हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६७ ☆ व्यंग्य – “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” ।)

बस यूँ ही, बैठे ठाले:-

☆ शेष कुशल # ६७ ☆

☆ व्यंग्य – “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन – शांतिलाल जैन 

थैंक यू मि. स्टीव चेन, आपने स्किप का बटन बनाया. न बनाया होता तो चिढ़, खीज और झुँझलाहट के मारे अपन इतने बाल नोंच चुके होते कि आनेवाले सात जन्मों तक गंजे ही जन्म लेते.

सोचिए श्रीमान्. आप यू-ट्यूब पर हैं. डियर शशांक दुबे की रिकमंडेशन पर, शंकर-जयकिशन की धुन पर, लता मंगेशकर के गाने पर झूम रहे हैं. ‘अज़ीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू..’ कि एक चीनी मास्टर आपको रोज़ाना 15 मिनट ताई-ची करने को कह रहा है. अनचाहे ही, थोड़ी-थोड़ी देर में वो आपसे मुख़ातिब होता है, बाहर झूलती तोंद से निजात दिलाने का पैकेज आपको बेचना चाहता है. आप खीजते हैं,  झल्लाते हैं,  फिर स्क्रीन पर स्किप बटन के उभरने का बेसब्री से इंतिज़ार करते हैं. अब आपने साँस रोक ली है, चौकन्ने हो गए हैं, पूरी एकाग्रता से तर्जनी तैयार करके रखी है, स्किप का बटन उभरा और आपने दबाया. थैंक गॉड. राहत की एक लम्बी सांस ले पाए आप. कॉकरोच जैसी जीजिविषा वाले विज्ञापनों को आप किल तो नहीं कर पाए मगर कुछ देर के लिए निजात पा लेते हैं. वे फिर आएँगे. बार-बार आएँगे. तर्जनी अभिशप्त है. वो ईवीएम का बटन दबाए कि स्किप का – जिन्हें हटाना चाहती है वे ही बार बार लौट आते हैं.

स्किप एक जिद्दी बटन है श्रीमान्. समय से पहले हटेगा नहीं. टाईमर लगा होता है. स्किप ऐड इन फ़ाईव सेकंड्स. यही पाँच सेकंड्स आपके सुभाव में सेरेनिटी, आपके धैर्य, आपकी सहनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं. आप फेल भी हो सकते हैं. फिंगर है श्रीमान्, टारगेट से चूकी और एक विज्ञापन सा खुल जाता है, आप संसार के सबसे लक्की फेलो हैं. बस एक क्लिक और!! ये आपकी दुनिया बदल सकता है. जीवन में हर कष्ट स्थायी नहीं होता, कुछ कष्ट केवल पाँच सेकंड्स के होते हैं, लेकिन दिन में कई-कई बार होते हैं. निदान की शर्त बस इतनी कि आपकी नज़र स्क्रीन पर बनी रहे और आपकी अंगुली सही समय पर सही स्थान पर पहुँचे.

इन दिनों राष्ट्रीय प्रतीकों के बदलने की बहस सी चल रही है. स्किप बटन को राष्ट्रीय बटन घोषित करने का यही सही समय है. स्किप सही मायनों में समाजवादी, लोकत्रांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष बटन जो ठहरा. संविधान के अनुच्छेद 15 का अनुपालन करता है. धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करता. स्त्री पुरुष, गरीब अमीर, शहरी ग्रामीण, अगड़ों-पिछड़ों के, सबके फोन में समभाव से उभरता है. ये भजन के बीच भी उसी शिद्दत से उभर आता है जिस शिद्दत से गुरबानी, कव्वाली या साम-गीत के दौरान उभरता है. जाने किस धातु का बना है, रात में भी आराम नहीं करता. जब आप भारत में सो रहे होते हैं तब ग्लोब के दूसरी ओर की दुनिया के लोग इसे दबा रहे होते हैं. ईडन गार्डन से सिलिकॉन वैली तक मानव सभ्यता के सफ़र में सबसे ज्यादा दबाए जानेवाला बटन कोई है तो वो स्किप का बटन है. आदम और हव्वा के बीच सेब तो अब भी एक ही है,  मोबाईल दो हो गए है. सेब तो बाद में भी खा लेंगे फ़िलवक्त दोनों अपने अपने स्किप दबाने में बिजी हैं. अंगुली और स्किप बटन के बीच जुगलबंदी कुदरत की सबसे बड़ी सौगात है. 

