हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 9 ☆ मुक्तिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी भावप्रवण  “ मुक्तिका”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 9 ☆ 

☆ मुक्तिका ☆ 

 

शब्द पानी हो गए

हो कहानी खो गए

 

आपसे जिस पल मिले

रातरानी हो गए

 

अश्रु आ रूमाल में

प्रिय निशानी हो गए

 

लाल चूनर ओढ़कर

क्या भवानी हो गए?

 

नाम के नाते सभी

अब जबानी हो गए

 

गाँव खुद बेमौत मर

राजधानी हो गए

 

हुए जुमले, वायदे

पानी पानी हो गए

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 35 – जरूरत और आदत ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है  एक भावप्रवण रचना  ‘जरूरत और आदत  । आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़  सकते हैं । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 35 – विशाखा की नज़र से

☆  जरूरत और आदत  ☆

 

हम हरे नही

फिर भी प्रकाशपुंज हमारी जरूरत

एक दूजे की आँखों की चमक

थी हमारी आदत …

 

हम प्यासे तो पानी हमारी जरूरत

पर प्यार में प्यासा बने रहना

थी हमारी आदत ….

 

हम चाहे उलझे , बिखरें , टूटे

हवाओं की सरसरी हमारी जरूरत

संग प्राणों का आयाम साधना

थी हमारी आदत …

 

जलता रहा लोभ , ईर्ष्या , जलन

का अग्निकुंड चहुँओर

जिसकी तपिश की नहीं हमें जरूरत

हम में अहम को भस्म करना

थी हमारी आदत …

 

जरूरतें व्योम सी

थक जाती हैं आँखें तक – तक

समेटे अपने पंखों को

घोसलें में बसर करना

थी हमारी आदत ….

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 8 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 8/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 8 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

 

कौन कहता है कि

दिल सिर्फ सीने में होता है…

तुमको लिखूँ तो

मेरी उँगलियाँ भी धड़कती हैं…

 

 Who says that

 Heart is in chest only

 My fingers also throb

 When I write to you…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

गर यूँही घर में बैठा रहा

मार डालेगी तनहाइयाँ…

चल चलें मैखाने में जरा

ये फ़ना दिल बहल जायेगा…

 

If I keep staying at home like this

The aloofness is going to  kill me

O’ dear  let’s  just  go to the bar…

This dying heart will come alive!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

इक किस्सा अधूरे इश्क़ का

आज भी है दरम्यान तेरे मेरे…

हैं मौजूद साहिलों की रेत पे

पैरों के कुछ निशान तेरे मेरे…

 

A tale of inconclusive love still

exists between us, even today…

Few of our footprints are still

Present on the sand of shores…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

मरता तो कोई नही

किसी के प्यार में…

बस यादें कत्ल करती

रहती है किश्तों-किश्तों में…

 

Nobody ever dies in

someone’s  love…

In installments just the

Memories  keep killing you…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  अन्नदाता किसान ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज आपके “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  –  अन्नदाता किसान 

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  अन्नदाता किसान ☆

 

मै‌ किसान ‌अन्नदाता हूं,  देश का भाग्यविधाता हूं।

अपने कठिन परिश्रम से,  मै सबकी भूख मिटाता हूं

 

वर्षा, सर्दी,‌ गर्मी सहकर, सब्जी फल फूल उगाता हूं।

पर लूट‌खसोट के‌ चलते,  मैं भूखा ही‌ सो‌ जाता हूं ।

 

कभी आपदा के चलते, हम सब के सपने चूर  हुए।

कर्जे महंगाई के चलते,  हम मरने पर मजबूर हुए।

 

मेरी मेहनत  का फल , हर समय बिचौलिया खाता है ।

सरकारी ‌राहत का ‌धन, घपलेबाज की जेब में जाता है।

 

बेटी की‌ शादी पढ़ाई की चिंता, हम को खाये जाती‌ है।

रातें आंखों में ही कटती है, नींद न हमको आ पाती है।

 

