हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६१ – “राह तुम्हारी रही देखती…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत राह तुम्हारी रही देखती...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “राह तुम्हारी रही देखती...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

रहे कथानक अनुपम चर्चित

किंवदन्ती के ॥

जहाँ विछुड़कर रुके हंस थे

दमयंती के ॥

 

राह तुम्हारी रही देखती

मधुछंदा थी।

और पलट कर रही टेरती

प्रियंवदा  थी ।

 

इसी पुराने घाट, ठहर

पायल सँवारते ।

फूल टूट कर गिरे

अचानक वैजन्ती* के ॥

 

माला का सुखकर झुकाव

यों और कहीं था ।

फूल टूटने का कारण

बस वहीं कहीं था ।

 

हाँ, केवल उच्छवास वेग

वो सह न पाये ।

हुये मूर्च्छित गिरे

धरा पर, रसवन्ती के ॥

 

कर्ण फूल – कचनार, केश में

मृदुल कमल थे ।

जहाँ अलक के ब्याल

उड़ रहे सम्हल सम्हल थे ।

 

वहीं दूसरी ओर तनिक

विस्थापित होकर –

दृष्टि बिचारी विम्ब

खोजती पश्यंती के ॥

* वैजयंती

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15-11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५७ ☆ व्यंग्य – “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆ Edit

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ…” ।)

☆ शेष कुशल # ५७ ☆

☆ व्यंग्य – “ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ – शांतिलाल जैन 

‘मैं इमरजेंसी वर्क मीटिंग में हूँ। बाद में कॉल करता हूँ।’

‘झूठ लिखना पाप है’ – ऐसा तो न कहीं पढ़ा, न कहीं सुना। अलबत्ता ‘झूठ बोलना पाप है’ – बचपन से सुनते आ रहे हैं।

सो बोल नहीं रहे, लिख रहे हैं, धड़ल्ले से लिख रहे हैं। लिख कर रख ले रहे हैं, उसी को बार बार फॉरवर्ड कर दे रहे हैं। लिखना एक बार, फॉरवर्ड अनेक बार। इस कला में प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती श्रीमान्, एक गिफ्ट सी है जो मोबाईल खरीदने के साथ गॉड से मिल जाया करती है। नेटफ्लिक्स पर आप वेब सिरीज़ देख रहे हैं और कॉल रिसीव हुआ। लिखिए कि – ‘बॉस के साथ एक अर्जेंट मैटर पर डिस्कशन में हूँ। केबिन से बाहर आकर फोन करता हूँ’। फिर क्या तो आपका केबिन से बाहर निकलना और क्या ही आपका कॉल करना। यकीन मानिए लिखा हुआ झूठ पाप की केटेगरी में नहीं आता। आता तो लाखों व्हाट्सअप अंकल पाप की गठरी सिर पर लादे नरक में प्रवेश की कतार में खड़े होते।  उनकी कहानी फिर कभी, फिलवक्त आज के विषय ‘ऑटो रिप्लाई में समाया झूठ’ पर ही रहते हैं।

वाईफ का मूड सुबह से ख़राब है। मूड अगर सुबह आठ बजे के आसपास ख़राब हुआ है तो नौ साढ़े नौ तक तो माईग्रेन का माइल्ड से सीवियर केटेगरी में कन्वर्जन पक्का है। शॉपिंग ही इलाज़ है। शाम तक क्रेडिट कार्ड की शरण में जाना ही जाना है। तनाव पसरा है घर में कि घंटी बज उठती है। एक दोस्त का कॉल है। उठाऊँगा तो कहेगा – घर पर मिलने आना चाहता हूँ। ‘जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौंसला नहीं होता’। कुछ देर की ऊहापोह के बाद हौंसला जुटाकर लिखा – ‘सॉरी डियर, मैं आपसे मिल नहीं पाउँगा! आउट ऑफ़ स्टेशन हूँ, परसों लौटने का है। लौटने पर मैं ASAP जवाब दूँगा। कुछ अर्जेंट हो तो मैसेज करना। बाय।’  शहर में, दस मिनिट बाद ही, जो वो सामने पड़ जाता तो…। तो भी कुछ नहीं होता। आजकल झूठ बोलकर लोग शर्मिंदा नहीं होते। सारे ही बंदरों की पूँछ कटी हुई है इन दिनों। ऐसा कुछ हुआ भी नहीं, बस जवाब में उसने वसीम बरेलवी साहब का एक शेर लिख भेजा – ‘वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से, मैं ए’तिबार न करता तो क्या करता’।

