(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३१५ ☆ पहाड़ के पार…
‘पहाड़ के पार एक एक राक्षस रहता है। उसकी सीमा में प्रवेश करने वालों को वह खा जाता है।’ बचपन में सुनी कहानियों में प्रायः इस राक्षस का उल्लेख मिलता है। बालमन यों भी कच्चा होता है। जो उकेरा गया, वह अंकित हो गया। यह अंकित डर जीवनभर पहाड़ लांघने नहीं देता।
मज़े की बात यह है कि पहाड़ के उस पार रहने वालों के बीच, इस पार के राक्षस के किस्से हैं। इस पार हो या उस पार, पार उतरने वाले नगण्य ही होते हैं।
पहाड़ भौगोलिक संरचना भर है। जलवायु को अधिनियमित करने और प्रकृति के संतुलन के लिए पहाड़ होना चाहिए, सो है। पहाड़ को पार किया जा सकता है। थोड़ा अपभ्रंश का सहारा लिया जाए तो पहाड़, पहार, पार…! जिन्हें पार किया जा सकता है, वे ही पहाड़ हैं। ये बात अलग है कि पृथ्वी पर के पहाड़ों की सफल चढ़ाई करनेवालों में भी बिरले ही हैं जो मन का पहाड़ पार कर पाए हों।
मन के पहाड़ कई प्रकार के होते हैं। वर्जना से ग्रस्त, लांछना से भयभीत। वर्जना और लांछना, वांछना से दूर करते हैं। परिणामस्वरूप खंडित व्यक्तित्व जन्म लेने लगता है।
किसी कार्य के संदर्भ में एक उपासिका से मिलने गया। वे प्रवचन कर रही थीं। प्रवचन उपरांत चर्चा हुई। कुछ पृष्ठ मैंने उन्हें दिये। पृष्ठ देते समय उनकी अंगुली से स्पर्श हो गया होगा। मुझे तो पता भी नहीं चला पर वे असहज हो उठीं। सहज होने में कुछ समय लगा। पता चला कि पंथ के नियमानुसार उपासिका के लिए पुरुष का स्पर्श वर्जित है।
सत्य तो यह है कि स्त्री या पुरुष का क्रमशः पुरुष या स्त्री से स्पर्श एक विशिष्ट भाव जगाता है, यह वर्जना उनके अभ्यास में कूट-कूट कर भर दी गई थी। धर्म के पथ पर जिस ईश्वर की आराधना की जा रही है, अधिकांश पंथों में वह पुरुष देहाकार ही है। पुरुष होना दैहिक रचना है, पिता, भाई, मामा, चाचा, ताऊ, दादा, नाना, पुत्र या पति होना आत्मिक भाव है। स्पर्श के पार का राक्षस उपासिका के मन में बसा दिया गया था। फलतः उनके चेहरे पर कुछ देर असहजता छलकी था।
मनुष्य का सामर्थ्य अपार है, बस वह पार जाने का मन बना ले। साथ चाहिए तो एक समर्थ मित्र, गुरु या मार्गदर्शक चुने। मार्गदर्शक भी ऐसा जो आगे नहीं, साथ चले। जिसके सानिध्य में एक निश्चित दूरी के बाद पथिक को भी मार्ग का दर्शन होने लगे। मार्गदर्शन होने लगे तो पहाड़ के पार जाना कौनसा पहाड़-सा काम है!
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सॉनेट ~ ठंड का नवाचार।)
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “सरस्वती”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
कामवाली के साथ एक छोटी बच्ची आई, प्यारी सी! कामवाली उसे बर्तन पोछे का काम सिखाने लाई थी। मैंने बच्ची से उसका नाम पूछा और उसका जवाब सुनकर हैरान हो गया।
बच्ची ने नाम बताया – “सरस्वती!”
मैंने पूछा – “कहां तक पढ़ी हो?”
जवाब सुन मेरे होश उड़ गये, जब उसने कहा कि – “मैंने तो स्कूल का मुंह तक नहीं देखा!”
– “अरे! ऐसा?” फिर सरस्वती बर्तन मांझने का काम सीखने में लग गयी!
