हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४६ ☆ कविता – भारत की पहचान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “भारत की पहचान“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४६ ☆

✍ कविता – भारत की पहचान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आज हवा का रुख कुछ बदला सा है

पक्षियों का गान कुछ चहका सा है,

मन मोहने वाले  तिरंगे की शान है

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

अपनी आजादी को बनाए रखना

अपने उसूल बना, उन्हीं पर चलना,

न भूलना कुर्बानियों को, कसमों को

नई क़सम खाकर आगे, आगे बढ़ना,

क़दम जमीन पर तो सर आसमान है

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

अंदर बाहर पनपे शत्रु जंजाल कभी

तोड़ देता है  सजग जन-जाल तभी

बस केवल रहते हैं नियम और क़ानून

जन-जन पालके गणतंत्र बनाते सभी

हर मोड़ पर देखो त्याग व बलिदान है

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

सीमाओं पर डटे योद्धाओं की जान

घायलों बीमारों के कष्ट का  त्राण

घर-घर मोहल्ले के सजग प्रहरी अड़े

सभी बन गए आज राष्ट्र के अरमान।

तन-मन की जीत लख जग हैरान है,

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

*

आओ मित्रों, एक नई क़सम  खाएँ

भारत को इक नई पहचान दिलाएँ

न डगमगाएंगे न झुकने देंगे शीश,

आए दुनिया को नया पाठ पढाएँ।

अखंड एकता  ही बनी नई आन है,

मित्रों, यही तो भारत की पहचान है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९५ – जीवन का रंग… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का रंग।)

☆ लघुकथा # ९५ – जीवन का रंग श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सुनो पूजा! तुम रोज-रोज खाना बनाकर क्यों बाहर को फेंक देती हो  और मैं तुम्हें दो-चार चीज बनाने को बोल देता हूं तो तुम्हारा मुंह बन जाता है?

कमल जी ने गुस्से से अपनी बहु रानी की ओर देखा।

पूजा ने कहा – मम्मी जी आप मुझे देख रही है सुबह से मैं काम में व्यस्त हूं बाहर  मैंने कब खाना फेंक दिया?

देखो बहू मैं क्यों झूठ बोलूंगी कल भी शाम को बाहर खाना पड़ा था और आज अभी यह देखना रोटी और यह सब्जी कितने अच्छे से उसके अंदर डाली हुई है रोल बनाकर?

मम्मी जी यह कौन कर रहा है?

मेरे पास इतनी फुरसत थोड़ी ना है कि मैं खाना बनाकर फेंकूंगी और आपको तो पता है कि मैंने आज आलू की सब्जी कहां बनाई?

ऐसी हरकतें कौन कर रहा है सामने वाली भाभी जी की यहां सीसीटीवी लगा हुआ है उसमें देख कर आती हूं। कौन है यह मेरे घर के सामने खाना फेंक कर घर में झगड़ा करवा रहा है?

बहु सामने वाली रागिनी भाभी जी के दरवाजे पर दस्तक देती है।  

भाभी जी दरवाजा खोलिए थोड़ा काम है।

क्या हुआ? आज लग रहा है खाना जल्दी बन गया आपका – मुस्कुराते हुए रागिनी ने पूछा।

नहीं आज मेरा खाना जल्दी नहीं बना है बल्कि घर में युद्ध हो गया है। रागिनी तुम अपने सीसीटीवी में देखकर बताओ कि मेरे घर के सामने रोज-रोज खाना कौन रख रहा है?

रागिनी और पूजा ने जब सीसीटीवी में देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि उनके बगल वाली भाभी ही उनके घर के सामने रोज खाना रखकर, कुछ टोटका कर रही थी।

इसका वीडियो बना लेती हूं और मम्मी जी को दे देती हूं  मुझे बहुत परेशान करके रखा है।

पूजा ने वापिस घर आकर अपनी सास को बताया कि – मम्मी जी आप मेरे मोबाइल में यह वीडियो देख लीजिए अब आपको पता चल जाएगा कि खाना कौन बना बनाकर फेंक रहा है वरना आपके बेटे के आने के बाद आप मेरी ही शिकायत करती।

अरे बहु यह क्या कह रही है मैं अभी इसकी खबर लेती हूं।

फिर वे पड़ोसन झुमरी बहू से मिलकर बोली – आजकल के व्हाट्सएप पर मोबाइल ज्ञान को सुन सुनकर यह तुझे क्या हो गया कि बाबा के चक्कर में पड़कर तू यह सब काम क्यों कर रही है? इस सब में तू अपना समय और घर दोनों को बर्बाद कर देगी। प्रेम और श्रद्धा से भगवान की पूजा कर और मानवता के धर्म को समझ।