अगर अब भी आपको लगता है झूठ लिखने से पाप लग सकता है तो आप ये जिम्मेदारी मोबाइल पर डालकर अपराध-बोध मुक्त हो सकते हैं। ऑटो रिप्लाई का सिस्टम अवेलेवल जो है। मैनेजर साहब ने अपने वाट्सअप अकाउंट  में सेट कर रखा है।  मैसेज मिला – ‘पिताजी नहीं रहे। शवयात्रा 11 बजे निज निवास से निकलेगी।’ रिप्लाईड इंस्टेंटली – ‘थैंक-यू, आपका संदेश पाकर हमें बहुत ख़ुशी हुई। हमारे प्रतिनिधि आपके पिताजी से शीघ्र संपर्क करेंगे। उनका लोकेशन शेयर कर सकेंगे तो हमें आसानी होगी। आपका दिन शुभ हो।’ बैकुंठ धाम की लोकेशन खोजने में कितने ऋषियों, संतों ने हिमालय में अपने आप को गला दिया श्रीमान् मैनेजर साहब !! क्या शेयर करें आपको ?

ऑटो रिप्लाई तो दादू ने भी सेट किया हुआ है। उसे लगता है हर बार मैं उसे लेख छप जाने का अलर्ट ही भेजता हूँ। मगर उस दिन तो हमारे घर में चोरी हो गई थी। दादू को मैसेज किया। ‘बधाई शांतिबाबू’ – दादू रिप्लाईड।

वफ़ा के शहर में अब सब झूठ लिखते हैं। जो झूठ सब लिखते हों वो झूठ नहीं रह जाता, न्यू नार्मल हो जाता है। 

तो लिखिए, धड़ल्ले से लिखिए, झूठ लिखिए, फिलवक्त तो पाप नहीं ही पड़ेगा। पड़ने की संभावना हो तो भी ऑटो रिप्लाई करनेवाला मोबाइल हैण्डसेट नरक में जाएगा, आप और हम तब भी बचे रहेंगे।

-x-x-x-

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४४ ☆ # “श्रद्धांजलि…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “श्रद्धांजलि…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४३ ☆

☆ # “श्रद्धांजलि…” # ☆

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

व्यथित हैं वंचित शोषित

 गमगीन जवानी है

 

पिघल रहे हैं हिमखंड बहते धारे है

हमसे बिछड़े थे जो वह आज प्राण हमारे हैं

उजड़ गया है उपवन पतझड़ के मारे हैं

कांटो से चुभने लगे अब जो सहारे हैं

किससे करें फरियाद आंखों में पानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

 

तुम लाए थे गगन से तोड़कर तारे

जगमगाई थी कुटिया घर द्वार हमारे

रोशन हुए थे आंगन और चौबारे

कैसे भूलेंगे हम उपकार तुम्हारे

जीवन भर हम पर आपकी मेहरबानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

 

आपने हमको पढ़ना सिखाया

संगठित कर लड़ना सिखाया

दीक्षा दी हमें धम्म की

धम्म के मार्ग पर चलना सिखाया

धम्म के मार्ग पर चलते-चलते

मंजिल अपनी पानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

 

हम चिंतित है पर हारे नहीं है

हम विघटित है पर बेचारे नहीं है

सागर कितना भी उफान पर हो

हम विचलित है पर बेसहारे नहीं है

लड़ कर पाएंगे मंजिल अब डरना बेमानी है

आंखों में आंसू लब पर तेरी कहानी है

व्यथित हैं वंचित शोषित गमगीन जवानी है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ८६ – मगर चुपके, चुपके से… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता मगर चुपके, चुपके से… ‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ८६ ☆ मगर चुपके, चुपके से☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

