हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (११) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (११) ? ?

मेरे शब्द

चुराने आये थे वे,

चुप्पी की मेरी

अकूत संपदा देखकर

मुँह खुला का खुला

रह गया,

मेरी चुप्पी के

वे भी पात्र हो गए!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 8:07 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – परिवार, परंपरा और कोरिया ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ संस्मरण ☆ दक्षिण कोरिया – परिवार, परंपरा और कोरिया ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार ☆

कोरिया में रहते हम भारतीयों को एक भारत प्रेमी कोरियाई मित्र मिलें….ली यंग ची! जो भी नया भारतीय प्रोफेसर विश्वविद्यालय में आता वह उनसे मिलने अवश्य आ जाते। वैसे ही वे मुझे भी मिलने आए। फिर ड़ॉ. रवीन्द्र गर्गेश, ड़ॉ. राजीव खन्ना, डॉ. रमेश शर्मा और फिर डॉ. एम. पी शर्मा इन सबसे वे मिले। फिर हम सबका एक अच्छा ग्रूप ही बना। कोरियाई संस्कृति की बहुत सी जानकारी उनसे ही हमें मिली थी। वे हमें वीक येंड पर कभी कोरिया क कुछ खास जगहों पर घूमाने ले जाते फिर वह स्प्रींग फेस्टीवल हो या,पहाडी पर बना कोई बौद्ध विहार हो, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की सीमारेखा हो या फिर घर का कोरियन भोजन हो वे हमें ले जातें, साथ आतें और कभी कभी मेरे घर आकर भारतीय भोजन भी करते। कोरिया की परिवार- व्यवस्था, वहाँ के पारिवारिक संबंध, मान-सम्मान आदि की जानकारी उनसे तथा अन्य दोस्तों से मिली। श्रीमान यंग ची ली से आज भी मैं सोशल मीडिया के ज़रिए जुडी हुई हूँ। मैं जब कोरियाई लोकोक्तियों पर यूँ ही काम कर रही थीं तो उन्होंने मुझे कई लोकोक्तियों की जानकारी दी थीं। कोरियाई संस्कृति को समझने के लिए कुछ अंग्रेजी पुस्तकें भी ला दी थीं। उनकी वजह से कोरियाई भाषा और संस्कृति को समझने में भी आसानी हो रही थी।

कोरिया मेरे लिए केवल एक विदेश में जाकर अपनी सेवाएं देना नहीं था। वह एक प्रवास भी था.. एक सांस्कृतिक प्रवास!… जिसमें मैंने आधुनिकता और परंपरा को एक साथ चलते हुए देखा। जब मैं सियोल पहुँची थी, तब मेरी आँखों के सामने एक अत्यंत आधुनिक, विकसित देश था..ऊँची-ऊँची इमारतें, चमकती सड़कें, अत्याधुनिक मेट्रो, हर हाथ में मोबाइल और भागती हुई ज़िंदगी। मुझे लगा था कि इतने आधुनिक समाज में शायद पारिवारिक जीवन केवल औपचारिकता भर रह गया होगा.. किंतु धीरे-धीरे मुझे अनुभव हुआ कि इस चमकदार आधुनिकता के भीतर एक अत्यंत गहरी पारिवारिक चेतना जीवित है।

कोरिया को समझने के लिए वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था को समझना आवश्यक है। वहाँ परिवार केवल माता-पिता और बच्चों का छोटा-सा समूह नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा, पूर्वजों, संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं से जुड़ी एक जीवित संस्था है। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था पर कन्फ्यूशियस विचारधारा का गहरा प्रभाव रहा है। चीन से आए कन्फ्यूशियस दर्शन ने सदियों तक कोरिया के सामाजिक और नैतिक जीवन को दिशा दी। विशेषकर जोसॉन राजवंश के समय परिवार को समाज की सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना गया। कन्फ्यूशियस सिद्धांतों के अनुसार माता-पिता का सम्मान, बड़ों के प्रकि आज्ञाकारिता, परिवार की प्रतिष्ठा और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य माने जाते थे। यही कारण है कि कोरिया में बच्चों को बचपन से ही विनम्रता, अनुशासन और पारिवारिक मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाता रहा।

पुराने समय में कोरिया में तीन-चार पीढ़ियाँ एक ही छत के नीचे रहती थीं। परिवार का मुखिया सबसे वरिष्ठ पुरुष होता था और उसका निर्णय पूरे परिवार के लिए अंतिम माना जाता था। बहुएँ सास-ससुर की सेवा को अपना धर्म समझती थीं और पुत्र अपने माता-पिता की अनुमति के बिना कोई बड़ा निर्णय नहीं लेते थे। यह सब सुनते-पढ़ते मुझे अपने भारतीय संयुक्त परिवारों की याद आती रहती थी। मुझे अक्सर लगता कि एशिया की संस्कृतियों में भले ही भाषाएँ भिन्न भिन्न हों, पर परिवार के प्रति भाव लगभग समान हैं।