कमल जी की बातें सुनकर उनकी पड़ोसन झुमरी एकदम सन्न रह जाती है उसके चेहरे का रंग उड़ जाता हैं। वह रोने लगती है और कहती है मम्मी जी अब ऐसा कभी नहीं होगा। अब मैं सही राह पर चलूंगी।

कमला जी ने कहा ठीक है आज मैं तुम्हें माफ कर रही हूं। बेटा जीवन के रंग अजब-गजब होते हैं खुशी-गम धूप-छाँव की तरह आते जाते है। तुम्हारी कोई समस्या है तो मेरे पास आओ।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २९५ ☆ तुझ्या साठीच… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २९५ ?

☆ तुझ्या साठीच… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

ही माझी अखेरची कविता…

असेल कदाचित,

मन उगाचच हळवं होतं,

आत्मपरीक्षण करत—

आठवत राहतंय,

भूतकाळ!

खूप रडू कोसळतंय,

स्वतःतून उगवल्या असंख्य कविता,

अगदी प्रामाणिक होत्या त्या,

तुला कळल्याच नाहीत,

तू ,

आयुष्याचा अध्याय !

तुझ्याशिवाय—

अस्तित्वहीन मी,

हे मला तरी कुठं समजलं ?

आधे आधुरेच आहोत आपण,

एकमेकांशिवाय,

हे समजण्यात,

केवढा मोठा कालखंड पार केला…

आज हा फोटो पाहिल्यावर,

जाणवलं,

परतीच्या वाटेवर,

आपण दोघेही आहोत….

आणि ही माझी अखेरची कविता —

तुला न कळणारी….

माझ्या सारखीच!!!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

गुरूदेव रविंद्रनाथ टागोरांना संगीताचं सखोल ज्ञान होतं. ते स्वत: लिहिलेल्या गीतांना स्वत: संगीतबद्ध करत. अशी दोन हजारहून अधिक वैशिष्ट्यपूर्ण गाणी रविंद्र संगीतया नावाने भारतात व भारताबाहेरही प्रसिद्ध आहेत व गायली जातात. टागोरांनी सहा नवीन तालांची निर्मिती देखिल केली आहे. कदाचित म्हणूनच गीतांजलीत वारंवार गायन, वादनाचे उल्लेख आढळतात.

————-

गीत : ४

Life of my life, I shall ever try to keep my body pure, knowing that thy living touch is upon all my limbs.

I shall ever try to keep all untruths out from my thoughts, knowing that thou art that truth which has kindled the light of reason in my mind.

I shall ever try to drive all evils away from my heart and keep my love in flower, knowing that thou hast thy seat in the inmost shrine of my heart.

And it shall be my endeavour to reveal thee in my actions, knowing it is thy power gives me strength to act.

———

 मराठी भावानुवाद : गीत : ४

*

माझ्या जीवनी तूच वससि

प्राण रूपे अससि विधाता

*

मनुष्य जीवन तुझी देणगी

जपून ठेवीन त्याची शुचिता

अंतर माझे प्रकाशित करी

तुझे रूप, अंतीम सत्यता

*

मनात माझ्या पाप नसे

अभद्र विचारा वाव नसे

हृदयमंदिरी वास तुझा रे

अमंगलाला स्थान नसे

*

तूच प्रेरणा मम कार्याची

कृतीत माझ्या तुझा भास हो

आश्वासित तुज प्राणपणाने

सत्कर्माची मला आस हो

*

भावानुवाद : कवयित्री : ©️मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—— 

गीत : ५

I ask for a moment’s indulgence to sit by thy side. The works that I have in hand I will finish afterwards.

Away from the site of thy face my heart knows no rest nor respite, and my work becomes an endless toil in a shoreless sea of toil.

To-day the summer has come at my window with its sighs and murmurs;and the bees are plying their minstrelsy at the court of the flowering grove.

Now it is time to sit quiet, face to face with thee, and to sing dedication of life in this silent and overflowing leisure.

