मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून☆ ।। राजा पंढरीचा ।। भाग 2 ☆ सौ. अमृता देशपांडे

सौ. अमृता देशपांडे

☆ मनमंजुषेतून ☆ ।। राजा पंढरीचा ।। भाग 2 ☆ सौ. अमृता देशपांडे ☆ 

तो काळ महाराष्ट्रासाठी फार कठीण होता. यवनांचा धुडगूस माजला होता. परकीयांच्या आक्रमणापेक्षा जनजीवन उध्वस्त झाले होते. बायका मुली पळवल्या जात होत्या. मंदिरांची तोडफोड करून मूर्ती भंग केली जात असे. पांडुरंगा ची मूर्ती यवनांनी पळवून कर्नाटक प्रांतात नेऊन टाकली. अशा वेळी सर्व संतांनी आपापल्या परीने घाबरलेल्या जनतेला एकत्र आणण्याची जबाबदारी घेतली. भगवी पताका, भागवत धर्म,  आणि वारकरी संप्रदाय या त्रयींच्या आधारे जनतेला एक सुरक्षा कवच दिले. श्री संत भानुदास म्हणजे एकनाथ महाराजांचे वडील, यांनी पांडुरंगाची मूर्ती कर्नाटकातून आणून पंढरपूरात स्थापन केली. कर्नाटकातून आला म्हणून “कानडा राजा पंढरीचा”.

संत रामदास स्वामी, संत तुकाराम,  संत एकनाथ इत्यादिनी हिंदुधर्म,  हिंदु दैवते, यांचे महत्व पटवून देऊन साध्या भोळ्या शेतकरी, कामकरी वर्गाचे जगणे सुसह्य कसे होईल याची ग्वाही दिली. त्याच काळात शिवाजी राजे दिल्लीच्या पातशाहीशी टक्कर देत होते. स्वराज्य आणि सुराज्य स्थापनेसाठी त्यांची पराकाष्टेची शिकस्त चालू होती. त्यांना समर्थ रामदास व संतश्रेष्ठ तुकाराम महाराज हे पाठीशी राहून उत्तेजन देत होते. मार्गदर्शन करत होते. महाराजांना तुळजाभवानीचा वरदहस्त होता. अवघा महाराष्ट्र संक्रमणाच्या कठिण परिस्थितीतून जात होता. रयतेला, जनतेला एकत्र आणून त्यांच्या वृत्ती,  त्याचे आचार,  त्यांचे विचार , हे विठ्ठलाच्या रूपात असलेल्या परम शक्ती कडे वळवण्याचे महत्कार्य सर्व संतांनी केले आहे.  त्यातूनच भागवत धर्माची गुढी रोवली गेली. भगवी पताका अस्तित्वात आली. वारकरी,  माळकरी संप्रदाय उदयास आला.

भोळी भाबडी रयत विठ्ठलाच्या वात्सल्यपूर्ण कृपेच्या आश्रयाला आली.

अभ्यास करताना माझ्या मनात परत परत विचार यायचे, कि खरंच विठ्ठल भक्तांच्या मदतीसाठी धावून आला असेल का? मग कळलं, ज्याचा त्यावर विश्वास नाही,  किंवा मनात संदेह आहे, त्यांना तो दिसत नाही,  जाणवत नाही. पण ज्यानं विश्वास ठेवला, त्याला तो प्रत्यक्ष दिसतो, मदत करतो, संकटातून बाहेर काढतो. कुठल्याही गोष्टीत विश्वास आणि श्रद्धा महत्वाची. जनाबाईंच्या अभंगातला विठू लेकुरवाळा असतो.  सगळे भक्त विठ्ठल नामाच्या गजरात नाचतात, गातात, धावतात,  उड्या मारतात. स्वतःला विसरून पांडुरंगाच्या पायाशी लोळण घेतात.  पावसापाण्याची, उन्हातान्हाची  कदर न करता पायी पंढरीची वारी करतात. त्यांच्या भक्तीने,  त्यांच्या सेवेने वेडा झालेला विठू सुद्धा आषाढी कार्तिकी एकादशीला त्यांची वाट बघत असतो. असं हे देवाचं आणि भक्ताचं नातं. ‘ देव भावाचा भुकेला ‘ . त्याला फक्त भक्तांच्या ह्रदयीचा खरा भक्ती भाव अपेक्षित आहे. भक्तांची आर्ततेने आलेली ” विठ्ठला, विठुराया, पांडुरंगा ” अशी हाक त्याच्यापर्यंत क्षणार्धात पोचते, आणि तो भक्तांजवळ हजर होतो. हा अनुभव भक्तांचा.

 

© सौ अमृता देशपांडे

पर्वरी- गोवा

9822176170

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (59) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता 

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18

( भक्ति सहित कर्मयोग का विषय )

यदहङ्‍कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥

अंह भाव वश यदि तेरा ‘‘नहीं लडूंगा‘‘ भाव

तो यह मिथ्या, प्रकृति तो लड़वायेगी आप ।।59।।

 

भावार्थ :  जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा॥59॥

If, filled with egoism, thou thinkest: “I will not fight”, vain is this, thy resolve; Nature will compel thee.