एक अनुमान है कि दुनियाभर में तर्जनियाँ एक दिन में कोई टेन मिलियन टाईम्स तो स्किप का बटन दबा ही लेती हैं. इंसा इन दिनों परमात्मा को कम याद करता है, स्किप ज्यादा दबाता है. लोग सारांश पढ़ते हैं, किताबें स्किप कर जाते हैं. रील देखते हैं, व्याख्यान स्किप कर जाते हैं. हेडलाइन पढ़ते हैं, विश्लेषण स्किप कर जाते हैं. स्किप संस्कृति की जकड़ में है समय समाज. बाज़ार ने सभ्यता के दाएँ कोने में एक अदृश्य स्किप बटन लगा दिया है, जहाँ सिर्फ मैं और मेरी पसंद ही मायने रखती हैं बाकी कसमें-वादे, प्यार-वफ़ा, रिश्ते-नाते सब कुछ स्किप किए जा सकते हैं.

स्किप स्कूल के जमाने में अपन का सबसे पसंदीदा एक्शन हुआ करे था, क्लास स्किप करना सबसे पसंदीदा शग़ल था, बेंत की मार पड़ा करती थी. पिताजी को भी हमें जुतियाने का चाहत भरा अवसर मिल जाया करता. इसके बावजूद स्किप अपन का पसंदीदा एक्शन बना रहा. आज भी सबसे पसंदीदा एक्शन है. थैंक यू मि.स्टीव चेन.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ वह छूटा हुआ मौका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, मेरा इंटरव्यू कैंसल हो गया!” निखिल ने फोन पर लगभग चीखते हुए कहा।

“अच्छा… क्यों?”

“कंपनी ने आखिरी समय पर मेल भेज दिया। तीन महीने से तैयारी कर रहा था। आज सुबह से मन ही मन पूरा इंटरव्यू दे चुका था। अब कह रहे हैं—‘नई तारीख बाद में बताएँगे।’”

माँ ने धीरे से पूछा, “तो क्या हुआ?”

“क्या हुआ?” निखिल हँसा, “आपको पता भी है यह नौकरी मेरे लिए कितनी जरूरी थी?”

“हाँ बेटा, पता है।”

“नहीं माँ, आपको नहीं पता। घर का किराया, लोन की किस्त… सब कुछ इसी नौकरी पर टिका था। मुझे लगा था आज सब बदल जाएगा।”

माँ कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर बोलीं, “तुमने अपना काम तो पूरा किया था न?”

“हाँ।”

“फिर?”

“फिर क्या? अब इंतज़ार करूँ।”

“कर लो।”

“बस? इतनी आसानी से?”

माँ हल्के से हँसीं, “बेटा, कुछ चीज़ें हमारे हाथ में होती हैं और कुछ नहीं। जो हमारे हाथ में नहीं, उसे पकड़े रहने से हाथ ही दुखता है।”

निखिल कुछ नहीं बोला।

“माँ…”

“हाँ?”

“अगर यह नौकरी नहीं मिली तो?”

“तो तुम क्या करोगे?”

“पता नहीं।”

“और अगर मिल गई तो?”

“तब… सब ठीक हो जाएगा।”

माँ फिर चुप हो गईं।

“क्या हुआ माँ?”

“कुछ नहीं। बस सोच रही थी… इंसान अक्सर जिस दरवाज़े के सामने खड़ा होता है, उसे ही अपनी मंज़िल मान लेता है।”

“आप फिर पहेलियाँ बुझाने लगीं।”

“नहीं बेटा,” माँ ने मुस्कुराकर कहा, “मैं तो बस पूछ रही हूँ—अगर दरवाज़ा देर से खुले तो क्या हम मान लें कि घर में कोई और रास्ता है ही नहीं?”

निखिल ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उसी समय उसके मोबाइल पर एक नया मेल आया।

उसने स्क्रीन देखी।

कुछ सेकंड तक चुप रहा।

“माँ…”

“हाँ बेटा?”

“कल एक जगह और इंटरव्यू है। मैंने वहाँ आवेदन तो किया था, लेकिन पहली नौकरी की उम्मीद में उसे लगभग भूल ही गया था।”

माँ मुस्कुराईं, “तो अब?”

निखिल ने खिड़की से बाहर देखा। चेहरे पर सुबह वाली बेचैनी नहीं थी।

“अब लगता है… कल जल्दी उठना पड़ेगा।”

माँ हँस पड़ीं।

“हाँ बेटा, कभी-कभी जिंदगी हमारी योजना बदल देती है… ताकि हम वह रास्ता देख सकें, जिस पर हमने ध्यान ही नहीं दिया था।”

निखिल ने फोन रखा और अगली सुबह की तैयारी में लग गया।

बाहर रात गहरी हो रही थी।

और उसके भीतर… जैसे कोई नया सवेरा धीरे-धीरे उतर रहा था।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ 🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें 🌱 

🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें—क्या 189/195 झीलें कभी भी फट सकती हैं?

🇳🇵 नेपाल की त्रासदी से सबक, लेकिन घबराहट नहीं

नेपाल में हुई भीषण हिमालयी त्रासदी ने स्वाभाविक रूप से पूरे हिमालय को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच एक प्रमुख अखबार की यह सुर्खी सामने आई—

“चिंता… देश में 189 ग्लेशियर झीलें फटने की स्थिति में, पूरे हिमालय में 7500 ऐसी झीलें।”

सुर्खी निश्चित ही डर पैदा करती है। लेकिन क्या वास्तविक स्थिति इतनी भयावह है?