तू मुझे छुप छुप कर देखती तो है,

मगर चुपके, चुपके से,

तू मुझे धीरे से स्पर्श, करती तो है,

 मगर चुपके, चुपके से,

तू हरदम मेरे सपने में, आती तो है,

मगर चुपके, चुपके से,

तू मेरे दिल पर छाती जाती तो है,

मगर चुपके, चुपके से,

तेरी नजर बयां करती, नाराज़गी,

मगर चुपके, चुपके से,

तेरे लब भी करते हैं, शिकायतें,

मगर चुपके, चुपके से,

तेरा दिल धड़कता है, मेरे लिए,

मगर चुपके, चुपके से,

तू भी मुझे रब से मांगती तो है,

मगर चुपके, चुपके से.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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सूचना/Information ☆ सम्पादकीय निवेदन – सौ. मंजिरी येडूरकर – अभिनंदन – आणि त्यांची एक कविता ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ. मंजिरी येडूरकर

💐अ भि नं द न 💐

आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका सौ. मंजिरी येडूरकर यांनी तिहेरी यश संपादन केले आहे.

काव्य किरण मंडळ, कल्याण यांनी आयोजित केलेल्या राज्यस्तरीय अभंग लेखन स्पर्धेत त्यांच्या ‘ज्ञानेश्वरांचा वसंत’ या रचनेस तृतीय पारितोषिक मिळाले आहे.

ऋतूपर्ण दिवाळी अंक आयोजित कथा स्पर्धेत त्यांच्या कथेला उत्तेजनार्थ पुरस्कार प्राप्त झाला आहे.

कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान, नाशिक यांच्याकडून मराठी साहित्याच्या अभ्यासासाठी घेण्यात येणा-या साहित्यभूषण या परीक्षेत तृतीय कृष्णामाई पुरस्कार प्राप्त झाला आहे.

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

आजच्या अंकात वाचू या त्यांची ही विशेष कविता – ज्ञानेश्वरांचा वसंत

 

☆ ज्ञानेश्वरांचा वसंत ☆

 (राज्यस्तरीय काव्य लेखन स्पर्धा, काव्य किरण मंडळ, कल्याण)

(विषय – संत ज्ञानेश्वर, शीर्षक – ज्ञानेश्वरांचा वसंत)

दिसतो वसंत, व्यासांच्या तेजाते

महाभारताते, वैभविले

*

अर्जुन वसंत, कृष्ण तो कोकीळ

पार्थास कथील, गीताख्यान

*

वसंत कळतो, हिरवाईतून

दिव्य तेजातून, जैसा ज्ञानी

*

प्रतिभेच्या वेली, बहरली गाणी

देह रुपी वनी, वसंत हा

*

मी पण लोपेल, स्मरा भगवंत,

भक्तीचा वसंत, गीताख्यान

*

वसंती सुमने, सुमनी शैलेय

श्रीकृष्णी अजेय, गीतार्थात

*

कर्म फल त्यागी, वसंत मोहवी

म्हणे त्या माधवी, ज्ञानदेव

*

वसंती मोगरी, ओवली वा सुटी

समानत्व वाटी, गंधामाजी

*

तैसे साम्य दावी, गीतेची संस्कृत,

टीका ती विस्तृत, मराठीत

*

अशा या वसंता, किती रूपातून

पाहतो आतून, ज्ञानदेव

सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचना/Information ☆ सम्पादकीय निवेदन – डॉ. शोभना आगाशे – अभिनंदन – आणि त्यांची एक कविता ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

डॉ. शोभना आगाशे

💐अ भि नं द न 💐

काव्य किरण मंडळ, कल्याण यांनी आयोजित केलेल्या राज्यस्तरीय अभंग लेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका डॉ. शोभना आगाशे यांच्या ज्ञानेश्वर समाधीया रचनेस द्वितीय पारितोषिक मिळाले आहे.

तसेच

कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान, नाशिक यांच्याकडून मराठी साहित्याच्या अभ्यासासाठी घेण्यात येणा-या साहित्यभूषण या परीक्षेत त्यांनी यश संपादन केले आहे.