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 74 ☆ किस्सा दुखीराम सुखीराम का ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है आपका एक  ‘किस्सा दुखीराम सुखीराम का’।  इस विशिष्ट रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 74 ☆

☆ किस्सा दुखीराम सुखीराम का

एक गाँव में दो आदमी रहते थे। एक दुखीराम, दूसरा सुखीराम। दुखीराम गरीब था, मेहनत-मजूरी करके अपना पेट भरता था। सुखीराम धन-संपत्ति वाला, बड़ी हवेली में रहता था।

लेकिन दरअसल दुखीराम और सुखीराम दोनों ही दुखी थे। दुखीराम इसलिए कि गरीब होने के बावजूद उसे राक्षसी भूख लगती थी। रोटियों की गड्डी मिनटों में ऐसे ग़ायब होती जैसे किसी जादूगर ने अपनी छड़ी घुमा दी हो। अपना भोजन उदरस्थ कर वह परिवार के दूसरे सदस्यों के भोजन की तरफ टुकुर टुकुर निहारता बैठा रहता। कोई सदस्य नाराज़ होकर हाथ रोक कर अपनी थाली उसकी तरफ सरका देता और दुखीराम झूठा संकोच दिखाता फिर खाने में जुट जाता।

परिवार के लोग दुखीराम की विकराल भूख से परेशान थे। उसकी मजूरी अकेले उसी के लिए काफी न होती। गाँव के लोग भोज में उसे बुलाने से कतराते थे। रिश्तेदार भी उसे अपने यहाँ बुलाने से बचते थे। जिस घर में उसके चरण पड़ते वहाँ मातम छा जाता।

गाँव के दूसरे छोर पर अपनी विशाल हवेली में सुखीराम रहता था। सुखीराम सब तरह से सुखी था। किसी चीज़ की कमी नहीं थी। घर में दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। एक ही रोना था कि सुखीराम को भूख नहीं लगती थी। घर में छप्पन भोजन तैयार होते, लेकिन सुखीराम को उनकी तरफ देखने का मन न होता। किसी तरह एकाध रोटी हलक़ से उतरती। इस चक्कर में सुखीराम ने जाने कितने चूर्ण और भस्म फाँक लिये, लेकिन भूख को नहीं जागना था, सो नहीं जागी। हवेली में सभी लोग परेशान थे। भगवान ने सब कुछ दिया, लेकिन तन में कुछ पहुँचता नहीं। ऐसी समृद्धि किस काम की?

दुखीराम और सुखीराम दोनों ही परेशान थे, एक अपनी सर्वग्रासी भूख से तो दूसरा भूख की बेवफाई से। दोनों ही चिन्ताग्रस्त थे। एक भगवान से भूख घटाने की प्रार्थना करता तो दूसरा भूख बढ़ाने की।

आखिर उनकी प्रार्थना सुनी गयी और एक रात भगवान दोनों के सपने में आये। दोनों ने अपनी अपनी व्यथा सुनायी। भगवान पशोपेश में। एक चाहे भूख कम करना, दूसरा चाहे भूख बढ़ाना। एक की भूख गरम तो दूसरे की नरम। अन्ततः उनकी प्रार्थना मंज़ूर हो गयी। दुखीराम की जठराग्नि सुखीराम के शरीर में स्थानांतरित हो गयी और सुखीराम की जठराग्नि दुखीराम के शरीर में।

दूसरे दिन उठे तो दोनों का व्यवहार आश्चर्यजनक। दुखीराम भोजन की तरफ पीठ फेर कर बैठ गया और सुखीराम दौड़ दौड़ कर भोजन पर हाथ साफ करने लगा। बड़ी मुश्किल से यह शुभ दिन आया था। दोनों के परिवार परम प्रसन्न। दोनों के परिवारों ने मन्दिर जाकर भगवान को धन्यवाद दिया और प्रसाद चढ़ाया। इस चमत्कार के बाद दोनों परिवार दीर्घकाल तक सुखी रहे।

जैसे दुखीराम सुखीराम के दिन बहुरे ऐसे ही सब के बहुरें।

 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ कथा संग्रह – यह आम रास्ता नहीं है – श्री कमलेश भारतीय ☆ सुश्री कृष्णलता यादव

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

गुरुग्राम में डाॅ प्रेम जनमेजय के आवास पर एक माह पूर्व मेरे कथा संग्रह के विमोचन पर हरियाणा की सशक्त लेखिका सुश्री कृष्णलता यादव भी मेरे आग्रह पर आईं थीं । उन्हें वहीं नया कथा संग्रह भेंट किया था । उन्होंने इस पर विस्तारपूर्वक अपनी प्रतिक्रिया इस प्रकार दी है :::

सुश्री कृष्णलता यादव 

कथा संग्रह – यह आम रास्ता नहीं है  – लेखक – श्री कमलेश भारतीय  ☆ पुस्तक समीक्षा – सुश्री कृष्णलता यादव ☆

कथा संग्रह – यह आम रास्ता नहीं है
लेखक – श्री कमलेश भारतीय
प्रकाशक – इण्डिया नेटबुक्स
मूल्य – रु 150
ISBN –  9789389856941
पृष्ठ – 123

फ्लिपकार्ट लिंक – यह आम रास्ता नहीं है 

# आम जन की खास कहानियाँ   

नामचीन कथाकार श्री कमलेश भारतीय का सद्य प्रकाशित कहानी-संग्रह, ‘यह आम रास्ता नहीं है’ पढ़ने का सुअवसर मिला। 16 रचनाओं से सज्जित यह संग्रह आम जन की खास बातें करता है। ये कहानियाँ पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो हम उस घटना विशेष के साक्षी रहे हों। कथानक को बहुत लम्बा न करके कहानियों को उबाऊ होने से बचाया है।