अपने छप्पर में मैं बैठा, खाली कोठारों को तकता हूं ।

हाथों की लकीरें देख देख, अपनी क़िस्मत पढता‌ हूं ।

 

अंधेरी काली रातों में उठ ,खाली बर्तन टटोलता मैं।

कर्जे खर्चे के पन्ने,  बार बार खोलता पढ़ता हूं मैं।

 

आशा और निराशा ‌से, जब दिल मेरा घबराता है ।

भूतकाल भविष्य बन‌कर, मुझको रोज डराता है।

 

उम्मीदों के दामन में, बस रंगीन नजारे दिखते हैं ।

इन अंधियारी रातों में, बस चांद सितारे दिखते हैं ।

अब सूनी-सूनी आंखों से, उम्मीद की राहें तकता हूं।

खेत की मेढ़ पर बैठा हूं, पगला दीवाना दिखता हूं।

 

मैं नील‌कंठ बन बैठ गया, पीकर‌ के‌ विष का प्याला ।

अपनी व्यथा‌ कहें किससे, है कौन उसे सुनने वाला ।

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 12 ☆ स्वप्नपरी ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  श्रृंगारिक कविता “स्वप्नपरी“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 12 ☆

☆ स्वप्नपरी

 

मंद मंद अती अलगद पाऊल

टाकित आली  न  लगे चाहूल

ये  सुहासिनी ,ये  गं  कामीनी !!

 

आभाळाचा  पडदा  सारुनी

नक्षत्रांच्या   परीधानातुनी

ये गं  यामीनी, ये गं कामीनी !!

 

कल्पवृक्षाच्या झोपाळ्यावर

रत्नांचा  तो  स्वर्गही  सुंदर

ये गं त्यातुनी, ये  गं कामीनी !!

 

रुणझुण रुणझुण संगीत सुमधुर

घडवी  विधाता  तुजला  सुंदर

ये श्रृंगारुनी ,  ये  गं  कामीनी !!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 38 ☆ अमलतास  ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्रकृति के आँचल में लिखी हुई एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “अमलतास ”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 38 ☆

  ☆ अमलतास 

 

पीतांबर है या

पहनी अंशुमालाएँ?

या किरणों का

उत्सर्ग हुआ ।

 

गदराया है,

सोना पेड़ पर

या मौसम ही

सोने सा हुआ।

 

कोई कहे

जादु हुआ है,

या कोई कहे

यह गजब हुआ ।

 

© सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 5 – अशोक कुमार ….2 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….2 पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 5 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….2 ☆ 

अपने समय में (1940 के बाद के वर्षों में) अशोक कुमार का क्रेज़ ऐसा था कि वे कभी-कभार ही घर से निकलते थे और जब भी निकलते तो भारी भीड़ जमा हो जाती और ट्रैफिक रुक जाता था. भीड़ दूर करने के लिए कभी-कभी पुलिस को लाठियां चलानी पड़ती थीं. रॉयल फैमिलीज़ और बड़े घरानों की महिलाएं उन पर फिदा थीं और लाइन मारती थीं.

अशोक कुमार को 1943 मे बांबे टाकीज की एक अन्य फ़िल्म किस्मत में काम करने का मौका मिला। इस फ़िल्म में अशोक कुमार ने फ़िल्म इंडस्ट्री के अभिनेता की पांरपरिक छवि से बाहर निकल कर अपनी एक अलग छवि बनाई। इस फ़िल्म मे उन्होंने पहली बार एंटी हीरो की भूमिका की और अपनी इस भूमिका के जरिए भी वह दर्शको का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने मे सफल रहे। किस्मत ने बॉक्स आफिस के सारे रिकार्ड तोड़ते हुए कोलकाता के चित्रा सिनेमा हॉल में लगभग चार वर्ष तक लगातार चलने का रिकार्ड बनाया।