मुझे आज भी वह दिन याद है जब मुझे और डॉ. गर्गेश जी को हमारे एक कोरियाई छात्र आलाम (कोरियन व्यक्तिवाचक नाम) ने अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया था। उनके घर में उनके बुज़ुर्ग पिता भी थे। सबसे मिलने और बातें करने के बाद मेज़ पर भोजन लगाया गया… और कहा गया कि भोजन के लिए चलें…भारतीय सहजता में हम जाकर खाने की मेज़ के पास बैठने लगें, पर बाकी सब वहीं रुके रहें मेरी समझ में नहीं ?..तभी आलाम ने मुस्कुराते हुए पर हौले से कहा, “पहले अप्पा…” हम तुरंत सँभल गएं। यही बात मैंने प्रो. ली हो जंग के घर में भी महसूस की थी। कुछ ही क्षणों में उसके पिता कमरे में आए। घर के सभी सदस्यों ने हल्का झुककर उनका अभिवादन किया और उनके बैठने के बाद ही बाकी लोग बैठें। उस दृश्य में एक शांत गरिमा थी।  अचानक मुझे अपना घर याद आ गया जहाँ बचपन में दादा जी के बैठने के बाद ही भोजन आरंभ होता था। भारत और कोरिया के बीच  हज़ारों किलोमीटर की दूरी अवश्य है, पर संस्कारों की धरती कहीं बहुत निकट है। केवल घरों में ही नहीं, सार्वजनिक जीवन में भी बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देता था। मेट्रो में युवा तुरंत अपनी सीट वृद्ध लोगों के लिए छोड़ देते थे। किसी बड़े व्यक्ति को वस्तु देते समय दोनों हाथों का प्रयोग करना सामान्य शिष्टाचार माना जाता था। भले ही पेन ही क्यों न देना हो दोनों हाथों से पकड़कर ही दिया जाता था। अभिवादन करते समय हल्का झुकना वहाँ के व्यवहार का सहज हिस्सा था। इन छोटी-छोटी बातों में मुझे संस्कारों की वह निरंतरता दिखाई देती थी जो आधुनिक जीवन की तीव्र गति के बीच भी जीवित थी। भोजन के दौरान हमने देखा कि घर का युवा बेटा अत्यंत संयम से बैठा था। वह अपने पिता के सामने ऊँची आवाज़ में बोल नहीं रहा था और न ही किसी प्रकार की असावधानी दिखा रहा था। मेरे छात्र ने बताया कि माता-पिता के सामने धूम्रपान या शराब पीना आज भी असभ्यता माना जाता है। मैंने हल्के मज़ाक में कहा, “तो फिर यहाँ के युवाओं को दो व्यक्तित्व रखने पड़ते होंगे, एक दोस्तों के साथ और एक घर में!” मेरी बात सुनकर वह झेंप गया।

कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था की सबसे अद्भुत बात मुझे यह लगी कि वहाँ दूर-दूर के रक्त-संबंधी भी स्वयं को एक ही परिवार का सदस्य मानते हैं। यदि किसी व्यक्ति का पूर्वज समान है, तो वे स्वयं को “इल्गा” अर्थात् “एक ही घराने/ परिवार/वंश” का सदस्य कहते हैं। कोरिया में बसी एक अमेरिकन प्रोफेसर मिस. एलिना जो वहाँ अंग्रेजी पढ़ाती थीं और सालों से वहीं कोरिया में थी, उसने एक दिन अपने कोरियाई मित्र को घर बुलाया था, उस समय उसने मुझे और मोशा को भी आमंत्रित किया थ…स्ट्रॉबेरी और योगहर्ट खाने के लिए। तब बातों ही बातों में उस कोरियाई महिला ने हमें अपने परिवार की वंशावली हमें दिखायी थी.. बिलकुल वंशवृक्ष बनाकर। वह बता रही थी ऐसे वंशवृक्ष में कई पीढ़ियों के नाम, जन्म, विवाह, मृत्यु, सरकारी पद और यहाँ तक कि कब्रों के स्थान तक दर्ज होते हैं। मैं आश्चर्य से उसे देखती रही। मुझे लगा जैसे मैं किसी परिवार का इतिहास नहीं, बल्कि किसी छोटे राज्य का अभिलेख ही देख रही हूँ। मोशा और मैं दंग रह गए इतनी बारीकी से विवरण दिया जाता है। वैसे अपने यहाँ भी कुछ कुछ समुदायों में ऐसी जानकारी मिलती हैं। मुझे याद है हमारे गली में कुछ खास समुदाय ( विशेषकर लिंगायत समुदाय के कोष्टि (जाडरु) समुदाय) के लोग आते थे और घर-परिवार की जानकारी अपने बही खाते में दर्ज कर जाते थे… कौन-कौन अब नहीं रहें, कौन नया सदस्य परिवार में जन्मा है इसकी जानकारी वे लेते हैं। ये सरकारी लोग नहीं होते.. ये उस खास कम्युनीटि के स्वामी जैसे लगते थे.. जिन्हें ‘हेळव’ कहा जाता था.. अर्थात सुमदाय के बारे में जानकारी देनावेला या रखनेवाला.. जो हर साल आकर घर घर जाकर जानकारी इकट्ठा कर अपने बही खाते में दर्ज कर देते थे।

दरअसल कोरिया में वंशावली केवल दस्तावेज़ नहीं बल्कि वह सम्मान, पहचान और पारिवारिक स्मृति का प्रतीक होती है। परिवार के लोग उसे लगभग किसी पवित्र ग्रंथ की तरह सुरक्षित रखते हैं। कोरिया में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुई। उसने बताया कि विशेष अवसरों पर वे अपने पूर्वजों की स्मृति में भोजन अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करते हैं। विशेष रूप से “चुसोक” जैसे पारिवारिक त्योहारों के समय पूरा कोरिया जैसे अपने मूल की ओर लौटता दिखाई देता है। लोग महानगरों से अपने गाँव जाते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर श्रद्धा अर्पित करते हैं और पूरे परिवार के साथ पारंपरिक भोजन करते हैं। उस समय मुझे बार-बार भारतीय पर्वों की याद आती थी,  ऐसे पर्वों और उत्सवों के समय घर से दूर रहने वाले लोग अपने घर लौटने का प्रयास करते हैं। मुझे लगा कि एशिया की संस्कृतियों में भी परिवार केवल साथ रहने भर की व्यवस्था नहीं है, बल्कि स्मृतियों और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी है। उस आधुनिक महानगर में यह दृश्य देखकर मुझे लगा कि समय कितना भी बदल जाए, मनुष्य अपनी जड़ों से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।

कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को समझने में वहाँ के पारिवारिक संबोधनों ने मेरी बहुत सहायता की। वहाँ हर रिश्ते के लिए अलग शब्द है और यह भी महत्वपूर्ण है कि बोलने वाला लड़का है या लड़की। लड़की अपने बड़े भाई को “ओप्पा” कहती है, जबकि लड़का अपने बड़े भाई को “ह्योंग” कहता है। बड़ी बहन के लिए “ओन्नी” और “नूना” जैसे अलग संबोधन हैं। शुरू-शुरू में मैं इन शब्दों में बहुत उलझ जाती थी। एक बार मैंने गलती से किसी महिला को “ह्योंग” कह दिया। साथ में बैठे छात्र हँसने लगे और मैं संकोच से भर उठी। बाद में वही घटना हमारी मित्र-मंडली का प्रिय हास्य प्रसंग बन गई। पर धीरे-धीरे समझ आने लगा कि ये संबोधन केवल शब्द नहीं हैं, इनके भीतर पूरा सामाजिक अनुशासन और आत्मीयता छिपी हुई है। एक और बात वहाँ संबंधों के भीतर एक विशेष भावनात्मक आत्मीयता है, जिसे कोरिया में “जोंग” (Jeong) कहा जाता है। यह ऐसा लगाव है जो केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मित्रों, पड़ोसियों और सहकर्मियों तक फैल जाता है। शायद यही कारण था कि मि.ली यंग ची, या मि. जून जैसे लोग हमारे लिए केवल परिचित नहीं रहे, बल्कि परिवार जैसे बन गए थे। मुझे कई बार लगा कि कोरियाई समाज की आत्मा इसी “जोंग” में बसती है।

ओप्पा, अम्मा जैसे संबोधनों को सुनते हुए मैं बार-बार मराठी और कन्नड भाषा से रिलेट कर करती थी। दक्षिण भारत, विशेषकर कर्नाटक की पारिवारिक संस्कृति में भी रिश्तों के लिए अत्यंत आत्मीय और सूक्ष्म संबोधन हैं, अण्णा, अक्का, अम्मा, अप्पा, अज्जी, अज्जा, चिकप्पा, माव आदि। ऐसे ही मराठी में भी हैं दादा, भाऊ, आई, बाबा, आजी, आजा, काका, मामा आदि आदि हिंदी में भी है। हमारी तरह ही कोरिया में भी किसी बड़े व्यक्ति को केवल नाम से पुकारना असभ्यता माना जाता है। बस अंग्रेजी ने सारे संबंधों को ‘अंकल’ और ‘आंटी’ में समा दिया है। कोरिया में “ओप्पा” सुनते ही मेरे मन में “अण्णा” गूँज उठता था। “अम्मा” और “अप्पा” जैसे शब्द तो इतने परिचित लगे कि कई बार मुझे लगता था जैसे मैं किसी दूर देश में नहीं, बल्कि अपने ही सांस्कृतिक परिवेश के किसी दूसरे रूप में हूँ। इन्हीं समानताओं ने मेरे भीतर कोरियाई भाषा और वहाँ की पारिवारिक व्यवस्था के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की। मुझे लगा कि एशियाई संस्कृतियों में परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक संसार का केंद्र है।

कोरिया में नामों की परंपरा भी अत्यंत रोचक है। वहाँ पहले पारिवारिक नाम और बाद में व्यक्तिगत नाम बोला जाता है, जैसे किम, यी, पाक, जून आदि। (वैसे वहाँ इतने अधिक ‘किम’ नाम वाले हैं कि वे ही लोग हँसी मज़ाक में कहते हैं कि पहाड़ से यदि एकाध पत्थर उछाला जाय तो निश्चित ही वह किसी ‘किम’ के सिर पर आकर गिरेगा) मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि विवाह के बाद भी महिलाएँ अपना पारिवारिक नाम नहीं बदलतीं। यह बात मुझे बहुत भायी, क्योंकि इससे स्त्री की मूल पहचान बनी रहती है। कोरिया में यह भी माना जाता था कि व्यक्ति का नाम उसके भाग्य को प्रभावित करता है। इसलिए बच्चों के नाम ऐसे रखे जाते थे जिनका अर्थ समृद्धि, दीर्घायु, सौभाग्य या सुंदरता से जुड़ा हो।