‘अर्जी’ कहानी में लेखक के पत्रकारीय व लेखकीय रूप प्रकट हुए हैं। एक अनपढ़ महिला ने बड़ी कुर्सी तक अपनी बात पहुँचाने के लिए एक कदम तो बढ़ाया। यद्पि वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकी क्योंकि उसे बलात् रोक दिया गया; तो भी उसका बढ़ा हुआ कदम प्रतीक है – स्त्री की जागरूकता का, उसकी चेतनता का और सबको संगठित करने की क्षमता का। कहानी में वात्सल्य की फुहार है, राजनीति का कुत्सित रूप है और है दहेज की समस्या। इस समस्या से सम्बन्धित अनेक प्रश्न हैं। लेखक ने इनके उत्तर नहीं दिए। वह क्यों दे? उत्तर देने बनते हैं- हम सबको, आखिर हम भी तो समाज के घटक हैं। आँचलिकता का पुट कहानी को रससिक्त बनाता है।

महिलाओं के सामने अनेक लक्ष्मण रेखाएँ होती हैं, उससे इधर-उधर पाँव रखे नहीं कि तरह-तरह की बातें बनने लगती हैं। कितना सीमित है उसका संसार। लेखक ने हाँफ-हाँफ जानेवाली कथानायिका अमृता को घर से बाहर का रास्ता दिखाया है किन्तु कहाँ मिल पाया उसको पाक-साफ़ संसार। उसे शक-शुबहा के श्वान रास्ता रोकते मिले। यह अलग बात है कि वह उनकी परवाह किए बिना आगे बढ़ जाती है। यह आम रास्ता नहीं है शीर्षक कथ्य पर एकदम सटीक बैठता है।

संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘भुगतान’, महादेवी वर्मा के भक्तिन चरित्र की याद ताजा करवाता है। अतीत की एक रील लेखक के यहाँ चल रही है, इसके समानान्तर एक रील पाठक के समक्ष भी चल रही होती है – भगतराम की कमियों-खूबियों व अपनत्व की। कहानी खुलासा करती है – मानव की फितरत का कि किस प्रकार दुनियादारी का पहाड़ पचास बरस की लम्बी सेवा को पलक झपकते ओझल कर देता है। रचना का समापन बिन्दु आँखें नम कर जाता है। सही अर्थों में, यही है लेखक व लेखन की सार्थकता-सफलता। भगतराम का तकियाकलाम सिद्ध करता है कि उसमें सकारात्मकता का समन्दर ठाठें मारता था। यह रचना ग्रामीण संस्कृति को जीवंत करती है, इसमें स्वार्थ की पोटलियाँ खुली हैं वहीं नेकदिली व ईमानदारी के ध्वज भी लहराए हैं। निजी तौर पर मुझे यह रचना बहुत भायी है क्योंकि मैं स्वयं ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी हूँ।

मज़बूरियों की बात करती है ‘सूनी माँग का गीत’ कहानी। भूख क्या न करवा दे! घर का मुखिया कितना कुछ सहता है ताकि उसके परिजन चैन से जी सकें। दुनिया से उसके जाने का अर्थ है परिजनों के सामने एक बीहड़ का उग आना, जहाँ असुरक्षा बोध के भेड़िए गुर्राते हैं, भूख के चीते मर्यादा की बाड़ फलांगते हैं और तथाकथित सभ्य समाज तमाशबीन बनकर देखता रह जाता है। यहाँ कशमकश है – जवानी, बुढ़ापे तथा अभावों के मध्य। तभी फैसले का झोंका आता है -कोई नई राह पा जाता है, कोई कसमसाता-सा जहाँ का तहाँ खड़ा रह जाता है। तनावपूर्ण स्थिति में पात्रों से विदा लेता पाठक चिंतन-चिंतना में ऊबने-डूबने लगता है। कथ्य में स्वाभाविकता, घटनाक्रम में गत्यात्मकता बनी रही है। शीर्षक आकर्षक है।

मिर्चपुर गाँव की राई-सी घटना का पर्वत-सा रूप ले लेने की कहानी है ‘अपडेट’। यहाँ भी लेखक का पत्रकार का रूप स्पष्ट उभरकर आया है। राजनीति का असली चेहरा प्रस्तुत करती यह कहानी दर्शाती है कि न तो पीड़ितों के साथ नए-नए खेल खेलने वालों की कमी, न घटना से फायदा उठाने वालों की। व्यंग्य शैली, दमदार शीर्षक, चुटीले वाक्य, भाषाई प्रवाहशीलता कहानी की अतिरिक्त विशेषताएँ हैं, जो पाठक को आकर्षित करती हैं। बानगीस्वरूप – सरकार चौकन्नी रहकर भी फेल हो गई। बड़ा बेटा जो सबसे बड़ा मोहरा था, वह छिटककर विपक्ष के हाथ लग गया। साधारण-सा गाँव देश के चैनलों की सुर्खियाँ बन गया। हर दलित नेता फायर ब्रांड भाषण देकर चला जाता।

‘कठपुतली’ कहानी मानो एक प्रश्न-मंजूषा है, जिसमें स्त्री को लेकर प्रश्न दर प्रश्न हैं, जिनके उत्तर पाठकों को ही सोचने हैं, लिंग-भेद से ऊपर उठकर यथा – क्या नारी की कोई भूमिका नहीं?….?….? बड़ी बात यह कि चोट खाई नारी ने स्वयं को सम्भाला, वह टूटकर भी साबुत रही, किस्मत का रोना नहीं रोती रही। वह उठी और उसका उठना उसे उसकी मंज़िल तक ले गया।

