(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बिरज की ग्वालन की व्यथा…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३ ☆
कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – ईमानदारों का सम्मेलन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७४ – व्यंग्य – ईमानदारों का सम्मेलन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
पहली बार जिला मुख्यालय में “ईमानदारों का राष्ट्रीय सम्मेलन” आयोजित हुआ। स्वागत द्वार पर बड़े अक्षरों में लिखा था—“सच्चाई ही हमारी पहचान है।” नीचे छोटा अक्षर में लिखा था—“प्रायोजक: यूनिवर्सल कंस्ट्रक्शन कंपनी (जिस पर सीबीआई की जांच जारी है)।” मुख्य अतिथि, माननीय मंत्री जी, जिन्होंने हाल ही में अपनी तीसरी पत्नी के नाम पर पाँच एकड़ ज़मीन रजिस्टर कराई थी, मंच पर पहुँचे तो तालियाँ गूँज उठीं। भीड़ में से किसी ने कहा— “यही सच्चे ईमानदार हैं, सब कुछ खुलेआम करते हैं!” मंत्री जी मुस्कुराए। उन्होंने भाषण में कहा— “देश को अब ईमानदारी की कमी नहीं, बस पहचानने की ताकत चाहिए।” भाषण समाप्त होते ही मंच संचालक ने घोषणा की— “अब ईमानदारी सम्मान समारोह होगा।” पुरस्कार स्वरूप मंत्री जी ने हर प्रतिनिधि को घड़ी भेंट की, जिस पर उनका चुनाव चिन्ह खुदा था। पत्रकारों ने पूछा— “घड़ी असली है या नकली?” आयोजक बोला— “घड़ी असली है, बस समय नकली बताती है।”
दूसरा सत्र ‘नैतिकता के नए मानदंड’ पर था। एक वक्ता, सरकारी बाबू, बोले—“पहले रिश्वत को अपराध माना जाता था, अब यह सहयोग शुल्क कहलाने लगी है। समाज विकासशील है, शब्दावली भी होनी चाहिए।” दूसरे वक्ता, प्राइवेट स्कूल के संचालक, बोले—“हम बच्चों में नैतिकता लाने के लिए जीना कठिन बना देते हैं। फिर जब बच्चा नियम तोड़ने लगे, तो वही असली नागरिक कहलाता है।” सभागार तालियों से गूंज उठा। तभी मंच के पीछे से आवाज़ आई—“कृपया चोरी गई कुर्सियाँ वापस करें।” प्रतिनिधि मुस्कुराए—“ईमानदारी का सम्मेलन है, कुर्सियाँ कहाँ जाएँगी?” कुछ देर बाद पाया गया कि दर्जनभर कुर्सियाँ पार्किंग में बिक्रय हेतु रखी थीं। आयोजक ने घोषणा की— “यह व्यवस्था शुल्क है।” बाबू जी बोले— “वाह, देश आगे बढ़ रहा है!”
तीसरे सत्र में “डिजिटल ईमानदारी” पर चर्चा हुई। एक युवा अफ़सर ने कहा—“अब सब ऑनलाइन है। भ्रष्टाचार भी पारदर्शी हो गया है। ट्रांजैक्शन सीधे खाते में आती है, दलालों की ज़रूरत नहीं रही। यह डिजिटल इंडिया की सफलता है।” एक और विद्वान बोले—“ईमानदारी अब ऐप में मिलती है, वेरिफाई करके डाउनलोड करनी पड़ती है।” तभी मंच के सामने एक गरीब व्यक्ति अपनी फ़ाइल लेकर आया—“बाबू जी, दो महीने से आवेदन लंबित है।” बाबू ने मुस्कुरा कर कहा—“भाई, यह ईमानदारी का सम्मेलन है, सुविधा केंद्र नहीं। यहाँ सिर्फ भाषणों की अनुमति है, काम की नहीं।” वह आदमी चुप हो गया, लेकिन पौधे के पास खड़ा एक बच्चा बोला—“अगर यह ईमानदार हैं, तो हमारे गाँव में झूठे कौन रहते हैं?” सभा मौन हो गई। पंखे की आवाज़ में ईमानदारी की झिल्ली सी फड़फड़ाने लगी।