थोड़ा तथ्य समझना उपयोगी होगा। 🔍

🏔️ 7,500 का मतलब क्या है?

भारतीय हिमालय में हजारों छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें हैं। National Remote Sensing Centre (NRSC) ने उपग्रहों की सहायता से 7,500 से अधिक ग्लेशियल झीलों को मैप किया है। ये 7,500 ऐसी झीलें नहीं हैं जिन्हें सरकार ने “फटने के कगार पर” माना है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कुल संख्या इससे भी काफी अधिक—लगभग 28,000 ग्लेशियल झीलों—की है। 7,500 का आंकड़ा उन झीलों से सम्बद्ध है जिन्हें उपग्रह आधारित अध्ययन में चिन्हित/मैप किया गया है।

🚨 फिर 189 या 195 का क्या अर्थ है?

यहीं पर समाचार की सुर्खी और वास्तविकता के बीच फर्क समझना जरूरी है।

NDMA ने विभिन्न वैज्ञानिक आंकड़ों, उपग्रह चित्रों और अन्य अध्ययनों को मिलाकर जोखिम-प्रधान झीलों की एक dynamic list तैयार की है।

2024 में इस सूची में 195 high-risk glacial lakes थीं। इससे पहले 189 का आंकड़ा प्रचलित था। अर्थात् 189 कोई “189 झीलें अभी फटने वाली हैं” वाली संख्या नहीं थी।

और high-risk का अर्थ “किसी भी क्षण फटने वाली” भी नहीं है।

इसका अर्थ है कि इन झीलों में ऐसे जोखिम-संकेत पाए गए हैं—जैसे क्षेत्रफल में तेजी से वृद्धि—जिनके कारण इनके संभावित GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का वैज्ञानिक आकलन और जोखिम-निवारण प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।

🛰️ क्या सरकार केवल आंकड़े गिन रही है?

नहीं।

सरकार ने इस खतरे को गंभीरता से लेते हुए National Glacial Lake Outburst Flood Risk Mitigation Programme (NGRMP) शुरू किया है। इसके अन्तर्गत high-risk झीलों का ground assessment, जलस्तर और मौसम की निगरानी, bathymetric surveys, early-warning systems तथा आवश्यकता के अनुसार झील का जलस्तर कम करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।

Central Water Commission भी हिमालयी क्षेत्र में बड़ी ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की नियमित निगरानी करता है और GLOF के लिए अधिक संवेदनशील अवधि में monitoring bulletins जारी करता है।

🇳🇵 नेपाल की त्रासदी हमें क्या बताती है?

नेपाल में हुई हालिया आपदा को केवल यह कहकर समझना भी सही नहीं होगा कि “एक ग्लेशियर झील फट गई और बाढ़ आ गई।”

उपलब्ध प्रारम्भिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, वहां glacier/ice-rock collapse और debris flow की cascading घटना ने नदी में अचानक अत्यन्त शक्तिशाली बाढ़ पैदा की। अर्थात् हिमालयी खतरे अनेक रूपों में सामने आ सकते हैं—glacial lake outburst, glacier collapse, landslide, debris flow अथवा प्राकृतिक अवरोध टूटने के रूप में।

🌡️ फिर असली चिंता क्या है?

चिंता जरूर है—लेकिन घबराने की नहीं, जागरूक होने की।

बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और कुछ ग्लेशियल झीलों के विस्तार से हिमालय की प्राकृतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए वैज्ञानिक निगरानी, early-warning systems, downstream hazard mapping, स्थानीय समुदायों की तैयारी और संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर सावधानी अत्यन्त आवश्यक है।

लेकिन “हिमालय में 7,500 झीलें हैं और 189 कभी भी फट सकती हैं” कहना उपलब्ध सरकारी आंकड़ों का सही अर्थ नहीं है।

🌱 सही निष्कर्ष

न तो खतरे को नकारना समझदारी है,

न ही आंकड़ों को सनसनी में बदलना।

हिमालय हमें चेतावनी दे रहा है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की गुंजाइश कम होती जा रही है। इसका उत्तर डर फैलाना नहीं, बल्कि विज्ञान, सतर्कता, बेहतर आपदा-प्रबंधन और पर्यावरण-सम्मत विकास है।

🏔️ हिमालय को डर की नजर से नहीं,

समझ और सम्मान की नजर से देखने का समय है।

🌿 जागरूक रहें। घबराएँ नहीं।

प्रकृति को समझें—और उसकी सीमाओं का सम्मान करें।

प्रस्तुति: जगत सिंह बिष्ट 🪷

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३१ – इंटरव्यू की नीली टाई – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – इंटरव्यू की नीली टाई।)  