त्यांच्या या उज्वल यशाबद्दल ई अभिव्यक्ती (मराठी) परिवारातर्फे त्यांचे मन:पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐✒️💐

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

आजच्या अंकात वाचू या त्यांची ही विशेष कविता – ज्ञानेश्वर समाधी

ज्ञानेश्वर समाधी ☆

 *

भावार्थ दीपिका, लिहविली माये

तीर्थाटना जाये, संतांसवे ||१||

*

परतुनी येता, आज्ञा मागे तदा

जाया मोक्ष पदा, विठाईसी ||२||

*

इंद्रायणी तीरी, वंदूनी गुरूसी

विनवी आज्ञेसी, ज्ञान राजा ||३||

*

समाधीची वार्ता, जाई संतांप्रती

वैष्णवांचे चित्ती, थारा नाही ||४||

*

पंढरीचा रावा, रुक्मिणी सहीत

ऋषी, मुनी, संत, जमा होती ||५||

*

समाधीचे स्थान, सिद्ध ते अनादि

तेथेच समाधी, ज्ञाना घेई ||६||

*

द्वादशी पारणे, रांधे रुक्माबाई

हरी वाढू जाई, प्रसादासी ||७||

*

फुटलासे बांध, निवृत्तीचे मन

करी समाधान, विठूराया ||८||

*

एके बाजू गुरू, दुजे देव तारू

वाद्यांचा गजरू, चोहीकडे ||९||

*

समाधीस्थ होता, निरंजनी लीन

झाले ब्रम्हपूर्ण, ज्ञानराज ||१०||

 डाॅ. शोभना आगाशे

वाकड, पुणे

 मो. नं. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१४ ☆ असली नास्तिक की पहचान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘असली नास्तिक की पहचान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ असली नास्तिक की पहचान

स्वर्ग-नरक के विशाल स्वागत-कक्ष में भारी भीड़ जुटी थी। तिल धरने को जगह नहीं थी। मृत्युलोक से पहुंची आत्माओं के रिकॉर्ड खंगालने में  चित्रगुप्त जी के आठ दस असिस्टेंट लगे थे। रिकॉर्ड के आधार पर स्वर्ग और नरक के अलॉटमेंट की लिस्टें निकाली जा रही थीं। आत्माएं दम साधे अपने कर्मों का फैसला सुनने के लिए खड़ी थीं। कई पाप-कर्म वाले भी इस उम्मीद में थे कि शायद एकाध पुण्य-कर्म के बदौलत स्वर्ग की लिस्ट में नाम आ जाए।

लिस्टें लगीं तो हल्ला-गुल्ला बढ़ गया। स्वर्ग की लिस्ट में जगह पाने वाले खुशी से ‘चित्रगुप्त जी जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे तो नरक की लिस्ट में ढकेले  गये विलाप करके उसे अन्याय और भेदभाव बता रहे थे।

हल्ला-गुल्ला सुनकर यमराज वहां घूमते हुए आ गये। चित्रगुप्त जी से हाल-चाल पूछा । चित्रगुप्त जी ने जवाब दिया, ‘सब काम ठीक चल रहा है, प्रभु, लेकिन ये दो-तीन आत्माएं बड़ी देर से बहस कर रही हैं। बार-बार पूछती हैं कि उनका नाम नरक की लिस्ट में कैसे रखा गया।’

यमराज ने पूछा, ‘इनके रिकॉर्ड में क्या है?’

चित्रगुप्त जी बोले, ‘ये घोर नास्तिक हैं। भगवान के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाते हैं। कभी मंदिर नहीं गये, कभी भगवान की पूजा नहीं की। कहते हैं भगवान के अस्तित्व का किसी ने कभी प्रमाण ही नहीं दिया। ‘मान लो’ ‘विश्वास करो’ कहने से काम नहीं चलता। इनका सवाल है कि बिना प्रमाण-सबूत के कैसे मान लें? अब बताइए इनको नरक में न भेजें तो क्या करें? एकदम ओपिन एंड शट केस है।

