मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ जागर ☆ श्री आशिष बिवलकर ☆

श्री आशिष  बिवलकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? जागर ? श्री आशिष  बिवलकर ☆

☆

आदिमाया तुझा | मांडला जागर |

भक्तीचा सागर | नवरात्र ||१||

*

घटस्थापनेस | देवी बैसे घटी |

ताराया संकटी | भक्तगणां ||२||

*

देवी आनंदाने | मागतो जोगवा |

दारोदारी धावा | नऊदिनी ||३||

*

खणा नारळाने | भरतो ही ओटी |

भक्तीभाव दाटी | ह्रदयात ||४||

*

फुले हार वेणी | माळ घटावर |

सप्तधान्य घेर | भोवताली ||५||

*

उपवास व्रत | कठोर साधना |

उद्धारते मना | तपश्चर्या ||६||

*

उदो उदो देवी | शक्तीने प्रहार | 

दुष्टांचा संहार | रक्षणासी ||७||

©️ वास्तवरंग

☆

(चित्र सौजन्य – श्री आशिष बिवलकर) 

© श्री आशिष  बिवलकर

बदलापूर

मो 9518942105

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # ३०१ – “प्राण पखेरू उड़े अचानक…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​  2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “प्राण पखेरू उड़े अचानक...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३०१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “प्राण पखेरू उड़े अचानक...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

सारे बेटे रहे पालते

” पापा ” को स्नेह से

मरे एक दिन किन्तु पिताजी

हत्यारी मधुमेह से

 

कोई दवा काम ना

आयी तरह तरह बदली

जब भी जिस ने जो

बतलायी वह गोली निगली

 

सोया करते पूज्य पिता

तब बाहर की दालान में

जिस में भीग भीग जाते

थे चौमासे के मेह से

 

जब भी कोई व्यक्ति

माँगने दरवाजे आता

उसे मना की नहीं कभी

वह खुश होकर जाता

 

कीर्तिमान यह रहा पिता

का कुछ न कुछ देते

कहा किये थे याचक ना

खाली जाये इस गेह से

 

बहुत तसल्ली थी उनको

जायेंगे माघ मेला

तभी राम ने उन से था

खेला ऐसा खेला

 

प्राण पखेरू उड़े अचानक

रोक नहीं पाये

लगा कि सारा नेह चुक गया

उनका था इस देह से

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15-09-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अक्स… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अक्स… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

कैसे चलती है क़लम,

कैसे रच लेते हो रोज़ ?

खुद से अनजान हूँ,

पता पूछता हूँ रोज़,

भीतर खुदको हेरता हूँ,

दर्पण देखता हूँ रोज़,

बस अपने ही अक्स,

यों ही लिखता हूँ रोज़!

?

© संजय भारद्वाज   

6.6.2019, 11.10 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ७० ☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” ।)

☆ शेष कुशल # ७० ☆

☆ व्यंग्य – “अमीर को अमीर बनाए रखने की कीमियागिरी…” – शांतिलाल जैन ☆

लोकतंत्र जम्बूदीप में भी है. जाहिर है वहाँ एक संसद भी है और संसद की कार्यवाही को कवर करनेवाले न्यूज़ चैनल भी. यू-ट्यूब पर उपलब्ध ऐसे ही एक चैनल के बुलेटिन का ट्रांसक्रिप्ट कुछ इस प्रकार है.

“नमस्कार. मैं हूँ अनाम और आप देखना शुरू कर चुके हैं दी जम्बूदीप टाइम्स. सरकार ने आज संसद में दो अधिनियम प्रस्तुत किए, जिन्हें भारी हंगामे के बीच बिना बहस के ध्वनि मत से पारित कर दिया गया. आज के बुलेटिन में हम दोनों कानूनों पर विस्तार से बात करेंगे.

पहला है मिनिमम वेजेस फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून के तहत देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को एक करोड़ रुपए रोज़ाना की न्यूनतम आय की गारंटी प्रदान की गई है. इसे हर पाँच साल में संशोधित किया जाएगा और प्राइस इंडेक्स के अनुसार इसमें वृद्धि की जा सकेगी. उद्देश्य है रिच लाइफ़ स्टाइल में जीवनयापन के लिए एक तयशुदा बुनियादी आय का भरोसा दिलाया जाना.

