हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चमत्कार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चमत्कार ? ?

कल जो बीत गया,

उसका पछतावा व्यर्थ,

संप्रति जो रीत रहा

उसे दो कोई अर्थ,

 

बीज में उर्वरापन

वटवृक्ष प्रस्फुटित करने का,

हर क्षण में अवसर,

चमत्कार उद्घाटित करने का,

 

सौ चोटों के बाद एक वार

प्रस्तर को खंडित कर देता है,

अनवरत प्रयासों से उपजा

एक चमत्कार कायापलट कर देता है,

 

संभावनाओं के बीजों को

कृषक हाथों की प्रतीक्षा निर्निमेष है,

चमत्कारों के अगणित अवसर

सुनो मनुज, अब भी शेष हैं..!

 

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 5:43 बजे 21 जून 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८८ ☆ ~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ “फेसबुक की कहानी” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८८ ☆

?  आलेख ?~ इन दिनों न्यूयार्क से ~ फेसबुक की कहानी ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

फेसबुक एक ऐसे विचार से शुरू हुआ था  जिसमें कुछ युवा अपने विश्वविद्यालय परिसर में आपस में जुड़ने का सरल तरीका खोज रहे थे। समय के साथ वही विचार इतना विशाल रूप ले चुका है कि दुनिया के लगभग हर कोने में लोग दिन की शुरुआत और बिस्तर पर दिन का अंत इसी मंच की खिड़की पर झांककर करते हैं। इसकी शुरुआत दो हजार चार में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हुई थी और धीरे धीरे इंटरनेट से आज फेसबुक सीमित दायरे वाले कॉलेज नेटवर्क से निकलकर वैश्विक मंच बन गया है। इस यात्रा में इसके संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग सबसे प्रमुख चेहरे के रूप में बने रहे और आज भी कंपनी का नियंत्रण मुख्य रूप से उनके हाथ में ही है। बाद में कंपनी ने अपना नाम बदलकर मेटा प्लेटफार्म्स कर लिया, जबकि फेसबुक उसी नाम से अपनी सेवाएं देता रहा।

फेसबुक की सबसे बड़ी सफलता उसका फैलाव है। यह केवल परिचितों से संपर्क बनाए रखने का साधन नहीं रहा, बल्कि विचार, अनुभव, समाचार, कला, व्यापार, जनमत और मनोरंजन का ऐसा सम्मिलित मंच बन चुका है जिसकी तुलना किसी अन्य माध्यम से करना कठिन है। इसके उपयोगकर्ता दुनिया भर में करोड़ों की संख्या में हैं और हर दिन अरबों पोस्ट, फोटो, वीडियो और संदेश यहां पर साझा होते हैं। लोग अपने विचार व्यक्त करते हैं, समूह बनाते हैं, समुदायों से जुड़ते हैं, खरीद फरोख्त करते हैं, विज्ञापन चलाते हैं और अपनी पहचान को मजबूत करते हैं। यही व्यापकता इसे आज के दौर में सबसे प्रभावी डिजिटल मंचों में शामिल करती है।

फेसबुक के आर्थिक ढांचे की रीढ़ विज्ञापन है। इसका लगभग पूरा राजस्व इसी पर आधारित है। फेसबुक उपयोगकर्ताओं के व्यवहार और रुचियों को समझकर विज्ञापनदाताओं को ऐसा मंच देता है जहां वे लक्षित दर्शकों तक सीधे पहुंच सकते हैं। इस सटीकता ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए इसे अत्यंत उपयोगी बना दिया  है। धीरे धीरे कंपनी ने कंटेंट निर्माताओं के लिए भी अवसर खोले हैं। पेशेवर मोड, वीडियो मोनेटाइजेशन, पेड सदस्यता जैसे कई साधन उपयोगकर्ताओं को सीधे कमाई का अवसर दे रहे  हैं। इस तरह फेसबुक एक साधारण सोशल नेटवर्क से विकसित होकर एक व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है।

फेसबुक का उपयोग समझदारी और सावधानी से किया जाए तो यह उपयोगकर्ता को अत्यंत लाभ पहुंचा सकता है। गोपनीयता सेटिंग्स की समय समय पर जांच, निजी जानकारी साझा करने में संयम, उपयोगी समूहों और पृष्ठों से जुड़ाव, संतुलित समय प्रबंधन और स्वस्थ संवाद की आदत इसे सकारात्मक अनुभव बना सकती है। जो लोग रचनात्मक हैं और नियमित रूप से लेख, फोटो या वीडियो साझा करते हैं, उनके लिए यह अपनी पहचान बनाने और  लोगों तक पहुंच बढ़ाने का एक प्रभावी मोबाइल एप है। इसे कंप्यूटर पर भी उसी सरलता से चलाया जा सकता है, किसी तरह के व्यक्तिगत डेटा स्टोरेज की अलग से आवश्यकता नहीं होती। निजी व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए तो अब फेसबुक आधुनिक ऑनलाइन बाजार का अनिवार्य उपकरण बन चुका है।