दहेज नामक सामाजिक बुराई के इर्द-गिर्द घूमती ‘हिस्सेदार’ कहानी वर-वधू पक्ष वालों की मनोदशा की परत दर परत खोलती है वहीं यह भी सिद्ध करती है कि सामाजिक कुप्रथाओं के लिए समाज का हर व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिस्सेदार होता है। अत: ज़रूरत है अपनी प्रतिरोधात्मक शक्ति को कुंद होने से बचाने की तथा बुराई का जोरदार खंडन करने की।

अब बात करती हूँ पाठक की चेतना को झिंझोड़ने वाली ‘एक सूरजमुखी की अधूरी परिक्रमा’ कहानी की। शीर्षक ऐसा कि पाठक चाहे तो भी इसकी दहलीज पर खड़ा नहीं रह सकता। उसकी उत्सुकता उसे अंदर ठेलकर ही मानती है। आत्मकथात्मक शैली में, स्त्री को केन्द्र में रखकर लिखी गई है यह कहानी दर्शाती है कि किस प्रकार पति और पुत्र के मध्य विभिन्न भूमिकाएँ निभाती स्त्री कहीं न कहीं कमजोर पड़ गई और अन्त में अपने जिगर के टुकड़े को खो बैठी। किसी ने भी उसके दुख-दर्द को समझने की कोशिश नहीं की। आखिर वही हुआ, जो नहीं होना चाहिए था। समाज की निधि लुटती रही और समाज सोता रहा। स्त्री के पक्ष में कौन खड़ा हुआ? ज़्यादतियाँ करने वाला मनमानी करता रहा। उसका सामना करने की हिम्मत समाज क्यों नहीं जुटा पाया? परोक्षत: कहानी प्रश्नों के हथौड़े मारती है। निस्सन्देह स्त्री समाज की इकाई है मगर विडम्बना यह कि जब यह इकाई संकटग्रस्त होती है तब समाज मात्र तमाशा क्यों देखता रह जाता है? उसे इससे सहानुभूति क्यों नहीं होती?

‘अगला शिकार’ कहानी राजनीति व शिक्षा जगत का कच्चा चिठ्ठा खोलती है। जब-जब समाज पर राजनीति हावी होती है, कर्मठता की बजाय चमचागिरी की पूछ होती है, मनचाही मुराद पूरी होती है।

साम्प्रदायिक दंगों की त्रासदी का चित्रण करती, प्रतीकात्मक शीर्षकधारी कहानी ‘अंधेरी सुरंग’ में संवेदना की धार बहती है। सिख युवक की गमगीनी में गमगीन पाठक ‘इंसानियत कभी नहीं मरती’ के फलसफे के साथ चैन की साँस लेता है। कहानी आईना दिखाती है कि सम्प्रदायवाद की जंजीरों में जकड़े व्यक्ति के लिए इंसान, उसके गुण और इंसानियत कोई मायने नहीं रखते। सामाजिक मनोविज्ञान का यथार्थ चित्रण तथा प्रगतिशील सोच का प्रतिनिधित्व करती है ‘मैंने अपना नाम बदल लिया है’ कहानी। दूसरे विवाह के रूप में कथानायिका साहस भरा कदम उठाती है। आखिर क्यों सहे वह पति नामक प्राणी की ज्यादतियाँ? किले के बहाने सचमुच देश दर्शन करवाती है ‘देश दर्शन’ कहानी। कथानायक रतन गाइड बहुत रोचक ढंग से राजनीति की बखिया उधेड़ता है, किसी को बुरा लगे तो लगे। ऊपरी तौर पर बड़बोला किन्तु सत्यबोला भी है वह। ऐसा प्रतीत होता है एक हाथ में अतीत के, दूसरे हाथ में वर्तमान के गुब्बारे सम्भाले हुए है वह; जैसा जी में आता है, वही गुब्बारा फोड़ देता है और हल्कापन महसूस करता है। कुल मिलाकर गाइड के मुख से देश की राजनीति, अफसरशाही की कारगुजारियों व जनता जनार्दन की हालत बयां कर डाली है। यह कहानी अन्य कहानियों से एकदम हटकर है।

‘नीले घोड़े वाले सवारों के नाम’ रचना का मूल विषय है – दहेज की समस्या। इसके समाधान हेतु मात्र नारे लगाने की नहीं, ठोस कदम उठाए जाने व दहेज लोभियों को सबक सिखाए जाने की ज़रूरत है। आत्मकथात्मक शैली में रचित, मिट्टी की महक से सराबोर करती, गाँवपन से गले मिलाती, शहरीकरण से रूबरू करवाती ‘माँ और मिट्टी’ कहानी में कभी गाँव, कभी शहर में घूमते हुए पाठक का मन खूब रमता है।

सम्पूर्ण संग्रह में भाषिक सौंदर्य, बिम्बों की चमक और देर तक साथ बना रहने वाला वातावरण बहुत हद तक घुला-मिला है। इसलिए ये पाठक पर अपनी पकड़ बनाए रखने में सक्षम हैं। कहानियों के पात्र पाठकों के साथ निरन्तर रूबरू होते हुए, अपने संवादों से उनके मनोभावों को संवेदित करते हुए आगे बढ़ते हैं।  कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ व्यक्ति को आईना दिखाती हैं कि लो देखो अपना चतुर्दिक परिवेश और यदि कुछ कुव्यवस्थित दिखाई देता है तो उसे सुव्यवस्थित करने के लिए चेतना का द्वार खटखटाओ, चिन्तन का सूरज उगाओ और समाज को कमजोर करने वाले कारकों के खात्मे के लिए जोरदार आन्दोलन चलाओ, बिना इस बात पर ध्यान दिए कि तुम किस जाति-सम्प्रदाय से सम्बन्ध रखते हो।

