(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुकून।)
इस भाग दौड़ की जिंदगी में समझ में नहीं आता क्या करूँ क्या न करूँ?
आज पैदल चल रही हूँ तो यह रास्ता भी मुझे बहुत लंबा लग रहा है कमल जी अपने आप से बातें करते हुऐ आराम से धीरे-धीरे चल रही थी।
दीवार पर लिखे हुए सभी पोस्ट को ध्यान से पढ़ रही थी और आसपास की दुकानों के बोर्ड भी पढ़ रही थी। चलो अच्छा है आज गाड़ी खराब हो जाने से कुछ तो फायदा हुआ पता चल जाएगा कि कहाँ क्या मिलता है?
तभी अचानक एक पोस्ट दिखाई दिया उसमें लिखा था कि चाय कॉफी के साथ यहाँ बातों का आनंद लें।
यह कैसी दुकान है कमल जी ने सोचा कुछ देर रुकने के बाद उनके मन में विचार आया चलो अंदर चल कर देखती हूँ घर जल्दी जाकर क्या करूंगी अकेली ही तो रहती हूँ बच्चों ने तो मुझे अकेला छोड़कर विदेश चले गए समय काटने के लिए पास के स्कूल में पढ़ाती हूँ।
उन्होंने देखा काफी सारे लोग बैठे हैं एक लाइब्रेरी है उसमें कुछ लोग ऑनलाइन पढ़ रहे हैं कुछ पेपर और किताबें पढ़ रहे है, चाय कॉफी और नाश्ता भी मिल रहा है।
तभी एक मुस्कुराती हुई महिला ने कहा -” मैडम आप क्या लेंगे लिए यहाँ बैठ जाइए।”
कमल जी ने कहा बहन जी कैसी जगह है इसके बारे में आप मुझे कुछ बताइए?
उसे महिला ने कहा मेरा नाम कविता है, हम पति-पत्नी यहां रहते हैं हमारा बहुत बड़ा घर था सड़क के किनारे हम अकेले रहते थे इसलिए हम लोगों ने सारी किताब कॉपी को एक जगह रख दिया और कुछ कंप्यूटर भी खरीद लिए हैं बच्चे पढ़ते हैं और जो हमारी तरह बुजुर्ग हैं वह भी यहां आते हैं हम सभी एक दूसरे के साथ अपना अनुभव बताते हैं और इतनी देर हम सब कैसे बैठ पाएंगे इसलिए यहाॅं पर चाय कॉफी नमकीन बिस्कुट सैंडविच और पकौड़ी मिलती है।
बाबाजी आप लोग तो बहुत अच्छे कार्य कर रहे हो मुझे तो यह पता ही नहीं था।
कविता ने कहा बहन क्या करें हमारी मजबूरी है और वक्त की मांग है आज के जमाने में किसी के पास समय नहीं है और हमारे पास समय ही समय है तो क्यों ना हम सभी को सुकून बाँटे।
कविता ने कहा ठीक कह रही हो बहन मुझे भी एक कप चाय पिला दो। कविता और रागिनी दोनों मुस्कुराने लगती हैं उनकी आंखों में एक चमक आ जाती है।
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १४ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
टागोरांच्या कुटुंबात अनेक सुप्रसिद्ध चित्रकार होते. मात्र रविंद्रनाथांनी वयाच्या पन्नाशीनंतर चित्रं काढायला सुरवात केली. तरीही त्यांनी जवळ जवळ १५ वर्षांच्या कालावधीत अंदाजे २३०० कलाकृती निर्माण केल्या होत्या. त्यांचे कथासंग्रहदेखिल समर्पक चित्रांनी सजवलेले असत.
कलेच्या अभ्यासकांच्या मते टागोरांची चित्रं Art Nouveau या कलाप्रकारामुळे जगापर्यंत पोहोचली. Art Nouveau ही एक कला चळवळ होती. त्यात लोककलेचं मोठ्या प्रमाणात चित्रण असायचं.
१९३० मध्ये टागोरांची ३०० चित्रं असलेली प्रदर्शने युरोपात लंडन, पॅरिस व बर्लिन मधे भरवण्यात आली होती.
त्यांनी आपली अनेक चित्रं निरनिराळ्या कलासंग्रहालयांना भेट दिली होती. बर्लिनच्या नॅशनल गॅलरीला १०० एक पेंटिंग्ज त्यांनी भेट दिली होती. त्यातील अनेक पेंटिंग्स नंतर लंडनमधील संग्रहालयात गेली. जी पाच चित्रं बर्लिनच्या संग्रहालयात शिल्लक होती, त्यात पक्ष्यांची आणि माणसांची चित्रं होती, पैकी एक लाल रोबमध्ये असलेल्या मुलीचंही चित्र होतं. ही चित्रं त्यांनी शाई आणि पाण्याच्या रंगाने काढली होती. असं म्हणतात की नाझींनी ही चित्रं तिथून काढून टाकली. कांही लिलावात खाजगी संग्राहकांना दिली असावीत. कांही चित्रं टागोरांना परत पाठवली असावीत. शेवटी त्यांचं फक्त एकच चित्र बर्लिन येथील संग्रहालयात शिल्लक राहिलंय, हे मात्र खरं!
