हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४८ ☆ कविता – फ़र्क पड़ता है… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “फ़र्क पड़ता है“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४८ ☆

✍ कविता – फ़र्क पड़ता है… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मुझे क्या फ़र्क पड़ता है

जब सीमा पर

कोई जवान गोली खाता है

और

शहीद हो जाता है।

 

मुझे क्या फ़र्क पड़ता है

जब सीमा पर तैनात फ़ौजी

अपने साथी की शहादत पर

आँसू नहीं बहा पाता

वरन् और दृढ़ हो जाता है।

 

मुझे क्या फ़र्क पड़ता है

जब अपने सीने में दर्द छुपाए

बड़े लंबे बॉक्स में

अपने साथी शहीद का मृत शरीर

राष्ट्रीय झंडे में लपेट

बिना आँसू बहाये

उसके परिवार के सामने

रख देते हैं।

 

लेकिन मुझे तब फ़र्क पड़ता है

जब शहीद के माँ बाप

आँसू छुपाए रोते हैं

और कहते जाते हैं

कि, काश हमारा दूसरा बेटा होता

तो उसे भी सीमा पर भेज देते।

 

और, मुझे फ़र्क पड़ता है तब भी

जब शहीद का आठ वर्षीय बालक

पिता के दाह संस्कार के बाद

रोता नहीं, वरन्

बिना आँसू गिराये बोलता है

मैं भी अपने पिता के समान

बहादुर बनूंगा।

तब बहुत फ़र्क पड़ता है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९७ – श्रद्धा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्रद्धा।)

☆ लघुकथा # ९७ – श्रद्धा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

पल्लवी क्यों ना हम लोग किटी पार्टी में हर महीने 50-50 रुपए सभी लोग इकट्ठा करें हमारे उसमें 12 मेंबर हैं और हर साल दिसंबर में उन पैसों से हम कम्बल खरीदें और किसी आश्रम या मंदिर में गरीबों को दान कर दें?

रोमा दीदी आप ठीक कह रहे हो पर क्या इसके लिए हमारे सारे सदस्य मानेंगे?

क्यों नहीं मानेंगे पल्लवी नेक काम करने में बुराई क्या है?

ठीक है दीदी आप जल्दी आ गई है, मैं थोड़ा सा नाश्ता तैयार कर लेती हूं तब तक सब महिलाएं आती है आप बात करके देख लो?

हिबा ने सभी महिलाओं से कहा कि हम सभी को जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए?

ठीक है तो तुम करो ना मदद, हमसे क्यों मांग रही हो हर माह में हम 50-50 रुपए तुम्हारे पास क्यों जमा करें सभी महिलाओं ने एक सुर में कहा।

रीमा ने कहा – तुम लोग हमेशा मकर संक्रांति में तो एक दूसरे को उपहार देती हो सावन में हम भी एक दूसरे को उपहार देते हैं, तो क्यों ना ऐसा कुछ नेक काम भी करें।

बहन रीमा तुम्हें बहुत शौक है तो नेक काम तुम करो जीवन में हमारी बहुत उलझने हैं और हम सब अपने अनुसार दान करते हैं।

तुम्हें हमारा नेता बनकर राय देने की कोई जरूरत नहीं है?

आखिर हम सब लोग इधर-उधर घूमते फिरते हैं होटल में किटी पार्टी करते हैं कुछ लोग घर में भी कर लेते हैं इसलिए क्यों ना कुछ गरीबों को दान दें ।

तभी पल्लवी ने नाश्ता रखते हुए कहा कि रीमा दीदी आप अपने मन से दान करो ना हम सबको क्यों अपनी बात थोप रही हो।

नहीं नहीं पल्लवी हमारी छोटी सी बचत से किसी की जरूरतमंद का की मदद हो जाएगी।

दीदी आप आज की पार्टी का मजा क्यों खराब कर रही हो?

  दीदी तुम बहुत अमीर है। जीजा जी शहर के मशहूर बिजनेसमैन है। घर में नौकर चाकर है होटल में पार्टी देती हो तुम्हारे लिए पैसों का कोई मोल नहीं है पर हम लोगों की स्थिति के बारे में तो सोचो।

सभी दान पूर्ण अपनी हैसियत के हिसाब से करते हैं।

भगवान ने सबको सोचने समझने की शक्ति का दिमाग दिया है सबको अपनी श्रद्धा से कार्य करने दो ना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २९७ ☆ जिद्द… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २९७ ?

☆ जिद्द… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

** 

 

ही जिद्दच तर होती,

जीवनाची प्रत्येक लढाई

जिंकण्याची!

हवे ते मिळविण्याची !

किती मिळाले, किती निसटले

आठवत नाही ….

पण आठवते,

अथांगतेचा तळ गाठल्याचे,

आकाशात मुक्त विहरल्याचेही ! 

 

कोण काय बोलले,

कोण काय म्हणाले, आठवत नाही….

पण किती तरी क्षण 

कुणी कुणी—

डोक्यावर ताज ठेवल्याचे,

आठवतात, आठवत रहातात!