☆  चुभते तीर # १३१ – व्यंग्य  – इंटरव्यू की नीली टाई ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास के पास नौकरी का सिर्फ एक आखिरी मौका बचा था। ‘एपेक्स ग्रुप’ का इंटरव्यू शहर का सबसे कड़ा इंटरव्यू माना जाता था, जहाँ पैनल के लोग जवाब से ज़्यादा उम्मीदवार के जूते की पॉलिश और टाई की गांठ देखकर फैसला सुनाते थे। विकास ने अपनी अलमारी का कोना-कोना छान मारा, लेकिन उसे अपनी पुरानी नीली टाई कहीं नहीं मिली।

समय हाथ से रेत की तरह फिसल रहा था। सुबह नौ बजे का इंटरव्यू था और आठ बज चुके थे। मजबूरी में विकास ने अपने छोटे भाई की एक चमकीली रेशमी टाई उठाई, जिस पर छोटे-छोटे पीले कार्टून बने हुए थे। वह दिखने में किसी गंभीर कॉर्पोरेट अफ़सर की टाई कम और बच्चों के जन्मदिन की सजावट ज़्यादा लग रही थी।

विकास जब इंटरव्यू रूम के बाहर पहुँचा, तो वहाँ बैठे बाकी उम्मीदवारों को देखकर उसका बचा-कुचा आत्मविश्वास भी उड़ गया। सब काले सूट और गंभीर चेहरों के साथ ऐसे बैठे थे जैसे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का विलय करने आए हों। सब विकास की कार्टून वाली टाई देखकर मन ही मन हंस रहे थे।

कमरे के अंदर से बुलावा आया। विकास ने गहरी सांस ली, भगवान का नाम जपा और अंदर प्रवेश किया। सामने तीन पैनलिस्ट बैठे थे, जिनके चेहरों पर इतनी गंभीरता थी कि मानो उन्होंने आखिरी बार मुस्कुराहट दस साल पहले देखी हो।

मुख्य इंटरव्यूअर, मिस्टर मेहरा ने विकास की फ़ाइल देखी, फिर चश्मा नीचे करके उसकी टाई पर नज़र टिका दी। पूरे दो मिनट तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा। विकास के दिल की धड़कन ऐसे चल रही थी जैसे किसी पुरानी बस का इंजनों चालू हो रहा हो।

मिस्टर मेहरा ने कड़क आवाज़ में पूछा, “विकास, यह इंटरव्यू देश की शीर्ष टेक कंपनी के लिए है। क्या आप हमें बता सकते हैं कि इस गंभीर माहौल में ऐसी बचकानी टाई पहनकर आने के पीछे आपकी क्या रणनीति है?”

विकास जानता था कि सच बोलने पर उसकी नौकरी का पत्ता हमेशा के लिए कट जाएगा। उसने अपनी आंखें बंद कीं, एक पल सोचा और सीधा होकर बोला, “सर, आजकल की कॉर्पोरेट दुनिया तनाव से भरी पड़ी है। जब आपकी टीम रात को दो बजे तक काम कर रही होगी और हर तरफ़ दबाव होगा, तब मेरा काम सिर्फ़ कोडिंग करना नहीं होगा। जब भी मेरी टीम तनाव में मुझे देखेगी, इस टाई को देखकर उनके चेहरे पर एक सेकंड की मुस्कान आ जाएगी। यह टाई मेरी असफलता का डर भगाने का चिन्ह है।”

तीनों पैनलिस्ट ने एक-दूसरे की तरफ देखा। मिस्टर मेहरा धीरे से अपनी कुर्सी से उठे। विकास को लगा कि अब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। लेकिन मिस्टर मेहरा ने आगे बढ़कर विकास से हाथ मिलाया और बोले, “हमे ऐसे लोग चाहिए जो ज्ञान के साथ-साथ कठिन से कठिन स्थिति में भी तनाव कम करना जानते हों। यू आर हायर्ड!”

बाहर बैठे बाकी उम्मीदवार यह देखकर चौंक गए कि कार्टून वाली टाई पहनकर गया लड़का खुशी से झूमता हुआ बाहर आ रहा था। सबने विकास के इस अनोखे आत्मविश्वास के लिए ज़ोरदार तालियां बजाईं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८ ☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पवित्र बंधन…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७८

☆ # “पवित्र बंधन…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

रक्षाबंधन

सिर्फ धागों का नहीं

दिलों का बंधन है

इस पवित्र बंधन को

शत-शत वंदन  है

इसमें छुपा है

भाई बहन का प्यार

सदियों से गवाह है

यह सारा संसार

कितने स्नेहमय लगें

यह रेशम के धागें

जिनकी कोई बहन नहीं

वे हैं कितने अभागे

इसमें छुपी है

बचपन से

यौवन तक की

साथ बिताई बातें

भूखे प्यासे रहकर

साथ काटी रातें

अभाव में भी खुश रहकर

कैसे पड़ता है जीना

एक दूजे का सहारा बनकर

हर दुख पड़ता है जीना

बहन के सुख दुख में

शामिल होता है भाई

राखी बंधवाकर

रक्षा करने की

उसने कसम है खाई

काल का चक्र भी

यह खुशियां ना लूटें

भाई बहन का रिश्ता

जन्म जन्म तक ना टूटें

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८२ ⇒ बस्ता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बस्ता…।)