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☆ गीत ४० ☆
THE rain has held back for days and days, my God, in my arid heart. The horizon is fiercely naked ⎯ not the thinnest cover of a soft cloud, not the vaguest hint of a distant cool shower.
Send thy angry storm, dark with death, if it is thy wish, and with lashes of lightning startle the sky from end to end.
But call back, my lord, call back this pervading silent heat, still and keen and cruel, burning the heart with dire despair.
Let the cloud of grace bend low from above like the tearful look of the mother on the day
WHERE dost thou stand behind them all, my lover, hiding thyself in the shadows? They push thee and pass thee by on the dusty road, taking thee for naught. I wait here weary hours spreading my offerings for thee, while passers by come and take my flowers, one by one, and my basket is nearly empty.
The morning time is past, and the noon. In the shade of evening my eyes are drowsy with sleep. Men going home glance at me and smile and fill me with shame. I sit like a beggar maid, drawing my skirt over my face, and when they ask me, what it is I want, I drop my eyes and answer them not.
Oh, how, indeed, could I tell them that for thee I wait, and that thou hast promised to come. How could I utter for shame that I keep for my dowry this poverty. Ah, I hug this pride in the secret of my heart.
I sit on the grass and gaze upon the sky and dream of the sudden splendour of thy coming ⎯ all the lights ablaze, golden pennons flying over thy car, and they at the roadside standing agape, when they see thee come down from thy seat to raise me from the dust, and set at thy side this ragged beggar girl a-tremble with shame and pride, like a creeper in a summer breeze.
But time glides on and still no sound of the wheels of thy chariot. Many a procession passes by with noise and shouts and glamour of glory. Is it only thou who wouldst stand in the shadow silent and behind them all? And only I who would wait and weep and wear out my heart in vain longing?
EARLY in the day it was whispered that we should sail in a boat, only thou and I, and never a soul in the world would know of this our pilgrimage to no country and to no end.
In that shoreless ocean, at thy silently listening smile my songs would swell in melodies, free as waves, free from all bondage of words.
Is the time not come yet? Are there works still to do? Lo, the evening has come down upon the shore and in the fading light the seabirds come flying to their nests.
Who knows when the chains will be off, and the boat, like the last glimmer of sunset, vanish into the night?
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४० – बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में सम्मान की”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६९ ☆ देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆
हमारे समाज में उपरोक्त किंवदंती को बहुत बुरा माना जाता हैं। आज का समय इसके बिल्कुल विपरीत हो गया हैं। अपना उल्लू सीधा करने में कोई भी पीछे नहीं रहता हैं।
पूरा विश्व युद्ध की आग से तप रहा है। हमारा मीडिया इस मौके को खूब भांजने में रात दिन एक कर रहा हैं। जब कभी युद्ध आदि का समय आता है, मीडिया वाले भी भूतपूर्व रक्षा अधिकारियों को अपने पैनल में लेकर दिन भर चर्चा कर अपनी टी आर पी दिन दोगुनी और रात चौगुनी वृद्धि कर लेते हैं।
स्टूडियो को “वार रूम” का टाइटल मिल जाता हैं। मोहोल को युद्धमय बनाने के लिए समय समय पर सायरन बजा दिया जाता हैं। शरीफ सा दर्शक इनकी फरेबी बातों में बंधा रहकर मूर्ख बनता रहता हैं।