बांबे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय की मौत के बाद 1943 में अशोक कुमार बॉम्बे टाकीज को छोड़ फ़िल्मिस्तान स्टूडियों चले गए। वर्ष 1947 मे देविका रानी के बाम्बे टॉकीज छोड़ देने के बाद अशोक कुमार ने बतौर प्रोडक्शन चीफ बाम्बे टाकीज के बैनर तले मशाल, जिद्दी और मजबूर जैसी कई फ़िल्मों का निर्माण किया। इसी दौरान बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले उन्होंने 1949 में प्रदर्शित सुपरहिट फ़िल्म महल का निर्माण किया। उस फ़िल्म की सफलता ने अभिनेत्री मधुबाला के साथ-साथ पार्श्वगायिका लता मंगेश्कर को भी शोहरत की बुंलदियों पर पहुंचा दिया था।

पचास के दशक मे बाम्बे टॉकीज से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी खुद की कंपनी शुरू की और जूपिटर थिएटर को भी खरीद लिया। अशोक कुमार प्रोडक्शन के बैनर तले उन्होंने सबसे पहली फ़िल्म समाज का निर्माण किया, लेकिन यह फ़िल्म बॉक्स आफिस पर बुरी तरह असफल रही। इसके बाद उन्होनें अपने बैनर तले फ़िल्म परिणीता भी बनाई। लगभग तीन वर्ष के बाद फ़िल्म निर्माण क्षेत्र में घाटा होने के कारण उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी बंद कर दी। 1953 मे प्रदर्शित फ़िल्म परिणीता के निर्माण के दौरान फ़िल्म के निर्देशक बिमल राय के साथ उनकी अनबन हो गई थी। जिसके कारण उन्होंने बिमल राय के साथ काम करना बंद कर दिया, लेकिन अभिनेत्री नूतन के कहने पर अशोक कुमार ने एक बार फिर से बिमल रॉय के साथ 1963 मे प्रदर्शित फ़िल्म बंदिनी मे काम किया । यह फ़िल्म हिन्दी फ़िल्म के इतिहास में आज भी क्लासिक फ़िल्मों में शुमार की जाती है। 1967 मे प्रदर्शित फ़िल्म ज्वैलथीफ में अशोक कुमार के अभिनय का नया रूप दर्शको को देखने को मिला। इस फ़िल्म में वह अपने सिने कैरियर मे पहली बार खलनायक की भूमिका मे दिखाई दिए। इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया। अभिनय मे आई एकरुपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेता के रूप मे भी स्थापित करने के लिए अशोक कुमार ने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इनमें 1968 मे प्रदर्शित फ़िल्म आर्शीवाद खास तौर पर उल्लेखनीय है। फ़िल्म में बेमिसाल अभिनय के लिए उनको सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस फ़िल्म मे उनका गाया गाना रेल गाड़ी-रेल गाड़ी बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

1984 मे दूरदर्शन के इतिहास के पहले शोप ओपेरा हमलोग में वह सीरियल के सूत्रधार की भूमिका मे दिखाई दिए और छोटे पर्दे पर भी उन्होंने दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया। दूरदर्शन के लिए ही दादामुनि ने भीमभवानी, बहादुर शाह जफर और उजाले की ओर जैसे सीरियल मे भी अपने अभिनय का जौहर दिखाया।

अशोक कुमार को दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्म फेयर पुरस्कार से भी नवाजा गया। पहली बार राखी 1962 और दूसरी बार आर्शीवाद 1968, इसके अलावा 1966 मे प्रदर्शित फ़िल्म अफसाना के लिए वह सहायक अभिनेता के फ़िल्म फेयर अवार्ड से भी नवाजे गए। दादामुनि को हिन्दी सिनेमा के क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ठ सहयोग के लिए 1988 में हिन्दी सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें 1999 में पद्म भूषण और 2001 में  उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अवध सम्मान प्रदान किया गया। अशोक कुमार भारतीय सिनेमा के एक प्रमुख अभिनेता रहे हैं। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार भी आपके ही सगे भाई थे। लगभग छह दशक तक अपने बेमिसाल अभिनय से दर्शकों के दिल पर राज करने वाले अशोक कुमार का निधन 10 दिसम्बर 2001 को हुआ।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 44 – दृष्टि ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “दृष्टि। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 44 ☆