सम्मेलन के अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य हुआ। अध्यक्ष महोदय बोले— “हम सब अपने-अपने क्षेत्र के ईमानदार लोग हैं। मैं डॉक्टर के नाम पर दवा बेचता हूँ, शिक्षक नकली प्रमाणपत्र देता है, अफ़सर काम न करके फ़ाइल दबाता है, नेता जनता को भरोसा देता है—और यही राष्ट्रीय एकता का आधार है।” सभागार ठहाकों से भर गया। उन्होंने कहा— “अगले वर्ष हम ‘सच्चाई दिवस’ मनाएँगे, बशर्ते प्रायोजक मिल जाए।” बाहर निकलते हुए किसी ने पूछा— “क्या सम्मेलन सफल रहा?” आयोजक हँसा— “पूरा बजट खर्च हो गया, अब तो ईमानदारी साबित है!” रात को शहर लौटने वाले प्रतिनिधियों की बसें चलीं। सड़क किनारे एक ठेला वाला बैठा था, धीरे से बुदबुदाया— “साहब लोग ईमानदार हैं, इसलिए गरीब अब भी ज़िंदा है।” सड़क की बत्तियाँ झिलमिलाईं—शायद वे भी इस नई ईमानदारी पर मुस्कुरा रही थीं।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८८ ☆
~ न्यूयार्क से ~ उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर: स्वयं भगवान चित्रगुप्त ने तपस्या की थी यहां
महाकाल की नगरी उज्जैन केवल बाबा महाकाल के कारण ही नहीं, बल्कि कर्म, न्याय और मोक्ष की गहरी अवधारणाओं से जुड़े भगवान श्री चित्रगुप्त मंदिर के कारण भी विशेष पहचान रखती है। क्षिप्रा नदी के पवित्र तट रामघाट, अंकपात क्षेत्र में स्थित यह मंदिर उन विरले तीर्थों में गिना जाता है, जहाँ मृत्यु के बाद मिलने वाले न्याय, कर्मों के लेखा-जोखा और मोक्ष की परंपरा को महसूस किया जा सकता है। प्राचीन अवंती या उज्जयिनी की इस तपोभूमि को भगवान श्री चित्रगुप्त की साधना का स्थल माना जाता है, जहाँ उन्होंने तपस्या कर सर्वज्ञता और समस्त जीवों के कर्मों का लेखा रखने की दिव्य शक्ति प्राप्त की थी।
मान्यता के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्मा ने दीर्घ तपस्या के दौरान अपने ही मन में अंकित एक दिव्य पुरुष की कल्पना की, वह चित्र मन के अंतरतम में गुप्त हो गया, इसी से “चित्रगुप्त” नाम की उत्पत्ति मानी जाती है।
ब्रह्मा ने इस दिव्य पुरुष को आदेश दिया कि वे महाकाल की नगरी उज्जैन जाकर कठोर तपस्या करें और मानव कल्याण के लिए ऐसी शक्तियाँ अर्जित करें, जिनसे वे समस्त प्राणियों के पाप पुण्य और कर्मों का सूक्ष्मतम लेखा रख सकें। लोक परंपरा में यही स्थान आगे चलकर श्री चित्रगुप्त धाम , धर्मराज चित्रगुप्त मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ ।
आज भी भगवान श्री चित्रगुप्त की प्रतिमा को एक हाथ में कर्मों की पुस्तक और दूसरे हाथ से लेखा करते हुए दर्शाया गया है।
यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की परंपरागत रचना लिए हुए है, जिसमें गर्भगृह, मंडप और ऊँचा शिखर प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। गर्भगृह में स्थापित भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति को सफेद संगमरमर की शांत, गंभीर और न्यायमूर्ति भाव वाली प्रतिमा के रूप में वर्णित किया जाता है, जो भक्तों को अपने कर्मों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है। रामघाट स्थित धर्मराज श्री चित्रगुप्त मंदिर में यमराज, धर्मराज और यमुना के साथ चित्रगुप्त की संयुक्त उपासना की परंपरा भी मिलती है, जिससे यह स्थल मृत्यु, धर्म, पवित्रता और न्याय , इन चारों के अनूठे संगम के रूप में देखा जाता है।