?अभी अभी # १०८२ ⇒ आलेख – बस्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अमीरों की टाउनशिप होती है, गरीबों की बस्ती ! बस्ती के बच्चे सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन और छात्रवृत्ति के लिए जाते हैं, और टाउनशिप के बच्चे आईपीएस और डीपीएस में एक अच्छा इंसान बनने। वे भी क्या दिन थे, जब सबके लिए एक ही स्कूल होता था, और एक जैसा ही बस्ता।

घर में हाथ से सिली हुई थैली ही बस्ता कहलाती थी, जिसमें एक पट्टी, पेम, पेंसिल और पढ़ने-लिखने की किताब होती थी।

कुछ सम्पन्न बच्चे तो पानी-पोता भी लेकर आते थे। कुछ गंदे बच्चे थूक से पट्टी पोंछ लेते थे, तो कुछ लट्ठे के कमीज से ही पट्टी साफ कर लिया करते थे। जिस रोज कोई राष्ट्रीय त्योहार होता था, बस्ती-पट्टे की छुट्टी हो जाती थी।।

समय के साथ बस्ता भी बड़ा होता चला गया। हर विषय की कॉपी किताब, परीक्षा के समय स्याही वाला पेन, स्केल, कंपास और न जाने क्या क्या ! जो बस्ता कभी हाथ में रहता था, अचानक वेताल की तरह कंधे पर आ बिराजा। खाने का टिफ़िन और वॉटर बॉटल भी साथ में ही लद लिये।

कभी कभी रेलवे के हम्मालों के कंधों और सर पर बोझा लदा देखकर आज के स्कूली बच्चे निगाहों के सामने आ जाते हैं।

मोटी ताज़ी स्कूल की फीस के साथ बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ, सर पर पढ़ाई का बोझ, और माता-पिता पर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का बोझ।।

बस्ता बच्चे की पहचान है ! कभी किसी के बस्ते को लात लग जाती, तो उसको छूकर माफी माँगनी पड़ती थी। वह विद्या है। समय कितना भी बदल जाएबस्ते में विद्या है, ज्ञान का भंडार है, सरस्वती का वास है। बच्चों का भविष्य है, माता पिता के सपने इन्हीं बस्तों में बंद है।

यह बस्तों की बस्ती है। यहाँ दिन भर मेहनत है, पढ़ाई है, और आंखों में अच्छे नम्बरों से पास होने की, स्कूल में टॉप करने की उम्मीद बसती है। बच्चा है, तो बस्ता है, जिसमें से ज्ञान बरसता है। हर बस्ते में एक बच्चे का सुनहरा भविष्य बसता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२२ – भारत मां का ये प्रहरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता भारत मां का ये प्रहरी।)

☆ अभिव्यक्ति # १२२ ☆

☆ भारत मां का ये प्रहरी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

याद नहीं करते हम,

सीमा पर त्योहारों को.

अपने खून से होली खेलें,

बचा रहे परिवारों को.

*

स्त्रोत नहीं पूछा करते,

शूरों का और तारों का.

हथियार उठाते हैं जब,

ख्याल नहीं है वारों का.

*

खुद के अरमाँ, खुद के सपने,

दूर हो गए, सारे अपने.

बच्चों की किलकारी भी,

लगती जैसे हों सपने.

*

देश की पावन मिट्टी का,

माथे पर तिलक लगाता हूं.

भारत माता की पुकार पर,

हाथों पर शीश, सजाता हूं.

*

देश की सीमा को अपने,

खून से अपने सजाया है.

दुश्मन कैसे भी आया हो,

हमने उसे दूर भगाया है.

*

सर्दी हो या गर्मी की लू,

दिन हो या, रातें गहरी.

