हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कटखने दिन हुए है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – कटखने दिन हुए है…!

☆ ॥ कविता॥ कटखने दिन हुए है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

कटखने  दिवस हुए, कुलाँचे भरती रातें,

सूरज  सिर चढ़कर हँसकर करता घातें।

*

वसुधा  जलती जैसे ‘देवराला’ की सती,

पानी  के अभाव में  सरिता प्यासी मरती,

भूखा पेट नहीं भरे, चिकनी-चुपड़ी बातें।

*

दुर्दशा वन- उपवन की हुई जैसे भिखारी,

खुद सियासतदानों ने  ऐसी चलाई आरी,

दिन- दहाड़े मौत की होने लगी वारदातें।

*

दहाड़ी के तन से टप-टप टपक रही बूँदें,

ताप  के मारे परिंदे पँख समेटे दृग हैं मूँदे,

लू की लपटों से उबल रहे हैं घर-अहाते।

*

वक्त बड़ा बेढंगा है देखकर चलना जरा,

एक  जैसा लगता है आदमी खोटा-खरा,

कि मतलबी हो गई यारों की मुलाक़ातें।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आज ? ?

अपने शब्दकोश से

निष्कासित कर दिया मैंने

एक शब्द… ‘कल’..,

फिर वह

बीता कल हो या

आता कल..,

अब केवल अपना

आज जीता हूँ,

यही कारण है;

बीते और आते कल का

आनंदरस भी पीता हूँ…!

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रात: 9:44 बजे, 01/04/2023)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१८ – मनोज के दोहे ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है  “मनोज के दोहे। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१८ – मनोज के दोहे ☆

प्रफुल्लित डाल पर आरी को चलाता वह ।

सभी के मन  में सदा लालच जगाता वह।।

 *

वृक्षों का काम, छाया और फल को देना।

कर्तव्य के भाव हर पल में बताता वह।।

 *

इंसानियत के मापदंडों को भुलाकर।

अपनी उंगलियों में सबको नचाता वह।।

 *

बढ़ रहे हैं धरा पर सब अपनी ही डगर।

ले उड़ा आकाश में सपने दिखाता वह।।

 *

कुछ के मन की चाहना तो है बड़ी विचित्र।

कंधे में गन को रख, खुद को रिझाता वह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दिव्य गीत यह है गाना ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’ जी का ई-अभिव्यक्ति में  स्वागत। लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता दिव्य गीत यह है गाना।)

☆ कविता ☆ दिव्य गीत यह है गाना ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

वंदे मातरम गान प्यारा, हर लब तक है पहुंँचाना।

हेलो हाय छोड़ सबको नित, दिव्य गीत ये है गाना।।

*

भरा हुआ है आंचल माँ का, भिन्न-भिन्न उपहारों से।

कोई उऋण नहीं हो सकता, माँ के इन उपकारों से।।

वृक्ष घनेरे मलयागिरि के, पवन सुवासित कर देते।

 फल फूलों से लदे बाग ये, बरबस मन को हर लेते।।

 मातृभूमि के श्री चरणों में, है अपना शीश झुकाना।

 हेलो हाय छोड़ सबको नित, दिव्य गीत यह है गाना।।

*

 परे कल्पना के हरदम ही, रूप तुम्हारा माँ लगता।

 धवल चांदनी रातों में जब, हर कोना दमका करता।।

 शीश हिमालय ताज सजा है, दिनकर बिंदी बन चमके।

 कर में खप्पर धारण करती, अरि भागा करते डर के ।।

जन्म मिले यदि पुनः पुनः तो, हिंदुस्तान सदा पाना।

 हेलो हाय छोड़ सबको नित, दिव्य गीत यह है गाना।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२४ ☆ काठी सावर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२४ ?

☆ काठी सावर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

कसरत करते तारेवरची

खाण्यासाठी भाकर मिरची

*

बाप वाजवी ढोल चामडी

पोरे जमली पारावरची

*

सावकारही आला होता

डोक्यावरती टोपी फरची

*

कुणी न आले वाचवायला

फुले वाळली वेलीवरची

*

मनात आहे काय चालले

रेघ सांगते भाळावरची

*

या कष्टाची भीक तोकडी

कळी खुलेना गालावरची

*

तोल म्हणाला नको घाबरू

काठी सावर हातावरची

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८१ – संकल्पित रहो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८१ – संकल्पित रहो – १ ✍

दोस्तो!