श्री कमलेश भारतीय के लेखन में साफगोई है, वे अनुभव सहेज कर तथा हृदय की भावना उकेर कर रख देते हैं। पुस्तक की साज-सज्जा, आवरण, मूल्य, मुद्रण आदि सामान्य पाठक के अनुकूल है। कामना है, भारतीय जी स्वस्थ रहते हुए साहित्य यज्ञ में सतत सारस्वत समिधाएँ डालते रहें।

© सुश्री कृष्णलता यादव

संपर्क – 677 सैक्टर 10ए,  गुरुग्राम 122001

मो – 9811642789

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 73 ☆ फादर ऑफ मेन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 73 – फादर ऑफ मेन 

‘द चाइल्ड इज द फादर ऑफ मेन।’ दो शताब्दी पहले विल्यम वर्ड्सवर्थ की कविता में सहजता से आया था यह उद्गार। यह सहज उद्गार कालांतर में मनोविज्ञान का सिद्धांत बन जाएगा, यह विल्यम वर्ड्सवर्थ ने भी कहाँ सोचा होगा।

‘चाइल्ड’ के ‘फादर’ होने की शुरुआत होती है, अभिभावकों द्वारा दिये जाते निर्देशों से। विवाह या अन्य समारोहों में माँ-बाप द्वारा अपने बच्चों को दिये जाते ये निर्देश सार्वजनिक रूप से सुनने को मिलते हैं। कुछ बानगियाँ देखिए, ‘दौड़कर लाइन में लगो अन्यथा जलपान समाप्त हो जायेगा।’…  ‘पहले भोजन करो, बाद में शायद न बचे।’.. ‘गिफ्ट देते समय फोटो ज़रूर खिंचवाना।’… ‘बरात में बैंड-बाजेवालों को पैसे तभी देना जब वीडियो शूटिंग चल रही हो।’ बचपन से येन केन प्रकारेण हासिल करना सिखाते हैं, तजना सिखाते ही नहीं। बटोरने का अभ्यास करवाते हैं, बाँटने की विधि बताते ही नहीं। बच्चे में आशंका, भय, आत्मकेंद्रित रहने का भाव बोते हैं। पहले स्वार्थ देखो बाकी सब बाद में।

‘मैं’ के अभ्यास से तैयार हुआ बच्चा बड़ा होकर रेल स्टेशन या बस अड्डे पर टिकट के लिए लगी लाइन में बीच में घुसने का प्रयास करता है। झुग्गी-झोपड़ियों में सार्वजनिक नल से पानी भरना हो, सरकारी अस्पताल में दवाइयाँ लेनी हों, भंडारे में प्रसाद पाना हो या लक्ज़री गाड़ी  में बैठकर सबसे पहले सिग्नल का उल्लंघन करना हो, ‘मैं’ का हुंकार व्यक्ति को संकीर्णता के पथ पर ढकेलता है। इस पथ के व्यक्ति की मति हरेक से लेने के तरीके ढूँढ़ती है। चरम तब आता है जब जिनसे यह वृत्ति सीखी, उन बूढ़े माँ-बाप से भी लेने की प्रवृत्ति जगती  है। माँ-बाप को अब भान होता है कि बबूल बोकर, आम खाने की आशा रखना व्यर्थ है। कैसे संभव है कि सिखाएँ स्वार्थ और पाएँ परमार्थ!

अपनी कविता ‘प्रतिरूप’ स्मरण हो आई।

मेरा बेटा

सारा कुछ खींच कर ले गया,

लोग उसे कोस रहे हैं,

मैं आत्मविश्लेषण में मग्न हूंँ, बचपन में घोड़ा बनकर,

मैं ही उसे ऊपर बिठाता था, दूसरे को सीढ़ी बनाकर ऊँचाई हासिल करने के

गुर सिखलाता था,

परायों के हिस्से पर

अपना हक जताने की

बाल-सुलभता पर

मुस्कराता था,

सारा कुछ बटोर कर

अपनी जेब में रखने की उसकी अदा पर इठलाता था, जो बोया मेरी राह में अड़ा है, मेरा बीज

अब वृक्ष बनकर खड़ा है, बीज पर नियंत्रण कर लेता, वृक्ष का बल प्रचंड है,

अपने विशाल प्रतिरूप से,

नित लज्जित होना,

मेरा समुचित दंड है!

साहित्य मौन क्रांति करता है। बेहतर व्यक्ति और बेहतर समाज के निर्माण के लिए बच्चे में बचपन से बड़प्पन भरना होगा। आखिर जो भरेगा वही तो झरेगा।

इसीलिए तो कहा गया था, ‘द चाइल्ड इज द फादर ऑफ मेन।’

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Article ☆ World Television Day ☆ Shri Ajeet Singh

Shri Ajeet Singh

(We present an article ‘World Television Day’ on the eve of  World Television Day – 21st November  written by Shri  Ajeet  Singh ji, Director (News), Doordarshan. We are extremely thankful to Shri Ajeet Singh ji for this informative and well researched article based on his experience.) 