————-

मराठी भावानुवाद : गीत ५

*

ऐहिक काजामधुनि फुरसत

क्षणभर विश्रांतीची ऐपत

देशील का मज हे रघुराया॥

*

बसेन तुझिया समीप म्हणतो

लाड मनाचे पुरविन म्हणतो

कधी देशी मज संधी सखया॥

*

पाहीन शुभ तव मुखमंडल

दर्शन लाभो तुझे सुमंगल

पूर्ण करीन मग विहित कार्या॥

*

संग तुझा मज कसा मिळेना

तुझ्यावरून मम दृष्टी हटेना

विसाव्याचे क्षण हेच माझिया॥

*

गवाक्षी माझ्या ग्रीष्म उसासे

मधमाशांची लगबग भासे

निवांत प्रहरी येशील का या॥

*

जीवनगाणे तुजला अर्पून

देईन मी कुडी ही समर्पून

दृष्टी तुजवर अंती सुखावया॥

*

भावानुवाद : कवयित्री : ©️ मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

 –—————————–

गीत : ६

Pluck this little flower and take it, delay not! I fear lest it droop and drop into the dust.

It may not find a place in thy garland, but honour it with a touch of pain from thy hand and pluck it while there is time.

——————

भावानुवाद: गीत : ६

*

फुले उमलती, सुगंध पसरती

गळुनि पडता, धुळीत मिळती

*

खुडुनि तयांना घेऊन जा तू

जीवन त्यांचे न व्यर्थ दवड तू

*

हारात असणे जर नसे प्राक्तनी

करूण स्पर्श दे वेदना जाणुनि

*

दिवस आजचा सरण्या आधी

वेळ पुजेची टळण्या आधी

*

खुडुनि तयांना प्रभुचरणांशी

वाहुनि जातील निर्माल्याशी

*

सार्थक होईल त्या फुलण्याचे

सार्थक होईल त्या जगण्याचे

*

रूप देखणे नसेल त्यांना

सुगंध मोहक नसेल त्यांना

*

खुडुनि आणी पूजेस्तव ती

जाण्यापूर्वी वेळ टळुनि ती

*

— क्रमशः भाग दुसरा

*

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२८ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२८ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

आज जिन्हें अधिकार मिले हैं, 

करने अत्याचार मिले हैं, 

अपराधी बेखौफ घूमते, 

उनसे, थानेदार मिले हैं।

0

नहीं इश्क का जब जुनून था, 

मेरे जीवन में सुकून था, 

उफनाया तो रोक न पाया, 

नई आशिकी, नया खून था।

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चाल वो दुश्मनी की चलते हैं, 

पैंतरे नित-नये बदलते हैं, 

एक दिन तो, पनाह माँगी थी 

आज छाती पे मूंग दलते हैं।

0

कतरा-कतरा जुबान रखता है, 

चश्मदीदी बयान रखता है, 

घाव, अपनी जुबान खोलेगा 

जुल्म की दास्तान रखता है।

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स्वार्थ में इन्सानियत, ईमान बेचे जा रहे, 

अब दया, आशीष औ‘ सम्मान बेचे जा रहे, 

राजनैतिक मंडियों में मजहबी व्यापार है, 

आज दौलत के लिए भगवान बेचे जा रहे।

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रेशमी रिश्ते न तोड़ो फूलकर अभिनन्दनों में, 

सूत्र नाजुक हैं मगर दृढ़शक्ति रक्षाबन्धनों में, 

सद्गुणों की हो सुरभि तो दुष्ट भी वश में रहेंगे, 

विष चढ़ा पाते नहीं हैं नाग जैसे चन्दनों में।

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अब प्रगति तो फाइलों परचों में है, 

लूट, हत्या, बेबसी चरचों में है, 

आदमी पशु से अधिक बदतर हुआ 

राष्ट्र गिरवी, कर्ज औ’ खर्चों में है।

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८९ ☆ आलेख – “स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी : वैश्विक स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक मूर्ति” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८९ ☆

?  आलेख – स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी : वैश्विक स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक मूर्ति ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

स्वतंत्रता का कोई  आकार नहीं होता, पर जब वह न्यूयॉर्क हार्बर के मध्य लिबर्टी द्वीप पर अथाह जलधारा के बीच खड़ी हो कर हवाओं से बातें करती है तो वह एक वैश्विक जीवंत प्रतीक बन जाती है। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी अर्थात “लिबर्टी इनलाईटिंग द वर्ल्ड” की कहानी फ्रांस द्वारा वर्ष 1886 में अमेरिका को भेंट किया गया विचारों, संघर्षों और दोस्ती की उस स्वतंत्र यात्रा की प्रतीकात्मक भेंट  है जो मनुष्य को मनुष्यता के पथ पर चलने की राह दिखाती है।

