रांतों में इसके विभिन्न रूप हैं।
नववर्ष का प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व-
आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही परम पिता परमात्मा ने १९६०८५३१२० वर्ष पूर्व यौवनावस्था प्राप्त मानव की प्रथम पीढ़ी को इस पृथ्वी माता के गर्भ से जन्म दिया था। इस कारण यह “मानव सृष्टि संवत्” है।
इसी दिन परमात्मा ने अग्नि वायु आदित्य अंगिरा चार ऋषियों को समस्त ज्ञान विज्ञान का मूल रूप में संदेश क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में दिया था। इस कारण इस वर्ष को ही वेद संवत् भी कहते हैं।
आज के दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त कर वैदिक धर्म की ध्वजा फहराई थी। (ज्ञातव्य है कि भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल षष्ठी को हुआ था ना की प्रतिपदा अथवा दीपावली पर) (विजयादशमी व दीपावली का श्रीराम से कोई संबंध नहीं है देखे श्रीमद् वाल्मीकि रामायण)।प0
आज ही से कली संवत् तथा भारतीय विक्रम संवत् युधिष्ठिर संवत् प्रारंभ होता है।
आज ही के शुभ दिन विश्व वंद्य अद्वितीय वेद द्रष्टा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने संसार में वेद धर्म के माध्यम से सब के कल्याणार्थ “आर्य समाज” की स्थापना की थी। इसी भावना को ऋषि ने आर्य समाज के छठे नियम में अभिव्यक्त करते हुए लिखा *”संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना”*
महानुभावों! इन सब कारणों से यह संवत् केवल भारतीय या किसी पंथ विशेष के मानने वालों का नहीं अपितु संपूर्ण विश्व मानवों के लिए है।
आइए! हम सार्वभौम संवत् को निम्न प्रकार से उत्साह पूर्वक मनाएं -*
यह संवत् मानव संवत् है इस कारण हम सब स्वयं को एक परमात्मा की संतान समझकर मानव मात्र से प्रेम करना सीखें। जन्मना ऊंच-नीच की भावना, सांप्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रीयता, संकीर्णता आदि भेदभाव को पाप मानकर विश्वबंधुत्व एवं प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव जगाएं। अमानवीयता व दानवता का नाश तथा मानवता की रक्षा का व्रत लें।
आज वेद संवत् भी प्रारंभ है। इस कारण हम सब अनेक मत पंथों के जाल से निकलकर संपूर्ण भूमंडल पर एक वेद धर्म को अपनाकर प्रभु कार्य के ही पथिक बनें। हम भिन्न-भिन्न समयों पर मानवों से चलाए पंथों के जाल में न फसकर मानव को मानव से दूर न करें। जिस वेद धर्म का लगभग २ अरब वर्ष से सुराज्य इस भूमंडल पर रहा उस समय (महाभारत से पूर्व तक) संपूर्ण विश्व त्रिविध तापों से मुक्त होकर मानव सुखी समृद्धि व आनंदित था। किसी मजहब का नाम मात्र तक ना था। इसलिए उस वैदिक युग को वापस लाने हेतु सर्वात्मना समर्पण का व्रत लें। स्मरण रहे धर्म मानव मात्र का एक ही है, वह है वैदिक धर्म।
वैदिक धर्म के प्रतिपालक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की विजय दिवस पर हम आज उस महापुरुष की स्मृति में उनके आदर्शों को अपनाकर ईश्वर भक्त, आर्य संस्कृति के रक्षक, वेद भक्त, सच्चे वेदज्ञ गुरु भक्त, मित्र व भातृवत्सल, दुष्ट संहारक, वीर, साहसी, आर्य पुरुष व प्राणी मात्र के प्रिय बने। रावण की भोगवादी सभ्यता के पोषक ना बनें।
आज राष्ट्रीय संवत् पर महाराज युधिष्ठिर विक्रमादित्य आदि की स्मृति में अपने प्यारे आर्यावर्त भारत देश की एकता अखंडता एवं समृद्धि की रक्षा का व्रत लें। राष्ट्रीय स्वाभिमान का संचार करते हुए देश की संपत्ति की सुरक्षा संरक्षा के व्रति बनें। जर्जरीभूत होते एवं जलते उजड़ते देश में इमानदारी, प्राचीन सांस्कृतिक गौरव, सत्यनिष्ठा, देशभक्ति, कर्तव्यपरायणता व वीरता का संचार करें।
आज आर्य समाज स्थापना दिवस होने के कारण *”कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”* वेद के आदेशानुसार सच्चे अर्थों में आर्य बनें एवं संसार को आर्य बनाए न की नामधारी आर्य। आर्य शब्द का अर्थ है- सत्य विज्ञान न्याय से युक्त वैदिक अर्थात ईश्वरीय मर्यादाओं का पूर्ण पालक, सत्याग्रही, न्यायकारी, दयालु, निश्छल, परोपकारी, मानवतावादी व्यक्ति। इस दिवस पर हम ऐसा ही बनने का व्रत लें तभी सच्चे अर्थों में आर्य (श्रेष्ठ मानव) कहलाने योग्य होंगे। आर्यत्व आत्मा व अंतःकरण का विषय है। न कि कथन मात्र का।
सर्वप्रथम आप सबको आप सबको भारतीय नववर्ष, गुड़ी पाडवा, चैत्र नवरात्रि एवं उगाड़ी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें। पर्व हमारे जीवन में उल्लास तो लाते ही हैं साथ ही हमें एवं हमारी आने वाली पीढ़ी को हमारी संस्कृति से अवगत भी कराते हैं।
आज इन सभी पर्वों के साथ आप सबसे यह संदेश साझा करने में गर्व का अनुभव हो रहा है कि विगत दिनों www.e-abhivyakti.com परिवार के दो सदस्यों ने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की जिसके लिए मैं दोनों सदस्यों को हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई देना चाहता हूँ।
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सम्माननीय साहित्यकार श्री संतोष ज्ञानेश्वर भुमकर जी की कविता “असीम बलिदान ‘पोलिस'” को विगत दो दिनों में 252 पाठकों ने इस वेबसाइट पर पढ़ा। यह अपने आप में उनकी रचना के लिए एक कीर्तिमान है।
विगत दिवस हमारी वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी को मशाल न्यूज़ नेटवर्क स्पर्धा में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने के लिए हार्दिक अभिनंदन।
मैं आपका हृदय से आभारी हूँ। आप सभी साहित्यकार मित्रगणों का स्नेह ही मेरी पूंजी है। पुनः आपका सभी साहित्यकार मित्र गणों का अभिनंदन एवं लेखनी को सादर नमन।
(डॉ ऋतु अग्रवाल जी का e-abhivyakti में स्वागत है। आप भीम राव आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली में प्राध्यापक हैं । सोशल मीडिया से परिपूर्ण वर्तमान एवं विगत जीवन के एहसास की अद्भुत अभिव्यक्ति स्वरूप यह कविता “अब क्यूँ?” हमें विचार करने के लिए प्रेरित करती है।)