हमारे एक परिचित मुंबई स्थित बहुत बड़ी विज्ञापन कंपनी में कार्यरत हैं। उन्होंने बातचीत में बताया आज कल फिल्मी सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों का क्रेज़ कम हो रहा हैं। विज्ञापनों में बहुत शीघ्र इन रक्षा विशेषज्ञों को देखा जा सकेगा। भूतपूर्व योद्धा यदि मान जाएं तो बोर्नविटा, डाबर और मसाले बनाने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत दे सकती हैं। टीवी पर अपनी सेवाएं देने वाले चेहरे को जनता विज्ञापनों में देखकर ही उत्पाद खरीदने का मानस बनाती हैं।
हमें तो लगता है, आने वाले समय में टीवी एंकर भी विज्ञापनों में भी छा जाएंगे, बशर्ते उनके चैनल इसकी अनुमति दे देवें
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “संस्कारधानी मेरा अपना शहर ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ ☆
🌻आलेख🌻संस्कारधानी मेरा अपना शहर 🌧️
आइये जबलपुर के बारे में कुछ अंश आपको बता रही हूंँ। ताल तलैया से घिरा हुआ माँ नर्मदा तट पवित्र स्थल जहाँ की संगमरमर की चट्टानें विश्व प्रसिद्ध है।
यहाँ के घाट, गौरी घाट, उमा घाट, तिलवारा घाट, भेड़ाघाट, ऐसे घाटों से सजा जिसमें 52 ताल और 84 छोटी तलैया शामिल है। इस कारण इसे तालों का शहर भी कहा जाता है।
इसका मुख्य नाम जाबालिपुरम था। जो हमारे जाबालि ऋषि के नाम पर पड़ा। इसे त्रिपुरा और गढा नाम से भी जाना जाता है।
मूलतः कलचुरी काल में त्रिपुरा उनकी राजधानी थी और गोड काल में गढ़ा प्रमुख स्थल था। ऋषि जाबालि की तप स्थली होने के कारण इसे जाबालिपुरम कहा गया जो बाद में रूप बदलते- बदलते जबलपुर हो गया।
जबलपुर को हमारे संत श्रद्धेय विनोबा भावे जी ने संस्कारधानी घोषित किया। उनका दिया हुआ यह उपहार जीवनपर्यंत जबलपुर वासी अपने नाम और पता के साथ संस्कारधानी लिखते हैं।
पौराणिक गाथा है रानी दुर्गावती का साम्राज्य जिन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हुए रानी दुर्गावती का साम्राज्य इसे कहा जाता है और जबलपुर में संस्कार, प्रीत, गीत, जीव, जल और सुंदर से सुंदर मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है। यहाँ पर माँ भगवती की तीन मुँह वाली मूर्ति जो तेवर में भी विराजी है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध है।
यहां पर माँ भगवती महाकाली महालक्ष्मी मां सरस्वती के एक ही पत्थर पर तीनों देवियों का मुँह जुड़ा हुआ है। हजारों की संख्या में रोज यहाँ दर्शन करते हैं। सुबह से शाम तक माँ भगवती का प्रसाद भंडारा के रूप में प्राप्त होता है।
चारों तरफ पहाड़ से घिरे होने के कारण इसे जल संग्रहण का मुख्य स्थल माना गया। माँ नर्मदा की असीम कृपा यहाँ पर बहुत सारे ऐसी अनुसंधान और योगशाला भी बनाई गई और जगह-जगह जल संरक्षण को महत्व दिया गया। एक प्रकार से पर्यावरण को बढ़ाया गया।
यहाँ पर भारत में युद्ध में होने वाले ट्रक, गोला बारुद का निर्माण होता है। और यह निर्माण खमरिया फैक्ट्री जबलपुर में होता है। आज भी जब सैनिक युद्ध के लिए निकलते हैं तो जबलपुर का ट्रक ट्रैक्टर और बड़ी-बड़ी तोप गाड़ी जबलपुर के ट्रेडमार्क से दिखाई देती है।
मध्य प्रदेश का हृदय स्थल बीच में होने के कारण जबलपुर सारी जगह से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर हमारे महाभारत काल के साम्राज्य को भी शताब्दी कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है। गौड़ शासको के समय संग्राम शाह का यहाँ पर अधीनस्थ ग्रह मंडल का निर्माण भी बताया गया है जो हमारे समृद्ध और प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं।
रेल मार्ग बस सेवा और वायु सेवा निरंतर चारों दिशा और चारों ओर जाने का मुख्य जंक्शन स्टेशन जबलपुर है। यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण किला मदन महल का किला है जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। 11वीं शताब्दी का गोंडवाना साम्राज्य के विरासत को आज भी दर्शाता है। इसका निर्माण गोड़ राजा मदन सिंह ने करवाया था।
यहाँ पर भेड़ाघाट में कई फिल्मों की शूटिंग पहले भी हुई अब भी होती है और लगातार फिल्मी दुनिया को भेड़ाघाट की संगमरमर की दुनिया पसंद आती है। यदा कदा छोटी बड़ी फिल्में यहाँ हमेशा बनती दिखाई देती है।
दुर्गावती का किला और दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की शान को और भी बढ़ता है। यहाँ पर नित्य प्रति मां नर्मदा की आरती इतनी सुंदर होती है कि हजारों की संख्या में यहाँ के श्रद्धालु नियमित शामिल होते हैं और पुण्य के भागीदार होते हैं।