फ्रांस में बैठे बुद्धिजीवियों ने जब उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यह सोचा कि अमेरिका को एक ऐसी भेंट दी जाए जो आज़ादी और मानव गरिमा की आकांक्षा को व्यक्त कर सके, तब शायद उन्होंने भी कल्पना न की होगी कि यह प्रतिमा एक दिन पूरी दुनिया में  अमेरिका का भावनात्मक प्रतीक बन जाएगी। यह प्रतिमा रोमन देवी लिबर्टस से प्रेरित है। मूर्ति के हाथों में अमेरिका की स्वतंत्रता ,  4 जुलाई 1776 की तारीख की तख्ती है । फ्रांस ने अमेरिकन क्रांति में दोस्ती के प्रतीक स्वरूप  इसे अमेरिका को भेंट किया था। 28 अक्टूबर 1886 को इस स्मारक का उद्घाटन हुआ था। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की मूर्ति 151 फीट ऊंची है। पैडस्टल सहित स्मारक की कुल ऊंचाई 305 फीट है। तांबे की आवरण परत के कारण ऑक्सीडेशन से इसका रंग हरा पड़ गया है।1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था।

फ्रांसीसी विचारक और सहयोगियों ने आज़ादी और मानवाधिकारों का संदेश देती  विराट प्रतिमा का विचार रखा और मूर्तिकार बार्थोल्डी ने उसे रूप देना शुरू किया। यह मूर्ति कठोर सम्मिश्रित धातु की चादरों से गढ़ी गई, पर इसमें मानवीय भावनाओं का भावनात्मक ताप भी भरा हुआ था। इसके भीतर का ढांचा इंजीनियरों की बुद्धिमत्ता का प्रमाण है, जिसने इसे समुद्री हवाओं की मार से भी सुरक्षित रखा हुआ है। यह प्रतिमा अपने आप में कला और विज्ञान का संगम था, जैसे किसी छंद में पिरोई सुंदर कविता के पीछे पंक्तियों में छिपा  गणित ।

जब प्रतिमा आकार ले रही थी, तब उसे अमेरिका में खड़े करने के लिये मजबूत पेडेस्टल बनाने की ज़िम्मेदारी अमेरिकी जनता ने उठाई। फंड जुटाने के अनगिनत प्रयास हुए, नाटकों से लेकर प्रदर्शनियों तक, व्यापक जन भागीदारी हुई और अंततः यह सहयोग दोनों देशों की आम जनता की मित्रता की एक अनूठी मिसाल बन गया। तैयार प्रतिमा सैकड़ों टुकड़ों में  समुद्र पार भेजी गई और जब वह न्यूयॉर्क पहुंची, तब लोगों ने उसे सिर्फ धातु का ढांचा नहीं, एक उम्मीद का पैगाम समझ दिल से उसका स्वागत किया। पेडेस्टल पूरा होते ही , स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी खड़ी की गई और उसकी ऊंचाई आसमान को छूते हुए मनुष्य की वैश्विक स्वतंत्रता की मुखर नैसर्गिक आकांक्षा का स्थायी स्मारक बन गई। जिस दिन इसका लोकार्पण हुआ, उस दिन यह तय हो गया कि यह प्रतिमा सिर्फ अमेरिका की नहीं, उन सबकी अभिव्यक्ति का भाव है जो प्रगति और  स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।

स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के हर हिस्से की अपनी प्रतीकात्मक भाषा है।  हाथों में  मशाल एक राह दिखाती है जो तमाम अंधेरों को पीछे छोड़ कर प्रकाश की ओर चलने की प्रेरणा देती है। दूसरी भुजा में टेढ़े मेढ़े रास्तों का संक्षेप है, जिस पर तख्ती में अमेरिकन क्रांति की वह तिथि अंकित है जब मनुष्यों ने यह घोषित किया था कि किसी भी शासन से ऊपर मानव की स्वतंत्र इच्छा है। उसके चरणों के समीप टूटी जंजीरें इस बात की गवाही देती हैं कि गुलामी चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हो, उसे तोड़ने का साहस एक दिन जरूर जागता है। यही साहस इस प्रतिमा को वैचारिक रूप से उसकी ऊंचाई से भी ऊंचा स्थान देता है।

बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में जब लाखों प्रवासी समुद्र पार कर अमेरिका की ओर चले, तब यह प्रतिमा उनके लिये खुले सपनों की पहली झलक थी जिसने दिल को आश्वस्त किया कि वे एक नए वैश्विक स्वतंत्र अध्याय की रचना करने बढ़ रहे हैं। अनगिनत आंखों ने इसे देखा और अपनी उम्मीदों को इसके साथ जोड़ लिया। यही वह क्षण है जब यह प्रतिमा मनुष्य के सामूहिक सपने की प्रहरी बन गई। आगे चलकर इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिला और समय समय पर इसके संवर्द्धन होते रहे, पर इसके अर्थ की भावनात्मक ऊंचाई कभी नहीं घटी।

आज जब आधुनिक दुनिया की जटिलताएं बढ़ रही हैं, तब भी स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी अपनी जगह पर अडिग खड़ी है और मानवता को याद दिलाती  है कि स्वतंत्रता किसी राष्ट्र की नहीं, पूरी मानव जाति की प्राकृतिक आवश्यकता है। वह सिखाती है कि अधिकार सिर्फ मिलते नहीं, उनकी रक्षा भी करनी पड़ती है। वह यह भी याद दिलाती है कि आज़ादी का कोई अंत नहीं, उसका सफर हमेशा चलता रहता है।

समुद्र की लहरें उसके पांवों से टकराती हैं, हवाएं उसकी मशाल को छूकर आगे निकल जाती हैं, पर वह डगमगाती नहीं। उसे पता है कि वह केवल तांबे और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक शक्ति का जीवंत रूप है। इसी कारण हर आने वाला युग हर नई पीढ़ी उसे अपने संदर्भ में पढ़ती है और हर देखने वाली आंख उसके अर्थ को अपने अंतस में खोजती है। यही स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की असली महानता है कि वह स्मारक होकर भी जीवित है और प्रतीक होकर भी मनुष्य के दिल की धड़कनों से बात करती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के निहित संदेश और भी प्रासंगिक हो चले हैं।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

न्यूयॉर्क से

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०१ – मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०१  – मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है… ☆

जीवन को जीना है सीखा,

हर गहरे तल में झाँका है।

मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है,

उसके भावों को बाँचा है।।

 

लिखना पढ़ना शौक रहा है,

शब्दों से शृंगार किया है।

भावों के सागर में डूबा,

जग को कुछ संदेश दिया है।।

 

पहन मुखौटे जो आये हैं,

उनके चेहरों को भाँपा है।

चाहा नहीं हैं मुझको फिर भी,

सबको प्रेम सदा बाँटा है।।

 

कर्तव्यों के डगर चले हैं,

आदर्शों के पाठ पढ़ेे हैं।

अधिकारों को पाकर फिर भी,

नहीं कभी भी हम अकड़े हैं।।

 

जीवन भर मैंने खोजा है,

कोई ऐसा मिला नहीं है।

जिसको मैं दुनियाँ में कह दूँ,

इससे बढ़कर सगा नहीं है।।

 

जिसने मुझको जनम दिया है

उनसे ही जीना सीखा है।

उंगली पकड़ राह दिखलायी,

लगते प्रिय ही मात-पिता हैं।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४९ – हस्तरेखा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा हस्तरेखा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४९ ☆

🌻लघु कथा🌻 🤲हस्तरेखा 🤲

सदियों से चली आ रही ज्योतिष विद्या, हस्त रेखा, टोना – टोटका, उपाय कोई मानता कोई नहीं मानता।

परन्तु जहाँ पर काम बन जाए सभी एक साथ।

एक हस्त रेखा वाले बाबा की दुकान चल पड़ी। 20-25  लोग सदैव लाईन पर खड़े ही मिलते।

अपना हुलिया इस कदर बना रखें थे कि सच में देखने वाला मोहित हो जाता था। हर बात सच्ची जान पड़ती थी।

अचानक एक हाथ आगे बढ़ा। बाबा जी ने देखा—तुम्हारी हस्त रेखा कह रही है तुम्हें किसी का मालिकाना मिलेगा। बिना कमाए ही सब मिलेगा।

जब तक कुछ और कहते उनको एक पर्ची दिखने लगी लिखा था – – चुपचाप स्वागत करके अपनी जगह मुझे बिठा दो। वरना – – हस्त रेखा मुझे भी बनाना आता है। पीछे की पंक्ति में माँ खड़ी है।

