(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक आलेख – “नया साल, नई सोच” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९३ ☆
न्यूयार्क से ~ नया साल, नई सोच श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
हर बारह महीने बाद हमारे सामने एक ताज़ा कैलेंडर बिलकुल कोरा कैनवास तथा इंद्रधनुष के रंग लेकर आता है। एक जनवरी यह कोई साधारण दिवसांक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक प्रस्थान बिंदु है, जो हमें रुककर सोचने, ठहरकर पीछे मुड़कर देखने और फिर से नए संकल्प के साथ शुरू करने का साहस देता है। यह वह अवसर है जब हम अपने पिछले अनुभवों को एक संदर्भ के रूप में संजोते हुए भी, उनके बोझ से अपने मन को मुक्त कर सकते हैं। हर नए साल की पहली सुबह हवा में एक अलग सी ताज़गी, आशा की एक नई लय और संभावनाओं का एक अनूठा संगीत लेकर आती है। इसी लिए इस दिन को दुनियां भर में उत्सव की तरह उत्साह से मनाया जाता है। लेकिन क्या यह सब परिवर्तन अपने आप हो जाता है? नहीं, यह तभी सार्थक बनता है जब हम खुद अपनी सोच की दिशा और दशा बदलने का निश्चय करते हैं।
हमारी सोच अक्सर आदतों के पिंजरे में कैद होती है। हम वही रास्ते चुनते हैं, वही प्रतिक्रियाएं देते हैं और वही डर साथ लेकर चलते हैं। यह पुरानी सोच एक ऐसा आरामदायक कोना बना देती है जहां से बाहर झांकना भी मुश्किल लगता है। नकारात्मकता, हार मान लेने की मानसिकता और असफलताओं का बोझ , ढर्रे पर जिंदगी, ये सब हमारी रफ्तार के रोकते हैं। पर नया साल हमें याद दिलाता है कि समय बदल रहा है, और बदलना ही प्रगति के लिए जीवन का सार है। तो क्यों न हम भी अपनी सोच को नई दिशा दें? नई सोच का अर्थ यह नहीं कि पुरानी हर बात को नकार दिया जाए। बल्कि यह एक विवेकपूर्ण संतुलन है। इसमें अतीत के सबक को साथ लेकर, वर्तमान में जीते हुए, भविष्य के लिए एक लचीली, सकारात्मक और समाधान-उन्मुख मानसिकता का विकास करना होता है। यह सबसे पहले हमारे नजरिए में बदलाव लाती है। एक ही स्थिति को हम समस्या के रूप में देखें या चुनौती के रूप में, यह हमारी सोच तय करती है। नई सोच “क्यों नहीं हो सकता” के स्थान पर “कैसे हो सकता है” पर केंद्रित होनी चाहिए , जो आशा की किरण को जिंदा रखती है। साथ ही, यह हमें जिज्ञासु बनाए रखती है, नई चीजें सीखने के लिए हमें प्रेरित करती है और हमें यह एहसास दिलाती है कि गलतियां असफलताएं नहीं, बल्कि सीखने के सोपान हैं। जीवन अनिश्चितताओं से भरा है, और पुरानी, कठोर सोच मुसीबत में टूट जाती है, जबकि नई और लचीली सोच झुकती जरूर है, लेकिन टूटती नहीं। यह अनुकूलन की क्षमता विकसित करती है। इसमें अतीत की कमियां गिनाने के बजाय, जो मिला है उसके प्रति कृतज्ञ होना और दूसरों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखना भी शामिल है।
लेकिन यह बदलाव रातों-रात नहीं आता। नए साल की शुरुआत इसे आरंभ करने का एक शुभ अवसर जरूर है। बड़े-बड़े संकल्पों के बोझ तले दबने की बजाय, एक छोटी, सकारात्मक आदत से शुरुआत करें। जैसे, रोजाना पांच मिनट शांत बैठकर अपने खुद के साथ रहना, एक अच्छी किताब के कुछ पन्ने पढ़ना, या दिन की शुरुआत तीन अच्छी बातें गिनकर करना। जब भी मन कहे “यह मेरे बस की बात नहीं”, तो एक बार खुद से पूछें, “क्या इसे करने का कोई एक छोटा तरीका हो सकता है?” सोशल मीडिया की नकारात्मकता और तुलना की दुनिया से अवकाश लेकर, उस समय को अपने शौक, परिवार या स्वयं के साथ बिताएं। अपने से अलग विचार रखने वालों की बात बिना कटुता के सुनने का प्रयास करें, इससे हमारा दृष्टिकोण व्यापक होता है। और सबसे महत्वपूर्ण, अपनी कमियों के प्रति आलोचनात्मक होने के बजाय, स्वयं से वैसी ही प्रोत्साहन की भाषा बोलें जैसी किसी प्रिय मित्र से बोलते हैं।