पुराने कोरिया में समाज कई वर्गों में विभाजित था। “यांगबान” उच्च वर्ग माना जाता था जिसमें कुलीन, विद्वान और अधिकारी आते थे। निम्न वर्गों पर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबंध थे। मैंने कही पढ़ा था कि पुराने ज़माने में उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों को “सांगनोम” (नीच लोग) कहकर पुकारते थे और उनके साथ अत्यंत तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते थे। प्रत्येक वर्ग के बीच पहनावे, रहन-सहन और भाषा के मामलों में और विशेष रूप से विवाह तथा अंतिम संस्कार की रस्मों में स्पष्ट भेदभाव और प्रतिबंध लागू थे। जो लोग इन नियमों का उल्लंघन करते थे, उन्हें कठोर दंड दिया जाता था। निम्न वर्ग के लोगों को खपरैल की छत वाले घर बनाने की मनाही थी, और सामान्य वर्ग के लोगों को अपने घरों के प्रवेश द्वार पर कोई फाटक लगाने या पत्थर की सीढ़ियाँ बनवाने की अनुमति नहीं थी। यह पढ़ते हुए मुझे भारतीय समाज की वर्गीय और जातीय संरचना की शिद्दत से याद आई। मनुष्य ने लगभग हर समाज में ऊँच-नीच की दीवारें बनाई हैं। हालाँकि आधुनिक कोरिया इन विभाजनों से बहुत आगे निकल चुका है, फिर भी पुराने शब्द और सामाजिक स्मृतियाँ कहीं-कहीं आज भी जीवित हैं।

आज का कोरिया बदल रहा है। हालाँकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने कोरिया में भी कई सामाजिक परिवर्तन ला दिए हैं। छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवाओं में अकेले रहने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है और विवाह तथा जन्म-दर को लेकर वहाँ गंभीर चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं। फिर भी मैंने अनुभव किया कि इन परिवर्तनों के बीच परिवार आज भी लोगों के भावनात्मक जीवन का सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है। आधुनिकता के बीच भी वे अपनी जड़ों को पूरी तरह छोड़ नहीं पाए हैं। महानगरों में छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, युवा पीढ़ी अधिक स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है और जीवन की गति पहले से कहीं अधिक तेज़ हो गई है। फिर भी मैंने महसूस किया कि परिवार आज भी वहाँ भावनात्मक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार है। त्योहारों पर लोग अपने गाँव लौटते हैं, पूर्वजों की कब्रों पर जाते हैं और पूरे परिवार के साथ समय बिताते हैं।

मि. ली यंग ची ने एक दिन कहा था कि “हम कोरियन आधुनिक हो सकते हैं, लेकिन परिवार को नहीं छोड़ सकते।” उनकी यह बात मेरे मन में गहराई तक उतर गई थी। कोरिया की पारिवारिक व्यवस्था को देखकर यही लगा कि संस्कृति केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं रहती, वह लोगों के व्यवहार, संबोधनों, भोजन की मेज़, पूर्वजों की स्मृतियों और बुज़ुर्गों के प्रति आदर में जीवित रहती है। सियोल की चमचमाती सड़कों और आधुनिक जीवन के बीच मैंने जो सबसे सुंदर चीज़ देखी, वह थी परिवार के प्रति उनका गहरा सम्मान, शायद इसलिए भी कि मैं भी संयुक्त परिवार में ही पली बढ़ी हूँ। बात तो आखिर यही है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। सच्ची आधुनिकता शायद वही है जहाँ मनुष्य आगे बढ़ते हुए भी अपने पूर्वजों, अपने परिवार और अपनी स्मृतियों का हाथ थामे रहता है।

कोरिया से लौटते समय मेरे साथ केवल कुछ तस्वीरें या वहाँ के मेरे वास की स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि संबंधों को देखने की एक नई दृष्टि भी थी। सियोल की चमकती रोशनियों के पीछे मैंने एक ऐसा समाज देखा जो आज भी अपने पूर्वजों की स्मृतियों, पारिवारिक संबोधनों और बुज़ुर्गों के सम्मान में अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रखे हुए है। मुझे बार-बार लगा कि एशिया की संस्कृतियाँ भले ही अलग भाषाओं में बोलती हों, पर उनके हृदय की धड़कन कहीं समान है..परिवार, स्मृति और आत्मीयता से परिपूर्ण!

*********

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, मानसगंगोत्री, मैसूरु-570006

306/40, विमल विला, निसर्ग कॉलोनी, जयनगर, बेलगाम, कर्नाटक

मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०५ ☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  “बिट्टूपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०५ ☆

☆ “’बिट्टू…” – लेखक : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक – ‘बिट्टू’ 

लेखक डॉ. संजीव कुमार

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ मातृत्व की  पावन तपस्या पर अभिनव उपन्यास – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

डॉ. संजीव कुमार का  ‘बिट्टू’ कालजयी और शाश्वत साहित्यिक मूल्यों को रेखांकित करता नया रोचक उपन्यास है। वे विविध नवाचारी विषयों, और विधाओं में इतना सारा मौलिक रच चुके हैं कि रिकॉर्ड बुक्स में लगातार दर्ज होकर साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं।

हिंदी उपन्यास साहित्य का मूल उद्देश्य मानव मन की अतल गहराइयों को छूना और समाज को एक संवेदनशील आईना दिखाना है। यह कृति इस साहित्यिक मानक पर शत प्रतिशत खरी  है।

उपन्यास  एक बंधी-बंधाई कहानी नहीं है, बल्कि स्त्री के अस्तित्व, उसकी अदम्य जिजीविषा और मर्मस्पर्शी त्याग का एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह समाज को करुणा और संवेदना के शाश्वत मूल्यों से जोड़ता है। उपन्यास की नायिका ‘बिट्टू’ एक शांत, विनम्र और बेहद हँसमुख स्त्री है, जिसका जीवन विवाह के शुरुआती दिनों में किसी मधुर गीत की तरह खुशियों से भरा हुआ था। किंतु, कहानी का मुख्य साहित्यिक द्वंद्व ‘माँ बनने की अभिलाषा’ से शुरू होता है। दस वर्षों का लंबा और मरुस्थल जैसा इंतज़ार, समाज के तीखे ताने और पारिवारिक दबाव के बीच बिट्टू का संघर्ष पाठक को भावनात्मक रूप से अपने साथ बहा ले जाता है।