 

ती जिद्दच तर होती—

उंबरठ्याच्या बाहेर पडण्याची,

नको ते नाकारण्याची, 

 

हातातली कांकणे,पायातली पैंजणे, 

किणकिणत राहिली, छुमछुमत राहिली…

पण ही जिद्दच होती

‘माणूसपण’ जपण्याची, 

‘स्व’त्व टिकवण्याची…

सारे पसारे मांडून, 

सम्राज्ञी सारखं जगण्याची!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ४ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ४ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

रविंद्रनाथ टागोरांनी बंगाली भाषेतील त्यांचा काव्यसंग्रह ‘गीतांजली’ १९१० साली प्रकाशित केला. या संग्रहात १५० हून अधिक कविता आहेत. या संग्रहातील ५३ व त्यांच्या ‘नैवेद्य’, ‘खेया’ अशा पूर्वप्रकाशित पुस्तकातून तसेच नियतकालिकातून प्रसिद्ध झालेल्या पन्नास अशा एकूण निवडक १०३ कवितांचे स्वत: रविंद्रनाथांनी इंग्रजीत भाषांतर करून ‘गीतांजली’ ‘song offerings’ हे पुस्तक सन १९१२ मध्ये प्रकाशित केले. या पुस्तकाला प्रसिद्ध इंग्रजी कवी W B Yeats यांची प्रस्तावना लाभली आहे. याच इंग्रजी काव्यसंग्रहाला सन १९१३ मधे नोबेल पुरस्कार जाहीर झाला.

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गीत : १०

Here is thy footstool and there rest thy feet where live the poorest, and lowliest, and lost.

When I try to bow to thee, my obeisance cannot reach down to the depth where thy feet rest among the poorest, and lowliest, and lost.

Pride can never approach to where thou walkest in the clothes of the humble among the poorest, and lowliest, and lost.

My heart can never find it’s way to where thou keepest company with the companionless among the poorest, the lowliest, and the lost.

————–

भावानुवाद : गीत १०

*

तू असशी तव भक्तांजवळी 

जे असती तव पायांजवळी।

*

हाकेस त्यांच्या देशी उत्तर 

मज भासे तव दर्शन दुस्तर।

वाकुनि करतो तुजला नमना

पाहू न शकतो तुझिया चरणा।

चरणांपाशी असती जमले

दीन, दुबळे, भरकटलेले॥

*

शाल पांघरून विनम्रतेची

सेवा करिसी त्या सर्वांची।

अहंकारी मी करित वल्गना

अधीर तरीही तुला भेटण्या।

तुझिया पाशी कसा येऊ रे

अडला नडला, शरण मी नच रे।

चरणांपाशी असती जमले 

दीन, दुबळे, भरकटलेले॥

*

तुला भेटण्या आतुर अंतर

मार्ग शोधितो इथे निरंतर।

कसा मी येऊ जिथे तू असशी

शरणागतांसि मार्ग दाविसी।

उन्मत्ताला मार्ग न मिळतो

तुझियापाशी येऊ न शकतो।

चरणांपाशी असती जमले 

दीन, दुबळे, भरकटलेले॥

*

षड्रिपूंचा त्याग करुनि

जावे शरण तयालागुनि।

अशाच भक्ता आश्रय देतो

त्यांच्यासाठी जन्मा येतो।

चरणांपाशी असेच जमती

दीन, दुबळे जे अहं त्यागती॥

*

भावानुवाद: © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

———

गीत : ११

Leave this chanting and singing and telling of beads! Whom dost thou worship in this lonely dark corner of a temple with doors all shut? Open thine eyes and see thy God is not before thee!

He is there where the tiller is tilling the hard ground and where the path-maker is breaking stones. He is with them in sun and in shower, and his garment is covered with dust. Put off thy holy mantle and even like him come down on the dusty soil!

Deliverance? Where is this deliverance to be found? Our master himself has joyfully taken upon him the bonds of creation; he is bound with us all for ever.

Come out of thy meditations and leave aside thy flowers and incense!

What harm is there if thy clothes become tattered and stained? Meet him and stand by him in toil and in sweat of thy brow.

——————

भावानुवाद: गीत ११

*

अंधाऱ्या गाभार्‍यात

देवळाच्या कोपर्‍यात

मंत्रपठण करीत

भक्तीगीते गात

जपमाळ ओढत

त्याची वाट बघत

उपासना करतोस का?

वेडा आहेस का?

उघड डोळे, बघ नीट

नाही विठ्ठल, नाही वीट

*

तो तर आहे तिथं

शेतकरी शेतात जिथं

मशागत करतोय,

रस्त्यात मजूर जिथं

दगड फोडतोय

देव आहे फक्त तिथं

भिजणाऱ्या पावसात

भाजणाऱ्या उन्हात

धुळीत, मातीत,

दगड धोंड्यात

*

शांतव नंदादीप

ये मातीच्या समीप

करिसी भक्ती

मागसी मुक्ती

बंधक जगती

देवही असती

निर्मिती, क्षती

करण्यासाठी

बंधन भक्तांप्रती

मोदे स्विकारती

*

नको प्रार्थना,

नको याचना,

नको फुले, नको धूप

नको पत्री, नको दीप

ये धुळीत तू ही,

मळोत वस्त्रे तुझी ही

त्याची सोबत कर

गरजूंना मदत कर

सुखदुःखाचा प्रहर

त्यांच्याच बरोबर

*

भावानुवाद: © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

———

गीत : १२

*

The time that my journey takes is long and the way of it is long.

I came out of the chariot of the first gleam of light, and pursued my voyage through the wildernesses of worlds leaving my track on many a star and planet.

It is the most distant course that comes nearest to thyself, and that training is the most intricate which leads to the utter simplicity of a tune.

The traveller has to knock at every alien door to come to his own, and one has to wander through all the outer worlds to reach the innermost shrine at the end.