भविष्य की दिशा में फेसबुक और उसकी मूल कंपनी मेटा नई संभावनाओं की ओर कदम बढ़ा रही है। आभासी और संवर्धित वास्तविकता के माध्यम से वे एक ऐसे डिजिटल जगत की कल्पना कर रहे हैं जिसमें लोग एक दूसरे से केवल संवाद ही नहीं करेंगे बल्कि एक साझा आभासी संसार में चल फिर सकेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए प्रयोग भी इस अनुभव को और उन्नत बनाने की ओर अग्रसर हैं। यह सब सफल हुआ तो सोशल कनेक्शन, मनोरंजन, शिक्षा और व्यापार के बिल्कुल नए स्वरूप सामने आ सकते हैं।

फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। गलत सूचना, गोपनीयता का जोखिम, अत्यधिक स्क्रीन समय से आँखें खराब होना ,सामाजिक ध्रुवीकरण और डिजिटल निर्भरता जैसे पहलू चिंता का विषय बने रहते हैं। इस कारण फेसबुक की उपयोगिता तभी अर्थपूर्ण है जब इसे समझदारी और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए। एक ओर यह अवसरों की दुनिया खोलता है, दूसरी ओर यह अपने साथ अपेक्षित सतर्कता भी मांगता है।

समग्र रूप से फेसबुक आधुनिक समाज का ऐसा दर्पण बन गया है जिसमें पूरी दुनिया एक साथ दिखाई देती है। यह लोगों को जोड़ता है, विचारों को दिशा देता है, रचनात्मकता को बढ़ावा देता है और आर्थिक अवसरों के नए मार्ग खोलता है। साथ ही यह याद दिलाता है कि हर तकनीक उतनी ही उपयोगी है जितनी समझदारी से हम उसका उपयोग करें।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

इन दिनों न्यूयार्क से

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३१ – बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३१

☆ बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

जानलुई एक होटल में बैठा था। वह नाश्ता करने आया था। पास रेडियो पर गाना आ रहा था।

जानलुई गाना सुन रहा था। तभी उसके ध्यान में आया कि जब रेडियो में गाना दूसरे स्टेशन से आ सकता है तो इसी तरह चित्र भी हवा में क्यों नहीं आ सकते? यह सोचकर जानलुई वहाँ से उठा और पर चल दिया।

पर आ कर उसने रेडियो की कार्यविधि का अध्ययन किया। कही से कांच, घूमने वाला चक्का, वायर, बैटरी आदि सामान एकत्र कर के प्रयोग करने लगा।

चुंकि जानलुई को बचपन से फोटोग्राफी का शौक था। इसलिये यह फोटो और आवाज को एक साध यंत्र में लाना चाहता था।

इसी कोशिश में वह दिन-रात मेहनत करता रहा। एक कमरे में कैमरा लगा दिया। उसमें कुछ परिवर्तन किया। जिस तरह रेडियो की आवाज को विद्युत तरंग में बदलने की कोशिश की जाती है।

कुछ दिनों तक लगातार कोशिश करने के बाद वह इस कार्य में सफल हो गया। तब उसने दूसरे कमरे में चमकीले शीशे लगा कर उसके पीछे एक चक्का लगाया, जो एक मोटर से घूमता था। इसे कई यंत्रों से जोड़ कर तैयार किया गया था।

जानलुई ने कैमरे के सामने रंगीन गुड़िया रख दी। जिस के ऊपर फोकस से प्रकाश डाला गया। तब दूसरे कमरे में जा कर शीशे पर चित्र प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया।

बहुत कोशिश के बाद जानलुई चित्र को विद्युत तरंग से वापस चित्र प्राप्त करने में सफल हो गया। उसने यह चित्र एक सामान्य सिद्धांत को कार्य में बदल कर प्राप्त किया, जिस के अनुसार पहले चित्र को कैमरे में प्राप्त कर के विद्युत तरंग में बदला जाता है। फिर विद्युत तरंग को वापस चित्र में बदल दिया जाता है।

जानलुई द्वारा प्राप्त किए गए चित्र साफ नहीं आ रहे थे। इसलिये यह उन्हें साफ प्राप्त करने की कोशिश करने लगा।