☆ आलेख ☆ ~ “संकल्प” (एक शब्द विशेष) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
जानने का प्रयास करते हैं। इस सम्बन्ध में मैं एक शब्द विशेष आप सभी के सम्मुख रखने का प्रयास कर रहा हूँ।
वह शब्द विशेष जिसके विषय में मैंने न सिर्फ मनन – चिंतन किया है, बल्कि अध्ययन भी किया है।
शब्द जो स्वयं में सामर्थ्य रखता हो और ऐसा सामर्थ्य जो किसी व्यक्ति को या व्यक्तियों के समूह को निर्धारित लक्ष्य के पार ले जाता हो। आज मैं एक ऐसे शब्द की बात करने जा रहा हूँ-
वह शब्द विशेष है –
☆ “संकल्प” ☆
यदि किसी एकल शब्द को साहित्यिक, आध्यात्मिक एवं भौतिक भाव से देखे तो –
इस अति महत्वपूर्ण शब्द “संकल्प” का कोई विकल्प है ही नहीं। संकल्प का आश्रय लेकर और संकल्प के साथ कार्य को प्रतिपादित करने वाले महामना जन का मानना है, कि संकल्प शब्द, शब्द के प्रभाव की ऐसी पराकाष्ठा है, जो विश्वास को आधार बनाकर स्व्यं को उस पर स्थापित कर, किसी विशेष उद्देश्य को प्राप्त कराने सहायक होती है।
संकल्प के साथ कार्य करने में दुश्वारी यह है कि लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निद्रा का त्याग करना होगा, स्वयं को अहं दूर रखना होगा, विश्वास को साथ लेकर चलना होगा।
संकल्प को सिद्धि तक ले जाने हेतु सत्य का आश्रय लेना आवश्यक एवं श्रेयस्कर होता है।दुनिया की कोई भी बड़ी से बड़ी समस्या ही क्यों न हो। संकल्प उसे पूर्ण समाधान की ओर ले जाता है। यदि इस शब्द को विभिन्न संदर्भों में ले तो इसका प्रभाव क्या होगा, इसके एक दो उदाहरण आपके सामने रखता हूं।
प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठानो में संकल्प का बड़ा ही महत्व है।
निश्चित संकल्प के साथ मन्त्रोंचार के माध्यम से किया गया अनुष्ठान सिद्धि को प्राप्त करता है।
क्षय मुक्ति आंदोलन पर आधारित मेरा ऐतिहासिक उपन्यास ‘तुमसे क्या छुपाना’ के आवरण पृष्ठ पर लिखा मेरा मूल वाक्य –
“क्षय मुक्त भारत की संकल्पना पर आधारित उपन्यास”
का परिणाम यह कि इस उपन्यास में परम ऊंचाई को प्राप्त किया।
क्षय मुक्ति पर लिखी हुई मेरी पहली कविता जो एन. टी. आई. बेंगलुरु में पढ़ी गई थी, वह यह थी कि –
संकल्प सिद्धि का ले मन में आगे हर कदम बढाना है।
एक सफल उद्घोषक के रूप में पहचान दिलाने में सहायक हुई।
यदि हम संकल्प के आध्यात्मिक पक्ष को देखें तो मां सती ने जब भेष बदलकर भगवान श्री राम के होने की परीक्षा ली तो उन्हें शिव के क्रोध का भाजन बनना पड़ा-
गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि-
शिव संकल्प कीन्ह मन माही
एहि तन सती भेंट अब नाहीं
यह संकल्प को शिव संकल्प नाम दिया गया।
वहीं यदि मैं अपने जनपद बलिया की बात करूं,तो मेरे जनपद में कला एवं संस्कृति से जुडी हुई एक संस्था है जो साहित्य संस्कृति और कला को प्रोत्साहित करती है और जिसके संस्थापक अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी श्री आशीष त्रिवेदी हैं – उस संस्था का नाम है – “संकल्प”
मैं इस संस्था के अनवरत प्रदर्शन को देखकर कह सकता हूँ कि यह संस्था अपने नाम के अनुरूप प्रभाव के साथ स्वयं के संकल्प पर खरी ही नहीं उतरी बल्कि ने संस्था ने अपने निरंतर प्रयास एवं अभ्यास से शिखर को स्पर्श किया है। आज यह संस्था अपना बीसवा अपना स्थापना वर्ष मना रही है।