सजग सतर्क हमेशा है,

भारत मां का ये प्रहरी..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ संवाद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ संवाद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

खोटा विचार आहे ह्या राजकारण्यांचा

त्यानीच मांडला हो बाजार माणसांचा

मग्रूर आणि लोभी झालेत हे पुढारी

केलाय आज त्यानी कचराच कायद्य्यांचा

का ही निमूट झाली जनता इथे कळेना

डोळे मिटून बघते अन्याय बावळ्यांचा

या आंधळ्या प्रजेला येईल जाग तेंव्हा

उडवील बोजवारा सगळ्याच धोरणांचा

 *

कमजोर लोकशाही होतेय रोज येथे

उरलाच धाक नाही कुठल्याच संस्कृतीचा

पैसा कुठून कोठे पळतोय ते कळेना

देवासही तडाखा बसलाय चोरट्यांचा

 *

अंधार दाटलेले दिसते भविष्य येथे

होईल रोज सौदा आभाळ चांदण्यांचा

शास्त्रौक्त वेद तेव्हा धरतील मौन सारे

होईल काय सांगा‌ उपयोग मांत्रीकांचा

 *

स्वातंत्र्य मिळवलेले जपणे जरूर आहे

ठेवा विचार ध्यानी आता नव्या पिढ्यांचा

सांभाळण्यास त्याना घेऊ जबाबदारी

त्यांच्या सवे करूया संवाद जीवनाचा

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “फाटणं आणि फाडणं…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “फाटणं आणि फाडणं…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

फाटणं आणि फाडणं…

लहानपणी ज्या काही गोष्टींबद्दल प्रसाद (हातावर, गालावर, आणि पाठीवर) मिळाला असेल तो या दोन गोष्टींबद्दल जास्त असेल. (देवाचा) प्रसाद हा प्रेमाने तळहातावर ठेवला जातो व तो खाल्ला जातो. पण फाटणं आणि फाडणं यामुळे मिळणारा प्रसाद हा तळहातापासून पाठीपर्यंत अंगावर पडला होता. त्यासाठी जागेचं म्हणजे शरीराच्या भागाच, आणि जागेच म्हणजे कुठे आहोत याच बंधन नव्हत. आणि गोडवा… त्याचा तर संबंधच नसायचा.

फाटणं यात वस्तूच नुकसान असत. तर फाडणं बहुतेक वेळा मुद्दाम केल जात. फाटणं यात दुर्लक्ष, निष्काळजीपणा असतो. तर फाडणं यात काळजीपूर्वक करायचं कांहीही नसत. फाटणं यात दु:ख असत, तर फाडण्यात दु:खाचा संबंध असेलच अस नाही.

हा कागद कोणी फाडला… किंवा कसा फाटला… अथवा हे कागद काही कामाचे नसतील तर फाडून टाकू… फाडणं हा शब्द साधारण अशाच प्रकारच्या वाक्यात ऐकायला येतो. किंवा यात जे घडलं तीच क्रिया फाडणं यात अपेक्षित असते.

फाडणं याला व्यवस्थितपणा लागत नाही. यासाठी कोणतही मोजमाप नसत. याला कोणतही शास्त्र, किंवा सुत्र नाही. सुसूत्रता तर मुळीच लागत नाही. ऊलट व्यवस्थितपणे केलेला अव्यवस्थितपणाच यात अपेक्षित असतो. मनाला येईल तसे आणि तेवढे तुकडे करणं यालाच आपण फाडणं म्हणतो.

पण फक्त याच अर्थाने हा शब्द वापरतो का… तर मुळीच नाही. बर्‍याच चांगल्या गोष्टींसाठीसुध्दा फाडणं हा शब्द वापरतो, आणि त्यात बोलणारा आणि ऐकणारा यांना गैर वाटत नाही.

वर्गणी किंवा इतर चांगल्या ठिकाणी पैसे मिळाल्यावर दिली जाणारी पावती. याला पावती फाडणं असच म्हणतात. चांगल्या मनाने, चांगल्या कामासाठी दिलेल्या पैशांची पोचपावती देतांना त्या पावतीचा फाडणं असा ऊल्लेख होतो.

लग्न ठरल्यावर केली जाणारी कपड्यांची खरेदी. याला कपडा फाडायचा आहे असाच ऊल्लेख खान्देशात तरी सहज केला जातो. परत हा शब्द वापरतांना उत्साह जाणवतो. अशा कपडे फाडण्याच्या कार्यक्रमाला काहींना मानाने यायला सांगितल जातं. बर्‍याचदा तर अशा वेळी पंधरावीस जणं असल्याच मी पाहिलं आहे. काहीतर दुकानाच्या बाहेरच असतात. दुकानात साडी फाडली जाते आहे का शर्ट पीस आणि पॅट पीस हे त्यांना दिसतही नाही. पण कपडा फाडायच्या कार्यक्रमास ते हजर असतात.

एखादी गोष्ट घडल्यानंतर त्याच्या चांगल्या किंवा वाईट गोष्टींच श्रेय, यश, अपयश कुणाच्या नावावर असेल, याला सुध्दा याचं बील कोणाच्या नावावर फाडायचं असाच प्रश्न मनात असतो. काही तर या यशासाठी आपणच असल्याचा दावा करतात. तर अपयशाच खापर कोणावर फोडाव याचा घाट घालतात.

असच बील फाडणं वस्तूच्या खरेदीनंतर सुध्दा असतं. आपल्या नांवाने जे बील फाडलं जात ती वस्तू आपण आनंदाने घेतलेली असते, बर्‍याचदा त्याचं बील संभाळून सुध्दा ठेवतो, पण वस्तू घेतांना त्याच बील मात्र फाडल जात.