☆ दृष्टि 

 मैं अब आपको स्वर योग के विषय में कुछ बताता हूँ । सर्वप्रथम हाथों द्वारा नाक के छिद्रों से बाहर निकलती हुई श्वास को अनुभव करने का प्रयत्न कीजिए । देखिए कि कौन से छिद्र से श्वास बाहर निकल रही है । स्वर योग के अनुसार अगर श्वास दाहिने छिद्र से बाहर निकल रही है तो यह सूर्य स्वर होगा । इसके विपरीत यदि श्वास बाएँ छिद्र से निकल रही है तो यह चंद्र स्वर होगा एवं यदि जब दोनों छिद्रों से श्वास निकलता अनुभव हो तो यह सुषुम्ना स्वर कहलाएगा । श्वास के बाहर निकलने की उपरोक्त तीनों क्रियाएँ ही स्वर योग का आधार हैं । सूर्य स्वर पुरुष प्रधान है । इसका रंग काला है । यह शिव स्वरूप है, इसके विपरीत चंद्र स्वर स्त्री प्रधान है एवं इसका रंग गोरा है, यह शक्ति अर्थात्‌ पार्वती का रूप है । इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं ओर स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर अर्थात्‌ इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर स्थित रहता है और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर । सुषुम्ना मध्य में स्थित है, अतः जब दोनों ओर से श्वास निकले वह सुषम्ना स्वर कहलाएगा ।

गांधार नाड़ी नाक में, हस्तिजिह्वा दाहिनी आंख में, पूषा दाये कान में, यशस्विनी बायें कान में, अलंबुसा मुख में, कुहू लिंग प्रदेश में और शंखिनी गुदा में जाती है । हठयोग में नाभिकंद अर्थात कुंडलिनी का स्थान गुदा से लिंग प्रदेश की ओर दो अंगुल हटकर मूलाधार चक्र में माना गया है । स्वर योग में कुंडलिनी की यह स्थिति नहीं मानी जाती है। स्वर योग शरीर शास्त्र से संबंध रखता है और शरीर की नाभि गुदामूल में नहीं, वरन उदर मध्य ही हो सकती हैं । इसीलिए यहाँ नाभिप्रदेश का तात्पर्य उदर भाग मानना ही ठीक है । श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष संबंध उदर से ही है । स्वर योग इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य को नाभि तक पूरी साँस लेनी चाहिए । वह प्राण वायु का स्थान फेफड़ों को नहीं, नाभि को मानता है । गहन अनुसंधान के पश्चात अब शरीर शास्त्री भी इस बात को स्वीकारते हैं कि वायु को फेफड़ों में भरने मात्र से ही श्वास का कार्य पूरा नहीं हो जाता । उसका उपयुक्त तरीका यह है कि उससे पेड़ू तक पेट सिकुड़ता और फैलता रहे एवं डायफ्राम का भी साथ-साथ संचालन हो । तात्पर्य यह कि श्वास का प्रभाव नाभि तक पहुँचना जरूरी है । इसके बिना स्वास्थ्य खराब होने का खतरा बना रहता है । इसीलिए सामान्य श्वास को स्वर योग में अधूरी क्रिया माना गया है । इससे जीवन की प्रगति रुकी रह जाती है । इसकी पूर्ति के लिए योग के आचार्यों ने प्राणायाम जैसे अभ्यासों का विकास किया ।

तो वास्तव में हम प्रकृति और ब्रह्मांड में बाहरी परिवर्तन के साथ हमारे आंतरिक शरीर और मस्तिष्क के परिवर्तनों को समझ सकते हैं ।

 

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे # 35 – फुगडी कोरोनाची ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है। आज प्रस्तुत है श्रीमती उर्मिला जी की रचना  “फुगडी कोरोनाची ”। उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ केल्याने होतं आहे रे # 35 ☆

☆ फुगडी कोरोनाची ☆ 

(काव्यप्रकार :-मुक्तछंद)

 

फू बाई फू.. फुगडी फू..वाढ वाढ वाढतोयस कोरोना तूं रे कोरोना तूं.ऽऽ.!!धृ.!!