लेखक ने यहाँ बड़ी कुशलता से दिखाया है कि कैसे एक स्त्री का मातृत्व केवल उसकी व्यक्तिगत इच्छा नहीं रह जाता, बल्कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा का एक क्रूर प्रश्न बना दिया जाता है।

इस कथा-प्रवाह में बिट्टू का चरित्र अटूट विश्वास और संकल्प के एक ऊंचे शिखर की तरह प्रस्तुत किया गया है। जहाँ एक ओर बिट्टू का पति उसके मातृत्व को लेकर मौन धारण कर लेता है और रूढ़िवादी समाज उसे ‘दोषी’ ठहराने लगता है, वहीं बिट्टू अपनी आस्था की लौ को बुझने नहीं देती।

 वह मंदिर, मन्नत, व्रत और डॉक्टरों के चक्कर काटकर भी हार नहीं मानती। यहाँ तक कि अपनी जान दांव पर लगाकर सर्जरी का बड़ा जोखिम उठाना, उसके इसी संकल्प को दर्शाता है कि वह अपने मातृत्व को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

लेखक की भाषा सरल होते हुए भी गहरी संवेदनाओं को व्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है। पूरी रचना में प्रतीकों और उपमाओं का बहुत ही सुंदर और ललित प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए, जब बीमारी की रिपोर्ट आती है, तो लेखक उसे “वज्रपात” के समान बताते हैं। यह ललित शैली पाठक के हृदय में आदि से अंत तक करुणा का संचार करती चलती है।

उपन्यास में संतान हीनता पर सामाजिक प्रताड़ना के यथार्थ को चित्रित करते हुए लेखक लिखते हैं कि, “शुरू-शुरू में घरवाले उसे समझाते, लेकिन धीरे-धीरे ताने और फुसफुसाहटें बढ़ने लगीं। कोई कहता- ‘शायद इसी में कोई दोष है।’ कोई कहता- ‘इतने साल हो गये, अब क्या उम्मीद!'”, यह अंश हमारे समाज की उस कड़वी और नग्न सच्चाई को उजागर करता है, जहाँ बाँझपन का सारा दोष केवल और केवल स्त्री के माथे मढ़ दिया जाता है। लेखक ने यहाँ सीधे प्रहार के बजाय “फुसफुसाहटों” शब्द का जो प्रयोग किया है, वह उस मानसिक पीड़ा को दर्शाता है जो किसी सीधे वार से भी अधिक गहरी और जानलेवा होती है। परंतु, इस घने अंधकार के बाद मातृत्व की उपलब्धि और परम तृप्ति का वह उजला क्षण भी आता है, जब वह पहली बार अपने बच्चे को गोद में लेती है। उसकी आँखों से अविरल अश्रु धारा बह निकलती हैं और वह मन ही मन कहती है,  “हे भगवान, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए… तूने मुझे माँ बना दिया।”, यहाँ बिट्टू के दस वर्षों के तप और संघर्ष का एक सुखद अंत होता है। “अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए” का यह भाव यह सिद्ध करता है कि एक भारतीय स्त्री के लिए जीवन का चरम लक्ष्य और उसकी संपूर्णता मातृत्व की प्राप्ति ही है।

परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। कहानी का सबसे कारुणिक मोड़ तब आता है जब वह ब्रेन ट्यूमर जैसी घातक बीमारी की चपेट में आ जाती है। लेकिन इस काल के सामने भी बिट्टू टूटती नहीं है, बल्कि वह नियति और मृत्यु पर अपनी ममता से विजय प्राप्त करती है। अपने अंतिम दिनों में, वह काँपते हाथों से अपने मासूम बच्चे के सिर पर हाथ रखती है और कहती है,  “बेटा, मज़बूत बनना। माँ ने तेरे लिए बहुत इंतज़ार किया था… अब तू ही मेरा संसार है।” मृत्यु के द्वार पर खड़ी होकर भी अपने बेटे के भविष्य की यह चिंता और उसके चेहरे की शांति यह संकेत देती है कि उसने अपनी जीवन-साधना पूरी कर ली है। अब उसे मृत्यु का कोई भय नहीं है।

साहित्यिक मानकों की कसौटी पर यदि हम इस कृति को परखें, तो ‘बिट्टू’ बांझपन की सामाजिक विसंगति पर एक अत्यंत सफल, प्रौढ़ और श्रेष्ठ उपन्यास सिद्ध होता है। अरस्तू के प्रसिद्ध ‘विरेचन सिद्धांत’ के अनुसार, जो साहित्य पाठक के मन के विकारों को धोकर उसे करुणा से पवित्र कर दे, वही उत्तम साहित्य है। यह उपन्यास पाठक के भीतर इसी पवित्र करुणा का संचार करता है। भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों वस्तु,  अर्थात् पात्र-चित्रण, रस और उद्देश्य के कड़े मानकों पर यह रचना पूरी तरह सुदृढ़ और संतुलित है। इसका शिल्प और इसका कथ्य दोनों ही उच्च कोटि के हैं। डॉ. संजीव कुमार ने एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायक कृति हिंदी साहित्य को सौंपी है, जो पाठकों को पुस्तक बंद करने के बाद भी देर तक सोचने पर विवश करती है। यह उपन्यास दुःख की राख से अपनी खुशियों का संसार बुनने वाली एक साधारण स्त्री के असाधारण और कालजयी महागाथा बनने की अमर कहानी है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२२ – है जीवन क्षण भंगुर प्यारे… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२२ ☆