बिजलियाँ कौंध गई। अपनी गर्भवती स्त्री को मारते मारते अधमरा छोड़ बाबा बनने का ढोंग अब समाप्त होता दिखने लगा। मेरी हस्त रेखा में ढूँढ निकालने का योग बना हुआ है।

बाबा जी दोनों हाथ मलते नजर आने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५७ – देश-परदेश – वकील दिवस: 3 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५७ ☆ देश-परदेश – वकील दिवस: 3 दिसंबर ☆ श्री राकेश कुमार ☆

देश के प्रथम राष्ट्रपति स्वर्गीय श्री राजेंद्र प्रसाद जी के जन्मदिवस को अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। साधारण भाषा में अधिवक्ता को वकील कह कर संबोधित किया जाता हैं। कानून के हाथ लंबे होते हैं, कानून अंधा होता है, जैसी अनेक किवदंतियां वकीलों से जुड़ी हुई हैं।

वकीलों से बच कर रहना चाहिए कहने वाले तो यहां तक ज्ञान देते हैं, कि वादी और परिवादी वकील के द्वारा कोर्ट में इतने पैसे खर्चवा देते है, उससे अच्छा तो दोनों पक्ष अपनी अपनी पूंजी लेकर जलती हुई आग के समक्ष बैठ कर करेंसी नोट जलाते जाएं, जिसके पैसे पहले समाप्त हो जाए, वो पक्ष हारा हुआ कहलाएगा।

लोग वकील के घर के पास घर भी नहीं लेना चाहते है, डरते हैं, कोई ना कोई झगड़ने का मुद्दा बन जाएगा इसलिए वकीलों के घर के पास प्रॉपर्टी अपेक्षाकृत सस्ती उपलब्ध रहती हैं।

कानून की डिग्री वाले वकीलों के अलावा भी अनेक प्रकार के वकीलों का सामना जीवन में हुआ हैं। मोहल्ले या परिवार के झगड़े सलटाने वाले भी हमारे समाज में पाए जाते हैं।

कार्यालय में कुछ लोग बात बात पर नियम की बात करते हैं, तो लोग उनको भी वकील की संज्ञा से नवाज़ देते हैं। इस प्रकार के लोगों से लोग दूरी बनाना उचित समझते हैं।

दो बिल्लियों की रोटी के एक टुकड़े को लेकर लड़ाई को बंदर वकील सलटा देता है, वाली पुरानी कहानी हम सब ने बचपन में खूब सुनी थीं।

वर्तमान में तो वकील पुलिस तक को डराते हैं। किसी वकील के साथ दुर्घटना हो या किसी वकील ने आपकी गाड़ी को टक्कर भी मारी हो, वकील संगठित होकर सड़कों पर उतर आते हैं।

वकील का पेशा कभी बहुत सम्मानित पेशा होता था, वर्तमान में लोग उनका सम्मान भय के कारण ही करते हैं। न्याय प्रणाली और हमारे न्यायधीश भी इस सब के लिए उतने ही जिम्मेवार है जितने हमारे वकील लोग हैं।

देश के कुछ वकीलों ने समाज के लिए बहुत अच्छा कार्य भी किया है। राष्ट्रीय मुद्दे और गरीबों के लिए भी समय समय पर वकीलों ने पूर्व में बहुत सारे कार्य भी किए गए हैं, जिनको भुलाया नहीं जा सकता हैं।

अब लेखनी को विराम देता हूं, वर्ना आप लोग कहेंगे वकीलों की बहुत वकालत कर रहा हूं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३११ ☆ जाम लावा भाकरीला… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३११ ?

☆ जाम लावा भाकरीला… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

सात जन्माचे बंधन आता पाळतोय कोण

घटस्फोट हे घेण्याचे किती वाढलेय लोण

*

सात फेऱ्यांचाही तिने नाही पाळला करार

सोने नाणे घेऊन ही वधू झालेली फरार

*

लग्नापूर्वीचे शूटिंग खर्च केला हा लाखात

लग्नानंतर हो नाही कुणी कुणाच्या धाकात

*

भरपूर वेळ आहे नाही दळण कांडण

कुत्र्या मांजरा सारखे होते घरात भांडण

*

सम वाटणी कामाची दोघे आहे नोकरीला

भाजी नाही केली सांगे जाम लावा भाकरीला

*

माय कामावर गेली पोर घरी रडवेला

दूध आया ही पाजते माझ्या छोट्या लेकराला

*

आहे आबादी आबाद चकाकतोय बंगला

नाही संस्कार राहिले आहे माणूस खंगला

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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