दुध नासणं याला सुध्दा काही ठिकाणी दुध फाटलं असच म्हणतात. द्रवरूप पदार्थ नासतो, सांडतो. पण दुध मात्र फाटतं. दुधाचा चक्का करायचा असेल तर मात्र दुध मुद्दाम फाडलं जात. पण मला दुध फाटलं या शब्दाची गंमत वाटते.

पण या शब्दांमुळे काही गोष्टींना ऊजाळा मिळाला.

 

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ जाणीव… – भाग – २ ☆ श्री दीपक तांबोळी ☆

श्री दीपक तांबोळी

? जीवनरंग ?

☆ जाणीव… – भाग – २ ☆ श्री दीपक तांबोळी

(“मला कुणी समजूनच घेत नाही” नयना संतापून रडायला लागली “ती आई तशीच आणि तुम्हीही तसेच. सारखे मागे लागतात. मनासारखं काही करुच देत नाहीत” रागारागाने ती उठली आणि तिच्या रुमकडे निघून गेली.) 

इथून पुढे – –  

“अशीच करते ही आजकाल. थोडंसं काही बोललं की लगेच रडायला लागते. तिच्याशी कसं वागावं तेच कळेनासं झालंय ” माधवी हताश होऊन म्हणाली.

” साहजिकच आहे माधवी. सध्या तिला डिप्रेशन आलंय. तिच्या बहुतेक मैत्रिणी नोकरीला लागल्यात. ज्यांना लागल्या नाहीत त्यांची लग्नं होऊन गेलीत. ही एकटीच अशी घरात रिकामी बसलीये. जिच्याजवळ भावना मोकळ्या करता येऊ शकतील अशी कुणी व्यक्तीच सध्या उरलेली नाहिये. साहजिकच तिला डिप्रेशन येणार. एकट्या मुलांचा हाच प्राॅब्लेम असतो. ती लवकर डिप्रेशनमध्ये जातात. याकरिता कमीतकमी दोन मुलं तरी हवीत “

” हो. नाही झालं आपल्याला दुसरं मुल. काय करणार. पण ही ही गोष्ट खरी की तिच्या डिप्रेशनला तीच स्वतः जबाबदार आहे. तिच्या अपेक्षा तर खुप आहेत पण तिला स्वतःला काहिच करायला नको असतं “

” हो. तेही खरंच. पण ते ती ॲक्सेप्ट करत नाहीये. याच्यावर एकच उपाय आहे तो म्हणजे तिचं लवकरात लवकर लग्न लावून देणं “

” ठिक आहे. सुरुवात केलीच आहे आपण स्थळं बघायला”

दोनच दिवसांनी रोजचा पेपर वाचतांना एल. आय. सी. च्या व्हेकंसीजची जाहिरात विनायकच्या पहाण्यात आली. त्यानं नयनाला हाक मारुन बोलावलं

” तू आजचा पेपर वाचलास? “त्यानं विचारलं

” नाही. मी पेपर वाचत नाही “

” का? का पेपर वाचत नाहीस? कमीतकमी नोकरीच्या जाहिरातीसाठी तर वाचत जा “

” अहो बाबा इतके जाॅब पोर्टल आहेत. त्याच्यावर हजारोंनी जाहिराती येत असतात. त्याच्यासाठी पेपर वाचायची काय गरज आहे? “

” मग एल. आय. सी. ची जाहिरात वाचलीच असशील तू?  “

” वाचली असेल. शक्यता आहे. पण त्यांनी कंप्युटर इंजीनियर कुठे मागितलेत? ” जाहिरात बघत ती म्हणाली

” पण त्यांना कोणतेही ग्रॅज्युएटस् चालणार आहेत “

” बाबा मी कारकून बनून काय करु? मागेही तुम्ही कुठल्यातरी बँकेची जाहिरात दाखवली होती. मला अशा जाॅबमध्ये इंटरेस्ट नाहिये बाबा. मला माझ्याच फिल्डमधला जाॅब हवाय ” ती वैतागून म्हणाली.

” बेटा नोकरीच करायची म्हंटलं तर कुठलीही चालू शकते. फिल्ड वेगळं असलं तरी शिकतो माणूस. आणि सरकारी नोकरी केव्हाही चांगली. पगारही चांगला असतो. जाॅब सिक्युरिटी असते आणि लग्न झाल्यावरही तू तिथे बदली करुन जाऊ शकतेस “

” हो पण जाॅब सॅटिसफॅक्शनच काय? ते मला या सरकारी नोकरीत मिळणार थोडीच आहे. आणि मला त्या सरकारी नोकऱ्या अजिबात आवडत नाहीत. राहू द्या. मी पुण्यातल्या एका कंपनीत अप्लाय केलाय. पुढच्या आठवड्यात इंटरव्ह्यू आहे “