दूसरा है वेल्थ क्रिएशन एंड एसेट होल्डिंग फॉर सुपर रिच एक्ट, 2026. इस क़ानून में देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों को उनके क़ब्ज़े में अब तक आ चुकी राष्ट्र की चालीस प्रतिशत संपदा में कमी नहीं आने देने की गारंटी प्रदान की गई है. उद्देश्य है अमीरों को गरीब होने से बचाना. कानून यह सुनिश्चित करेगा कि कल को आर्थिक समानता लाने की सनक में कोई सिरफिरा जननायक अमीरों की संपदा कम न कर बैठे.

सूत्र बताते हैं कि अंदरखाने सरकार चिंतित है कि कुछ बिजनेस टाइकून्स और टॉप सीईओज की इनकम और सैलरी लगातार घट रही है. कहीं कहीं तो यह पचपन लाख रुपए प्रतिदिन तक रह गई है. जबकि उनकी फैक्ट्रियों में मजदूरों की आय पंद्रह बेसिस पॉइंट के इज़ाफ़े के साथ तीन सौ पंद्रह रुपए रोज़ हो गई है. ऐसे में सुपर रिच सेगमेंट को शोषण से बचाने की जरूरत महसूस की जा रही थी. प्रस्तावित क़ानून यह देखेगा कि बिजनेस टाइकून्स की इनकम बेंच मार्क इनकम से कम न होने पाए. यदि ऐसी स्थिति निर्मित होती है तो शासन इंसेटिवाइज करके अंतर की राशि की आपूर्ति करेगा. बिल पेश करते हुए सरकार ने इसे कल्याणकारी राज्य की दिशा में एक जनहितकारी कदम बताया है.

कॉर्पोरेट फंडेड थिंक टैंक के एक अर्थशास्त्री से हमने कुछ देर पहले बात की. उन्होंने जम्बूदीप टाइम्स को बताया कि सुपर रिच परिवार इन दिनों फाइनेंशियल स्ट्रेस से गुजर रहे हैं. एक करोड़ रुपए रोज़ की मामूली आमदनी से घर खर्च बमुश्किल निकल पाता है. निजी विमान से यात्रा का खर्च,  विदेशों में होने वाली कांफ्रेसेज का खर्च,  प्राईवेट आईलैंड पर हॉलिडेईंग का खर्च और परिवार में परिणय-प्रसंग पड़ जाए तो चार-पाँच हज़ार करोड़ की मामूली सी रकम में सादगी से निपटाने की मजबूरी. स्थिति इतनी गंभीर है कि पाँच सितारा होटल्स में दो जून की रोटी का खर्च निकालपाना दुश्वार होता जा रहा है. अधिनियमों का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित जम्बूदीप बनाने के लिए गरीबों को अमीरों के पक्ष में त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए. सरकार के विधिक सलाहकारों का अभिमत है कि तीन सौ रुपए रोजाना कमाने की लक्झरी में जी रही पचास प्रतिशत आबादी स्वेच्छा से कुर्बानी न दे तो शासन क़ानून बनाकर ऐसी कुर्बानी ले सकता है, लेना भी चाहिए. गरीब और मध्यम वर्ग की कुर्बानियाँ जीएसटी के रूप में हो सकती हैं. बढ़ी हुई आयकर की दरों के रूप में या सर्विस चार्जेज के रूप में भी हो सकती है, जल, जंगल, जमीन के अधिग्रहण के रूप में भी.

अधिनियम पारित होने के बाद जननायक ने प्रेस से बात करते हुए कहा है कि आर्थिक समानता की बात करनेवाले बुद्धिजीवी जम्बूदीप में अराजकता फैलाना चाहते है. पचास प्रतिशत आबादी के पास देश की संपदा का छह प्रतिशत हिस्सा अभी भी  है. यह विलासिता है. संपत्ति रखने की उसे जरूरत ही क्या है?  रोज़ कमाना रोज़ खाना है. पाँच किलो अनाज हम दे ही रहे हैं, उतना अपने पास रखकर शेष अमीरों में बाँट देना चाहिए.