☆ World Television Day ☆ Shri Ajeet Singh☆ 

This day let’s ponder over the impact television now has on our personal, familial, social and political life.

Not going into the well known history of this audio visual medium, suffice to say that it has gradually changed our lives in a big way. It cut down our time for Radio, cinema and print media significantly.

TV started making real impact in America and European countries in fifties of the last century. The first Presidential debates in 1960 between John Kennedy and Richard Nixon marked the moment that the television had arrived.

In India the impact came in early eighties through 9th Asian Games, introduction of colour TV, and then the serial saga through Hum Log, Ramayan and Mahabharat. By mid-nineties came the private television and the Doordarshan started losing the race both in entertainment segment of serials and the news segment. It soon became a mad race even among the private networks, each trying to beat the other through sensational contents and even by rigging the TRPs for a bigger pie in the advertisement revenue.

The cut throat race continues.

My personal feeling is that television has in this process made us passive consumers of its contents. It has even polarised the community on communal and political lines.

There was a time when films united the country. Those made Hindi as the most spoken and understood language. In its early days, Television too performed that role through its films and film-based programmes and live sports especially cricket.

In the last decade or so, television news seems to have become more popular than serials. Of 800 odd television channels in India, about half cater to news. Prime time is a big circus on most of the news channels.

We remain passive consumers.

Will television continue to play overwhelming or even dominant role in entertaining the masses and as educator and information provider?

I don’t think so. In last about five years or so,

A new technology has brought on the scene a new mass media called social media. It has already started impacting the television. Now I devote equal, if not more, time to social media than the television. The smartphone technology has made television as just one of its many adjuncts. There is also smart television and OTT content, all available on smartphones. Television gave us what a channel thought the best for us. Of course, we could change channels but we could not always have the contents we specifically wanted. Google on smartphones has widened the area of our choice astronomically.

Social media has made every citizen a reporter. He won’t stand sermonising of different hues any more. He has a take on anything and everything. That makes social media a better two-way communication medium. Its reach and audience are huge. Facebook has 180 crore subscribers. If people only make a country, then Facebook is the biggest country of the world.

Social media gives rise to communities and identities of big and small sizes that television and other mass media sought to rollover.

This way social media makes us active and discreet consumers of contents. This is a major point social media scores over television.

These are my stray thoughts on this World Television Day.

We have a galaxy of television watchers in our group.

Will they enlighten us ? Waiting to hear.

 

©  Shri Ajeet Singh 

Ex Director (News) Doordarshan

Mo. – 9466647037

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 30 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 30 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 30) ☆ 

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 30☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

मैं दिल हूँ, रुकूँगा…

तो  मर  जाऊँगा,

मुझे  सुकून  ना  दे,

बस बेकरार रहने दे…

 

I am just a  heart…

If stopped,  I’ll  die…

Give me no relaxation,

Let me be restless only…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

जिंदगी भी एक

फन है लम्हों का

इसे अपने अंदाज

से  गँवाने  का…

 

Life  is  just  an

artistry of moments

To have them wasted

in  their  own  style…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

अक्सर कुछ अनकही बातें

बहुत कुछ  कह जाती हैं

ज़रूरी नहीँ कि हर चीज़

लफ़्ज़ों  में  ही  बयाँ हो…

 

Sometimes  even  some

Unexpressed things say a lot

It’s not always necessary

Everything be said in words!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

ख्वाहिशों से भरा पड़ा है

मन  इस  कदर  कि…

रिश्ते  भी  तरसते  हैं …

ज़रा सी जगह पाने के लिए…

 

The mind is full of desires

to such an extent that

Relationship also yearns

to  get  a  little space…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 30 ☆ भारत आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आचार्य जी  द्वारा रचित आरती भारत आरती । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 30 ☆ 

☆ भारत आरती ☆ 

आरती भारत माता की

सनातन जग विख्याता की

*

सूर्य ऊषा वंदन करते

चाँदनी चाँद नमन करते

सितारे गगन कीर्ति गाते

पवन यश दस दिश गुंजाते

देवगण पुलक, कर रहे तिलक

ब्रह्म हरि शिव उद्गाता की

आरती भारत माता की

*

हिमालय मुकुट शीश सोहे

चरण सागर पल पल धोए

नर्मदा कावेरी गंगा

ब्रह्मनद सिंधु करें चंगा

संत-ऋषि विहँस,  कहें यश सरस

असुर सुर मानव त्राता की

आरती भारत माता की

*

करें श्रृंगार सकल मौसम

कहें मैं-तू मिलकर हों हम

ऋचाएँ कहें सनातन सच

सत्य-शिव-सुंदर कह-सुन रच

मातृवत परस, दिव्य है दरस

अगिन जनगण सुखदाता की

आरती भारत माता की

*

द्वीप जंबू छवि मनहारी

छटा आर्यावर्ती न्यारी

गोंडवाना है हिंदुस्तान

इंडिया भारत देश महान

दीप्त ज्यों अगन, शुद्ध ज्यों पवन

जीव संजीव विधाता की

आरती भारत माता की

*

मिल अनल भू नभ पवन सलिल

रचें सब सृष्टि रहें अविचल

अगिन पंछी करते कलरव

कृषक श्रम कर वरते वैभव

अहर्निश मगन, परिश्रम लगन

ज्ञान-सुख-शांति प्रदाता की

आरती भारत माता की

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – नेत्रदान ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  काशी निवासी लेखक श्री सूबेदार पाण्डेय जी का विशेष आलेख  “नेत्रदान। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – नेत्रदान ☆