कथाओं के अनुसार, उज्जैन के इसी क्षेत्र में भगवान चित्रगुप्त ने दीर्घकालीन तप कर वह दिव्य शक्ति पायी, जिसके बल पर वे यमलोक में प्रत्येक आत्मा के लोक-परलोक के कर्मों का खाता तैयार करते हैं। इसी कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल पूजा ही नहीं, बल्कि आत्म-मंथन, अनुशासित जीवन और सत्यनिष्ठ आचरण का संकल्प भी करते हैं ताकि मृत्यु के बाद उनके पक्ष में उत्तम लेखा लिखा जाए। कायस्थ समाज, जो श्री चित्रगुप्त को अपना आदि–देव और कुलदैव मानता है, इस मंदिर को ‘कायस्थों के चार धाम’ के रूप में अग्रणी स्थान देता है , और कार्तिक शुक्ल द्वितीया (चित्रगुप्त पूजा ,यम द्वितीया) पर यहाँ विशेष अनुष्ठानों, लेखनी, बही की पूजा और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक एकता को व्यक्त करता है।
उज्जैन के धर्मराज–चित्रगुप्त मंदिर से कई जीवंत लोककथाएँ भी जुड़ी हैं, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को बढ़ाती हैं। एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि वनवास के बाद भगवान राम ने शिप्रा तट पर इसी क्षेत्र में आकर धर्मराज–चित्रगुप्त की विशेष पूजा की और अपने पिता दशरथ सहित पूर्वजों का तर्पण कर पितृऋण से मुक्ति की प्रार्थना की थी। इसीलिए आज भी बहुत से लोग यह विश्वास लेकर आते हैं कि शिप्रा में स्नान और चित्रगुप्त मंदिर में विधिवत पूजा तर्पण से पितृदोष शांत होता है और पूर्वजों की आत्माओं को शांति और उन्नति प्राप्त होती है।
आधुनिक समय में इस मंदिर की एक अत्यंत विशिष्ट और चमत्कारिक मानी जाने वाली लोकपरंपरा ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। यहाँ ऐसे अनेक श्रद्धालु पहुँचते हैं जो असहनीय रोग, दीर्घकालीन पीड़ा या जीवन मृत्यु के संघर्ष में उलझे अपने परिजनों के लिए या तो चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करते हैं या फिर शांत, पीड़ामुक्त मृत्यु के रूप में मोक्ष का वरदान माँगते हैं।
प्रचलित विश्वास यह है कि सच्ची आस्था से की गई विशेष पूजा के बाद चौबीस घंटे के भीतर या तो कष्टों से राहत मिलती है या फिर अत्यंत शांतिपूर्ण प्रस्थान का मार्ग खुल जाता है, इसलिए इसे कई लोग रूपक रूप में “मौत का वरदान” माँगने वाला मंदिर भी कहने लगे हैं, जबकि भक्त इसे वास्तव में “मोक्ष और कष्टमुक्ति” की याचना मानते हैं।
स्थानीय परंपरा में यह धारणा भी प्रचलित है कि इस मंदिर के ऊपर से कर्क रेखा गुजरती है, जो इसे ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष ऊर्जा–क्षेत्र बनाती है और ग्रहदोषों, विशेषकर कालसर्प, राहु–केतु आदि के समाधान के लिए यहाँ दीपदान और विशेष पूजा कराई जाती है। कई पीढ़ियों से यहाँ सेवा कर रहे पुरोहितों के अनुसार रामघाट का यह मंदिर कम से कम सैकड़ों वर्षों से नियमित पूजा अर्चना का केंद्र है, और उनके वंश द्वारा सत्रहवीं, अठारहवीं शताब्दी से यहाँ आराधना किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। समय समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार, नई प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा और ट्रस्ट के गठन जैसी प्रक्रियाएँ भी हुईं, जिनके कारण इसे “श्री चित्रगुप्त धाम” के रूप में व्यवस्थित धार्मिक केंद्र का रूप मिला।