जब एक व्यक्ति की सोच बदलती है, तो उसका पूरा जीवन बदलने लगता है। रिश्तों में एक नई मिठास आती है, कार्यक्षेत्र में रचनात्मकता बढ़ती है, और मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर होता है। और जब ऐसे अनेक व्यक्ति मिलकर एक समाज बनाते हैं, तो वह समाज प्रगति, शांति और सहयोग का केंद्र बन जाता है। नई सोच समस्याओं को सामूहिक चुनौती के रूप में देखना सिखाती है, जिसका समाधान मिलकर खोजा जा सकता है।
तो आइए, इस नए साल पर हम केवल नए कपड़े, नए साजो-सामान, चमक धमक ही नहीं, बल्कि एक नया दृष्टिकोण भी स्थाई रूप से धारण करें। उस सोच को अपनाएं जो बदलाव से नहीं डरती, जो सीखने के लिए हमेशा तैयार रहती है और जो हर स्थिति में एक संभावना की तलाश करती है। क्योंकि सच तो यह है कि नया साल कोई जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत के लिए हमारे अपने मन का बनाया हुआ एक सुंदर बहाना है। यह बहाना, अगर हम चाहें, तो हमारे जीवन की सबसे सुंदर कहानी का पहला वाक्य बन सकता है। आपकी सोच नई हो, आपका नजरिया उज्ज्वल हो, और यह नया साल आपके जीवन में अनगिनत नई खुशियां, नई सफलताएं और नई संभावनाएं लेकर आए। शुभ नववर्ष ।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २७१ ☆हरी भरी धरती- नववर्ष का खास संदेश… ☆
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नव वर्ष आया द्वार पे
आशा की चादर ओढ़कर।
बीते दुखों छोड़कर
बंधन कटीले तोड़कर।।
*
हर दिन जगे विश्वास ऐसा,
भोर होवे प्रेममय ।
जीवन पथिक बनते हुए
होगी सदा जय की विजय ।।
*
उम्मीद की डोरी पकड़
हाथों में थामें फूल को।
पहला कदम रखते ही जागे
भूलिए मत मूल को ।।
*
तय किया जब लक्ष्य पाना
वर्ष नव उत्कर्ष हो ।
गूँजती मंगल ध्वनि तो
क्यों न सबको हर्ष हो।।
***
नया वर्ष केवल कैलेंडर न बदले हमारी आदतें भी हरी हो जाएँ। पौधे लगाना,पेड़ बचाना यही सच्चा संकल्प बन जाए।जब धरती मुस्कुराएगी,तभी मन को सुकून आएगा।प्रकृति की रक्षा करेंगे हम,तो भविष्य सुरक्षित होगा।आइए इस वर्षहर श्वास में हरियाली,हर कर्म में प्रकृति,और हर दिन ग्रीन मोटिवेशन अपनाएँ।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी रचना बालकहानी – लिपि की कहानी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३४ ☆
☆ बालकहानी – लिपि की कहानी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
मुनिया की सुबह तबीयत खराब हो गई। उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। अपनी सहेली के साथ स्कूल भेज दिया। प्रार्थनापत्र में उसने जो लिखा था, उसकी अध्यापिका ने उस प्रार्थनापत्र को उसी रूप में समझ लिया। और मुनिया को स्कूल से छुट्टी मिल गई।
क्या आप बता सकते है कि मुनिया ने प्रार्थनापत्र किस लिपि में लिख कर पहुंचाया था। नहीं जानते हो ? उसने प्रार्थनापत्र देवनागरी लिपि में लिख कर भेजा था।
देवनागरी लिपि उसे कहते हैं, जिसे आप इस वक्त यहाँ पढ़ रहे है। इसी तरह अंग्रेजी अक्षरों के संकेतों के समूहों से मिल कर बने शब्दों को रोमन लिपि कहते हैं।
इस पर राजू ने जानना चाहा, “क्या शुरु से ही इस तरह की लिपियां प्रचलित थीं?”