 

विमानातनं आलास !

हाहा म्हणता पसरलास!

तग धरुन बसलास !!१!! आता फुगडी फू….

 

कोरोना रे कोरोना !

तुझा लाडका चायना !

व्हायरस पाठवून केली की हो दैना !

कोरोनाची पीडा आता जाता जाईना !!२!! फुगडी फू…

 

अमेरिका फ्रान्स स्पेन अन् इटली !

चायनाची तर हौसच फिटली !

लाखोंची पतंग याने की हो काटली !!३!! आता फुगडी फू…

 

कोरोनाचा तर वाढतोय जोश!

त्यावर नाही अजून निघाला डोस !

गावेच्या गावे याने पाडली ओस !

जिकड तिकडं याचाच घोष !!४!! आता फुगडी फू..

 

आम्ही नाही हरणार !

शासनाचे ऐकणार!

घरातच रहाणार!

फळे आम्ही खाणार!

सात्त्विक आहार घेणार !

तुला पळवून लावणार !

जोमाने उभे रहाणार!!५!! आता फुगडी फू…

 

©️®️उर्मिला इंगळे

सातारा

दिनांक:२१-५-२०.

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

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मराठी साहित्य – कादंबरी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ #8 ☆ मित….. (भाग-8) ☆ श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे 

(युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते. हमें यह प्रसन्नता है कि श्री कपिल जी ने हमारे आग्रह पर उन्होंने अपना नवीन उपन्यास मित……” हमारे पाठकों के साथ साझा करना स्वीकार किया है। यह उपन्यास वर्तमान इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया पर किसी भी अज्ञात व्यक्ति ( स्त्री/पुरुष) से मित्रता के परिणाम को उजागर करती है। अब आप प्रत्येक शनिवार इस उपन्यास की अगली कड़ियाँ पढ़ सकेंगे।) 

इस उपन्यास के सन्दर्भ में श्री कपिल जी के ही शब्दों में – “आजच्या आधुनिक काळात इंटरनेट मुळे जग जवळ आले आहे. अनेक सोशल मिडिया अॅप द्वारे अनोळखी लोकांशी गप्पा करणे, एकमेकांच्या सवयी, संस्कृती आदी जाणून घेणे. यात बुडालेल्या तरूण तरूणींचे याच माध्यमातून प्रेमसंबंध जुळतात. पण कोणी अनोळखी व्यक्तीवर विश्वास ठेवून झालेल्या या प्रेमाला किती यश येते. कि दगाफटका होतो. हे सांगणारी ‘मित’ नावाच्या स्वप्नवेड्या मुलाची ही कथा. ‘रिमझिम लवर’ नावाचं ते अकाउंट हे त्याने इंस्टाग्रामवर फोटो पाहिलेल्या मुलीचंच आहे. हे खात्री तर त्याला झाली. पण तिचं खरं नाव काय? ती कुठली? काय करते? यांसारखे अनेक प्रश्न त्याच्या मनात आहेत. त्याची उत्तरं तो जाणून घेण्यासाठी किती उत्साही आहे. हे पुढील भागात……”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ #7 ☆ मित….. (भाग-8) ☆