समग्र रूप से देखें तो उज्जैन का श्री चित्रगुप्त मंदिर केवल एक देवालय भर नहीं, बल्कि भारतीय धर्मदर्शन के “कर्म सिद्धांत” का जीवंत विद्यालय है, जहाँ हर दर्शन यह स्मरण कराता है कि मृत्यु के बाद न्याय निश्चित है और उसका आधार हमारे अपने कर्म ही हैं। महाकालेश्वर, कालभैरव और शक्तिपीठों के साथ स्थित यह धाम उज्जैन की बहुरंगी आध्यात्मिक विरासत में उस कड़ी के रूप में जुड़ता है जो भक्ति के साथ-साथ जिम्मेदार, न्यायपूर्ण और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देती है । इसलिए जब यह कहा जाता है कि “स्वयं भगवान चित्रगुप्त ने यहाँ तपस्या की थी”, तो इसके पीछे वही भाव निहित है कि यह स्थल मनुष्य को अपने भीतर के न्यायाधीश, अपने ही ‘चित्रगुप्त’ को जगाने की प्रेरणा देता है।
यह मंदिर न केवल कायस्थों के लिए बल्कि समूचे हिंदू समाज , पौराणिक, ऐतिहासिक, ASI, पर्यटन हर दृष्टि से जन महत्व की विरासत है।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आस्था और ग्रीन मोटिवेशन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २६७ ☆आस्था और ग्रीन मोटिवेशन… ☆
आस्था… यह केवल पूजा की थाली में रखे दीपक की लौ नहीं होती,
आस्था वह शक्ति है जो मनुष्य को अंधेरों में भी रोशनी ढूँढने की प्रेरणा देती है।
और हरियाली… यह केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं,
यह धरती का प्राण, प्रकृति की धड़कन और हमारे जीवन की ऊर्जा है।
आस्था और हरियाली जब एक साथ जुड़ते हैं,
तो मनुष्य के भीतर एक अद्भुत शक्ति जन्म लेती है।
यही शक्ति है ग्रीन मोटिवेशन।
आस्था हमें जोड़ती है, हरियाली हमें जीवित रखती है
जब हम किसी मंदिर, किसी वृक्ष, या किसी पवित्र स्थल पर जाते हैं,
तो मन अपने आप शांत हो जाता है। क्यों?
क्योंकि प्रकृति के साथ किया गया हर संपर्क,
हमें हमारे मूल से जोड़ता है।
धरती माता से जुड़ी यह भावना ही आस्था है।
और जब इसी आस्था में हम हरियाली का संकल्प जोड़ते हैं,
तो यह आस्था केवल व्यक्तिगत नहीं, समाज का बल बन जाती है।
हर पौधा एक प्रार्थना है, हर वृक्ष एक आशीर्वाद
यदि हम समझ लें कि—
“पेड़ लगाना सिर्फ पर्यावरण का काम नहीं, यह पूजा का एक रूप है।”
तो हर मनुष्य का दृष्टिकोण बदल जाएगा।
एक पौधा लगाना मतलब
धरती को दिया गया श्रद्धा का दीप,
एक वृक्ष को बचाना मतलब
आने वाली पीढ़ियों के लिए आशीर्वाद छोड़ देना।
आस्था का असली अर्थ ही यही है —
जहाँ हम रहते हैं, जिस हवा को साँस लेते हैं,
उसको पवित्र, सुरक्षित और जीवनदायी बनाना।
ग्रीन मोटिवेशन: आत्मा को जगाने वाली प्रेरणा
ग्रीन मोटिवेशन बाहरी नहीं,
यह भीतर उठने वाला वह भाव है जो कहता है—
“मैं बदलूँगा, तो संसार बदलेगा।”
जब मन में आस्था हो और हाथों में कर्म…
तब कोई कठिनाई बड़ी नहीं लगती।
आज का समय हमसे यही मांग करता है कि
हम अपनी आस्था को केवल मंदिर की सीढ़ियों तक न रखें,
बल्कि हर पेड़, हर पौधे, हर पत्ते तक पहुँचाएँ।
धरती हमारी माता है, और माता को केवल पूजा नहीं, सुरक्षा चाहिए
हम रोज़ माँ को प्रणाम करते हैं,
पर उसी धरती-माता के आँगन में
यदि कूड़ा फेंक दें, पेड़ काट दें,
तो यह कैसी आस्था?