My eyes strayed far and wide before I shut them and said “Here art thou! “

The question and the cry “Oh, where? ” melt into tears of a thousand streams and deluge the world with the flood of assurance “I am! “

————

भावानुवाद : गीत १२

*

हा मार्ग जो नेतो मला

तुझियापाशी, नंदनंदना

प्रवास तो अती दूरचा

संपता रस्ता संपेची ना॥

*

मी उषेच्या प्रथम किरणी

मार्गस्थ झालो, मधुसूदना 

निर्मनुष्य, ओसाड प्रदेशी

लांघून जात तीनही भुवना॥

*

खडतर या अशा प्रवासी

तुजसाठी निघालो, जनार्दना

मार्गी जाता, ग्रहताऱ्यांवर

उमटत जाती पाऊलखुणा॥

*

वाट अनोखी अज्ञाताची

तुजकडे नेईल, मनमोहना

तुझीच शिकवण ध्यानी ठेवून

करीत जाईन मार्गक्रमणा॥

*

सूरतालाच्या गुंतागुंती

तूच शिकविसी, कमलनयना

शेवटी नंतर हाती येई

सुबोध, सरल ती स्वररचना॥

*

निजधामाचे द्वार शोधण्या

अनोळखी द्वारी, अजन्मा

तूच फिरविशी भुवनोभुवनी

मनमंदिरी तव अंती येण्या॥

*

भरकटलो मी अनेक वेळा

जाणवसी परी, कंसमर्दना

अंती माझ्या मिटल्या नयना

दिससी तू रे अंतश्चक्षुंना॥

*

कोठे अससी या प्रश्नाला

उत्तर देई अश्रूंचा पूर

हमी मिळतसे अस्तित्वाची

प्रतिध्वनित हो तुझेच उत्तर॥

*

– क्रमशः भाग चौथा 

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “हृद्य”- लेखिका : सुश्री रेखा इनामदार साने – परिचय : श्री ओंकार बागूल ☆ प्रस्तुती – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “हृद्य”- लेखिका : सुश्री रेखा इनामदार साने – परिचय : श्री ओंकार बागूल ☆ प्रस्तुती – श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

 – – संवेदनशील मनांचा आरसा.

 – – व्यक्तिचित्रांचा एक अनोखा प्रवास!

पुस्तक : हृद्य

लेखिका: रेखा इनामदार – साने

प्रकाशक : रोहन प्रकाशन 

पृष्ठ – १६८ 

मूल्य: २९५₹ 

हृद्य.. हृदयाला चांगले वाटणारे, आवडणारे. जे मनाला, हृदयाला सुखद, प्रिय किंवा आनंद देणारे असे आहे. काहीतरी आकर्षक, मोहक किंवा सुंदर. आयुष्यात अनेक क्षण, घटना, आठवणी अशा असतात ज्या आपल्या मनाला आणि हृदयाला सुखद अनुभव देतात. अशा काही गोष्टी ज्या कायमस्वरूपी मनात घर करून राहतात. एखादं उदाहरण द्यायचं झाल्यास, माझ्या आजीच्या हाताचे जेवण नेहमीच हृद्य असायचे. केवळ जेवणाची चव नव्हे, तर त्यात असलेली तिची माया, प्रेम आणि आपुलकी ही प्रत्येक घास अधिक चविष्ट बनवायची.

खरेतर, ‘हृद्य’ म्हणजे केवळ सौंदर्य नव्हे, तर ते आत्मिक समाधान आणि निखळ आनंद देणारे अनुभव होय. एक उबदार, प्रिय आणि मनाला भिडणारी अनुभूती असते, जी आपल्या आठवणींच्या कप्प्यात कायम जपून ठेवावीशी वाटते. आपल्याला जीवनात भेटलेल्या काही माणसांच्या आठवणीदेखील अशाच असतात. त्यांच्यासोबत घालवलेले क्षण जणू काही शुभ्र मोत्यांसारखे असतात. याच अनुषंगातून, लेखिका रेखा इनामदार – साने यांनी ‘हृद्य’ हे ललित गद्य प्रकारातील पुस्तक लिहिले आहे. रेखा इनामदार-साने या एक मराठी लेखिका, प्राध्यापिका आणि समीक्षक आहेत.

हे पुस्तक विविध व्यक्तिचित्रणात्मक लेखांचा संग्रह आहे. लेखिकेने साहित्य, कला, संगीत आणि संस्कृतीच्या क्षेत्रातील काही सर्जनशील व्यक्तींच्या व्यक्तिमत्त्वाच्या विविध पैलूंवर प्रकाश टाकला आहे. या संग्रहात एकूण १२ व्यक्तिचित्रणे आहेत ज्यांत स. शि. भावे, प्रभाकर आणि कमल पाध्ये, मालती बेडेकर, जगदीश गोडबोले, वसुंधरा कोमकली, मोहन आगाशे, अरुण फडके, सरोज देशपांडे, राम कोलारकर, जब्बार पटेल, राम बापट आणि कुमार गंधर्व यांचा समावेश आहे. मुळात ही सारी व्यक्तिचित्रणे केवळ बाह्य ओळख किंवा यशोगाथा म्हणून या लेखांतून समोर येत नाहीत.