‘इनका यह भी कहना है कि वे नास्तिक नहीं, तर्कवादी हैं। असली नास्तिक वे हैं जो ऊपर से भगवान को मानने का ढोंग करते हैं, लेकिन भीतर से उन पर बिल्कुल विश्वास नहीं करते। जो भगवान का नाम जपते हैं, लेकिन धर्मस्थलों के दान-पात्रों से सारा चढ़ावा, बिना भगवान से डरे, गायब कर देते हैं। इनकी नज़र में नास्तिक वे नेता भी हैं जो जनता को दिखाने के लिए मंदिर में पूजा करते हैं, मंदिर बनवाते हैं, लेकिन जनता को मूर्ख बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो दिन भर झूठ बोलते हैं, झूठे आश्वासन देते हैं। नास्तिक वे धर्मगुरु  हैं जो धर्म को धंधा समझते हैं, जो भगवान पर भरोसा करने का उपदेश देते हैं लेकिन अपने साथ सशस्त्र सुरक्षाकर्मी लेकर चलते हैं। ये सब भगवान की मूर्ति को मिट्टी के पुतले से ज़्यादा कुछ नहीं समझते। इनकी नज़र में असली  नास्तिक वे हैं जो भगवान का नाम लेकर हत्या और अपराध करते हैं।’

सयाने यमराज बोले, ‘ये लोग गलत नहीं कहते। शंका करने मात्र से कोई नास्तिक नहीं हो जाता। अगर कोई उनकी शंका का समाधान नहीं कर पाता तो उसमें उनका क्या दोष है? असली नास्तिक वही है जो ऊपर से ईश्वर को मानने का दिखावा करता है, लेकिन भीतर से नहीं मानता। यदि इन शंकालु लोगों ने कोई अन्य पाप नहीं किया, किसी को लूटा सताया नहीं, समाज का अहित नहीं किया, तो इन्हें नरक में भेजना उचित नहीं। इन्हें ऐसी जगह स्थान दिया जाए जहां  इन्हें हमारी व्यवस्था को समझने का अवसर मिले और इनकी शंकाओं का समाधान हो। आगे से यह भी ध्यान रखें कि मुंह में राम और बगल में छुरी रखने वाले ढोंगी स्वर्ग में जगह न पा जाएं।’

चित्रगुप्त जी को ऐसी हिदायत देकर यमराज आगे बढ़ गये।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८६ – बेटे की माँ… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– बेटे की माँ…” ।)

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८५ — बेटे की माँ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

बिगड़ैल बेटा बारह साल बाद जेल की सज़ा काट कर लौटा। वह जर्जर हो गया था। झुकी टूटी माँ उसी के लिए जी रही थी। माँ ने बेटे के कैद जाने से पहले दिपाली नाम की दुल्हन पसंद की थी। दिपाली की तो कब के शादी हो गई। पर माँ तो उसी सपने में ठहर गई थी। विक्षिप्त सी माँ बड़ी मायूसी से अपने बेटे से बोली, “अब तुम्हारी शादी दिपाली से करवा दूँ। नाती नातिन मेरी गोद में खेलेंगे।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

03 – 12 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१४ – बेसुरा होना कठिन है ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१४ ☆ बेसुरा होना कठिन है… ?

एक संगीतमय आध्यात्मिक आयोजन से लौट रहे थे। वृंद के एक युवा गायक ने किसी संदर्भ में एकाएक कहा, “गुरुजी, बेसुरा गाना बहुत कठिन है।” उसके इस वाक्य पर पूरे वृंद में एक ठहाका उठा। कुछ क्षण तो मैं भी उस ठहाके में सम्मिलित रहा पर बाद में ठहाका अंतर्चेतना तक ले गया और चिंतन में बदल गया। इतनी सरलता से कितनी बड़ी बात कह गया यह होनहार युवक कि बेसुरा होना कठिन है।

जीवन जीने के लिए मिला है। जीने का अर्थ हर श्वास में एक जीवन उत्पन्न करना और उस श्वास को जी भर जीना है। श्वास और उच्छवास भी मिलकर एक लय उत्पन्न करते हैं, अर्थात साँसों में भी सुर है। सुर का बेसुरा होना स्वाभाविक नहीं है। वस्तुत:  ‘बेसुरा होना कठिन है’, इस वाक्य में अद्भुत जीवन-दर्शन छिपा है।  इस दर्शन का स्पष्ट उद्घोष है कि जीवन सकारात्मकता के लिए है।