सच्ची भक्ति वही है जिसमें
हम धरती को हरा-भरा रखें,
हवा को स्वच्छ और जीवन को संतुलित बनाएँ।
जब आप पौधा लगाते हैं,
धरती आपको आशीर्वाद देती है—
स्वास्थ्य का, मानसिक शांति का, और समृद्धि का।
अन्ततः आस्था यदि दीपक है, तो हरियाली उसकी लौ
आस्था हमें दिशा देती है।
हरियाली हमें जीवन देती है।
और इन दोनों का संगम ही
एक सुंदर, स्वस्थ और संतुलित भविष्य बनाता है।
आपके मन में जो हरियाली के प्रति सम्मान और प्रेम है,
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है सुश्री विमला रस्तोगी जी द्वारा लिखित मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप ” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३० ☆
☆ पुस्तक समीक्षा : मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप – लेखिका: सुश्री विमला रस्तोगी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’☆
– मुस्कराते बचपन की मार्गदर्शिका: मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप –
बचपन की मुस्कानें तभी खिलती हैं जब उन्हें समझने वाले माँ-बाप हों—विमला रस्तोगी की यह पुस्तक “मुस्कुराता बचपन, सोचते माँ-बाप” इसी भावभूमि पर रची गई एक विचारशील कृति है, जो बाल मनोविज्ञान, अभिभावकत्व और सामाजिक बदलावों के बीच एक सेतु और मार्गदर्शिका का कार्य करती है।
लेखिका ने अपने अनुभव, संवेदना और सामाजिक दृष्टि से समृद्ध लेखों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आज का बचपन केवल खिलौनों और किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तकनीक, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबावों के बीच जूझता हुआ बचपन है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें एक मार्गदर्शक, सहचर और संवेदनशील श्रोता की भूमिका भी निभानी होती है।
पुस्तक में लेखिका ने जिन विषयों को उठाया है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है —जैसे ‘बच्चे अपनाते हैं बड़ों की आदतें’, ‘हादसों के असर से बच्चों को उबारें’, ‘बच्चों को प्रकृति से जोड़ें’, ‘काल्पनिक खेल और बच्चे’, ‘आत्मकेन्द्रित बच्चे’—वे न केवल सामयिक हैं, बल्कि हर उस अभिभावक के लिए मार्गदर्शक हैं जो अपने बच्चे के सर्वांगीण विकास की चिंता करता है।
लेखिका की भाषा सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय है। कहीं भी उपदेशात्मकता नहीं है, बल्कि अनुभवजन्य उदाहरणों और संवेदनशील दृष्टिकोण के माध्यम से पाठक को सोचने के लिए प्रेरित किया गया है। विशेष रूप से ‘सेविन-सेविन-सेविन’ जैसे आधुनिक शहरी जीवन के उदाहरणों के माध्यम से लेखिका ने यह दिखाया है कि बच्चों को समय देना केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि एक सजीव संवाद की आवश्यकता है।
इस पुस्तक की विशेषता यह है कि यह केवल बच्चों के लिए नहीं, बल्कि उनके माता-पिता, शिक्षकों और बाल साहित्यकारों के लिए भी एक दर्पण है—जो उन्हें यह दिखाता है कि वे अपने व्यवहार, समय और दृष्टिकोण से बच्चों के जीवन को कैसे प्रभावित करते हैं।
विमला रस्तोगी जी का यह प्रयास निश्चय ही बाल साहित्य और अभिभावक विमर्श के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह पुस्तक हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए जो बच्चों के साथ जीवन को समझना और जीना चाहता है।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(पूर्वसूत्र- दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या दारावरची बेल वाजवली तेव्हा मनात विचार होते ते आता त्यांच्याशी काय बोलायचं याचेच. मनातली हतबलता कधीच विरून गेली होती. अनिश्चिततेचा तर लवलेशही नव्हता. हीच पुढे घडू पहाणाऱ्या चमत्काराची सुरूवात आहे याची मात्र मला त्याक्षणी कल्पनाही नव्हती!)
सहस्त्रबुद्धे आजोबांनीच दार उघडलं. ‘या’ म्हणाले आणि लगबगीने आत गेले. वेळेचा अंदाज घ्यायला मी माझ्या हातातल्या घड्याळकडं पाहिलं त्याच वेळी पाण्याचं तांब्या-भांडं घेऊन बाहेर आलेल्या आजोबांच्या ते नेमकं लक्षात आलं.
“गेले तीन दिवस अशीच वेळेची सर्कस चाललेय तुमची. मी फार त्रास देत नाहीय ना तुम्हाला?”