अंधापन एक अभिशाप – अंधापन मानव जीवन को जटिल बना देता है, तथा‌ जीवन  को अंधेरे से भर देता है।

अंधापन दो तरह का होता है

१ – जन्मांधता –  जो व्यक्ति जन्म से ही अंधे होते हैं।

२- अस्थाई अंधापन – बीमारी अथवा चोट का कारण से।

१ – जंन्मांधता

जन्मांध व्यक्ति सारी जिंदगी अंधेरे का अभिशाप भोगने के लिए विवश होता है। उसकी आंखें देखने योग्य नहीं होती, लेकिन उनकी स्मरण शक्ति विलक्षण ‌होती है। ‌वह मजबूर नहीं, वह अपने सारे दैनिक कार्य कर लेता है।  दृढ़ इच्छाशक्ति, लगन तथा अंदाज के सहारे, ऐसे अनेक व्यक्तियों को देखा गया है,  जो अपनी मेहनत तथा लगन से शीर्ष पर स्थापित ‌हुये है।  उनकी कल्पना शक्ति उच्च स्तर की होती है।  यदि हम इतिहास में झांकें तो पायेंगे  इस कड़ी में सफलतम् व्यक्तित्वों की एक लंबी श्रृंखला है, जिन्होंने अपनी क्षमताओं का सर्वोत्कृष्ट प्रर्दशन कर लोगों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। इस कड़ी में स्मरण करें  तो भक्ति कालीन महाकवि सूरदास रचित सूरसागर में कृष्ण ‌की‌ बाल लीलाओं का  तथा गोपियों का विरह वर्णन, भला कौन संवदेनशील प्राणी‌ होगा जो उन रचनाओं के संम्मोहन में ‌न फंसा‌ हो।

दूसरा उदाहरण ले रविन्द्र जैन की आवाज का। कौन सा व्यक्ति है जो उनकी हृदयस्पर्शी आवाज का दीवाना नहीं है?

तीसरा उदाहरण है मथुरा के सूर बाबा का, जिनकी कथा शैली  अमृत वर्षा करती है। अगर खोजें तो ऐसे तमाम लोगों की लंबी शृंखला दिखाई देगी, लेकिन उनका इलाज अभी तक संभव नहीं है। भविष्य में चिकित्सा विज्ञान कोई भी चमत्कार  कभी भी कर सकता है।

२ – अस्थाई अंधत्व

जब कि दूसरे तरह के अंधत्व का इलाज समाज के सहयोग ‌से संभव है । चिकित्सा बिज्ञान में इस विधि को रेटिना प्रत्यारोपण कहते हैं जिससे व्यक्ति के आंखों की ज्योति वापस लाई जा सकती है, जो किसी मृतक व्यक्ति के  परिजनों द्वारा नेत्रदान  प्रक्रिया में योगदान से ही संभव है । चिकित्सा विज्ञानियों का मानना है कि मृत्यु के आठ घंटे बाद तक नेत्रदान कराया जा सकता है तथा किसी की‌ जिंदगी  को रोशनी का उपहार दिया जा सकता है। यह एक साधारण से छोटे आपरेशन के द्वारा कुछ ही मिनटों में सफलता पूर्वक संपन्न किया जाता है।  मृत्यृ के पश्चात   मृतक को कोई अनुभूति नहीं होती, लेकिन  जागरूकता के अभाव में नेत्रदान   प्राय:  कभी कभी ही  संभव हो पाता है। जिसके पीछे जागरूकता के अभाव तथा अज्ञान को ही कारण  माना जा सकता है।

सामान्यतया हम लोग दान का मतलब धार्मिक कर्मकाण्डो के संपादन, पूजा पाठ तीर्थक्षेत्र की यात्राओं,  थोड़े धन के दान तथा कथा प्रवचन तक ही सीमित समझ लेते है, उसे कभी आचरण में उतार नहीं सके। उसका निहितार्थ नहीं ‌समझ सके। मानव जीवन की रक्षा में अंगदान का बहुत बड़ा महत्व है।  जीवन मे हम अधिकारों के पाने  की बातें करते हैं, लेकिन जहां कर्तव्य निभाने बात आती है‌, तो बगलें झांकने लगते हैं। इस संबंध में तमाम प्रकार की भ्रामक धारणायें  बाधक बन‌ती  है जैसे नेत्रदान आपरेशन के समय पूरी पुतली निकाल ली जाती है और चेहरा विकृत हो जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है। आपरेशन से मात्र नेत्रगोलकों के रेटिना की पतली झिल्ली ही निकाली जाती है । जिससे चेहरे पर कोई विकृति नहीं होती।

हिंदू धर्म में चौरासी लाख योनियों की कल्पना की गयी  है, जो यथार्थ में दिखती भी है, लेकिन यह‌ मान्यता पूरी तरह भ्रामक  निराधार  और असत्य है कि नेत्रदान के पश्चात अगली योनि में नेत्रदाता अंधा पैदा होगा। यह मात्र कुछ अज्ञानी जनों की मिथ्याचारिता है। इसी लिए भय से‌  लोग नेत्रदान से  बचना चाहते‌ है।  जब कि  सच तो यह है कि इस योनि का शरीर मृत्यु के पश्चात जलाने या गाड़ने से नष्ट हो जाता है, अगली योनि के शरीर पर इसका कोई प्रभाव ही नहीं होता। क्यो कि अगली योनि का शरीर योनि गत  अनुवांशिक संरचना पर आधारित होता है। यह एक मिथ्याभ्रामक मान्यताओं पर आधारित गलत अवधारणा है।