अधिनियम को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए सरकार ने एक रोडमैप भी बनाया है. मान लो किसी बड़े घराने की संपदा घटने लगी तो सरकार उसे एक दो हवाई अड्डे देगी,  कुछेक सी-पोर्ट दे देगी,  कुछ खदानें,  नॉमिनल दरों पर जमीन और कॉर्पोरेट टैक्स में छूट देकर उन्हें गरीब होने से बचाएगी. लोन के डिफाल्टर हुए तो नब्बे प्रतिशत से ज्यादा का हेयरकट देकर भी उनके सुपर रिच स्टेटस की रक्षा करेगी. सरकार अपनी प्राथमिकताएँ समझती है, अमीरों को और अधिक अमीर बनाना सरकार की प्राथमिकताओं में हमेशा ही शुमार रहा है.

अधिनियम के प्रावधानों में कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रेष्ठीजनों में वर्गीकरण नहीं किया गया है. जो कुशल है वो धनाढ्य भी हो यह जरूरी नहीं है. जो धनाढ्य है वो कुशल है. प्रस्तावित अधिनियम में संरक्षण पाने का अधिकारी है. इस अधिनियम में कार्य घंटे और कार्य दिवस भी परिभाषित नहीं किए गए है. ‘वंस ए अमीर इज आलवेज ए अमीर’ के सिद्धांत का अनुपालन किया गया है. विपक्ष ने इन दोनों अधिनियमों का विरोध किया है लेकिन हमने अपनी पड़ताल में पाया है कि जब वे ट्रेझरी बेंच पर क़ाबिज़ थे तब उनकी नीतियाँ भी प्रो-रिच-सुपर-रिच ही रहीं. बहरहाल, पूरे जम्बूदीप में सरकार के इन क़दमों का स्वागत किया जा रहा है. सुपर रिच खुश तो हैं लेकिन न्यूनतम दैनिक आय एक करोड़ से बढ़ाकर दो करोड़ रुपए रोज़ाना करने की मांग भी कर रहे हैं.

दोनों अधिनियमों पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ. अभी के लिए बस इतना ही. नमस्कार”

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 125 – The Parched Duster… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Parched Duster.  

☆ Witful Warmth# 125 ☆

☆ Satire ☆ The Parched Duster… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Near the doorway of the main lecture hall in the town’s oldest Government Teacher Training College, a hefty, battered wooden duster had occupied a dusty alcove for twenty straight years. Time, alternating sunlight, and rising damp had petrified the thick encrustation of chalk dust on its felt pad into something resembling solid limestone. Imbued in its aged grain was the silent perfume of reverence and devotion that once shaped young minds—now thoroughly interred under layers of grime.

Every morning at seven sharp, Shivshankar Guruji would arrive, plant his weathered rosewood walking stick against the crumbling brick platform just below the veranda, and sit. Draped in a torn white khadi kurta with a stained cloth towel slung over his shoulder, the old teacher spent entire days gazing at the chalk-choked relic with petrified, unblinking eyes.

Across the campus grounds, a glittering procession of air-conditioned sedans rolled in, disgorging high-flying coaching cartel barons, sleek ed-tech company pitchmen, and top-tier educational bureaucrats. The loudspeakers rattled with sacred chants celebrating the teacher as God Incarnate, though naturally, none of the suited consultants and crisp administrators spared a glance for a dusty block of scrap timber tucked in a forgotten alcove.

Whenever Ramdeen, the aging orderly, hurried past clutching his tin tea kettle, he would shudder at the statue-like figure on the bricks. Guruji would invariably ask in a faint, trembling croak, “Tell me, Ramdeen, on this grand circus of World Teachers’ Day, has any government circular arrived commanding someone to wipe the ink clean off a child’s slate with that duster? Or are we sticking to wrapping dignitaries in ceremonial shawls and empty rhetoric from the podium today?”

Ramdeen would only drop his gaze, exhale a heavy sigh, and shuffle quietly into the administrative fog.

The college had recently welcomed its new Regional Director from the State Council of Educational Research and Training: Dr. Animesh Agnihotri, a notoriously stern martinet, an evangelist of smart-classroom pedagogy, and a champion of bureaucratic polish. Whenever Director Agnihotri stepped out of his gleaming official car to inspect the new digital broadcast studio, his glare inevitably snagged on the ragged master parked on the plinth, staring devoutly at a discarded eraser.

To Agnihotri’s modern sensibilities, a tattered relic of an old man folding his hands before a lump of antique junk amidst digital whiteboards, AI tutors, and a state-sponsored festival looked less like devotion and more like deliberate aesthetic sabotage.

Once the morning’s keynotes concluded and the luminaries retreated to the air-conditioned VIP lounge to devour salted cashews and exchange performative pleasantries, Agnihotri dismissed his security detail and marched straight up to Guruji.