“अजिबातच नाही. उलट खूप वेळ घेऊन येता आलं असतं तर तेच मला जास्त आवडलं असतं. ” मी मनापासून म्हणालो. आणि ते खरंही होतं. केवळ बँक स्टाफच्या आत्मकेंद्री विचारांमुळे ग्राहक कसे दुखावले जातात आणि बॅंक-व्यवस्थापनालाही त्याचा किती मनस्ताप होत असतो याचा खूप काही शिकवून जाणारा अनुभव बँकिंग क्षेत्रामधल्या माझ्या तोवरच्या दीर्घ वाटचालीत मी प्रथमच घेत होतो. त्यामुळेच त्यादिवशीच्या कटू घटनेमुळे दुखावल्या गेलेल्या सहस्त्रबुद्धे आजोबांना समजून घेणंही आवश्यक आहे असंच मला वाटत होतं.
सहस्त्रबुद्धे आजोबांबद्दल मला कितीही सहानुभूती वाटत असली तरी केवळ त्यांच्या समाधानासाठी मी प्रभूदेसाईंना अतिशय कठोर शिक्षा करू शकणार नव्हतो आणि म्हणूनच आजोबांना अपेक्षित असणारा न्यायही मला देता येणार नव्हता. कारण प्रभूदेसाईंना शिक्षा करायची तर बँकेच्या नियमाप्रमाणे त्यांच्यावर आरोप ठेवून तो पुराव्यानिशी सिद्ध करण्याची जबाबदारी व्यवस्थापनाचाच एक भाग म्हणून माझ्यावरच येणार होती. त्यामुळे सहस्त्रबुद्धे आजोबांचं समाधान करायचं तर त्यांना प्रोसेसमधील या अडथळ्यांची जाणीव करून देणं जेवढं आवश्यक होतं तेवढंच अडचणीचंही ठरू शकणार होतं. कारण आजोबा ते ऐकून दुखावले, अस्वस्थ झाले, चिडले तर सगळ्याच प्रकरणाला नकारात्मक कलाटणी मिळण्याची शक्यता नाकारता येत नव्हती. ज्या उद्देशाने हे सगळंच प्रकरण आम्ही धसाला लावलं होतं तो उद्देशही पूर्ण झाला नसता ते वेगळंच. त्यामुळे परिस्थिती अतिशय नाजूकपणे हाताळणं आवश्यक होतं. बोलण्यातल्या कौशल्यापेक्षा आजोबांच्याशी प्रामाणिकपणे संवाद साधणं गरजेचं आहे असा विचार मी केला. गेल्या तीन दिवसात वेळोवेळी या प्रकरणाबद्दल माझ्या मनात जे जे विचार येऊन गेले ते सगळे अतिशय निखळ स्वरूपात आजोबांपुढे व्यक्त करून त्या पार्श्वभूमीवर यापुढे त्यांनी काय करणं आपल्याला अपेक्षित आहे हेही अतिशय स्पष्ट शब्दात त्यांना सूचवणं हाच एकमेव मार्ग मला योग्य वाटला. याच्या परिणामतः येणारं यशापयश ‘त्या’च्यावर सोपवून मी बोलायला सुरूवात केली.
“आजोबा, खरं सांगायचं तर या सगळ्या प्रकरणाबद्दलचेच विचार गेले तीन दिवस माझ्या मनात ठाण मांडून बसलेले आहेत. तुमच्या दुखावलेल्या भावना, तुम्हाला झालेला मनस्ताप, आणि त्यामुळे तुमच्यासारख्या वयोवृध्द ग्राहकाच्या मनातली बॅंकेची प्रतिमा डागाळली गेल्याच्या विचाराचाच मला खूप त्रास होतोय. खरंतर ग्राहकाला बॅंकेत तत्पर आणि चांगली सेवा मिळावी यासाठी सर्वच बॅंकांमधे काटेकोर नियम आहेत. एखाद्या ग्राहकाने तक्रार केली तर त्याचं तत्परतेने निराकरण होतेय कीं नाही हे पहाण्यासाठी आवश्यक ती यंत्रणाही कार्यरत आहे. खरं सांगायचं तर यामुळेच निर्माण होऊ पहाणारी तक्रार शक्यतो ब्रॅंचपातळीवरच योग्य पध्दतीने हाताळून त्याचं निराकरण करण्याचाच प्रयत्न बहुतेक ब्रॅंचमॅनेजर्स करीत असल्याने स्थानिक पातळीवरच त्याची दखल घेतली जाते.