तब उस की मम्मी ने बताया कि शुरु शुरु में ज्ञान की बातें एक दूसरे को सुना कर बताई जाती थीं। गुरुकुल में गुरु शिष्य को ज्ञान की बातें कंठस्थ करा दिया करते थे। इस तरह अनुभव और ज्ञान की बातें पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाती थीं।
मनुष्य निरंतर, विकास करता गया। इसी के साथ उस का अनुभव बढ़ता गया। तब ढेरों ज्ञान की बातें और अनुभव को सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई।
इसी आवश्यकता ने मनुष्य को प्रत्येक वस्तु के संकेत बनाने के लिए प्रेरित किया। तब प्रत्येक वस्तु को इंगित करने के लिए उस के संकेताक्षर या चिन्ह बनाए गए। इस तरह चित्रसंकेतों की लिपि का आविष्कार हुआ। इस लिपि को चित्रलिपि कहा गया।
आज भी विश्व में इस लिपि पर आधारित अनेक भाषाएं प्रचलित हैं। जापान और चीन की लिपि इसका प्रमुख उदाहरण है। शब्दाचित्रों पर आधारित ये लिपियों इसका श्रेष्ठ नमूना भी है।
चित्रलिपि का आशय यह है कि अपने विचारों को चित्र बना कर अभिव्यक्त किया जाए। मगर यह लिपि अपना कार्य सरल ढंग में नहीं कर पायी। क्यों कि एक तो यह लिपि सीखना कठिन था। दूसरा, इसे लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। तीसरा, लिखने वाला जो बात कहना चाहता था, वह चित्रलिपि द्वारा वैसी की वैसी व्यक्त नहीं हो पाती थी। चौथा, प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आकर्षण का केंद्र नहीं थी। और यह दुरुह थी।
तब कुछ समय बाद प्रत्येक ध्वनियों के लिए एक एक शब्द संकेत बनाए गए। जिन्हें हम वर्णमाला में पढ़ते हैं। मसलन- क, ख, ग आदि। इन्हीं अक्षरों और मात्राओं के मेल से संकेत-चिन्ह बनने लगे। जो आज तक परिष्कृत हो रहे हैं।
हरेक वस्तु के लिए एक संकेत चिन्ह बनाए गए। विशेष संकेत चिन्ह विशेष चीजों के नाम बताते हैं। इस तरह प्रत्येक वस्तु के लिए एक शब्द संकेत तय किया गया। तब लिपि का आविष्कार हुआ।
इस तरह सब से पहले जो लिपि बनी, उसे ब्राह्मी लिपि के नाम से जाना जाता है। बाद में अन्य लिपियां इसी लिपि से विकसित होती गई।
ऐसे ही धीरे धीरे विकसित होते हुए आधुनिक लिपि बनी। जिसमें अनेक विशेषताएं हैं। प्रमुख विशेषता यह है कि इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। अर्थात् यह हमारे विचारों को वैसा ही व्यक्त करती है।