पुढचे दोन दिवस मुंबई सह महाराष्ट्रातील प्रसिद्ध पर्यटन स्थळी फिरतांना त्यांचा हक्काचा मार्गदर्शक मीत होता. त्याचं सोबत असणं तिला आतल्या आत सुखावत होतं. त्याचं हसणं, बोलणं, वागणं, प्रत्येक गोष्ट संयमाने व विचारपूर्वक हाताळणं तिला त्याच्याकडे अधिकच आकर्षित करत होतं. सोबत घालवलेला प्रत्येक क्षण ती त्याला पारखत होती. एक चांगला मित्रच नव्हे तर चांगला जीवनसाथी होण्यास पात्र आहे का ? हे पाहत होती. आणि तिने केलेले विश्लेषण बरोबर आहे का हे स्वतःला विचारत होती. शुद्ध सोने सिद्ध होण्यासाठी कराव्या लागणा-या चारही परिक्षेतून ती त्याला पारखून घेत होती. आजचं त्याचं असं पावलो पावली काळजी घेणं असंच आयुष्यभर राहीलं का याचा अंदाज ती घेत होती.

अशा एक ना अनेक प्रकारे तिने त्याची परिक्षा घ्यायला सुरुवात केली होती. आणि तिच्या प्रत्येक प्रश्नाचं उत्तर तो अगदी चोख देत होता. त्याच्यासोबत मारलेल्या गप्पांमध्ये त्याने त्याच्या बद्दल ज्या ज्या गोष्टी सांगितल्या होत्या त्या अगदी तंतोतंत ती अनुभवत होती. आणि प्रत्येक परिक्षेत पैकीच्या पैकी गुण देऊन पास करत होती. आता तिच्या परिक्षाही संपल्या होत्या. आणि तिच्या वडिलांच्या सुट्ट्याही. शिर्डीला बाई बाबांचे दर्शन घेऊन ते मुंबईला आले. हाॅटेलवर येऊन सामानाची आवरा आवर करू लागले.

रिमझिम जड अंतःकरणाने सारी कामे करत होती. कदाचित तिला परत जायचं नव्हतं. तिच्या बाबांनी तिला ‘काय झालं ‘ विचारले पण ‘ काही नाही’ म्हणून तीने त्यांना टाळलं. गॅलरीत वाळत ठेवलेला स्कार्प    काढायला गेली. तिच्यावर चोरटी नजर ठेऊन असलेला मीत संधी पाहून तिच्या मागे गेला. आणि तिच्या अगदी मागे उभा राहिला. स्कार्प काढून ती जशी मागे फिरली तशी तीच्या अगदी जवळ मीत उभा होता. ती क्षणभर घाबरली. पण सावरलीही. आणि एकमेकांच्या डोळ्यांत डोळे घालून बघत राहीले.

रिमझिम- क्यो देखते हो ऐसी नजरो से की इंसान खो-सा रह जाए

मीत- मै भी हैरान हूँ. की तुम्हे देखकर क्यो आँखो में ये नुर-सा क्यो जाग जाता है. लेकीन सुकून भी उतना ही मिलता है. और दिल मे बेचैनी भी

रिमझिम- कुछ तो नाम होगा इस बेचैनी का. अपनापन या फिर………

मीत- या फिर…..

तीने लाजून मान खाली घातली. त्याने हळूच तिची हनुवटी वर केली. आणि

मीत- प्यार……….

लांब श्वास घेऊन मीत शब्द न काढता फक्त तोंडातून निघणा-या हवेच्या साह्याने बोलला. पुन्हा ती लाजली आणि मान खाली घातली. तिला त्याच्या डोळ्यांत डोळे घालून बोलायचे होते. आणि ती ही किती प्रेम करते हे जाहीर करायचे होते. पण शरमेने खाली गेलेल्या पापण्या वरती होत नव्हत्या. तशीच ती त्याच्या खांद्यावर डोके ठेऊन विसावली. गॅलरीतून आलेल्या हवेच्या झुळूकने दरवाजाला लावलेला पडदा हळूच त्याच्या भोवती गुंडाळला गेला.

मीत – रिमझिम, पता नही क्यो, पर मुझे लग रहा है की तुम हमेशा के लिए रूक जाओ. मेरे साथ

रिमझिम- क्या ये संभव है?

मीत- तुम चाहो तो……..