मैं महापुरुष नहीं साधारण व्यक्ति हूँ।

मेरे मन में भी उपजते हैं। हर्ष और विषाद

मुझे भी घेरती है निराशा

मैं भी बोलता हूँ/ दिग्भ्रमित अर्जुन की भाषा

पीड़ित होता हूँ अन्याय और अत्याचार से

विह्वल हो उठता हूँ। द्रौपदी जैसी पुकार से।

फिर होता है एहसास

कि मुझे जकड़े है- विवशता का पाश!

सोचता हूँ

जाने अनजाने इसी नागपाश में बँधे हैं

सब लोग

सब में व्याप गया है

निर्बलता का राजरोग,

शायद

निर्बलता शब्द न हो बिल्कुल ठीक

निर्बलता की जगह शायद

निर्वीयता होगा सही सटीक,

यह निर्वीयता नहीं तो क्या है

कि फटी आँखें देखती हैं

जलती बस्तियाँ।

देखती हैं- सद्भाव की डूबती कश्तियाँ।

प्रेम को मूर्खता

और करुणा को समझा जाता है

लिजलिजा विचार

अखबारों में रोज छपते हैं समाचार

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८० “बाहर हाँफ रही गौरैया…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बाहर हाँफ रही गौरैया...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

चित्र – श्री राघवेंद्र तिवारी (2004)

☆ “बाहर हाँफ रही गौरैया...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

एक सकोरा पानी-दाना

रक्खा करती माँ ।

औरों की खातिर चिड़ियों सी

 उड़ती रहती माँ ॥

 

छाती में दुनिया-जहान की

लेकर पीड़ायें ।

आँचल भर उसको सारी

जैसे हों क्रीड़ायें ।

 

आगे खिडकी में आँखों के

चित्र कई टाँगे ।

पीड़ा को कितनी आँखों से

देखा करती माँ ॥

 

बाहर हाँफ रही गौरैया

उस मुँडेर तोती ।

जहाँ उभरती   दिखे

सभी को आशा की जोती ।

 

गर्मी गले-गले तक आकर

जैसे सूख गई ।

इंतजार में हरी-भरी सी

दिखती रहती माँ ॥

 

लम्बे-चौड़े टीम-टाम है

बस अनुशासन के ।

जहाँ टैंकर खाली दिखते

नगर प्रशासन के ।

 

वहीं दिखाई देती सबकी

सजल खुली आँखें ।

इन्हीं सभी में भरे कलश

सी छलका करती माँ ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

17-04-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समानांतर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समानांतर ? ?

…….???

…..???

…???

पढ़ सके?

फिर पढ़ो..!

नहीं…?

सुनो मित्र,

साथ न सही

मेरे समानांतर चलो,

फिर मेरा लिखो पढ़ो..!

?

© संजय भारद्वाज  

(दोपहर 3:10 बजे, 15.6.2016)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ क्या फर्क पड़ता है? ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  क्या फर्क पड़ता है? ☆ हेमन्त बावनकर ☆ 

श्श्श्श…श्श्श

शान्त… शान्त

यहाँ सोती हैं

सौ से ज्यादा छोटी छोटी लड़कियाँ

जो पढ़ने के लिए निकली थीं.

पढ़ने तो गईं…

लेकिन, वापिस लौट न सकीं

और

सुला दी गई

उन छोटी छोटी कब्रों में

एक भयावह कब्रगाह में…

इससे,

दुनिया की बाकी छोटी छोटी लड़कियों को

उनके रिश्तेदारों को

और

जो इंसान कहलाने लायक ही नहीं हैं, उनको 

क्या फर्क पड़ता है?

 

वे मासूम लड़कियाँ

तो जानती भी नहीं थी कि…

देश क्या होता है?

सरहद क्या होती है?

मजहब क्या होता है?

नस्ल क्या होती है?

दोस्त देश क्या होता है?

और

दुश्मन देश क्या होता है?

वे तो समझती थी कि

सूरज एक होता है

चाँद एक होता है

और

यह जमीं सभी की होती है.