इनमें से बहुत सी लिपियों से हम परिचित हैं । ब्रिटेन में अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। इस भाषा को रोमन लिपि में लिखते हैं। पंजाबी भाषा, गुरुमुखी लिपि में लिखी जाती है। इसी तरह तमिल, तेलगु, कन्नड़ तथा मलयालम आदि ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती हैं।
अब यह भी जान लें कि विश्व की सबसे प्राचीन लिपियां निम्न हैं- ब्राह्मी, शारदा आदि।
(पूर्वसूत्र – त्यादिवशी आजोबांचा निरोप घेऊन मी बाहेर पडलो ते अनपेक्षितपणे बरंच कांही मिळाल्याचं समाधान घेऊन. अर्थात या सगळ्यामागचा कर्ता-करवता ‘तो’च होता! )
या घटनेनंतर माझ्या भावी आयुष्याला एक वेगळीच आनंददायी कलाटणी देणाऱ्या अशा कांही अनपेक्षित घटना लागोपाठ घडत गेल्या की आज इतक्या वर्षांनंतरही ते सगळं आठवताना मला जितकं सुखकारक वाटतं तितकंच अनाकलनीयही!
माझ्या आयुष्याला प्रत्येकवेळी असं अनोखं वळण देणाऱ्या त्या अनेक घटनांपैकी लगेचच घडलेल्या एका घटनेला निमित्त ठरला तो मला आलेला एक अनपेक्षित फोन!
मी अकोल्याहून रिलीव्ह झाल्यानंतर इथे पुण्यातील आमच्या झोनल-ऑफिसला चीफ मॅनेजर म्हणून जॉईन झालो ती जुलै २००० मधली गोष्ट. त्यानंतर लगेचच झालेली एम्. डी. व्हिजीट आणि त्यावेळी निर्माण झालेला तो ‘लॉंग पेंडिंग कंप्लेंट’ चा इश्यू हे जे सगळं रामायण घडलं ते मी जॉईन झाल्यानंतरच्या पहिल्याच महिन्यात. या संदर्भात निर्माण झालेल्या प्रश्नाच्या रूपातलं अचानक उद्भवलेलं ते चक्रीवादळ शांत होईपर्यंत अर्धा अधिक ऑगस्ट महिना उलटून गेला होता. त्या दरम्यान साठत गेलेली अनेक महत्त्वाची कामं मी हातावेगळी करत असतानाच एक दिवस अचानक तो फोन आला!
त्याकाळात मोबाईल्स नव्हते. ऑफिसचा लँडलाईन नंबर मी इमर्जन्सीसाठी आवश्यकच होता म्हणून फक्त आमच्या सांगलीतल्या घरी देऊन ठेवलेला होता. शिवाय रोज किंवा एक दिवसाआड घरी माझा संपर्क व्हायचा तो रात्री टेलिफोन बूथवरूनच. त्यामुळे हा माझ्या घरून आलेला फोन असायची शक्यता नव्हतीच. टेलिफोन ऑपरेटरने फोन कॉल कनेक्ट करून देताना ‘नाईक म्हणून एकजण बोलतायत’ असं सांगितलं होतं. त्यातून नेमका उलगडा झालाच नव्हता. फोन अॅटेंड केल्यावर समजलं, फोन भ. रा. नाईक सरांचा होता! मला आश्चर्यच वाटलं. सरांनी मला फोन कां केला असेल? आणि माझं हे पोस्टिंग, इथला नंबर हे सगळं त्यांना समजलं कसं?