लेखिकेने या कलावंतांच्या माणुसकीच्या पैलूंचा शोध घेतला आहे. त्या या व्यक्तींकडे एका कलासक्त रसिकाच्या आणि चिकित्सक समीक्षकाच्या दृष्टीने पाहतात. हे केवळ व्यक्तींचे चरित्र नसून, तो लेखिकेचा आत्मशोधाचादेखील प्रवास आहे. ज्या वाचकांना या महान व्यक्तींविषयी माहिती आहे, त्यांच्या मनातली ही शिल्पे ‘हृद्य’ वाचल्यानंतर अधिक ठसठशीत होतात. ज्यांना माहिती नाही, त्यांच्यासाठी हे पुस्तक एका पूर्ण सांस्कृतिक कॅनव्हासचे विलोभनीय दर्शन घडवते. साहित्यिकांच्या, कलावंतांच्या जीवनातील ताण, त्यांच्या वैयक्तिक मर्यादा, आणि त्यांच्या निर्मितीमागील वेदना याचा सखोल विचार करून हे लेख लिहिले आहेत.

लेखिका रेखा इनामदार-साने यांची खरी ताकद त्यांच्या चिकित्सक रसिकतेत आहे. त्या केवळ व्यक्तीचे प्रशंसा करत नाहीत, तर त्यांच्या कामातील बारकावे, विचारधारेतील द्वंद्वे आणि त्यांच्या कृतीमागील हेतू यांचा अधिक सूक्ष्मतेने शोध घेतात. वाचक जेव्हा हे लेख वाचतो, तेव्हा त्याला जाणवते की लेखिका स्वतः त्या व्यक्तींच्या आयुष्यात डोकावताना, स्वतःच्या जीवनाचा आणि विचारांचाही शोध घेत आहेत. या लेखांतून निर्मिती आणि वैयक्तिक आयुष्य यातील संघर्ष दिसून येतो. या संग्रहातील लेख कलावंत आणि माणूस या दोन भूमिकांमधील द्वंद्व स्पष्ट करतात.

लेखिकेने या व्यक्तिचित्रांच्या माध्यमातून मांडलेले साहित्यिक आणि कलावंतांचे संदर्भ खरे विशेष आहेत. या साऱ्या साधारण सत्तरीच्या दशकानंतरच्या व्यक्ती आहेत. त्यांच्या कार्याचे त्या काळातील महत्त्व आणि त्यांची दीर्घकाळ टिकणारी प्रासंगिकता या लेखांतून स्पष्ट होते. संबंधांचे स्वरूप, निष्ठेचे प्रश्न आणि आयुष्यातील निवडीचे परिणाम यासारख्या मूलभूत प्रश्नांवर यांतून चिंतन केले आहे. केवळ माहिती न देता, व्यक्तीचे सर्वांगीण चित्रे याद्वारे रेखाटली आहेत. शिवाय व्यक्तिनुरूप या लेखांच्या विषयांमधील विविधता सुंदर पद्धतीने समोर येते.

याखेरीज, ‘हृद्य’ या संग्रहातून पुरुषांच्या लेखनात दुर्लक्षित झालेले भावनिक पैलू प्रभावीपणे व्यक्त झालेले दिसून येतात. ‘प्रतिमा’ आणि ‘वास्तव’ यांचा भेद अचूकपणे निदर्शनास येतो. लेखिकेच्या स्व-जाणिवा आणि विषयाच्या जाणिवा यांतील उत्तम समन्वय साधला गेला आहे. या व्यक्तींची व्यक्तिचित्रणे रेखाटताना, त्या त्या व्यक्तीच्या जीवनाचे तत्त्वज्ञान अप्रत्यक्षपणे समोर आणले आहे. या संग्रहातील लेखांची एक सुंदर बाब म्हणजे कलाकृती आणि ती निर्माण करणाऱ्या व्यक्तीचे जीवन एकमेकांत कसे गुंफलेले असते, यावर केलेले भाष्य.

व्यक्ती बदलल्या तरी सर्जनाची प्रक्रिया आणि त्यामागील प्रेरणा कालातीत कशी राहते, याचे विश्लेषण यांतून वाचायला मिळते. लेखिकेने सहानुभूती आणि तटस्थता यातील नाजूक समतोल उत्तमरीत्या साधला आहे. त्यांनी व्यक्तीची बाजू मांडताना, सत्य आणि वास्तव यांना धक्का लावला नाहीये. हे व्यक्तिचित्रांचे स्वतंत्र लेख असले तरी, एका विशिष्ट जीवनदृष्टीमुळे पुस्तकाला एकसंधता मिळाली आहे. मुळात लेखिकेने या व्यक्तींची चित्रे रेखाटताना त्यांच्यातील ‘अपूर्णत्व’ आणि ‘अप्राप्यता’ अगदी सहज स्वीकारलेले आहे.

हृद्य हा संग्रह वाचताना, जणू काही भूतकाळातील व्यक्तींचा ‘आज’शी संवाद साधल्याचा अनुभव येतो. निर्मिती, कलावंत आणि रसिक या तीन घटकांचा अंतरंग यातून उलगडला आहे. लेखिकेने महानता आणि सामान्यत्व यातील सीमारेषा आणखी स्पष्टतेने अधोरेखित केल्याचे जाणवते. हा संग्रह म्हणजे मनोविज्ञान आणि साहित्य यांचा संगम असल्यासारखे वाटते. अनेक लेखांची सुरुवात एखाद्या विशिष्ट घटनेतून, संवादातून किंवा आठवणीतून होते, ज्यामुळे लगेच वाचकाचे लक्ष वेधले जाते. त्यांनी या लेखांतून स्मृती आणि विस्मृती यावर केलेले भाष्य अधिक खोल आहे. शिवाय प्रत्येक लेखाचे शीर्षकदेखील तितकेच रुचकर आहे.