प्रभूदेसाईंच्या बाबतीत मात्र जे घडलं ते खरंच त्यांच्यासारख्या सूज्ञ माणसांकडून कधीच अपेक्षित नाहीय. ही नकळत झालेली चूक नाहीये. आमच्या साहेबांशी बोलतानाही मी त्यांना जे सांगितलं होतं तेच आज तुम्हालाही सांगतो. ब्रॅंच मॅनेजरच्या दृष्टीने मोठ्या रकमांची डिपॉझिट्स बँकेत ठेवणारे खातेदार हेच महत्त्वपूर्ण ग्राहक असा अपवादात्मक कां असेना पण कांही मॅनेजर्सचा चुकीचा समज असतो. कदाचित त्या दिवशी समोर बसलेल्या अशाच एका कस्टमरला तत्पर सेवा देताना कोणताही अडथळा मधे येऊ नये असा प्रयत्न करत असतानाच प्रभूदेसाईंनी दुसऱ्या ग्राहकावर आपल्याकडून अन्याय होऊ नये याचीही काळजी, केवळ ते ब्रॅंच मॅनेजर होते म्हणूनच नव्हे तर एक माणूस म्हणूनही घ्यायला हवी होती असंच मला वाटतं. विशेषतः तुम्ही बराच वेळ बाहेर ताटकळत बसलाय हे त्यांच्या लक्षातही न येणं हेच चुकीचं होतं. तुम्ही आपणहोऊन पुन्हा दुसऱ्यांदा जेव्हा केबिनमधे गेलात तेव्हा निदान तिथेच बसलेल्या दुसऱ्या ग्राहकासमोर तरी त्यांनी तुमचं हसतमुखानं स्वागत करून नेमकं काय काम आहे हे विचारून घ्यायला हवंच होतं. एरवी इंटरकाॅमवरून अकाऊंटंना पूर्वकल्पना देऊन तुम्हाला त्यांच्याकडेही ते पाठवू शकले असते. तुमचं एक अगदी साधं काम हातावेगळं करण्यासाठी फक्त दोन मिनिटंही पुरेशी ठरली असती. असं असताना त्यांना ते करावंसं न वाटणं हेच आक्षेपार्ह आहे.
ज्या मन:स्थितीत तुम्ही बॅंकेत आला होतात त्याचा विचार करता प्रभूदेसाईंच्या वागण्या-बोलण्यावरील तुमच्या प्रतिक्रिया कितीही टोकाच्या असल्या तरी त्या नैसर्गिक आणि अपरिहार्य अशाच होत्या… “
ते लक्षपूर्वक ऐकत होते. मी बोलायचं थांबलो तसं भानावर येत त्यांनी चमकून माझ्याकडं पाहिलं. त्यांची ओलसर नजर पाहून मला पुढं काय बोलावं सुचेचना.
“… हे सगळं पुन्हा आठवताना, ऐकताना तुम्हालाही खूप त्रास होतोय हे समजतंय मला आजोबा. पण असं असूनही तुमच्यावर झालेल्या अन्यायाचं परिमार्जन करण्यासाठी तुमचं पूर्ण समाधान होईल असं मी काय करायला हवं तेच मला समजत नाहीय ” मी म्हणालो.
” म्हणजे?”
“प्रभूदेसाईंना जास्तीत जास्त कठोर शिक्षा करून तुम्हाला न्याय मिळवून द्यावा अशी तुमची अपेक्षा आहे. असं वाटणं यात गैर कांहीच नाही. पण तुम्ही थोडं समजूतीनं घेतलंत तर तुमच्या दृष्टीनं यातून समाधानकारक मार्ग कसा निघेल याचा विचार आपण करू शकू असं मला वाटतं. “
“सबुरीनं घ्यायचं म्हणजे काय करायचं?”
“कोणत्याही कर्मचाऱ्यांने नकळत किंवा जाणीवपूर्वक केलेल्या कुठल्याही चुकीची त्याला काय शिक्षा करायची याचे बँकांचे काही नियम आहेत आणि त्यासाठीची ठराविक प्रोसेसही. त्या बाहेर न जाता प्रभूदेसाईंना त्यांच्याकडून झालेल्या चुकीची स्पष्ट शब्दात कल्पना देऊन त्यांच्या बाबतीत नेमकी काय ॲक्शन घ्यायची हे ठरवावं लागेल. हे सगळं शक्यतो झोनल ऑफिसच्या पातळीवरच झालं तर लगेच अंमलात आणता येऊ शकेल. सर्व अहवाल सेंट्रल ऑफिसला पाठवून त्यांची अनुमती घ्यायची तर त्या प्रोसेसला बराच वेळही लागू शकेल. या दोन्हीपैकी जे करायचं ते तुमचं समाधान होईल असं व्हावं एवढीच माझी इच्छा आहे. पण जे कांही ठरेल त्याचा अंतिम निर्णय अर्थातच आमच्या डी. जी. एम्. साहेबांचाच असेल. तरीही त्याची पूर्वकल्पना तुम्हाला देऊन तुमची संमती घेण्याचं आश्वासन मी तुम्हाला देतो. “
“ठीक आहे. जे ठरेल ते सांगा मला. त्यानंतर काय करायचं ते मी पाहिन. ” आजोबा कांहीशा नाराजीने म्हणाले.