“Master ji,” he snapped with institutional frost, “why must you choke the main corridor at your age? If you have pending pension claims or want a free prescription form, go see the clerk inside. Staring at an obsolete piece of rotten timber isn’t going to launch a pedagogical revolution in this country.”

Shivshankar Guruji pressed his palms together with quiet dignity. “Director Sahib, I am not begging for allowances or administrative crumbs. I am simply awaiting the day when the dignity stripped from this doorway returns to that block of wood.”

Agnihotri scoffed at the poetic melodrama. “What dignity? The ministry burns through millions every World Teachers’ Day distributing tablets and dispatching bureaucrats on foreign training junkets. What grand mystery does this junkyard duster supposedly hold?”

Pandit Someshwar, a retired lecturer who had witnessed forty years of blackboards and curriculum shifts, stepped forward. “Do not dismiss him so quickly, Director. Twenty years ago, when the state began shuttering public classrooms to clear the ground for coaching shops, Guruji’s only son, Manas, stood in this very veranda and ignited an uncompromised crusade for free learning.”

Agnihotri raised an eyebrow. “And what did this prodigy do that supposedly ties him to an unwashed blackboard eraser?”

“He was the finest, most principled young educator in the province,” Someshwar replied, exhaling heavily. “While private institutes fleeced impoverished families for exorbitant tuition, Manas spent nights beneath kerosene lamps teaching hundreds of destitute children for nothing, furiously wiping the blackboard clean with that very duster. He placed it upon that shelf and took a solemn oath: until the poorest child in this town received an education free of extortion, he would never bow to the private education cartels.”

Guruji gently reached out, his trembling fingertips brushing the chalk-hardened felt. “Yes, Sahib,” he murmured. “My Manas stood on this very plinth and proclaimed, ‘Father, this is no mere block of wood; it is an educator’s self-respect, destined to wipe away ignorance.’ He swore that when he returned from Delhi bearing the National Commission’s order protecting rural education, he would dust it off himself and crown me guest of honor on the nation’s grandest stage.”

Pricked by administrative curiosity, Agnihotri strode into the dusty archives to unearth the twenty-year-old case file. Flipping through the yellowed confidential sheets, his professional swagger evaporated.

The final pages spelled out a modern corporate acquisition: twenty years ago, when Manas’s grassroots movement posed an existential threat to the tuition cartels, an international ed-tech conglomerate simply neutralized the threat with standard corporate leverage. They handed the fiery young reformer a covert twenty-five percent equity stake and installed him as Chief Executive Officer.

Manas tossed his chalk, his father’s duster, and his revolutionary vows straight out the window to become the country’s most celebrated digital education tycoon—a titan whose current empire thrived on trapping desperate rural parents into mortgaging ancestral farmlands to purchase predatory online subscription courses.

Agnihotri walked back out with hollow eyes and unsteady steps. “Guruji…” he stammered, his bureaucratic cadence breaking, “your crusade-leading son didn’t save the classrooms. He became their top auctioneer.”

Tears carved paths down the old man’s lined face, though his expression remained unmoved.

“I have known he was bought for a long time, Sahib,” Guruji wept softly. “I only come here every day to witness a spectacle: when the grandees take the stage on World Teachers’ Day to perform their theatrical piety, hawking the soul of education to the highest bidder while snatching the duster from their own teaching fathers—does this deaf, self-congratulating society catch even a fleeting whiff of the stench rising from the shroud of commodified knowledge, or are the cashews in the VIP lounge simply too sweet?”

Agnihotri stood immobilized, staring at the calcified duster, as the entire state-of-the-art training institute sank into the suffocating silence of an old master’s quiet humiliation.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ – हास्य-व्यंग्य – “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक व्यंग्य  “नरेन्द्र और देवराज इंद्र”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “नरेन्द्र और देवराज इंद्र” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