उनकी सारी दुनिया तो

घर से शुरू होकर

स्कूल तक ख़त्म हो जाती थी.

खा पीकर, पढ़ लिख कर

माँ-बाप की आगोश में खो जाती थी.

फिर,

जिस किसी ने निशाना बनाकर

उनके स्कूल पर मिसाइल दागी थी, उसे

क्या फर्क पड़ता है?

 

हम आदी हो चुके हैं

लड़ाइयों को टी वी पर देखने के

विडियो गेम्स की मानिंद…

तबाही के इस खेल में

अब हमें दिखाई नहीं देते

खँडहर बनते स्कूल और अस्पताल

शहर और इमारतें

शहरों-खंडहरों में दब रही

ऐशो आराम पुरसुकून आलीशान जिंदगी.

तबाह होते

खूबसूरत बाग़ बगीचे. 

अब… बच्चे, मर्द-औरतें और बुजुर्ग

कैसे भी जियें या मरें,

क्या फर्क पड़ता है?

 

हमें सीखने के लिए तो बहुत कुछ था

फिर क्या सीखा हमने ?

हुक्मरानों के तानाशाह होने से…

नागासाकी के परमाणु विस्फोट से…

यातना शिविरों से…

गैस चेम्बरों से…

गैस त्रासदी से…

आतंक के साए से…

धर्मान्धता के जहर से…

कोविड की महामारी से…

लड़ाइयों और नरसंहारों से…

अब, अमन के नाउम्मीद उन्मादियों को

क्या फर्क पड़ता है?

 

मुस्तक़बिल का आलमी अमन इनाम याफ़्ता

शायद कहीं सो रहा है…    

ज्यादातर अवाम बे-रुख़ हो गई है

और हुक्मरान पगला गए हैं…

उन्हें बकौल शायर हबीब जालिब*

याद दिलाना लाजमी है कि-

“तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था”

समझाना नामुमकिन है, उनको

क्या फर्क पड़ता है?

 

उम्मीद की लौ  

बुझी नहीं है…

अथर्ववेद** में ऐसे ही नहीं कहा गया है.

वसुधैव कुटुम्बकम

पूरी दुनिया एक परिवार है

इसलिए

मेरे अल्फाज

सरहदों के बगैर अल्फाज हैं

जो जहाँ कहीं तक पहुंचे

इंसानियत का पैग़ाम लेकर पहुंचे  

अमन का पैग़ाम लेकर पहुंचे

अब ये मत कहना कि- इससे

क्या फर्क पड़ता है?

फर्क तो पड़ता है,

अमन और इंसानियत के पैगाम से…

फर्क तो पड़ता है…

फर्क तो जरुर पड़ता है ! 

* पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब

** अथर्ववेद हिन्दू धर्म के चार वेदों (ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद ) में से चौथा वेद है.

©  हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तिनके…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆

☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तिनके अब पैरों के तले

रौंदे नहीं जाएंगे

अगर जोर जबरदस्ती की

तो पैर जख्मी हो जाएंगे

 

तिनकों का जख्म

आसानी से नहीं भरता है

जख्म नासूर बन जाए

तो कभी-कभी इंसान

दर्द से मरता है

 

बड़े-बड़े आंधी और तूफान

बरगद को उखाड़ देते हैं

लेकिन वह भी

तुच्छ समझे जाने वाले

तिनके के आगे

सर झुका देते

 

तिनके की जड़ें

अंदर तक जाती है

ना वह मरती है

ना कुंभलाती है

इसकी गहराई किसी को

समझ नहीं आती है

 

तिनके दुर्बल सही

पर कमजोर नहीं है

किसी और का

उन पर जोर नहीं है

जंगल ही उनका अपना घर है

कहीं और ठौर नहीं है

 

तिनके को प्रकृति की पनाह

में रहने दो

उन्मुक्त  हवा ओं के साथ बहने दो

परिंदों की बोली कहने दो

निसर्ग  की धूप-छांव

सहने दो

 

क्यों की,

जब तिनके प्रचंड गर्मी में

झुलसते है

अंदर ही अंदर

सुलगते है

जंगल की भीषण आग बनते हैं

दावानल में ढलते है

तो वन के वन

जलकर राख हो जाते है

अहंकार में डूबे हुए

सब ख़ाक हो जाते है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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