इस प्रकार कह सकते हैं कि “संकल्प” एक विशेष प्रभावपूर्ण शब्द है।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – हेमिस गोंपा – भाग-१६ ☆ श्री सुरेश पटवा
हेमिस गोंपा
हेमिस मठ भारत में द्रुकपा वंश का लेह से 45 किमी दूर स्थित एक हिमालयी बौद्ध मठ (गोम्पा) है। हेमिस मठ 11वीं शताब्दी से पहले अस्तित्व में था। इसे 1672 में लद्दाखी राजा सेंगगे नामग्याल द्वारा फिर से स्थापित किया गया था। पद्मसंभव का सम्मान करने वाला वार्षिक हेमिस उत्सव जून की शुरुआत में वहां आयोजित किया जाता है।
भारत की पूरी दुनिया में पहचान ऐसे देश के रूप में होती है जहां सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं। हमारे यहां रोजाना देश के किसी न किसी हिस्से में त्योहार मनाया जाता है। भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग बिना किसी डर के अपने-अपने त्योहार और उत्सव धूम-धाम से मनाते हैं। ऐसा ही एक उत्सव है प्रसिद्ध हेमिस गोम्पा मेला, जो केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में बौद्ध समुदाय द्वारा आयोजित किया जाता है। हेमिस गोम्पा मेला लद्दाख के सबसे बड़े बोद्ध मठ हेमिस गोंपा में आयोजित किया जाता है।
हेमिस गोम्पा मेला हर साल बौद्धिक कैलंडर के अनुसार पांचवे महीने में मनाया जाता है। हेमिस गोम्पा मेले का सबसे बड़ा आकर्षण है स्थानीय लोगों द्वारा मुखौटा पहनकर किए जाने वाला नृत्य। मेले में चार पैर के करताल, ढोल, छोटी तुरही सहित अन्य वाद्य यंत्र की मदद से संगीतकार संगीत की प्रस्तुति देते हैं। इस दौरान स्थानीय लोग लंबे सींग और मुखौटा पहनकर नृत्य करते हैं। स्थानीय नृत्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इसके लिए अलावा मेले में सुंदर हस्तकलाओं की भी प्रदर्शनी होती है। हेमिस गोम्पा मेले में आकर स्थानीय परम्परा को करीब से जानने का मौका मिलता है।
हेमिस गोम्पा मेले को लेकर बौद्ध अनुयायियों की मान्यता है कि इस मेले से अच्छे स्वास्थ्य और धार्मिक शक्ति को बढ़ावा मिलता है। यह मेला भगवान पद्मसंभव के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान पद्मसंभव के जीवन का लोगों को अध्यात्म से जोड़ने का एक ही लक्ष्य था। यहां पर सबसे बड़ी थंक़ा तस्वीर भी हैं, जिसे 12 सालों में एक बार आम लोगों के दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
हेमिस महोत्सव भगवान पद्मसंभव (गुरु रिनपोछे) को समर्पित है, जिन्हें बुद्ध के अवतार रूप में नृत्य प्रदर्शन करके सम्मानित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध शाक्यमुनि की भविष्यवाणी के अनुसार बंदर वर्ष के पांचवें महीने के 10 वें दिन उनका जन्म हुआ था। यह भी माना जाता है कि उनका जीवन मिशन सभी जीवित प्राणियों की आध्यात्मिक स्थिति में सुधार करना था। इसलिए यह दिन 12 वर्षों के चक्र में एक बार आता है, हेमिस उसकी स्मृति में एक बड़ा उत्सव मनाता है। माना जाता है कि इन पवित्र अनुष्ठानों के पालन से आध्यात्मिक शक्ति और अच्छा स्वास्थ्य मिलता है। हेमिस उत्सव मठ के मुख्य द्वार के सामने आयताकार प्रांगण में होता है। अंतरिक्ष चौड़ा और खुला है, दो उभरे हुए वर्गाकार