जबलपुर का क्षेत्रफल 5211 वर्ग किलोमीटर है और यह पूर्ण रूप से नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक विरासत, जबलपुर को माँ नर्मदा के कारण अत्यंत धरोहर के रूप में मिला है। आज भी यहां पर 64 योगिनी मंदिर अपनी कहानी 11वीं सदी के विरासत को दर्शाता है।
जबलपुर का खानपान रहन-सहन अत्यंत सादगी और रुचिकर है। दूसरे शहरों में आप दिनचर्या में ₹500 में आप दिन भर नहीं बिता सकते यहाँ पर खाने की इतनी अच्छी व्यवस्था है और साधु संतों के डेरो पर तो भोजन प्रसादी मुफ्त में। बस आप माँ नर्मदा की आश्रय में हो जाइए।
विदेशी पर्यटक का विशेष आकर्षण भेड़ाघाट की संगमरमर वादियाँ है। जहाँ सदैव नौका विहार होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर चाँदनी रात का नौका विहार प्रसिद्धि और समृद्धि को दर्शाता है।
जबलपुर तीनो जल सेना थल सेना और वायु सेवा की टुकड़ी का केंद्र है। जहाँ पर आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर शानदार परेड और उनकी कलाकारी देखने को मिलती है।
वायुयान सेवा में सुविधाजनक यात्रा कर सकते है। जबलपुर की सबसे ऊंची इमारत कटंगा टीवी टावर के नाम से प्रसिद्ध है। जो 1992 में दूरदर्शन टेलीविजन नेटवर्क के लिए तैयार किया गया था और इसे ही सैनिक को सलामी देने के लिए विशेष अवसरों पर इसे रोशन किया जाता है।
जबलपुर की रानी दुर्गावती यहाँ की गौड़ साम्राज्ञी थी। उनकी समाधि पर भी श्रद्धा से गौड़ समाज ही नहीं वरन संपूर्ण जबलपुर वासी नतमस्तक होते हैं।
सदियों से इस शहर पर कई राजवंशों का शासन रहा है। जिसमें गोड़ मराठा और ब्रिटिश भी शामिल है। वास्तु कला खानपान संस्कृत साहित्य और सादगी से परिपूर्ण जबलपुर एक अनूठी छाप छोड़ता है।
जो एक बार आता है यहाँ का होकर ही रह जाता है। राजनीति से संबंधित इसे बीजेपी का गढ़ कहा जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान जबलपुर की धरती को जब भी आते हैं चंदन जैसा लगाना कहते हैं। जबलपुर का मौसम बहुत ही सुहाना होता है। जब बारिश होती है तो ताल तलैया नदी नाले सब भरे हुए और उस पर हमारा जबलपुर एक सीप की तरह दिखाई देता है।
भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है कहा जाता है यहाँ के तट से भी आप कंकर पत्थर उठाकर ले जाएं उसे विधिवत पूजा नहीं करना पड़ता उसे स्थापित कर – – – हर कंकर शंकर होता है। माँ नर्मदा जी के तट को भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है।
नगरी चुनाव उपनगरी चुनाव ग्राम पंचायत सांसद विधायक सभी जबलपुर की शान को और भी बढ़ा देते हैं। लिखने को तो बहुत सारी बातें हैं जबलपुर पर जितना लिखूं काम ही होगा। परसाई महादेवी वर्मा हिंदी के प्रसिद्धता को बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान और अमिट छाप छोड़ गए हैं। जिसके कारण जबलपुर को साहित्यिक धरोहर भी कहा जाता है। घर-घर में तीज त्यौहार उतने ही शौक से मनाया जाता है जितना मंदिर पर भगवान की आरती।
यहां का दशहरा यानी क्वार की नवरात्रि पर माँ भगवती दुर्गा की आराधना जो होती है अतुलनीय अद्भुत और स्मरणीय होती है।
हर बार बृहद और नया। कभी समय मिले या घूमने का मन बन जाए तो जबलपुर जरूर आईयेगा। हमारे जबलपुर की शान भंवर ताल गार्डन शंकर चौरा जहाँ पर भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। सप्त ऋषियों का मूर्ति गार्डन पर विराजित हुआ हुआ है।
और मेडिकल कॉलेज से लेकर, अस्पताल रेलवे अस्पताल मिलिट्री अस्पताल और सुख सुविधा पूर्ण सभी प्रकार के वातावरण से संपूर्ण हमारा जबलपुर बहुत ही शानदार जानदार ईमानदार और सबसे बड़ी बात मेहमान बाजी करने पर कभी भी कोई भी प्राणी चुकता नहीं है।
दिल खोलकर सभी को अपना मानते हैं और उसे हृदय पर बसाते हैं।
यह माँ भगवती की आराधना नर्मदा की सेवा दीपदान की सुंदरता और यहां के संस्कार की अमिट कहानी है जो शब्दों से नहीं केवल भाव से समर्पित की जा सकती है।
यहाँ पर खोवे की जलेबी जीवन पर्यन्त स्वाद याद रहता है।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है – सुमित्र के दोहे…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७५ – सुमित्र के दोहे
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “सपनों जैसा घर...”)