नारायण – नारायण कहते हुए नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु जी ने आइये ऋषिवर, कहां से आगमन हुआ कहते हुए नारद जी का स्वागत किया। नारद मुनि बोले – प्रभु पृथ्वी पर स्थित आपके प्रिय जम्बुद्वीप का भ्रमण करके लौट रहा हूं। वहां की अराजक स्थिति को देखकर अत्यंत दुखी हूं। जनता में हाहाकार मचा है। देश की केंद्र सरकार और प्रदेश सरकारों के बढ़ते टैक्सों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, जिसके पास धन और सत्ता है वे सुख भोग रहे हैं। गरीबों, कमजोरों पर तरह – तरह के अत्याचार हो रहे हैं। प्रतिभा और योग्यता दर – दर भटक रही है, गधे पंजीरी खा रहे हैं। दबंगों के साथ – साथ अनेक साधु वेशधारी भी महिलाओं से दुष्कर्मों में लिप्त हैं। झूठ और फरेब का बोलबाला है। देवी – देवताओं के वंशज पथ भ्रष्ट हो गए हैं। धन्वन्तरि के वंशज चिकित्सा के क्षेत्र में, कुबेर के वंशज व्यवसाय में, बुद्धि दाता गणेश के वंशज मीडिया और न्याय में, विश्वकर्मा के वंशज तकनीक और नवनिर्माण में, माँ अन्नपूर्णा के वंशज कृषि और अनाज के क्षेत्र में लूट और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। प्रभु आपने ही बताया था कि धरती पर शांति और अनुशासन के लिए एक ही परम शक्ति ने अलग – अलग रूपों में जन्म लिया है। फिर देवी – देवताओं और अन्य धर्मों के प्रमुखों के नाम पर भोली – भाली जनता को भ्रमित करके क्यों लड़वाया और लूटा जा रहा है ? प्रभु अब जम्बुद्वीप पर आपके पुनः जन्म लेने का समय आ गया है। विष्णु जी बोले – ऋषिवर मैं यह कार्य अनेक बार कर चुका हूं, अब इसे कोई अन्य देवता करे। नारद मुनि निराश होकर देवराज इंद्र के दरबार में पहुंचे। उन्होंने देवराज को जम्बुद्वीप की हालत और विष्णु देव से मुलाकात की जानकारी दी। नारद की बात पर देवराज ने मुस्कुराते हुए कहा – हे ऋषिवर भारतवासियों और पड़ोसी देशों के समाचारों से हम सभी देवता चिंतित हैं। “देव सरकार” भी विष्णु जी से जम्बुद्वीप पर अवतार लेकर वहां पुनः व्यवस्था कायम करने का आग्रह कर चुकी है, किंतु विष्णु जी का कथन भी सही है कि वे यह कार्य अनेक बार कर चुके हैं, अतः अब किसी अन्य देवता को भेजा जाए। ऋषिवर विष्णु जी के धरती पर अनुभवों को देखते हुए हमने उनसे अनुरोध किया है, हमें विश्वास है कि वे एक बार फिर जम्बुद्वीप पर अवतार लेने राजी हो जाएंगे। वैसे भी उनका “कल्की अवतार” लेना अभी बाकी है।

नारद मुनि ने नारायण – नारायण कहते हुए गहरी सांस ली और बोले – प्रभु कहीं विष्णु जी को पहुंचने में देर न हो जाए। जम्बुद्वीप में इन दिनों नरेंद्र नामक व्यक्ति सर्वोच्च पद पर आसीन है, कोई अमित उनका सारथी है। ये दोनों ही तीक्ष्ण बुद्धि के स्वामी हैं। नरेंद्र तो चक्रवर्ती सम्राट बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उसने पूरे जम्बुद्वीप को एक रंग में रंग दिया है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान सहित विश्व के तमाम बड़े – छोटे देशों को अपनी वाणी से मोह लिया है, चीन पर भी डोरे डाल रहा है। जम्बुद्वीप का सारा विपक्ष भी एकजुट होकर उसका मुकाबला करने में असमर्थ साबित हो रहा है। यदि नरेंद्र के विजय रथ को शीघ्र नहीं रोका गया तो अनर्थ हो जाएगा। चिंतातुर देवराज बोले – हे ऋषिवर स्पष्ट बोलें – क्या अनर्थ हो जाएगा ?