चबूतरे, तीन फीट ऊंचे केंद्र में एक पवित्र खंभा के साथ। एक अच्छी तरह से चित्रित छोटी तिब्बती मेज के साथ एक समृद्ध गद्दीदार सीट के साथ एक उठा हुआ मंच औपचारिक वस्तुओं के साथ रखा गया है – पवित्र जल से भरे कप, बिना पके चावल, तोरमाआटे और मक्खन और अगरबत्ती से सजा। कई संगीतकार चार जोड़ी झांझ, बड़े पैन ड्रम, छोटे तुरही और बड़े आकार के पवन उपकरणों के साथ पारंपरिक संगीत बजाते हैं। उनके बगल में लामाओं के बैठने के लिए एक छोटा सा स्थान निर्धारित किया गया है।
समारोह गोम्पा के ऊपर एक सुबह की रस्म के साथ शुरू होता है, जहां ढोल की थाप और झांझ की गड़गड़ाहट और पाइपों की आध्यात्मिक जय हेतु “दादमोकार्पो” या “रयज्ञलरस रिनपोछे” का चित्र औपचारिक रूप से प्रशंसा और पूजा करने के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
उत्सव के सबसे गूढ़ रहस्यवादी मुखौटा नृत्य हैं। लद्दाख के मुखौटा नृत्यों को सामूहिक रूप से चाम्स प्रदर्शन के रूप में जाना जाता है। चाम्स प्रदर्शन अनिवार्य रूप से तांत्रिक परंपरा का एक हिस्सा है, जो केवल उन गोम्पों में किया जाता है जो भिक्षु तांत्रिक वज्रयान शिक्षाओं का पालन करके तांत्रिक पूजा करते हैं।
हेमिस गोम्पा दर्शन के बाद पेट में चूहे कूदना शुरू हो गए थे। हेमिस से थिकसे आधा घंटे का सफ़र था। बीच में स्टांका नामक जगह पर दोपहर का भोजन निपटाया। फिर रामबीरपुर होते हुए थिकसे गोम्पा पहुँचे। थिकसे ऊँची पहाड़ी पर सबसे खूबसूरत दिखता है। नीचे सिंधु नदी बहुत छोटे स्वरूप में बहती दिखती है।
थिकसे गोम्पा
अब हम थिकसे गोम्पा पहुँच गए हैं। ठिकसे गोम्पा या थिकसे मठ, टिकसे, के रूप में भी लिप्यंतरित होता है। यह एक तिब्बती शैली का मठ है जो तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग संप्रदाय से संबद्ध है। यह लेह से लगभग 19 किलोमीटर (12 मील) पूर्व थिकसे बस्ती में एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह तिब्बत के ल्हासा में पोटाला पैलेस से मिलता-जुलता है, और मध्य लद्दाख में सबसे बड़ा गोम्पा है, जिसमें विशेष रूप से महिला साधकों के लिए अलग इमारतों की व्यवस्था है।
यह मठ सिंधु घाटी में 3,600 मीटर (11,800 फीट) की ऊंचाई पर स्थित एक बारह मंजिला परिसर है और इसमें बौद्ध कला की कई वस्तुएं जैसे स्तूप, मूर्तियाँ, थांगका, दीवार पेंटिंग और तलवारें हैं। इसमें मैत्रेय की 15 मीटर (49 फीट) ऊंची प्रतिमा है, जो लद्दाख में भवन के भीतर इमारत की दो मंजिलों को कवर करती सबसे बड़ी मूर्ति है।
15वीं शताब्दी की शुरुआत में, गेलुग स्कूल के संस्थापक, जे चोंखापा, जिन्हें अक्सर “पीली टोपी” कहा जाता है, ने अपने छह शिष्यों को नए स्कूल की शिक्षाओं का प्रसार करने के लिए तिब्बत के दूरदराज के क्षेत्रों में भेजा। चोंखापा ने अपने शिष्यों में से एक, जंगसेम शेराप ज़ंगपो (विली: शे रब बज़ंग पो), अमितायस (अमिताभ का संभोगकाया रूप) की एक छोटी मूर्ति दी, जिसमें हड्डी का पाउडर और चोंखापा के खून की एक बूंद थी। चोंखापा ने उन्हें बौद्ध धर्म के प्रचार में मदद मांगने के संदेश के साथ लद्दाख के राजा से मिलने का निर्देश दिया।