☆  है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

है जीवन क्षण भंगुर प्यारे।

बन कर जियो बहादुर प्यारे।।

*

सद्भावों के बीज बोइए।

निकस पड़ें सद्-अंकुर प्यारे।।

*

जीवन में घिर आते संकट।

कभी न होना आतुर प्यारे।।

*

होती आत्म परीक्षा निशिदिन।

कभी न बनना निष्ठुर प्यारे।।

*

आएँगें शादी के दिन जब।

गूँजेंगे मंगल सुर प्यारे।।

*

छल-छद्मों की है यह दुनिया।

कहे जगत से माहुर प्यारे।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

29/5/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ – 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा 2 जून रोटी समारोह ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ ☆

🌻लघु कथा🌻 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ 

एक शानदार होटल में बड़े – बड़े पोस्टरों में रोटी की सुंदर सुंदर तस्वीरें लगा दिखाई दिया। डीजे बजाये जा रहे थे। बढ़िया डेकोरेशन चमचमाते टेबिल कुर्सीयाँ और मदमस्त लोग।

सुरमई शाम और हल्की सी बारिश के बीच मौसम खुशनुमा हो चला। परिवार सहित लोग आते जाते दिखे।

जो आसपास से निकल रहे थे बस भिन्न- भिन्न सजी रोटियों की तस्वीरें देख ठिठक जा रहे थे।

एक महिला दो बच्चों को लिए धीरे- धीरे दरवाजे पर पहुंच गई।

नया होटल खुला है क्या?

एक जोरदार ठहाका–

किसी ने कहा — इसे कौन बुला लिया। इस सेलिब्रेशन में।

महिला ने फिर पूछा — यदि होटल नया है तो किफायती दाम में आज रोटी मिल जायेगी। थोड़े से पैसे है मेरे पास बच्चों का पेट भर जायेगा।

धक्का देते किसी ने कहा — यहाँ दो जून रोटी सेलिब्रेशन हो रहा है। रोटी नही मिलेगी।

दोनों बच्चे पोस्टर पर ललचाते हुए हाथ फेर रहे थे। उनका पसीना शायद दो जून की रोटी के लायक नही बहा था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७९ – देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७९ ☆ देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

सोशल मीडिया अपने आप को समाज का बहुत बड़ा शुभचिंतक मानता है। इसकी पैरवी करने वाले तो ये तक कह देते हैं, कि “सोशल मीडिया ही समाज का वास्तविक आईना है”।

दिल को बहलाने के लिए ख्याल बुरा नहीं है, ग़ालिब! अलग अलग तरह के आईने भी आपकी शक्ल को विभिन्न  आकारों में दिखा देते हैं। पतले व्यक्ति को मोटा और मोटे व्यक्ति को पतला बताने वाले आईने हमने भी बहुत देखें हैं।

आज प्रातःकालीन भ्रमण पर एक परिचित के घर के सामने से निकलते हुए, एक पेशे से सेवानिवृत वकील साहब मिल गए, उनके चाय के आग्रह को मना नहीं करते हुए, हम उनके घर चले गए।

उनकी पत्नी टीवी के सामने कापी पेन लेकर बैठी थी। वो बोली अभी दस मिनट सब शांत बैठे रहें, उसके बाद ही चाय की व्यवस्था करूंगी।

टीवी के किसी समाचार चैनल पर भविष्य वक्ता कुछ जानकारी दे रहे थे, वो कॉपी में लिखती जा रही थीं। वकील साहब भी अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे। दस मिनट बाद बड़ी कठिनाई के बाद काग़ज़ के छोटे से कप में एक बड़ी चम्मच की मात्रा के बराबर चाय प्राप्त कर, हम अपने होठ ही गीले कर पाए।

वकील साहब की पुत्री एक बड़े हॉस्पिटल में महिला चिकित्सक हैं। भाभी जी भविष्य वक्ता द्वारा “सिजेरियन ऑपरेशन” के लिए अच्छे समय की जानकारी नोट कर रही थी। उनकी पुत्री उस समय किए जाने वाले ऑपरेशन का अधिक/ विशेष चार्ज, वसूल सकें। वकील साहब भी मुकदमा दायर करने का सबसे बढ़िया समय कौन सा है, की जानकारी बार काउंसिल को प्रतिदिन देते है, ताकि वकील उस विशेष समय के लिए अतिरिक्त राशि फीस के नाम पर लूटी जा सके।

चाय के समय वकील साहब बोले, कल ही बिटिया की सगाई टूट गई है। हमें भी आश्चर्य हुआ,  तब वो बोले लड़के वाले कहते है, किसी भी वकील की बेटी से विवाह नहीं करेंगे, वर्ना भोपाल वाली त्रिशा जैसा कुछ हो ना जाए। वो बहुत दुखी मन से बोले, समाज में लोग वकीलों से पारिवारिक संबंध जोड़ने से मना करने लगे हैं। आगे बोले पड़ोस में रहने से भी लोग डरते हैं। वकील के घर के आस पास जमीन भी तो सस्ती मिल जाती है।

बहुत देरी से मुंह में रखे हुआ गुटखा थूकने का समय आ गया है। इसलिए लेखनी को विराम देता हूँ।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००७ ⇒ उबासी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उबासी।)