या संग्रहाच्या निमित्ताने लेखिका रेखा इनामदार साने यांनी मानवी नात्यांतील अधिकांश कोमल भावना टिपल्या आहेत. तर तितक्याच प्रभावी पद्धतीने समीक्षात्मक, तटस्थ राहून परखड मते व्यक्त केली आहेत. त्यांनी व्यक्तिरेखांचे मानसशास्त्र सूक्ष्मपणे उलगडले आहे. त्यामुळे हे लेख वाचकांशी थेट भावनिक नाते जोडतात. त्या साध्या घटनांमधून जीवनाचा गहन अर्थ व्यक्त करतात. त्यांनी अलंकारिक भाषेचा अतिशय अचूक वापर केला आहे. लेखिकेने त्यांच्या आत्मनिवेदनाचा अंश लेखांमध्ये मिसळल्याने त्यांत आणखी सुबकता आली आहे. प्रत्येक लेखातून लेखिकेचा विवेक, अभ्यास आणि संवेदनशीलता अनुभवता येते.

‘हृद्य’ हा केवळ व्यक्तिचित्रांचा संग्रह नसून, तो मराठी ललित गद्यातील एक अत्यंत महत्त्वाचा आणि सखोल अनुभव आहे. हा ललित संग्रह वाचकाला स्वतःच्या अंतरंगात डोकावून पाहण्यास प्रवृत्त करतो आणि प्रत्येक सर्जनशील मानवाच्या ‘हृद्यतेचा’ स्वीकार करण्यास शिकवतो. हे पुस्तक वाचकाला जीवन आणि कलेच्या रहस्यावर स्वतःचे चिंतन करण्यास प्रेरित करते. अखेरीस, ‘हृद्य’ आपल्या मनात कलेकडे पाहण्याची एक अनोखी संवेदनशील दृष्टी देऊन जाते, जी दीर्घकाळ आपल्या सोबत राहते.

परिचय : श्री ओंकार दिलीप बागल

प्रस्तुती : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३० – कविता – झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता  “झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३० – झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

ग्रीष्म ने जब भी जलाये गाँव मेरे

पीर की अनुभूति से

परिचय हुआ है।

धूप में मज़दूर जब नंगे बदन थे,

देखकर आतप्त तब मेरे नयन थे।

सर्वहारा एक मुझमें तप रहा था,

खुद मेरे अहसास को

विस्मय हुआ है!

पाँव में छाले, किसी के फूटते थे,

वो गिरें तो अंग मेरे टूटते थे।

रंग जब अट्टालिकाओं पर चढ़े हैं,

झोंपड़ी के कत्ल का

संशय हुआ है!

साँस जब फूली श्रमिक की, धमनियों की,

आँख भर आयी, विटप की फुनगियों की।

भ्रूण अँकुराये लता की कोख में जब,

हार में भी जीत का

निश्चय हुआ है!

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९३ ☆ “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” – लेखक … डॉ. कमल किशोर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. कमल किशोर जी द्वारा लिखित  “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९३ ☆

☆ “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” – लेखक … डॉ. कमल किशोर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें

लेखक – डॉ. कमल किशोर दुबे 

चर्चाकार – विवेक रंजन श्रीवास्तव

डॉ. कमल किशोर दुबे की अभिनव कृति– – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

यह किताब मूलतः ,जीवन की गरिमा का पुनः स्मरण कराती हुई ऐसी कृति है, जो व्यक्ति को भीतर से बदलकर उसके जीवन को उद्देश्यपूर्ण और साधनामय बनाने की प्रेरणा देती है। इसमें विद्यार्थी जीवन से वृद्धावस्था तक जीवन यात्रा के हर पड़ाव पर  लेखक ने व्यक्तित्व विकास हेतु आवश्यक आयामों को छोटे छोटे, ,  सारगर्भित आलेखों के माध्यम से उद्घाटित किया है।

जीवन की श्रेष्ठता , केवल सुविधाओं से नहीं, संस्कारों से होती है।

प्राक्कथन में ही लेखक स्पष्ट करते हैं कि मानव जीवन की श्रेष्ठता केवल भौतिक उपलब्धियों, वैभव और ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, मानवता, प्रेम, सेवा, सद्भाव और परोपकार जैसे उच्च शाश्वत मूल्यों के  से बनती है। सनातन दृष्टि से मनुष्य योनि को “देवताओं को भी दुर्लभ” बताकर यह रेखांकित किया गया है कि मानव जीवन कर्म योनि है, जहाँ मनुष्य अपने पुरुषार्थ से जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य की ओर मोड़ सकता है।लेखक बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि मनुष्य की सच्ची पूँजी उसका आंतरिक संस्कार, उसकी संवेदना और उसकी कर्मशीलता है, न कि केवल स्थिति, पद या बैंक में जमा पूंजी ।

 पुस्तक का केंद्रीय स्वर यह है कि जीवन तभी वास्तव में श्रेष्ठ है, जब वह किसी उच्च उद्देश्य के साथ जिया जाए और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यक्ति स्वयं को लगातार ढालता और परिष्कृत करता रहे।लेखक के अनुसार, अपने भीतर की कमियों, दुष्प्रवृत्तियों और दुर्बलताओं की पहचान करके उन्हें रूपांतरित करना ही आत्म विकास का वास्तविक प्रारंभ है।