राजा, जो उस समय शे के पास नुब्रा घाटी में रह रहे थे, मूर्ति के उपहार से खुश हुए थे। राजा ने अपने मंत्री को लद्दाख में गेलुग आदेश के मठ की स्थापना के लिए शेरब जांगपो की मदद करने का निर्देश दिया। नतीजतन, 1433 में, जांगपो ने सिंधु के उत्तर में स्टैग्मो में ल्हाखांग सर्पो “येलो टेम्पल” नामक एक छोटे से मठ की स्थापना की। उनके प्रयासों के बावजूद, गेलुग व्यवस्था को अपनाने वाले लामा शुरू में कम थे, हालांकि उनके कुछ शिष्य प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गए।
15 वीं शताब्दी के मध्य में, पाल्डेन जांगपो ने अपने शिक्षक शेरब जांगपो द्वारा शुरू किए गए मठवासी कार्य को जारी रखा। उन्होंने यहां एक बड़ा मठ बनाने का फैसला किया, जो एक जगह का चयन करते समय हुई एक असामान्य घटना से तय होता था। किंवदंतियाँ हैं कि चोंखापा ने भविष्यवाणी की थी कि उनका स्वप्न सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर समृद्ध होगा। यह भविष्यवाणी तब सच हुई जब थिकसे मठ की स्थापना हुई। इसके बाद स्पितुक मठ और लिकिर मठ सिंधु के दाहिने किनारे पर ही स्थित हैं।
नया थिकसे मठ स्टैग्मो से कुछ किलोमीटर दूर, इसी नाम के एक गांव के ऊपर एक पवित्र पहाड़ी पर स्थित था। माना जाता है कि इस मठ का निर्माण पहले कदम की स्थापना के स्थान पर या उत्तर में लगभग 7 किलोमीटर (4.3 मील) स्टाकमो के छोटे चैपल के रूप में किया गया था। रिनचेन ज़ंगपो को थिकसे में लखंग न्येर्मा नाम के एक मंदिर का निर्माण करने के लिए भी जाना जाता है, जो रक्षक दोर्जे चेन्मो को समर्पित है। आज, जो कुछ देखा जा सकता है वह कुछ खंडहर है।
इस क्षेत्र में दस अन्य मठों हैं, जिनमे डिस्किट, स्पितुक, लिकिर और स्टोक प्रमुख हैं। हेमिस मठ के बाद थिकसे दूसरे स्थान पर है। थिकसे मठ के पास 1,327 एकड़ (537 हेक्टेयर) भूमि का स्वामित्व है और कुछ 25 गांव मठ से जुड़े हैं।
थिकसे मठ सहित लद्दाख में पुराने मठों का जीर्णोद्धार संबंधित मठ प्रशासन के अनुरोध पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किया जा रहा है। हालाँकि, यह विवाद के बिना नहीं रहा है। ऐसा कहा जाता है कि पारंपरिक मिट्टी और पत्थर के आंगनों को ग्रेनाइट में बदल दिया गया है, जिसने चमक को खराब कर दिया है। इसी तरह, मठ के पुनर्निर्मित दाहिने पार्श्व में नए रसोईघर का निर्माण शामिल है।
पर्यटकों की रुचि के मुख्य बिंदुओं में से एक मैत्रेय (भविष्य बुद्ध) मंदिर है, जिसे 14वें दलाई लामा की 1970 में इस मठ की यात्रा के उपलक्ष्य में बनाया गया था। इसमें मैत्रेय बुद्ध की 15 मीटर (49 फीट) ऊंची मूर्ति है, जो इस तरह की सबसे बड़ी मूर्ति है। उन्हें असामान्य रूप से कमल की स्थिति में बैठे रूप में चित्रित किया गया है, न कि उनके सामान्य प्रतिनिधित्व के रूप में खड़े होने या एक उच्च सिंहासन पर बैठने की मुद्रा में। यह मठ की सबसे बड़ी बुद्ध प्रतिमा है, और इसे बनने में चार साल लगे। इसे स्थानीय कलाकारों द्वारा केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान (लेह) के मास्टर शिल्प गुरु नवांग त्सेरिंग के मार्गदर्शन में बनाया गया था – यह मिट्टी की बनी है जिसका ऊपरी आवरण ताम्बा मिश्रित सुनहरे रंग में है। इस तरह हमारी लद्दाख़ यात्रा पूरी हुई।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “दर्पण…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – हमारा प्यारा नगर जबलपुर…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २५० ☆