उसके कमरे में तारों का जाल फैला हुआ था। वह उन्हें सावधानी से पार करता  था।मगर,  एक तार से उलझ गया, जिससे कमरे की खिड़की खुल गई।

एक हजार बैटरियों का प्रकाश सड़क पर फैल गया। लोग इकट्ठे हो गए। कोलाहल सुनकर मकान मालिक आ गया। उसने जानलुई को घर से निकाल दिया। तब जानलुई अपना सामान लेकर लंदन आ गया। जहाँ उसने अपना प्रयोग वापस दोहराया।

इस हेतु वह एक लड़के को ले कर आया। जिसे कमरे के सामने खड़ा किया। पर वह लड़का तेज प्रकाश देखकर घबरा गया और प्रकाश से दूर हट गया।

उधर जानलुई को कोई चित्र प्राप्त नहीं हो रहा था। वह पुनः कमरे में आया। देखा, लड़का प्रकाश से अलग खड़ा था।

“अरे भाई, डरो मत!” जानलुई ने जेब से कुछ रुपये निकाल कर लड़के को दिये.” तुम्हें कुछ नहीं होगा।”

फिर वह दूसरे कमरे में आ कर प्रयोग करने लगा। उसका प्रयोग सफल रहा। वह स्पष्ट चित्र प्राप्त करने में कामयाब हो चुका था।

इस तरह कई साल तक प्रयोग करने के बाद जानलुई बेयर्ड टेलीविजन का आविष्कार करने में सफल हुआ। यह आविष्कार उसकी अथक मेहनत का परिणाम है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७६ ☆ बाल कविता – मकड़ी रानी चली सैर को… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७६ ☆ 

☆ बाल कविता – मकड़ी रानी चली सैर को ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

मकड़ी रानी चली सैर को,

दीवारों के ऊपर।

जिस कोने में मिली गंदगी

बुने जाल से है घर।

 

भूख लगी थी उसे जोर की

ढूँढ़े मक्खी , मच्छर।

हुई सुबह से शाम उसे पर,

नहीं मिला है अवसर।

 

सोच रही वह लेटी- लेटी,

कैसे भूख मिटाऊँ।

पेट किलोलें करता मेरा

प्रभु से आस लगाऊँ।

 

शिकार को निकली चुपके से

दिखीं चींटियाँ उसको।

पकड़ीं उसने कई चींटियाँ

लिए चली वह घर को।

 

भूख मिटाई, तृप्त हुई वह

श्रम से मिलता खाना।

समझ गई जीने का ढँग वह

जीवन कटे सुहाना।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ८२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ८२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- सहस्त्रबुद्धे आजोबांचा निरोप घेऊन मी बाहेर पडलो तेव्हा माझ्या मनात झिरपणारं समाधान मला दिलासा देत होतं. त्यामुळे यापुढं जे घडेल ते ‘तो’ म्हणेल तसं’! तिकडे सहस्त्रबुद्धे आजोबाही असाच विचार करत असतील याची मला खात्री होती.

तरीही त्याची प्रचिती दुसऱ्या दिवशीच मला येणार आहे याची मात्र कल्पना नव्हती! )

प्रत्यक्षात पुढं जे घडत गेलं ते अगदी सहज चढावं वाटलं तरीही ते ‘तो’च घडवत असावा तसं कसोटी पहाणारंच होतं. पुढच्याच क्षणी कडेलोटही झाला असता अशीही वळणं आली. क्षणकाळ जीव घुसमटलाही. पण तो अंधार नवी प्रेरणा देऊन पुढची वाट दाखवत राहिला होता! इतक्या वर्षांनंतर आज सगळं आठवतानाही तो एखादा चमत्कार असावा तसंच वाटत रहातं!

मागे वळून पहाताना आजही मला जाणवतं कीं त्यादिवशी सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या घरातून बाहेर पडताना निर्णायक असं काही हाती लागलेलं नसतानाही मन मात्र पूर्वीसारखं अस्वस्थ नव्हतं. शांत होतं. जे होईल ते सर्वांच्याच हिताचं असेल हा विश्वास हळूहळू मनात झिरपत दृढ होत गेला होता. आणि मग आधी प्रत्येकक्षणी ‘पुढं काय होणार?.. ‘ याबद्दल असणाऱ्या अनिश्चिततेची जागा आता उत्सुकतेने घेतली होती. जे होईल ते चांगलंच असणाराय. आपण फक्त निमित्त आहोत हीच भावना मनात होती.