सरांचा असा अचानक फोन येणं मला अनपेक्षित होतं. आज या फोनच्या निमित्ताने आम्ही खूप वर्षानंतर पुन्हा संपर्कात आलो होतो. बोलण्यासारखं खूप कांही होतं पण त्या बिझी श्येड्युलमधे मनमोकळ्या गप्पा होणं शक्यच नव्हतं. त्या क्षणीचा माझ्या मनातला हा विचार अलगद टिपून घ्यावा तसं सर म्हणाले,
“तू कामाच्या गडबडीत असणार आहेस याची मला कल्पना आहे पण.. “
“नाही हो सर. अहो ही कामं कधीच संपणारी नाहीत. त्याचं कांही विशेष नाहीय. बोला ना सर तुम्ही. माझं इथलं पोस्टिंग, फोन नंबर सगळं मिळवलंत कुठून? ” मी उत्सुकतेनं विचारलं.
“ते तू भेटशील तेव्हा सांगतो सगळं. मी काल संध्याकाळी राजू/नितिन कडे आलोय. उद्या प्रतिभाकडं मुंबईला गेलो कीं मग लगेच पुण्याला येणं होणार नाहीय. तू सध्या पुण्यातच आहेस असं समजलं तेव्हाच तुला फोन करायचं ठरवलं होतं. आज आॅफीस सुटल्यानंतर तू येऊ शकतील कां राजूकडे? म्हणजे भेट होईल. बघ जमलं तर. “
सरांच्या बोलण्यातून त्यांची भेटण्या-बोलण्याची ओढ प्रकर्षाने जाणवत होती. त्यांची धाकटी मुलगी राजलक्ष्मी आणि जावई नितिन देशपांडे पुण्यातच रहात असत. सर त्यांच्याकडे आले होते. ते दोघेही साहित्यिक. यादृष्टीने आम्ही तिघेही समानधर्मी. माझ्या ऑडिट टेन्युअरमधे माझा पुण्यात जेव्हा सलग मुक्काम असायचा तेव्हा झालेल्या आमच्या मोजक्या भेटी आणि गप्पांनंतर खूप दिवसांनी सरांच्यामुळे आज त्या दोघांनाही पुन्हा भेटण्याचा योग येणार होता.
“सर, मी येईन नक्की. ” मी मनापासून म्हणालो.
अहमदनगर आणि नंतर अकोला या लागोपाठच्या बदल्या आणि तिथले त्या त्या वेळचे व्याप यामुळे त्या मधल्या काळात मला फारसा कुणाशीच संपर्क ठेवता आला नव्हता आणि अर्थातच याला नाईकसरही अपवाद नव्हते. असं असताना मुद्दाम माझा नंबर मिळवून त्यांनी मला फोन करावा याचं मला आश्चर्य वाटलं आणि आनंदही! या आधीच्या अगदी सुरूवातीच्या भागांमधे मी सविस्तर वर्णन केलेल्या प्रसंगांपैकी नाईकसरांच्या भेटींच्या संदर्भातले कांही मोजकेच प्रसंग आहेत. तरीही आम्हा दोघांच्या मनातला परस्परांबद्दलचा सद्भाव आणि आमचे ऋणानुबंध यांची कल्पना येण्यासाठी ते पुरेसे आहेत. त्या मोजक्या प्रसंगात वर्णन केल्याप्रमाणे त्या त्या प्रत्येकवेळी सर जेव्हा जेव्हा मला भेटले ते अगदी योगायोगाने भेटावेत तसेच पण त्या सगळ्याच भेटी मला खूप कांही देण्यासाठी ‘त्या’नेच घडवून आणलेल्या असाव्यात तशा अतर्क्यच होत्या माझ्यासाठी! या संदर्भातली खूप वर्षापूर्वीची मी माधवनगर शाखेचा मॅनेजर म्हणून चार्ज घेतलेल्या पहिल्या दिवशीच अचानक झालेली सरांची भेट या अर्थाने प्रातिनिधिक ठरावी अशीच होती! आज अशा सगळ्या घटना प्रसंगांचं मनोमन विश्लेषण करत असताना तर सरांशी झालेल्या सगळ्याच भेटींमधलं हे वेगळेपण मला अधिकच लख्ख जाणवतंय. आणि अर्थातच आज सरांचा फोन आल्यानंतर झालेली आमची भेटही अशीच एक अतिशय मोलाची आठवण म्हणून माझ्या मनात मी कायमची जपून ठेवलीय!