☆ बापू का सपना… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆
रेवातट पर बसा जबलपुर पावन प्यारा शहर हमारा
जिसकी मनभावन माटी ने हमें संवारा हमें निखारा
*
इसके वातावरण वायु जल नभ ने नित ममता बरसाया
इसके शिष्ट समाज सरल ने सदा नया उत्साह बढाया
*
इसके प्राकृत दृश्य और इतिहास ने नित नये स्वप्न जगाये
इससे प्राप्त विशेष ज्ञान ने पावन सुखद विचार बनाये
*
भरती है आल्हाद हृदय मे इसकी सुदंर परंपराये
इसकी धार्मिक भावनाओ ने भक्तिभाव के गीत गुजाये
*
इसकी हर हलचल में दिखता मुझको एक संसार सुहाना
श्वेत श्याम चट्टानो में है भरा प्रकृति का सुखद खजाना
*
दूर दूर तक फैला दिखता विंध्याचल का हरित वनांचल
कृपा बांटता प्यास बुझाता माँ रेवा का पावन आंचल
*
इसकी ही धडकन ने मुझको बना दिया साहित्यिक अनुरागी
संवेदी मन में ज्ञानार्जन की उत्सुकता उत्कण्ठा जागी
*
यहीं ज्ञान वैराग्य भक्ति तप मे रत है साधू सन्यासी
उद्योगो व्यापारो व्यवसाये में है कर्मठ सब नगर निवासी
(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘गिरगिट‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १५८ ☆
☆ लघुकथा – गिरगिट☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
विनम्रता की प्रतिमूर्ति, गुरु जी का वह आज्ञाकारी शिष्य। गुरु जी उसकी शालीनता से बहुत प्रभावित। वह कृतार्थ थे, मन ही मन सोचते ऐसे विद्यार्थी मिलते कहाँ हैं कलियुग में?
‘विद्या दान श्रेष्ठ दान’ मानकर और विद्यार्थी को योग्य पात्र समझकर गुरु जी यथासंभव सहयोग करते रहे। एक-एक कर इस विद्यार्थी के सब कार्य पूरे हो गए। उनकी कृपा से वह अच्छे पद पर नियुक्त भी हो गया। गुरु जी उसे अक्सर याद करते, मिलने को कहते पर वह अपनी व्यस्तता बताता रहा। मिलने न आने के हर बार नए कारण बन जाते। दरअसल गुरु जी से मिलने जाने का अब कोई कारण न रहा—?
गुरु जी लॉन में बैठे थे, सामने बड़ी देर से पेड़ पर निश्चल बैठा गिरगिट अब रंग बदल चुका था।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “एक पौधा… उम्मीद भरा……”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
गाँव के बीचों-बीच एक छोटी-सी पगडंडी थी। उस पगडंडी से रोज कई लोग गुजरते थे—कुछ जल्दी में, कुछ थके हुए, और कुछ अपने ही विचारों में खोए हुए। लेकिन वहाँ एक बुजुर्ग महिला रहती थी, जिसका नाम था श्यामली अम्मा।
अम्मा रोज सुबह सूरज निकलते ही एक छोटा-सा पौधा लेकर पगडंडी के किनारे लगा देतीं। फिर उसे थोड़ा पानी डालतीं, थोड़ी माटी थपथपातीं और मुस्कुराकर कहतीं—
“बेटा, बढ़ते रहो… किसी की छाँव बनना।”
एक दिन गाँव के बच्चों ने अम्मा से पूछा,
“अम्मा, आप रोज एक पौधा क्यों लगाती हैं? इससे होगा क्या?”
अम्मा ने हँसकर कहा,
“बच्चों, जब मैं नहीं रहूँगी, ये पौधे मेरे शब्द बनकर बोलेंगे…
किसी को छाँव देंगे, किसी को फल देंगे, किसी को ऑक्सीजन देंगे।
एक पौधा सिर्फ पौधा नहीं होता—ये जीवन को बढ़ाने का प्रण होता है।”
उनकी बात बच्चों के दिल में उतर गई। अगले दिन बच्चे भी अपने-अपने हाथों में पौधे लेकर आ गए। फिर क्या था—