आता यापुढं जे करायचं ते आपल्या बाजूने कुणालाही झुकतं माप देणारं नसेल आणि ते कुणाच्याही चुकीचं समर्थन करणारंही नसेल हे माझ्यापुरतं मी त्याच क्षणी ठरवूनच टाकलं. आता आपण घ्यायचा निर्णय कुणावरही अन्याय न करणारा जसा तसाच सर्वांना योग्य न्याय देणाराही असायला हवा असं मनापासून वाटत राहिलं. पण ही परस्परविरोधी दोन टोकं जुळवून समतोल साधायचा कसा ते मात्र त्याक्षणापर्यंत स्वच्छ दिसत मात्र नव्हतं.

त्या सकाळी सहस्त्रबुद्धे आजोबांकडून बाहेर पडल्या क्षणापासून ऑफिसमधे पोहोचेपर्यंतच्या अर्ध्या एक तासात याच संदर्भातले असेच सगळे विचारतरंग मनात उमटत राहिले होते. त्याच वेळी तिकडे वखरेसाहेबांच्या मनात मात्र वेगळीच घालमेल सुरू होती. ते माझीच वाट पहात होते!

तो गुरुवार होता. शनिवारीच त्यांना सोमवारच्या मुंबईत होणाऱ्या एम्. डी. मीटिंगसाठी रिलिव्ह व्हायचं होतं. मधे फक्त उद्याचा शुक्रवारचा एकच दिवस. जे व्हायचं ते जास्तीत जास्त उशीर म्हणजे उद्या सकाळीच पूर्ण होणं आवश्यक होतं. मिटींगला जाण्यापूर्वी तयारी करायच्या इतर असंख्य विषयांच्या बाबतीतल्या कामांच्या नियोजनाच्या व्यस्ततेतही प्रदीर्घ काळ प्रलंबित राहून आता ऐरणीवर आलेल्या या तक्रारीचा विषय वखरेसाहेबांना खूप अस्वस्थ करत होता. मीटिंगच्या संदर्भातल्या इतर अनेक अत्यावश्यक विषयांकडे दुर्लक्ष करून याचाच विचार करत बसणं त्यांना शक्यही नव्हतं आणि त्याच्याकडं दुर्लक्ष करणंही पुढं अधिकच अडचणीचं ठरू शकणार होतं. अशा विचित्र कात्रीत ते सापडलेले होते. कारण मुंबईतल्या मीटिंगमधे काय घडू शकेल याची चुणूक नुकत्याच झालेल्या एम्. डी. व्हिजिटमधे आम्ही सर्वांनीच अनुभवलेली होती. पण प्रत्यक्षात सर्वात जास्त झळ लागली होती ती वखरेसाहेबांनाच! त्याचे चटके अजूनही त्यांना जाणवत असायचे. त्याची पुनरावृत्ती होऊ नये हीच माझी धडपड होती, पण त्या दृष्टीने सुरू असलेल्या माझ्या अथक प्रयत्नांना अद्याप यश मात्र मिळत नव्हतं.

“काय झालं? काय म्हणाले सहस्त्रबुद्धे?”

मी त्यांच्या केबिनमधे पाऊल टाकताच वखरेसाहेबांनी उत्सुकतेने विचारलं. त्यांना अपेक्षित असणारं उत्तर अर्थातच माझ्याजवळ नव्हतं. त्याक्षणी ‘आता प्रभूदेसाई आणि सहस्त्रबुद्धे आजोबा या दोघांपुरताच हा विषय मर्यादित नाहीय. त्या दोघांपेक्षाही तो आज वखरेसाहेबांसाठीच अधिक महत्वाचा आहे’ हे मला तीव्रतेने जाणवलं.

“सर, मी आज त्यांना नेमक्या परिस्थितीची कल्पना दिलीय. त्यांना ते पटलंय असं वाटतंय तरी. आज आपण त्यांच्या तक्रारीबद्दल नियमांच्या चौकटीत राहून काय करायचं ते ठरवून टाकूया. आता त्यात दिरंगाई नको. मी त्याबद्दलची एक नोट तयार करून तासाभरातच तुम्हाला ब्रिफ करतो. “

“पण त्यामुळे त्यांचं समाधान होऊन ते तक्रार मागं घेतील याची खात्री आहे कां?”

“त्यांचं समाधान होणं हेच महत्त्वाचं आहे. ते कसं करायचं याचा विचार करूनच मी माझी नोट बनवतो. आजचा पूर्ण दिवस आपल्या हातात आहे. सगळं व्यवस्थित होईल. मी ब्रिफिंग घेऊन येतोच. ”

मी त्यांना दिलासा मिळावा म्हणून बोललो खरा पण प्रत्यक्षात माझ्यापुरतं अजूनही सगळं अधांतरीच होतं!