पहला आलेख “सुयोग्य विद्यार्थी कैसे बनें?” इस कृति का स्वर और दिशा दोनों निर्धारित करता है।यहाँ शिक्षा को केवल डिग्री और रोज़गार का साधन न मानकर, चरित्र निर्माण और संस्कार संवर्धन की प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है।लेखक प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का उदाहरण देते हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे अवतार भी वशिष्ठ और सांदीपनि जैसे गुरुओं के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि यह स्पष्ट हो कि ज्ञान के साथ विनय, स्वावलंबन, प्रेम, करुणा और सामाजिक सद्भाव अनिवार्य अंग हैं। यद्यपि ये आदर्श स्थितियां सामाजिक ताने बाने में आज व्यवहारिक नहीं लगती । लेखक आधुनिक शिक्षा संस्थानों में प्रतियोगिता, वैभव प्रदर्शन और धन केंद्रित दृष्टिकोण की आलोचना करते हैं, जो विनय, दया, त्याग और करुणा जैसे गुणों को पीछे छोड़ देता है।

रामचरितमानस की यह पंक्ति “बरसहिं जलद भूमि नियराये। जथा नवहिं बुध विद्या पाये।”  उद्धृत करके वे बताते हैं कि जिस प्रकार बादल पृथ्वी के समीप आकर बरसते हैं, उसी प्रकार सच्चा विद्वान जितना अधिक ज्ञान पाता है, उतना ही विनम्र होता जाता है।इस तरह पुस्तक में विद्या और विनय के संबंध को विद्यार्थी जीवन के आदर्श स्वरूप का केंद्रीय सूत्र माना गया है।

“विचार संयम या सकारात्मक सोच!” शीर्षक आलेख पुस्तक के वैचारिक ढाँचे का मेरुदंड है। यहाँ महाभारत के वनपर्व से उद्धृत श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि वेदों का सार “सत्य” और सत्य का सार “दम” अर्थात् संयम है; और वही संयम “त्याग” के रूप में सज्जनों के आचरण में प्रकट होता है।लेखक विचार संयम को इन्द्रिय संयम की मानसिक अवस्था बताते हैं । इसे आधुनिक भाषा में “पॉज़िटिव थिंकिंग” का भारतीय रूपक कह सकते हैं।

वे विचार-संयम को दो भागों में बाँटते हैं— 

विचार निग्रह: बिखरे हुए विचारों को समेटकर एक दिशा में लगा देना, जिसे वे सकारात्मक सोच का व्यावहारिक रूप बताते हैं।

निकृष्ट चिंतन से मुक्त होना: कुविचारों को हटाकर सद्विचारों में नियोजन करना, ताकि मनोभूमि में श्रेष्ठ वैचारिक बीज बोए जा सकें।

लेखक अत्यंत सहज उदाहरण से कहते हैं कि जैसे किसान जोते हुए खेत में उत्तम बीज बोकर उत्कृष्ट फसल पाता है, वैसे ही मनुष्य यदि प्रत्येक दिन आत्मचिंतन के लिए समय निकालकर आलस्य, आवेश, कटुभाषण, निराशा और कायरता जैसी प्रवृत्तियों की समीक्षा करे और उनके प्रतिपक्षी सद्गुणों को स्थापित करने का पुरुषार्थ करे, तो उसका व्यक्तित्व स्वतः उज्ज्वल होने लगेगा।

 इस क्रम में स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन मनन को विचार संयम के व्यावहारिक साधन के रूप में रेखांकित किया गया है।

पुस्तक के कई आलेखों का केन्द्रीय विषय आत्मविश्वास और पुरुषार्थ है “आत्मविश्वास सफलता का प्रथम सोपान”, “सफलता का पर्याय , दृढ़-आत्मविश्वास”, “सफलता की सही कसौटी .. पुरुषार्थ” आदि।गीता के प्रसिद्ध श्लोक “उद्धरेदात्मनात्मानं…” को आधार बनाकर लेखक यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु । इसलिए उसे अपने उद्धार की जिम्मेदारी किसी बाहरी सहारे पर नहीं, अपने आत्मबल पर रखनी चाहिए।

इन आलेखों में दो महत्त्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं— 

आत्मविश्वास केवल बाहरी प्रशंसा से नहीं, आत्म मूल्यांकन और अपने ध्येय के प्रति दृढ़ निष्ठा से जन्म लेता है।

सफलता की सही कसौटी परिणाम नहीं, बल्कि ईमानदार पुरुषार्थ और सतत परिश्रम है।  विरासत या अनैतिक साधनों से प्राप्त वैभव को लेखक नैतिक दृष्टि से “असफलता” तक कहने में संकोच नहीं करते।

“सफलता के लिए जीवन में संतुलन बनाएँ” आलेख में ऋतु-परिवर्तन और झूले का उदाहरण देकर लेखक बताते हैं कि जीवन में सुख दुःख, लाभ हानि, अनुकूल प्रतिकूल स्थितियाँ स्वाभाविक उतार चढ़ाव हैं, जिनका संतुलित विवेक से स्वागत करना ही मानसिक स्वास्थ्य का आधार है। यहाँ वे “कमल के पत्ते” की उपमा देते हैं, जो जल में रहते हुए भी उससे ऊपर रहते हैं ।  ठीक वैसे ही जीवन के मध्य में रहते हुए व्यक्ति को भीतर से निर्लिप्त और साक्षीभाव अपनाकर हर्ष और विषाद दोनों को समभाव से ग्रहण करना सीखना चाहिए।