?अभी अभी # १००७ ⇒ आलेख – उबासी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो सुबह बासी मुंह उठते ही आ आए, उसे उबासी कहते हैं। सुबह जब, रात भर की थकान के कारण आँखें खुलने से इंकार कर देती हैं, तब मजबूरन मुंह को अपना मुंह खोलना पड़ता है। उबासी बिना किसी ऑक्सीजन के सिलेंडर के, शरीर को निःशुल्क प्राणवायु सप्लाय करती है, बिना किसी शुक्रिया, करम, मेहरबानी के।

उबासी को अंग्रेजी में yawn याॅन कहते हैं। भले ही उबासी आए न आए, यॉन शब्द का उच्चारण करने के लिए पूरा मुंह तो खोलना ही पड़ता है। उबासी आलस्य और सुस्ती का प्रतीक है। जब सामने वाला आपके मन की नहीं, उबाऊ, अनावश्यक और बेतुकी बातें करने लगता है, तो आपके दिमाग़ का दही हो जाता है, और आप कितना भी कंट्रोल करें, अपनी जबान को लगाम दें, मुंह खुल ही जाता है, और उबासी अपनी असहमति प्रकट कर ही देती है।।

जिनकी सुराही सी गर्दन होती है, और छोटा, मासूम सा मुंह, उन्हें उबासी लेते वक्त बड़ी तकलीफ होती है। उबासी के वक्त मुंह अपनी मनमानी करता है, किसी की नहीं सुनता, और अपनी हैसियत से भी ज्यादा खुल जाता है। जिस कारण चेहरे की नसें भी तन जाती हैं और कभी कभी मुंह भी दुखने लगता है। बेचारे नवजात शिशु भी इस उबासी से नहीं बच पाते और जब उबासी के कारण उनका मुंह उनकी चेहरे की रचना से अधिक खुल जाता है, तो तनाव के दर्द के कारण, वे बेचारे अनायास ही रो पड़ते हैं। उस समय अगर आसपास कोई ना हो, तो बच्चे के रोने का कारण भी पता नहीं चल पाता।

हिचकी, डकार और उबासी वायु के अवरोध के शारीरिक विकार हैं। अधिक खाने से डकार, दिमागी थकान के कारण उबासी और हिचकी की तो पूछिए ही मत।

न जाने क्यों, हिचकी को किसी की याद से जोड़ दिया गया है। डकार और उबासी को गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन कभी कभी जब हिचकियां बंद ही नहीं होती तो इसे हलके में नहीं लिया जाता। एक तरह का सांस का अवरोध ही तो है हिचकी। छींक और खांसी भी नाक और गले के ही सामान्य अवरोध हैं जिनकी सतत उपेक्षा नजला, सर्दी जुकाम और दमा – खाँसी को जन्म दे सकती है।।

एक वायु विकार और है जिसका असर वातावरण पर ही नहीं, ओज़ोन की परत तक पड़ता है, शालीन भाषा में इसे गैस की ट्रबल कहते हैं। उबासी अगर ठंडी बासी है, तो यह तो भयंकर बदबू है। लोग भी अजीब हैं, मूली के परांठे खा खाकर दुश्मनी निकालते हैं। उबासी अगर यॉन है तो यह अंग्रेजी का fart फार्ट है। आपने किशोर कुमार का वह गीत तो सुना ही होगा ; फार्ट मेरी जान, फटाफट फट। बात मेरी मान फटाफट फट।

यकीन मानिए, उबासी हो या डकार, हिचकी हो या फार्ट, सभी शरीर के नैसर्गिक साफ सफाई की युक्तियां हैं। ये ऐसे संकेत हैं, जिनकी अनदेखी करने से ही शरीर में विकार उत्पन्न होते हैं। एक तरह का अलार्म सिस्टम है यह। रात को सोने का वक्त हो गया, उबासी संकेत देती है, आप ध्यान नहीं देते। जब तक डकार नहीं आती, खाते ही रहते हैं। शरीर हिलेगा डुलेगा नहीं तो वायुमंडल तो डोलेगा ही। अगर आपका ड्राइवर वाहन चलाते वक्त उबासी ले रहा हो, तो तत्काल पैदल हो लें, या उसे पैदल कर दें। अभी हमें खुदा के पास नहीं जाना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२९ ☆ उन्मात स्पर्श… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२९ ?

☆ उन्मात स्पर्श… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

येताच सूर्य ‘मे’चा ही पेटतेय काया

मित्रा तुझ्यात का ती, ती शोधतेय काया

*

हा सूर्य तापलेला करतोय सावळे मज

कृष्णा तुझ्याप्रमाणे ही शोभतेय काया

*

मी अर्घ्य रोज देतो आहे तुला तरीही

घामेजताच सारी का वाळतेय काया

*

स्नायू दुखावल्यावर रगडून अंग घेतो

तेलात ही सुखाने बघ खेळतेय काया

*

थंडी अशी गुलाबी झाली सुरू अचानक

नाजूक ओठ फुटती अन् फाटतेय काया

*

व्याधी व्यथा वयाच्या छळतात रोज आता

डोक्यास बाम रोजच ही मागतेय काया

*

स्पर्शात कालची ती अतृप्त ओढ नाही

उन्मात स्पर्श आता का टाळतेय काया

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ – जीवन नित्य विजय – ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ जीवन नित्य विजय  ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

जीवनात काही हरवत नाही

जीवन हरणे गिरवत नाही

जगण्यास मार्ग अनेक असती

कधी कुणी मनी ठरवत नाही.