स्मरण आता है कि जयपुर से वृंदावन की यात्रा में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायप्रणाली की विसंगतियों को लेकर संवाद हुआ था। उन्होंने बताया कि न्यायालय में आया हर व्यक्ति प्रथमदृष्टया न्यायदेवता के लिए निर्दोष है। उसे दोषी सिद्ध करने का काम पुलिस का है, व्यवस्था का है ।

महत्वपूर्ण बात है कि न्यायदेवता हरेक को पहले निर्दोष मानता है। इसका एक अर्थ यह भी है कि मनुष्य का मूल सज्जनता है। यह हम ही हैं जो भीतर के सज्जन को दुर्जन करने के अभियान में लगे होते हैं।

जीवन का अभियान सुरीला है, जीवन गाने के लिए है। नदी को सुनो, लगातार कलकल गा रही है। समीर को सुनो, निरंतर सरसर बह रहा है। पत्तों को सुनो, खड़खड़ाहट, एक स्वर, एक लय, एक ताल में गूँज रही है। बूँदों की टपटप सुनो, जो बरसात के साथ जब नीचे उतरती हैं तो एक अलौकिक संगीत उत्पन्न होता है। बादल की गड़गड़ाहट हो या बिजली की कड़कड़ाहट, संगीत का रौद्र रस अवतरित होता है। कभी रात्रि के नीरव में रागिनी का दायित्व उठाने वाले कीटकों के स्वर सुनो। बरसात में मेंढ़क की टर्र-टर्र सुनो।  कोयल की ‘कुहू’ सुनो, मोर की ‘मेहू’ सुनो। प्रकृति में जो कुछ सुनोगे वह संगीत बनकर कानों में समाएगा। शून्य में, निर्वात में जो कुछ अनुभव हो रहा है, वह संगीत है। तुम्हारे मन में जो गूँज रहा है, उसकी अनुगूँज भी संगीत है। हर तरफ राग है, हर तरफ रागिनी सुनाई पड़ रही है। यह कल्लोल है, यह नाद है, यही निनाद है।

इन सुरों को हम भूल गए। हमारे कान आधुनिकता और शहरीकरण के प्रदूषण से ऐसे बंद हुए कि प्रकृति का संगीत ही विस्मृत हो चला। हमने जीवन में प्रदूषण उत्पन्न किया, हमने जीवन में कर्कशता उत्पन्न की, हमने जीवन में कलह उत्पन्न किया, हमने जीवन में असंतोष उत्पन्न किया, हमने जीवन में अनावश्यक संघर्ष उत्पन्न किया। इन सबके चलते सुरीले से बेसुरे होने की होड़-सी लग गई।

कभी विचार किया कि इस होड़ में क्या-क्या खोना पड़ा?  परिवार छूटा, आपसी संबंध छूटे, संतोष छूटा, नींद छूटी, स्वास्थ्य का नाश हुआ। इतना सब खोकर कुछ पाया भी तो क्या पाया,…बेसुरा होना!.. सचमुच बेसुरा होना कठिन है।

संसार सुरीला है। जीवन के सुरीलेपन की ओर लौटो। तुम्हारा जन्म सुरीलेपन के लिए हुआ है।  सुरमयी संसार में सुरीले बनो। यही तुम्हारा मूल है, यही तुम्हारी प्रकृति है, यही तुम्हारी संस्कृति है।

स्मरण रहे, सुरीला होना प्राकृतिक है, सुरीला होना सहज है, सुरीला होना सरल है, बेसुरा होना बहुत कठिन है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५८ – हिंग्लिश पूर्णिका – राइट पथ ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – हिंग्लिश पूर्णिका – राइट पथ )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५८ ☆

☆ हिंग्लिश पूर्णिका – राइट पथ  ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

राइट टाइम ट्रेन रहें

कौन करेगा ट्रेन रहें?

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टेलेन्टेड हैं यंग बहुत

राइट पथ पर ब्रेन रहें

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बुलडोजर का जलवा है

साइलेंट क्यों क्रेन रहें

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क्लीन-ग्रीन लाइफ-टाउन

तब जब बहती ड्रेन रहें

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ड्रीम रियल्टी में बदलें

‘सलिल’ इनफ यदि ग्रेन रहें

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

६.१२.२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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