मी माझ्या केबिनमधे आलो. टेबलवर आजच्या इन्वर्ड मेल मधील पत्रांचा ढीग माझीच वाट पहात होता. पण आत्ता या क्षणी दुसऱ्या कुठल्याही कामांचे विचार मला नको होते. समोरचा तो पत्रांचा गठ्ठा मी शांतपणे बाजूला सरकवून ठेवला आणि ड्रॉवरमधली माझी डायरी बाहेर काढली.

नोट तयार करण्याच्या दृष्टीने लाईन ऑफ ॲक्शन ठरवायची म्हणजे त्या तक्रारीची दखल घेऊन प्रभूदेसाईंच्या विरुद्ध काय ॲक्शन घ्यायची हे ठरवायला हवं. सहस्त्रबुद्धे आजोबांनी सांगितलेलं कितीही खरं असलं तरी समोर कुठलाही सबळ पुरावा नसताना त्यांना शिक्षा करणं समर्थनीय कसं ठरणार? प्रश्न निरूत्तर करणाराच होता. मग समर्थनीय ठरेल असं काय करता येईल? स्वत:लाच विचारावं तसा मनात उभारलेला हाच प्रश्न मला नेमकी दिशा दाखवणारा ठरला. आता उद्या जे होईल ते होईल. निदान आज तरी याच गोष्टीचा विचार करत असंच अधांतरी तरंगत राहून इतर कामांकडे दुर्लक्ष करणं योग्य नाही असं वाटलं. या समोरच्या पत्रांच्या ढिगात कांही महत्त्वाची पत्रं असतील तर? क्षणाचाही विचार न करता मी तो पत्रांचा गठ्ठा पुढे ओढला. एकेक पत्रावरून नजर फिरवून ते बाजूला ठेवत गेलो. त्याच पत्रांमधे सेंट्रल ऑफिसकडून आलेल्या एका पत्राने माझं लक्ष वेधून घेतलं. आत्ता या क्षणी सहस्त्रबुद्धेंच्या तक्रारीच्या संदर्भात ताबडतोब करण्यासारखी एकच गोष्ट आहे हे ते पत्र मला बजावून सांगतंय असं वाटलं आणि दुसऱ्याच क्षणी ते पत्र घेऊन मी तातडीने वखरेसाहेबांच्या केबिनकडे धाव घेतली. त्या एका पत्राने मनातल्या विचारांना आणि पुढे घडणाऱ्या घटनांनाही वेगळं वळण देत मला निर्णयप्रक्रियेच्या नेमक्या रस्त्यावर आणून सोडलं होतं! मी ब्रिफिंग बनवण्यात वेळ घालवून ते इन्व्हर्ड मेल पाहिलंच नसतं तर? अगदी वरवर साधा वाटणारा घटनाक्रमसुद्धा ‘तुला मी दिलेल्या अंत:प्रेरणेवरच असा अवलंबून असतो’ हे जणू ‘तो’ मला समजावत होता!

मी वखरेसाहेबांच्या केबिनचं दार ढकलून आत जाताच त्यांनी आश्चर्याने माझ्याकडे पाहिलं.

“अरे वा,.. नोट तयारही झाली एवढ्यांत? ग्रेsट.. ! शो मी… ” त्यांनी उत्सुकतेने हात पुढे केला.

“सर, त्या आधी सेंट्रल ऑफिसकडून हे पत्र आलंय त्याला तातडीने उत्तर द्यायला हवं. त्या तक्रारीच्या बाबतीत काय करायचं याचा नंतर शांतपणे विचार करता येईल. “

“शांतपणाने विचार करायला नंतर वेळ आहेच कुठं… ?”

“हे पत्र त्या तक्रारीच्या संदर्भातलंच आहे सर. आणि त्यावर ‘Most urgent’ असा रिमार्कही आहे. आधी याला तातडीने उत्तर देणं आवश्यक आहे सर. शक्यतो फॅक्सनेच. तरच ते आजच्या आज एम्. डी. ऑफिसला मिळू शकेल. आणि मग त्याच बेसिसवर फायनल रिपोर्टिंग एम्. डींसमोर ठेवलं जाईल. ही केस तुम्ही मिटींगला निघण्यापूर्वी क्लोज होईल या दृष्टीने विचार करायला आजचा संपूर्ण दिवस आपल्या हातात आहे सर. उद्या सकाळी मी नेहमीसारखं सहस्रबुद्धेंच्या घरी जाणार आहेच. आपण काय करणार आहोत याबरोबरच त्यांनी काय करायला हवं हे मी उद्या त्यांना समजून सांगेन. सगळं व्यवस्थित होईल सर. खात्री आहे माझी. ” त्याक्षणी जे मनात आलं ते मी मोकळेपणानं बोलून टाकलं. माझ्याही नकळत ‘सगळं व्यवस्थित होईल’ हा शब्द दिला त्यांना देऊन बसलो. पण ते व्यवस्थित म्हणजे नेमकं काय हे मला स्वतःला तरी कुठं माहित होतं?