नेत्रदान के मार्ग की बाधाएं

नेत्रदान की सबसे बड़ी बाधा जनजागरण का अभाव तथा मानसिक रूप से तैयार न होना है। नेत्रदान के संबंध में जिस ढंग के प्रचार प्रसार की जरूरत महसूस की जा रही है वैसा हो नहीं पा रहा है, इसके लिए तथ्यो की सही जानकारी आम जन तक पहुंचाना, भ्रम का निवारण करने के मिशन को युद्ध स्तर पर चलाना। मृत्यु के पश्चात परिजन नेत्रदान के लिए  इस लिए सहमत नहीं होते, क्यो कि दुखी परिजन मानसिक विक्षिप्तता की स्थिति में लोक कल्याण के बारे में सोच ही नहीं पाते। सामंजस्य स्थापित नही कर पाते। इसके लिए अभियान चला कर लोगों को मानसिक रूप से अपनी विचारधारा से सहमत कर नेत्रदान हेतु मृतक के परिजनों को मृत्यु पूर्व ही प्रेरित करना तथा दान के महत्व को समझाना चाहिए, ताकि मृत्यु के बाद अंगदान की अवधारणा पर  उनकी सहमति बन सके। इसके लिए जनजागरण अभियान, समाज सेवकों की टीम गठित करना, लोगों को मीडिया प्रचार, स्थिर चित्र, तथा चलचित्र एवं टेलीविजन से प्रचार प्रसार कर जन जागरण करना तथा अंगदान रक्तदान के महत्व को लोगों को समझाना कि किस प्रकार मृत्यु शैय्या पर पडे़ व्यक्ति की रक्त देकर जीवन रक्षा की जा सकती है, तथा नेत्र दान से जीवन में छाया अंधेरा दूर कर व्यक्ति को देखने में सक्षम बनाया जा सकता है इसका मुकाबला कोई भी धार्मिक कर्मकांड नहीं कर सकता। लोगों को अपने मिशन के साथ जोड़कर वैचारिक ‌क्रांति पैदा करनी‌ होगी, बल्कि यूं कह लें कि हमें ‌खुद अगुआई करते हुए अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।

इस बारे में पौराणिक उदाहरण भरे पड़े हैं, जैसे शिबि, दधिचि, हरिश्चंद, कर्ण, कामदेव, रतिदेव, आदि ना जाने अनेकों कितने नाम।

इस संदर्भ में अपनी कविता ” दान  की  महिमा” की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत हैं –

जीते  जी रक्तदान मरने पर अंगदान,
सबसे बड़ा धर्म है पुराण ये बताता है।
शीबि दधिची हरिश्चंद्र हमें ‌ये बता गये,
सत्कर्मो का धर्म से बड़ा गहरा नाता है।

पर हित सरिस धर्म नहिं,
पर पीडा सम अधर्म नहीं।
रामचरितमानस हमें ये सिखाता है।
जीवों की रक्षा में जिसने विषपान किया,
देवों का देव महादेव ‌वो बन जाता है।।

(दान की महिमा रचना के अंश से) 

इस प्रकार हमारी ‌भारतीय संस्कृति में ‌दान का महत्व ‌लोक‌कल्याण हेतु एक  परंपरा का रूप ले चुका था, लेकिन आज का मानव  समाज अपनी परंपरा भूल चुका है। उसे एक बार फिर याद दिलाना होगा। इस क्रम में देश के उन जांबाज सेना के जवानों का संकल्प ‌याद आता है जिन्होंने अपना‌ जीवन‌ देश सीमा को तो सौंपा ही है अपने मृत शरीर  का हर अंग समाज सेवा में लोक कल्याण हेतु दान कर अमरत्व की महागाथा लिख दिया ऐसे लोगो का संकल्प, पूजनीय, वंदनीय तथा अभिनंदनीय है हमारे नवयुवाओं को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

© सूबेदार  पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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सूचना/Information ☆ अभिव्यक्ती शतकपूर्ती ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ अभिव्यक्ती शतकपूर्ती

अंतरीचे भाव सारे शब्द येथे मांडती

कल्पनेचे वेल येथे शब्दसुमने सांडती

लेखणीच्या रूपाने नांदते श्रीसरस्वती

शतक करते पूर्ण,आपली ‘अभिव्यक्ती’

15.08.2020 ✒✒ 22.11.2020

स्वातंत्र्यदिनाच्या सुमुहुर्तावर ई-अभिव्यक्ती च्या स्वतंत्र मराठी आवृत्ती ला सुरूवात केली.

बघता बघता शंभर दिवस पूर्ण झाले. या शंभर दिवसात नवनवीन सदरे सुरू झाली. नवनवीन लेखक, कवी यांनी या उपक्रमात सहभागी होऊन अंक सर्वांग सुंदर बनवला. वाचकांचाही उत्तम प्रतिसाद लाभला. प्रतिक्रियां वरून हे स्पष्ट होत आहे. असेच सहकार्य लाभत जावो आणि ‘अभिव्यक्ती’ बहरत जावो, ही संपादक मंडळाची अपेक्षा.!

आभार

संपादक मंडळ
मुख्य संपादक तथा मराठी आवृत्ती संपादक मंडळ.

 ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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