मी त्यांचा निरोप घेऊन जायला निघालो. पण ही अनिश्चितता अशीच सोबत घेऊन जाणं मला नको होतं. विषय पूर्णतः संपायला हवा होता आणि या क्षणापर्यंत तरी आजोबांचा अॅप्रोच मला निश्चिंत करणारा वाटत नव्हता. मी जाता जाता क्षणभर थबकलो. आजोबा माझ्याकडेच पहात होते.
“जाण्यापूर्वी एकच सांगायचंय. तुम्ही माझ्यापेक्षा मोठे आहात. अनुभवी आहात. खरंतर मी तुम्हाला कांही सांगणं योग्य आहे की नाही मला माहित नाही. तुम्ही भाविक आहात, दत्त महाराजांच्यावर तुमची श्रद्धा आहे याची मला कल्पना असल्यानेच हे सांगावंसं वाटतंय म्हणून सांगतो.. “
त्यांनी मला आत येऊन बसायची खूण केली. निसटू पहाणारा क्षण जणू अकल्पितपणे क्षणभर थबकला होता. तो घट्ट धरून ठेवत मी ‘त्या’नेच प्रेरणा द्यावी तसं बोलू लागलो….
“कोण चूक कोण बरोबर हे ठरवण्याचा, चुकीबद्दल शिक्षा करण्याचा अधिकार केवळ व्यवस्थेचा एक भाग म्हणून माणसाने स्वतःकडे घेतलेला आहे आणि त्याप्रमाणे नियम ठरवलेले आहेत. त्या नियमांप्रमाणे घेतलेला निर्णय सर्वार्थाने न्याय देणारा असतोच असं नाही. पण या सर्व व्यवस्थेवरही सर्वाधिकार असलेली एक अदृश्य यंत्रणा ‘वर’ कार्यरत असते. सोप्या भाषेत आपण ज्याला ‘देव’ म्हणतो त्या देवाची यंत्रणा. तो पहात असतो सगळं. आणि प्रत्येक क्षणी घडणाऱ्या घटनांचा साक्षीदारही तोच असतो. न्याय देणारा जसा तो तसाच अन्यायाचं निवारण करणाराही तोच. त्या देवाच्या काठीला आवाज नसतो. पण अतिशय योग्य पद्धतीने, कुणाच्याही नकळत, कसलाही गाजावाजा न करता, त्या काठीने होणारा न्यायनिवाडा हा अन्यायचं निराकरण करणारा, अन्याय झालेल्याला खऱ्या अर्थाने न्याय देणाराच असतो. एकच सांगावंसं वाटतं, प्रभूदेसाईंना काय शिक्षा करायची हेही आपण ‘त्या’च्यावर सोपवूया. जे होईल ते योग्यच असेल हा विश्वास असू दे. मी आमच्याकडून जे करणं आवश्यक आणि शक्य असेल ते सगळं करीन. उद्याची आपली भेट असेल ती या विषयापुरती शेवटची असेल हे नक्की. येतो मी… “
त्यांचा निरोप घेऊन मी बाहेर पडलो तेव्हा माझ्या मनात झिरपणारं समाधान मला दिलासा देत होतं. यापुढं जे घडेल ते ‘तो म्हणेल तसं’ ! तिकडं सहस्त्रबुद्धे आजोबाही असाच विचार करत असतील याची मला खात्री होती.
तरीही त्याची प्रचिती दुसऱ्या दिवशीच मला येणाराय यांची मात्र मला कल्पना नव्हती!!
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “रोयें कैसे…” ।)
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अपने से ही एक युद्ध” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १२५ ☆ अपने से ही एक युद्ध ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