माझं बोलणं ऐकूनही त्यांचं समाधान झालेलं नव्हतं. त्यांनी नाईलाजाने मी दिलेल्या पत्रावरून आपली नजर फिरवली. बघता बघता त्यांच्या चेहऱ्यावरचे भाव बदलत गेले.

ते पत्र म्हणजे या तक्रारीच्या प्रकरणात आम्ही झोनल आॅफीसच्या पातळीवर तातडीने काय केलंय आणि त्याबाबतची सद्यस्थिती काय आहे याबद्दलचा सविस्तर अहवाल एम्. डी. मीटिंगच्या पार्श्वभूमीवर आमच्याकडून मागवण्यात आलेला होता. पत्र आजच मिळालं होतं आणि त्याची पूर्तता आम्हाला तातडीने म्हणजे आजच्या आजच करणं आवश्यक होतं.

“येस्स्.. यू आर राईट. तरीही मी मिटींगला निघण्यापूर्वी सहस्त्रबुद्धेनी ही तक्रार मागे घेतली तरच मिटींगचं टेन्शन नाहीसं होईल. अदरवाईज… “

“आॅफकोर्स सर. तेही होईल. नक्की होईल.. ” मी आश्वासन दिलं.

पुढं ड्राफ्ट फायनल करून फॅक्स करण्यात दोन तास कसे उलटून गेले समजलंच नाही.

‘सदरच्या तक्रारीचं नेमकं कारण तक्रारदाराला समक्ष भेटून, चर्चा करून आम्ही समजून घेतले. केवळ कम्युनिकेशन गॅपमुळे निर्माण झालेल्या गैरसमजातून त्यांनी ही तक्रार केली गेल्याचे प्रथमदर्शनी दिसते. तक्रारदाराशी होणाऱ्या प्रत्यक्ष भेटी आणि चर्चांदरम्यान त्याच्याकडून मिळालेला प्रतिसाद अतिशय सकारात्मक आहे. लवकरच ते तक्रार मागे घेतील असा विश्वास वाटतो’ अशा आशयाचा तो फॅक्स पाठवला तेव्हाच थोडं रिलॅक्स वाटलं. प्रश्न सुटला नसला तरी त्याची बोच तात्पुरती तरी थोडी कमी झाली होती. तरीही वखरेसाहेब पूर्णत: स्वस्थ नव्हतेच. कारण हा अर्धविराम होता. ते मिटींगला निघण्यापूर्वी या प्रकरणाला पूर्णविराम मिळणंच त्यांच्या दृष्टीने महत्त्वाचं होतं. आणि… अर्थातच माझ्यासाठीही!

दिवसभराची सगळी कामं मार्गी लावून खूप थकल्यानंतर संध्याकाळी उशिरा मी वखरेसाहेबांच्या केबिनमधे गेलो ते उद्या सकाळी सहस्त्रबुद्धेंना भेटायला जाईन तेव्हा त्यांना काय सांगायचं हे ठरवूनच. पण मी जे ठरवलंय ते वखरेसाहेबांना योग्य वाटेल? कारण ते अंमलात आणणं म्हणजे थोडीतरी झळ प्रभूदेसाईना लागणं अपरिहार्यच होतं. ते वखरेसाहेबांना योग्य वाटलं नाही तर… ?

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ भावनांचा तू भुकेला… लेख क्र. २४ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे ☆

सौ. गीता वासुदेव नलावडे

? मनमंजुषेतून ?

 ☆ भावनांचा तू भुकेला… लेख क्र. २४ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे

भावनांचा तू भुकेला – – 

इयत्ता पहिलीच्या प्रवेशासाठी बसले होते, मुलांना दोन चार प्रश्न विचारून त्यांच्याशी संवाद साधण्याचा प्रयत्न करत होते.

एक छोटी चुणचुणीत मुलगी तिच्या वडिलांबरोबर माझ्या ऑफिसमध्ये आली. वडील काहीतरी विसरले – ते आणायला बाहेर गेले.