“आशा और उत्साह मनुष्य जीवन के मुख्य सम्बल” तथा “प्रसन्न रहना अथवा उद्विग्न होना, हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर” जैसे आलेख जीवन की भावनात्मक बुनियाद पर  हैं। लेखक आशा को भविष्य की बेहतर संभावना की ऊर्जा और उत्साह को उसे साकार करने का जीवंत संबल बताते हैं, जो व्यक्ति को विषमता, अवसाद और शोक से उबारकर संघर्ष की राह पर सक्षम बनाता है। इतिहास और युद्धभूमि के संदर्भों के माध्यम से यह विचार सामने आता है कि कई बार औषधियों से अधिक आशा ही रोगी के लिए जीवनदायी सिद्ध होती है और निराशा तिनके जैसी समस्या को भी पर्वत बना देती है।

दृष्टिकोण की चर्चा में “गरीबी अमीरी” को सापेक्ष  बताते हुए लेखक संकेत करते हैं कि तुलना का मानक बदलते ही हमारी संतुष्टि या असंतोष की भावना बदल जाती है। यदि हम सदैव अपने से अधिक संपन्न व्यक्ति से तुलना करेंगे, तो स्वयं को दरिद्र महसूस करेंगे; वहीं अपने से कम सुविधा युक्त लोगों को देखकर कृतज्ञता का भाव आएगा। इस प्रकार पुस्तक यह बताती है कि प्रसन्नता बाहरी स्थिति से अधिक, अंदरूनी दृष्टिकोण  है।

“अपने व्यक्तित्व और जीवन को उत्कृष्ट कैसे बनायें?” पुस्तक का एक केंद्रीय और दार्शनिक आलेख है, जिसमें लेखक आस्था, श्रद्धा, स्वभाव, गुण और कर्म के परस्पर संबंध को व्यवस्थित ढंग से स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्तित्व का ढाँचा “अंतरात्मा” में जमी आस्थाओं पर निर्भर है ,  वहीं से चिंतन को दिशा मिलती है, और धीरे-धीरे आदतें, स्वभाव और व्यवहार बनते जाते हैं। सुख दुःख, प्रसन्नता उद्विग्नता को वे परिस्थितियों की नहीं, मनःस्थिति की उपज मानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे ऋतुएँ बाहरी हैं, पर हमें कैसा महसूस होगा, यह हमारे शरीर और हमारी तैयारी पर निर्भर करता है।

यहाँ लेखक परिष्कार की संभावना पर भी स्पष्ट हैं,  यदि व्यक्ति में भीतर से बदलने की तीव्र आकांक्षा और संकल्प-शक्ति हो, तो वह अपने स्वभाव और कर्म पद्धति को पुनः गढ़ सकता है। “समुद्र की गहराई से मोती” निकालने की उपमा देकर वे बताते हैं कि जीवन रूपी समुद्र में उतरने के लिए बाहरी यंत्रों से अधिक धैर्य, साहस और सतत प्रयास की आवश्यकता है। प्रबल संकल्प, धैर्य और साहस के संघटन को वे सफल व्यक्तित्व निर्माण की त्रिधारा के रूप में स्थापित करते हैं।

कर्म-सिद्धांत पर लिखे गए “कर्म प्रधान विश्व करि राखा” और “कर्मदेव का सम्मान करें” जैसे आलेख पुस्तक को एक स्पष्ट नैतिक आधार प्रदान करते हैं। तुलसीदास की चौपाई “कर्म प्रधान विश्व करि राखा…” के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्महीन व्यक्ति को कुछ नहीं मिलता, और पाप पुण्य दोनों का प्रतिफल तात्कालिक रूप से मनःस्थिति और जीवनानुभव में झलकने लगता है। लेखक सरकारी न्याय व्यवस्था की धीमी फाइलों का व्यंग्यात्मक उदाहरण देकर यह संकेत करते हैं कि ईश्वर की व्यवस्थाएँ “उधारी” पर नहीं चलतीं।  ईर्ष्या, द्वेष, झूठ और अभिमान व्यक्ति को तत्काल “नारकीय” अनुभव में धकेल देते हैं, जबकि स्नेह, करुणा और दया उसे  “स्वर्ग ” जैसा आंतरिक सुख प्रदान करते हैं।

कुल मिलाकर, “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” एक ऐसी कृति के रूप में सामने आती है जो भारतीय अध्यात्म, वेद, गीता,रामचरितमानस और गायत्री विचारधारा से सार लेकर आधुनिक भाषा एवं शैली में व्यक्तित्व विकास की एक समन्वित जीवन पद्धति प्रस्तुत करती है।

यह केवल ‘क्या करें’ वाली नसीहतनुमा पुस्तक नहीं, बल्कि उदाहरणों, शास्त्रीय संदर्भों और चिंतनशील व्याख्याओं के माध्यम से पाठक को आत्म-संशोधन, सकारात्मक सोच, कर्मठता और प्रेमपूर्ण मनुष्यता की ओर प्रवाहित करने वाला तार्किक प्रवाही निबंध संग्रह है, जो सचमुच “मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता का दस्तावेज” कहे जाने योग्य है।