नारद मुनि ने पुनः गहरी सांस ली और कहा – प्रभु जम्बुद्वीप के चंद राज्य ही उसके ध्वज से बचे हैं। जैसे ही वह संपूर्ण जम्बुद्वीप पर अपना ध्वज लहराकर और सम्पूर्ण विश्व के नेताओं को जादू की झप्पी दे देकर चक्रवर्ती सम्राट बनेगा वैसे ही उसकी नजर आपकी कुर्सी पर होगी। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि वह बहुत चतुर है। उसके पास अमित जैसा कुशल सारथी और “मामा” जैसे घोषणा वीर हैं। नारद की बातों से चिंतित देवराज अपना आसन छोड़ विष्णु जी से मिलने रवाना हो गए। वे नहीं चाहते थे कि कलयुग में कोई धरती पुत्र इतना शक्तिशाली हो जाए कि उसके कारण इंद्रासन डोलने लगे।

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८३ ☆ # “माता के दरबार में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माता के दरबार में…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८३ ☆

☆ # “माता के दरबार में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

चलो दीपक जलाएं

माता के दरबार में

श्रद्धा के सुमन चढ़ाएं

माता के दरबार में

 

नवरात्रि के पावन पर्व पर

नौ रूपों पर गर्व कर

हम भक्ति के पुष्प चढ़ाएं

माता के दरबार में

 

पृथ्वी अंबर डोल रहा है

माता की जय बोल रहा है

भक्त जन जस गा रहे हैं

माता के दरबार में

 

गली चौराहे पर पंडाल खड़ा है

माता पर श्रृंगार चढ़ा है

हर कोई भोग लगा रहा है

माता के दरबार में

 

पाप बढ़ गए हैं संसार में

धार करो मां अपने वार में

ताकि हर पापी शीश नवाएं

माता के दरबार में

 

प्रबल हो गई दुष्ट शक्तियां

लाचार हो गई भक्तों की भक्तियां

इनका संहार करो मां

माता के दरबार में

 

तेरे नाम से शक्तिपीठ है चलते

निर्धन भक्तों को हरदम है  छलते

सब पाखंडियों की हाजिरी लगाओ

माता के दरबार में

 

मन से करो पूजा

नहीं है कोई मार्ग दूजा

अपना सब कुछ दिल से लूटाओ

माता के दरबार में

 

तन मन से जो करता है भक्ति

उस पर प्रसन्न होती है शक्ति

उसको मिलता है प्रसाद

माता के दरबार में /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११५ ⇒ मक्खन भैया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मक्खन भैया…“।)

?अभी अभी # १११५ ⇒ आलेख – मक्खन भैया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे देश में जब राबड़ी देवी, जलेबी बाई और इमरती देवी हो सकती है तो क्या मक्खन भैया नहीं हो सकते। रक्षाबंधन का पवित्र शब्द भाई, जब एक बार मुंबई पहुंच जाता है, तो कभी यह मुन्नाभाई हो जाता है तो कभी सिर्फ भाई! बड़ा वजनदार शब्द हो जाता है यह भाई। मुंबई से भाईगिरी का डिप्लोमा लेने के बाद, कोई भी भाई अक्खा मुलक में अपनी दादागिरी का डंका बजा सकता है। श्याम से कहना छेनू आया था, समझ गए आप, या शुद्ध हिंदी में समझाना पड़ेगा।

मुझे जब भी बाल दिवस मनाना होता है, मैं मक्खन भैया के पास चला जाता हूं। इंदौर भी मुंबई का बेटा ही कहलाता है। यहां भैयाओं का स्टार्स चलता है। जानकीलाल भैया अगर अपनी साड़ी की दुकान चलाते हैं, तो बड़े भैया और कृपा भैया अपनी राजनीति। यहां तो भैया, सभी काम प्रेम से होते हैं, यहां तक कि हजामत भी।।

लोग मन्नत के बाद अपने बाल देने कभी तिरुपति बालाजी जाते हैं तो कभी मेहंदीपुर के बालाजी। पसंद अपनी अपनी, विश्वास अपना अपना। अगर कोरोना काल को छोड़ दिया जाए, तो एक आम भारतीय आज भी इतना स्वावलंबी नहीं हुआ, कि अपनी हेयर कटिंग खुद ही कर ले। अपने आप पर हजामत के लिए उस्तरा चलाना आसान है, लेकिन अपने बालों पर इस तरह कैंची चलाना मुश्किल है कि आप अपने ही सर के बाल काट लें।

बहुत फर्क होता है अपने सर के बाल नोंचने और कटवाने में। इसीलिए मैं गांधी हॉल के सामने, शास्त्री मार्केट में, मक्खन भैया के कोमल हाथों द्वारा अपने बाल कटवाना ही उचित समझता हूं। यों तो यह बाल दिवस मंगलवार को छोड़कर कभी भी मनाया जा सकता है, लेकिन अगर छुट्टी का दिन रविवार हो, तो यह पर्व बाल बच्चों सहित भी मनाया जा सकता है।।