*

वर्तमानाला सामोरे जावे नित्य

नशीब केंव्हा अहं मिरवत नाही

अट्टाहास निराशा पसरवी भाव

आनंद कुणा दुःख भरवत नाही.

*

क्षितीजा गवसनी स्वप्ने स्वाभाविक

अपयश प्रयत्ना जीरवत नाही

कितीही दुरचा रस्ता ध्येयासाठी

कापत जाता, जिद्द हरवत नाही.

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “चुकेल तो शिकेल” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

☆ “चुकेल तो शिकेल☆ श्री जगदीश काबरे ☆

एखाद्या व्यक्तीला “मी कधीच चुकत नाही” किंवा “माझी विचारसरणीच अंतिम सत्य आहे” अशी ठाम खात्री वाटू लागते, तेव्हा ती केवळ त्याच्या मतांवर ठाम असते असे नसून, तिच्या संपूर्ण मानसिक रचनेत एक प्रकारचा बंदिस्तपणा निर्माण झालेला असतो. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोनातून ही अवस्था ‘cognitive rigidity’ म्हणजेच विचारांतील कठोरता दर्शवते. अशा व्यक्तीला नवीन माहिती, विरोधी मत किंवा आत्मपरीक्षण स्वीकारणे कठीण जाते, कारण त्यातून तिच्या ‘स्व’बद्दलच्या प्रतिमेला धक्का बसण्याची भीती असते. परिणामी, ती व्यक्ती एकाच विचाराच्या चौकटीत अडकून राहते आणि चकवा लागल्यासारखे त्याच प्रश्नाभोवती वारंवार फिरत राहते. हे वर्तन बाहेरून हट्टीपणासारखे दिसते, पण आतून ते असुरक्षिततेशी जोडलेले असते.

या प्रक्रियेमागे ‘confirmation bias’ ही एक महत्त्वाची मानसिक प्रवृत्ती कार्यरत असते. म्हणजे, माणूस आपले आधीचे मत बरोबर ठरवणारीच माहिती स्वीकारतो आणि विरोधी माहिती नाकारतो किंवा दुर्लक्ष करतो. त्यामुळे “मीच बरोबर आहे” ही भावना अधिकाधिक दृढ होत जाते. यात अहंकाराची जोड, व्यक्तीचे मत आणि तिची ओळख हे सगळे गुणावगुण एकरूप होतात. त्यामुळे मत चुकले आहे हे मान्य करणे म्हणजे स्वतःलाच कमी लेखणे, अशी भीती निर्माण होते. यामुळे व्यक्ती वस्तुनिष्ठ विचार करण्याऐवजी आत्ममग्नतेत गुरफटते.

एखाद्या रुग्णाने “मला काहीच आजार झालेला नाही” असे ठरवले, तर तो निदान, तपासणी आणि उपचार या सगळ्यांपासून दूर राहतो. परिणामी आजार अधिक बळावतो. त्याचप्रमाणे, विचारांच्या पातळीवरही “मी चुकूच शकत नाही” ही धारणा व्यक्तीला आत्मसुधारणेपासून रोखते. ती स्वतःच्या विचारांकडे नव्या दृष्टीने पाहत नाही, त्यामुळे चुका सुधारण्याची संधीच नाकारली जाते. असे वास्तव नाकारणे, हा एक प्रकारचा मानसिक बचावात्मक प्रतिसाद असतो. याउलट, विवेकशीलता म्हणजे स्वतःच्या विचारांवरही प्रश्न विचारण्याची तयारी ठेवणे ही बौद्धिक नम्रता प्रगतीसाठी अत्यावश्यक असते. माणूस चुकतो आणि आपणही चुकू शकतो, हे मान्य केल्यावरच तो नवीन शिकण्यास, बदल स्वीकारण्यास आणि अधिक व्यापक दृष्टिकोन विकसित करण्यास तयार होतो. डोळ्यावरचा धुरकट चष्मा पुसण्याची तयारी असणे हीच खरी प्रगतीची सुरुवात असते.

अशा पार्श्वभूमीवर, “मीच बरोबर” या आत्ममग्नतेत अडकलेली व्यक्ती केवळ स्वतःच्या बौद्धिक विकासालाच अडथळा ठरत नाही, तर व्यापक सामाजिक संवादालाही बाधा आणते. कारण संवादाचा गाभा हा परस्परांचे ऐकण्याची तयारी, स्वतःच्या भूमिकेवर पुनर्विचार करण्याची क्षमता आणि सत्याच्या शोधात लवचिक राहण्याच्या वृत्तीमध्ये असतो. जेव्हा एखादी व्यक्ती आपल्या मतांना अंतिम सत्य समजते, तेव्हा ती प्रत्यक्षात सत्याच्या शोधापासून दूर जात असते आणि स्वतःच्या विचारांच्या प्रतिध्वनीतच अडकून पडते. खरी विवेकशीलता ही अचूकतेच्या दाव्यात नसून, चुकण्याची शक्यता मान्य करण्याच्या प्रामाणिकपणात आणि त्या चुकांमधून स्वतःला सतत सुधारण्याच्या धडपडीत असते. म्हणूनच बौद्धिक प्रगतीचा मार्ग हा आत्ममग्नतेतून नव्हे, तर शंकांना सामोरे जाण्याच्या धैर्य आणि आत्मपरीक्षणाच्या सवयीमधूनच उलगडत जातो, हे आपण जेवढ्या लवकर लक्षात घेऊ तेवढे बरे. 

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक विज्ञान आणि वैज्ञानिक दृष्टीकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail. com

मो ९९२०१९७६८०

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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