मी तिच्याशी संवाद साधण्याचा प्रयत्न केला. “घरी कोण कोण असतं? “

ती नॉन स्टॉप बोलायला लागली. “बाई, आमच्या घरी मी, आई, बाबा, दादा असतो. मी मस्ती करत नाही, भांडण करत नाही. तरी आई आम्हाला टाळं लावून कामाला जाते. काही केलं नाही तरी उगाचच मारते. आमचं काहीच ऐकून घेत नाही. “

हे सर्व सांगत असताना तिच्या चेहऱ्यावरच्या वेदना पाहून मला एकदम भरून आलं, म्हटलं, “थांब हं, आपण तुझ्या आईला बोलावू. मी तिला समजावून सांगेन. मग नाही मारणार ती तुम्हाला. “

तिचे वडील आल्यावर त्यांच्याशी यासंबंधी बोलले, तर मान खाली घालून अपराधी स्वरात म्हणाले, “बाई, आजूबाजूची वस्ती चांगली नाही. दुपारच्या वेळी ही मुलं बाहेर खेळायला गेली, तर त्यांच्यावर लक्ष कोण ठेवणार? हिची आई दुपारी घरकामाला जाते, म्हणून दोघांना आत ठेवून टाळं लावून जाते. काम करून कंटाळते, मग मुलांनी जरा मस्ती केली तर मारते. “

त्यांना म्हटलं, “सध्याच्या परिस्थितीत मुलांना आत ठेवतात, ते योग्यच आहे, पण त्यांना उगाच मारू तरी नका. किती गुणी बाळं आहेत तुमची! अहो, या वयात मुलांनी मस्ती नाही करायची तर कोणी करायची? तुमच्या प्रेमाला भुकेली आहेत ती. त्यांच्यासाठी कष्ट करता, पण अशा वागण्याने त्यांना तुमच्याबद्दल प्रेम वाटेल का? रागावू नका, पण रोज अर्धा तास मुलांशी गप्पा मारा, खेळा, मस्ती करा. तुमचा शिणवठाही निघून जाईल आणि मुलांना आनंदही मिळेल. बघा बरं हा प्रयोग करून. “

हसून मान डोलवत ते मुलीला घेऊन निघून गेले. ऑफिसबाहेर पडताना मागे वळून पुन्हा पुन्हा मला टाटा करणारी ती चिमुरडी माझ्या नजरेसमोरून जात नाही. इतके दिवस तिच्या मनात असलेली खंत बोलून ती मोकळी झाली होती. आणि तो आनंद तिच्या चेहऱ्यावरून ओसंडून वहात होता.

काही पालक मुलांवर सतत ओरडत असतात. त्यामुळे पालकांविषयी मुलांच्या मनात अढी निर्माण होते, त्यातून अनेक समस्या निर्माण होतात.

मुलांशी मूल होऊन वागा. आपले निरागस बालपण पुन्हा अनुभवा. यातून तुम्हाला आणि मुलांना निखळ आनंदच मिळणार आहे.

या छोट्या जीवांना समजून घ्यायला हल्ली पालकांना वेळच नसतो. प्रत्येकाचं स्वतंत्र विश्व असतं. सुसंवाद सोडा, साधा संवादही घडत नाही, मग मुलांची वाढ खुंटते, त्यातूनच अनेक विकृती निर्माण होतात. आणि आपण दोष मात्र नवीन पिढीला देतो.

असं न करता प्रत्येकाने आपल्या वागण्याचा विचार करावा.

(हा लेख किमान दहा वर्षांपूर्वी लिहिलेला आहे, परंतु त्यात वर्णलेल्या परिस्थितीत सुधारणा झालेली तर दिसत नाहीच, उलट कुटुंबातील संवाद आणखीनच नाहीसा झालेला दिसत आहे. आणि त्यातून अनेक कौटुंबिक आणि सामाजिक समस्या निर्माण झालेल्या दिसत आहेत.

…. हे दुष्टचक्र थांबवायला पाहिजे आणि त्यासाठी तुम्ही – आम्ही – आपण काहीतरी सकारात्मक केले पाहिजे, नाही का?)