यह मस्तक यूं ही किसी के सामने नत-मस्तक नहीं होता। यहां विश्वास होता है, वहीं प्रेम से हजामत करवाई जाती है। जबान और कैंची एक साथ चलाना भी एक कला है।

कैंची तो खैर एक दर्जी भी कपड़ों पर चलाता है, लेकिन वह खामोश होकर जेब काटता है। अगर कपड़ा गलत कट गया, तो समझो गला गया।

जो जूने इंदौरी हैं उनकी अपनी अपनी पसंद की दुकानें हैं। उनके अपने दर्जी हैं, अपना हेयर कटिंग सैलून है, उनका अपना अखबार है, अपनी कार, बीवी और मकान ही नहीं, अपना होटल है, अपना स्वीट्स है। यहां सभी अपने हैं।।

जहां बाल है, वहां अपनी अपनी हेयर स्टाइल है।

कभी युवाओं के लिए देवानंद कट था तो युवतियों के लिए साधना कट। कटी पतंग वाले काका, और एंग्री यंग मैन बालों को कानों के नीचे तक ले आए। हमारे बाल बाल, और उनकी ये रेशमी जुल्फें। लेडीज और जेंट्स टेलर ही नहीं, सबके अपने अपने ब्यूटी पार्लर। हम किसी से कम नहीं।

बाल सबके झड़ते हैं, सबके सफेद होते हैं। पुरुष का भाग्य कौन जान पाया! क्या हर गंजा पुरुष भाग्यशाली होता है। केश विन्यास के सुख पर वैसे तो महिलाओं का ही कॉपी राइट है, फिर भी आज की काली दाढ़ी वाले अधिकांश युवाओं के आदर्श दो सफेद दाढ़ी वाले दो भद्र पुरुष ही हैं। एक बाल नरेंद्र और दूसरे जी हां, कौन बनेगा करोड़पति। आज की बालसभा समाप्त।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२७ – किसी का यहां कोई नहीं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘किसी का यहां कोई नहीं…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२७ ☆

☆ किसी का यहां कोई नहीं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

तूने अजब रचा ये संसार,

किसी का यहां कोई नहीं,

कहने को तो सब हैं यहां,

पर संगी साथी कोई नहीं,

तूने अजब…

 

मिथ्या जगत है, मिथ्या रिश्ते,

मिथ्या सब नाते हैं,

कोई किसी के साथ न चलता,

मिथ्या सब बातें हैं,

कैसी लीला ये तेरी करतार,

किसी का यहां कोई नहीं,

तूने अजब…

 

साँस चल रही, जब तक तेरी,

रिश्ते बने हैं, सुहाने,,

ज्यों ही तेरी, सांस ये छूटे,

कोई न तुझे पहचाने,

कैसे जीवन हुआ लाचार,

किसी का यहां कोई नहीं,

तूने अजब…

 

जैसी तेरी करनी होगी,

वैसी तेरी भरनी होगी,

कर्म की गठरी लेकर तुझको,

राह अकेले चलनी होगी,

बिछे राह में शूल अपार,

किसी का यहां कोई नहीं,

तूने अजब रचा ये संसार,

किसी का यहां कोई नहीं.

 

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ झाड… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ झाड… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

☆

मन छान आशावादी त्याला मातीत पेरावे

वाढण्याला भविष्यात रान ओलिताचे हवे

ऊन पाऊस झेलतं वाढ अंकुराची व्हावी

झाड ताडमाड होता सावलीला त्याच्या जावे

* 

माणसाने माणसाला झाडा सारखे जपावे

खतं संस्काराचे त्याला वेळोवेळी देत जावे

संसाराच्या अंगणात झाड होईल आधार

कल्पतरू सम त्याला वैभव लाभावे

 *

मुळे रोवून मातीत झाड उंच उंच व्हावे

झाड दैवत घराचे ऋषितुल्य होत जावे

साधूसंता प्रमाणेच त्यांची लाभावी सवली

उपकार करणारे झाड सोन्याचे वाटावे

 *

मुळ पुरुष घराचा मग झाडाने बनावे

सांभाळाया कुटुंबाला आयुष्याचे दान द्यावे

फुले फळे वाटताना झाड हसावे डोलावे

झाड रूप माणसाचे त्याला अखंड पुजावे

☆

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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