मी ऑफिस सुटल्यावर परस्परच सरांना भेटायला देशपांडे कुटुंबीयांच्या घरी गेलो. त्या सर्वांना भेटणं, मनसोक्त गप्पा सगळंच अपेक्षेप्रमाणे भरपूर आनंददायी होतं. सरांनी नेहमीप्रमाणे माझ्या लेखनप्रवासाबद्दल आपुलकीने चौकशी केली. सरांचं विशेषत: आध्यात्मिक विषयांवरील लेखन ही त्यांची खासियत होती. शिवाय त्यांच्या मनात माझ्या कथा लेखनाबद्दलही विशेष औत्सुक्य आणि कौतुक होतं. त्यांच्या मनात असणारा माझे बाबा आणि आम्ही कुटुंबीय यांच्याबद्दलचा लोभच या कौतुकाला निमित्त ठरत असावा. कारण बँकेतल्या वाढत्या जबाबदाऱ्या आणि कामांचे व्याप यालाच माझं प्राधान्य होतं जे मी आवडीने आणि मनापासून करत होतो. त्यामुळेच आवड असूनही फारसं लेखन होत नसल्याची खंतही मला कधी जाणवतही नव्हती. मनातलं कुणाशी तरी मोकळेपणानं बोलून टाकावं असं कधीकधी उत्कटतेनं वाटतं तेव्हाच आपण जवळच्या व्यक्तींसमोर मनापासून ते व्यक्त करतो, तसंच माझं लेखनाच्या बाबतीत होत असे. कितीतरी कथाविषय सुचायचे, मनात ठाण मांडून रहायचे, कधी कधी खूप त्रासही द्यायचे तेव्हाच मुद्दाम वेळ काढून त्याला कथारूप दिलं जायचं. या अर्थाने माझं लेखन स्वान्त सुखायच असायचं. सरांनी प्रत्येकवेळी केलेल्या कौतुकाइतकंच त्यांनी माझ्या कथा आवर्जून वाचून त्यांचं केलेलं सखोल विश्लेषण मला प्रोत्साहित करणारं ठरत असे.
त्यादिवशी सहज गप्पांच्या ओघात सरांनी ‘राजलक्ष्मी आणि नितिनने त्यांची स्वतःची ‘चिरानी प्रकाशन’ संस्था सुरू केल्याचं’ ही आवर्जून सांगितलं. ती तासाभराची भेट आवरती घेत गप्पा संपवून मी सरांना नमस्कार करून सर्वांचा निरोप घेऊन बाहेर पडलो.
तिथून बाहेर पडल्या क्षणापासून घरी पोहोचेपर्यंत सरांच्या संदर्भातल्याच विचार आणि आठवणींनी मनात गर्दी केली होती. पण दुसऱ्या दिवशी नेहमीचं धावतं रुटीन नेहमीच्याच वेगाने पुन्हा सुरू झालं आणि सरांच्या आठवणींचा कप्पा मग आपोआपच बंद झाला.
सरांची अचानक झालेली ही भेट वरवर पहाता योगायोगाने घडलेल्या एखाद्या घटनेसारखी वाटली तरी प्रत्यक्षात ती तशी नव्हती. ती भेट लवकरच मला अमूल्य असं कांही देण्यासाठी एक निमित्त ठरणार होती हे मला तेव्हा माहित नव्हतं एवढंच!
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय दोहे “धन जीवन की दौड़…” ।)
☆ तन्मय साहित्य # ३०८☆
☆ कविता – ☆ धन जीवन की दौड़… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बदलाव” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १२९ ☆ बदलाव ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बचपन की मिठास…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वीरान दिल में फूल खिलाया…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३४ ☆
वीरान दिल में फूल खिलाया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