क्रमशः दर गुरुवारी… 

© सौ गीता वासुदेव नलावडे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०५ – कविता – ☆ एक अकेलापन अपना है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता एक अकेलापन अपना है” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०५ 

☆ एक अकेलापन अपना है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

सब के सम्मुख रोयें कैसे

मौन सिसकते सोयें कैसे।

*

खारे आँसू नमक हो गए

बिना प्रेम जल धोयें कैसे।

*

आना जाना है जिस पथ से

उसमें काँटे बोयें कैसे।

*

खेत काट ले जाते कोई

घर में धान उगोयें कैसे।

*

अंतस में जो घर कर बैठी

उन यादों को खोयें कैसे।

*

एक अकेलापन अपना है

इसमें शूल चुभोयें कैसे।

*

जब निद्रा ही नहीं रही तो

सपने कहाँ सँजोएँ कैसे।

*

सबके बीच बैठकर बोलो

अपने नैन भिगोयें कैसे।

*

बढ़ती जाती भीड़ निरर्थक

ये मन इनको ढोये कैसे

*

बिखरे बिखरे मन के मोती

फिर से इन्हें पिरोएँ कैसे

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२६ ☆ अपनापन खो गया यहीं पर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अपनापन खो गया यहीं पर” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२६ ☆ अपनापन खो गया यहीं पर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

मन के भीतर कितना डर है

डर के आगे खड़ी उमर है।

*

चिपकी है भटकन पाँवों से

कितना लंबा हुआ सफ़र है।

*

जिसको सपनों में देखा था

वह तो मेरा अपना घर है।

*

अपनापन खो गया यहीं पर

यह कोई अनजान शहर है।

*

महँगाई के इस आलम में

मुश्किल कितनी गुज़र-बसर है।

*

सज़ा लिखे ख़ुद जुर्म यहाँ पर

रपट फ़ैसले पर निर्भर है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३० ☆ सभी अपने लगेंगे गैर दुनिया में नहीं कोई… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी अपने लगेंगे गैर दुनिया में नहीं कोई“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३० ☆

✍ सभी अपने लगेंगे गैर दुनिया में नहीं कोई… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

पला जो ख़ौफ़ है दिल में उसे पहले हटाओ तो

किले की सख़्त दीवारें गिरें मिलकर हिलाओ तो

 *

 भला इस चार दिन की जिंदगी में दुश्मनी कैसी

कभी दुश्मन को अपने तुम गले बढ़कर लगाओ तो

 *

जलाकर क्या मिला तुमको ये बस्ती और कुछ इन्सा

कहूँगा मर्द जो मुफ़लिस के घर चूल्हा जलाओ तो

 *

विजेता जीतकर दुनिया नहीं तुम हो गए सच है

कभी तुम बुद्ध सा मन जीत कर अपना दिखाओ तो

 *

सभी अपने लगेंगे गैर दुनिया में नहीं कोई

जो चश्मा भेद का आँखों पे है उसको हटाओ तो

 *

लगाने सिर्फ माँ के नाम से धरती न हरयाये

सभी रिश्तों के नामों से शज़र अपने  लगाओ तो

 *

ख़ुदा की रहमतों की बारिशों से घर न हो खाली

मदद करने अगर ख़ुद आप दरिया दिल बनाओ तो

रगों में दूध मीरा का बहे मेरी लहू बनकर

खुशी से ज़ह्र पी लूँगा मुहब्बत से पिलाओ तो

 *

बुज़ुर्गों की बनाई साख गर तुमको बचाना है

उठाई घर में दीवारें सभी भाई गिराओ तो

 *

कोई मां बाप बच्चों के मुखालिफ़ हो नहीं सकते

अरुण जो चाहते करना उन्हें खुलकर बताओ तो

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३७ – पता होता तो बता देता… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – पता होता तो बता देता।)

✍ पता होता तो बता देता… ☆ श्री हेमंत तारे

निज़ामे  ज़िंदगी पता होता तो बता देता

कब आयेंगे ख़म पता होता तो बता देता

मैं पशेमाँ हूं के तुम्हें आगाह कर न सका

वो दग़ाबाज़ है,  पता होता तो बता देता

तुम चाँद का इन्तिज़ार करते ही रहे छत पर

फ़लक पे होंगे अब्र, पता होता तो बता देता

*      

इस मर्तबा अच्छी आयी थी आम की बहार

तुम्हे पसंद है आम, पता होता तो बता देता

पूछ रही थी बुलबुल के कहाँ चली गयी बहार

मै जबाब दे न सका,  पता होता तो बता देता

*

शराफत के तकाजे से तुम  ख़ामोश ही रहे

वो नाशुक्रा है ‘हेमंत’ पता होता तो बता देता

निज़ामे ज़िंदगी = शैली / नियम / व्यवस्था, ख़म = मोड / वक्रता / कठिन समय, पशेमाँ  = लज्जित, फ़लक = आसमान, अब्र = बादल

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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