त्याने तीला मिठीतून सोडले. आणि आपल्या समोर उभे केले. आणि हळूच तिची हनुवटी पुन्हा वर केली.

मीत- इन खुबसूरत आँखो मे मै जिंदगी भर डुब कर रह जाना चाहता हूँ. इन ओठों की हंसी यु ही उम्रभर बरक़रार रखना चाहता हूँ. इस हसी चेहरे का नूर यूँ ही हमेशा के लिए बरक़रार रखना चाहता हूँ. और जिंदगी भर बस तुमसे ही प्यार करना चाहता हूँ. अगर तूम चाहो तो……

ती लाजली आणि तेथून निघुन गेली. तिच्या गालावर पसरलेली लाली त्याला ते सगळं काही सांगुन गेली होती.

मुंबई सेंट्रलला रेल्वे उभी होती. ‘बेटा, इस अनजान जगह पर आने के बाद मुझे अपने बच्चो की बहोत फ़िक्र हो रही थी. पर तुम्हारे साथ होने के बाद लगा ही नही की हम अनजान जगह पर है. जितने भी साथ रहे. आप मेरे परिवार का हिस्सा बनकर रहे. वैसे तो आप उम्र मे बहोत छोटे हो हमसे. फिर भी आप का बहोत बहोत शुक्रिया. हमेशा खुश रहो.

मीत- अंकल जी, जब आपने हमे अपने परिवार का हिस्सा कहा है. तो मै ये आपको बता दूँ  की अपनों का शुक्रिया अदा कैसा ?तेव्हा तिचा लहान भाऊ गिरीश म्हटला

‘ हाँ,  और कभी गुवाहाटी आओ तो हमे जरूर बताना. हम तुम्हे गुवाहाटी की सैर कराएगे ‘

त्याच्या या विनोदावर सर्वच हसले.

मीत- जरूर आएँगे और गुवाहाटी के साथ साथ पुरे आसाम की खुबसूरती तुम्हारी नजरों से ही देखेंगे

तेवढ्यात गाडीचा हाॅर्न वाजला. रिमझिम चे बाबा ‘ अच्छा बेटा हम करते है. अपना खयाल रखना’ आणि गाडीत बसायला लागले. खिडकीतून रिमझिमला त्याने एक नजर शेवटचे पाहिले. आणि हळूच ‘हॅप्पी जर्णी ‘ म्हटले. गाडी सुरू झाली. मीत मागे परतला.

बसमध्ये तिच्यासोबतच्या आठवणींमध्ये हरवला. कधी स्मित हास्य तर कधी काळजी असे प्रसंगानुरूप त्याच्या चेह-यारचे भाव बदलत होते. तसेच काहीसे रिमझिमचे पण होते. पण सर्वापासून तिने ते भाव अगदी शिताफीने लपवले होते.

मीत घरी पोहोचला. बॅगेतला सामान तो कपाटात ठेवत होता. तेव्हा त्याला बॅगेत एक पार्सल दिसले. ते त्याचे नव्हते. मग कोणी ठेवले हा प्रश्न त्याला पडला. आणि उत्सुकतेने त्याने ते पार्सल उघडले. आणि त्याला आश्चर्य झाले. आत तीच बुद्धमुर्ती ठेवलेली होती. जी अजिंठा लेण्या पहायला गेले असतांना त्याला पसंत पडली होती. ती रिमझिम ने त्याला माहीती न पडू देता त्याला भेट दिली होती. त्या मुर्तीच्या मागे तीने एक कागद चिकटवलेला होता. त्याने पाहीले. ज्यावर लिहीले होते, ‘ मनमीत जी, अपने कहा की आप मेरे चेहरे की हसी जिंदगी भर यूँ ही बरक़रार रखना चाहते हो. तो अपना बहोत खयाल रखीएगा. क्यो की अब मेरे चेहरे की मुस्कान आप हो……..

  क्रमशः

 © कपिल साहेबराव इंदवे

मा. मोहीदा त श ता. शहादा, जि. नंदुरबार, मो  9168471113

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