ये भिन्न बात है कि व्यवहार के स्तर पर इसे वर्तमान वैश्विक एक्सपोजर के साथ कितना और कैसे अपनाया जाए यह सवाल उठ खड़ा होता है, जिसके उत्तर पाठक को स्वयं ही ढूंढने होंगे ।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०३ – जीवन में आलस्य का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में आलस्य का। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०३ – जीवन में आलस्य का ☆

जीवन में आलस्य का, बढ़ता जाता रोग।

व्यर्थ समय है बीतता, घटे लाभ का योग।।

कार्य पूर्ण होते नहीं, बढ़ता जाता भार।

जनता पिसती है सदा,पड़ती भारी मार।।

गलत राह पर ये चलें, करें देश बदनाम।

जब चाहे हड़ताल से, करते चक्का जाम।।

 *

घर में ही बैठे रहें, करें जतन दिन रात।

अधिकारों की आड़ ले, देते रहते मात।।

नेतागीरी में लगे, खूब मचाते शोर।

कामकाज करते नहीं, निज स्वारथ पर जोर।।

सरकारी हर तंत्र में, ऐसों की भरमार।

 कभी मुक्ति इनसे मिले,तब होगा उपकार।।

 *

यही हाल हर घर सखे, मचता बड़ा बवाल।

मूर्तवान आलस्य ही, घर में करें धमाल।।

बैठ घरों में कर रहे, फेमस अपना नाम।

मोबाइल में खो रहे, रोज सुबह औ शाम।।

लाइक औ शेयर करें, मेसेज सुबह शाम।

व्हाटसएप व फेस बुक, चेटिंग में बदनाम।।

 *

खाने में आगे रहें, मुख से छीनें भोग।

काम चोर मस्ती करें, मेहनत करते लोग।।

कर्तव्यों से विमुख हैं, धरे हाथ पर हाथ।

समय बीतने पर यही, सदा पीटते माथ।।

 *

जीवन दर्शन अब यही, छाया है चहुँ ओर।

अगर ग्राफ बढ़ता गया, कैसी होगी भोर।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५९ – देश-परदेश – पशु बनाम परिवार प्रेम ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५९ ☆ देश-परदेश – पशु बनाम परिवार प्रेम  ☆ श्री राकेश कुमार ☆

पशु प्रेम और पालतू पशु प्रेम के मायने अलग है। समाज में कुछ लोग पशु प्रेमी होते हैं। दुसरी तरफ कुछ लोग पालतू पशु प्रेमी श्रेणी में आते हैं।

वर्तमान में जब मानव अपने परिवार, समाज और यहां तक की अपनी मातृ भूमि से भी अधिक प्यार अपने पालतू पशु को करने लग गया हैं।

पूर्व में लोग पालतू पशु शौकिया तौर से पाला करते थे। आज लोग पालतू पशु सोशल मीडिया के लिए भी पाल रहें हैं। परिवार और अपनों से दूरी बढ़ा कर पालतुओं से नजदीकियां बन रहीं हैं।

पालतू पालक बनना कोई गलत बात नहीं हैं, लेकिन परिवार और समाज की उपेक्षा करना भी किसी भी एंगल से अच्छा नहीं कहा जा सकता हैं। इससे बेहतर तो पशु प्रेमी लोग हैं।

मानव योनि में जन्म लेकर अपने ही समाज के उत्थान में योगदान ना कर, सिर्फ पालतू पशुओं का कल्याण करना, कभी भी उचित नहीं माना जाएगा।

आजकल लोग मां और बाप को बुढ़ापे में लावारिस छोड़ अपने पालतू पशुओं को अपना रहें हैं। कुछ युवा दंपती तो हद पार कर, अपना परिवार भी नहीं बना रहें हैं, जीवन का सब कुछ पालतू को समर्पित कर रहे हैं। इसी क्रम में कुछ युवा विवाह जैसी पवित्र संस्था के बंधन से मुक्त रह कर सृष्टि को ही समाप्त करने की मुहिम में योगदान कर रहें हैं।

समाज को भी सोचना होगा कि युवा पीढ़ी ऐसे कदम उठाने के लिए क्यों अग्रसर हो रही हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३११ ☆ फुलांना वेचल्यानंतर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३११ ?

☆ फुलांना वेचल्यानंतर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

सुखाने मी निघालो बघ यमाने गाठल्यानंतर

जराही दाह होईना कलेवर पेटल्यानंतर

*

असे चटके दिले त्यांनी इथे सोशीक लोकांना

जखम होते बरी म्हणती मिठाने शेकल्यानंतर

*

किती गर्दी इथे केली बघ्यांनी रंजनासाठी

कुणीही थांबला नाही तमाशा संपल्यानंतर

*

अनोखी कल्पना शक्ती जिथे रचनेत सापडते

कवीला वाचता येते कवन हे वाचल्यानंतर

*

इथे तर रानमेव्याला कुणीही मोल देईना 

सुक्यामेव्यास या किंमत बघाना वाळल्यानंतर

*

फुले रस्त्यात पडलेली चुरडली ना कधी पायी

सुगंधी हात झाले रे फुलांना वेचल्यानंतर

*

सुखाचा शोध घेताना भटकलो काल मी होतो

सुखाला जाणता आले समाधी लागल्यानंतर

*

कसे घरट्यात ते घुसले किती दादागिरी केली

अता बंदिस्त हे पाणी जहाले गोठल्यानंतर

*

दुधाची काळजी नाही जरी ते नासले आहे

कलाकंदामधे गोडी जरासे आटल्यानंतर

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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