विनायकला चुप बसण्याव्यतिरिक्त पर्यायच उरला नाही. तो माघार घेत म्हणाला

“ठिक आहे. मात्र या वेळी तरी तुझं सिलेक्शन व्हायला पाहिजे “

“मी प्रयत्न तर करणारच आहे ” ती म्हणाली आणि रुममध्ये निघून गेली. ती गेल्यावर माधवी विनायकला म्हणाली

“तुम्ही नोकरीसाठी तिच्या इतकं मागे लागता पण नोकरीला लागल्यावर ती कशी वागते ते माहित आहे ना? घरातल्या एकाही कामाला ती हात लावत नाही वरुन तिच्याच तैनातीत मला रहावं लागतं. असा रुबाब दाखवते की जणू घरात कमावणारी ती एकटीच आहे आणि आपण तिच्याच कमाईवर अवलंबून आहोत “

” माहितेय मला. पण अशी रिकामी बसलेलीही मला सहन होत नाही. पण तू काळजी करु नकोस. तिला नोकरी लागणं कठीणच दिसतंय कारण इंटरव्ह्यूला जातांना ती कधी तयारीच करुन जात नाही “

दुसऱ्या आठवड्यात नयना पुण्याला जाऊन इंटरव्ह्यू देऊन आली तेव्हा तिचा चेहरा पडलेला होता. संध्याकाळी विनायकनं घरी आल्यावर तिला विचारलं.

“काय झालं? कसा झाला इंटरव्ह्यू? “

” चांगला झाला पण माझं काही सिलेक्शन झालं नाही “

“का? “

” आजकाल वशिला लागतो बाबा सगळ्या ठिकाणी. आणि आपण तिथेच तर कमी पडतो. साक्षी जाॅबला लागली ती तिच्या मामाच्या ओळखीमुळे. समीर टिसीएस मध्ये त्याच्या बाबांच्या ओळखीमुळे लागला. नेहा पण तिच्या बाबांच्याच वशिल्यामुळे आयबीएम मध्ये लागलीये”

” याचा अर्थ तू मलाच ब्लेम करतेय. माझ्या जिथे ओळखी आहेत त्या एल. आय. सी. मध्ये आणि बँकेमध्ये तर तू नोकरी करायला तयार झाली नाहीस. सगळ्याच ठिकाणी माझी ओळख कशी असणार? आणि फक्त ओळखीमुळे नोकऱ्या लागत नाहीत. इंटरव्ह्यूमध्ये आपली हुशारीही दाखवावी लागते. मी पाहिलंय की इंटरव्ह्यूला जातांना तू कधीच तयारी करुन जात नाहिस. आज पाच वर्षं झाली तुला इंजीनियरींग सोडून. काय शिकलीस तेसुद्धा तुला आठवत नसेल तर इंटरव्ह्यूमध्ये तू काय बोंब पाडणार आहेस? तू पुण्याला गेलीस खरी पण काय होणार आहे हे आम्हांला अगोदरच माहित होतं “

“तुमचीच नाट लागली माझ्या इंटरव्ह्यूला ” ती रडत रडत म्हणाली

“वा रे वा! तू स्वतः तयारी करुन जायचं नाही. इंटरव्ह्यूत चांगली उत्तरं द्यायची नाही आणि सिलेक्शन झालं नाही तर आईबापालाच दोष द्यायचा. ही कोणती पद्धत? आम्ही काय वैरी आहोत का तुझे? ” माधवी चिडून म्हणाली

” जाऊ द्या मला काही बोलायचंच नाही या विषयावर “ती उठली आणि रडतरडत आपल्या रुममध्ये निघून गेली.

तिच्या पाठमोरी आकृतीकडे बघत माधवी म्हणाली

“बघा. अशी करते ही. गरीब आणि अशिक्षित आईवडिलांची मुलं काय ओळखीने लागतात का नोकरीला? “

” खरंय माधवी तुझं. गरीब आणि अशिक्षित आईवडिलांच्या मुलांमध्ये परिस्थितीला सामोरं जाण्याची आणि कसंही करुन यश मिळवण्याची जिद्द असते. त्यांना आपल्यालाच प्रयत्न करुन पुढे जायचं आहे याची जाणीव असते. कितीतरी यशस्वी आणि प्रसिद्ध व्यक्तींचे आईवडील अशिक्षित आणि गरीबच होते. कोणत्याही सुखसुविधा मुलांना ते देऊ शकले नाहीत तरीही मुलांनी यशाचं शिखर गाठलं. आणि आपली मुलं पहा. आपलंही चुकलंच. आपण नको तितके तिचे लाड केले. ती म्हणेल ते आपण तिला देत आलो. त्यामुळे तिला कधी गरिबीची जाणीवच झाली नाही. आईवडिलांनी आपल्याला शिकवलंय तर आपण स्वतःहून धडपड करुन नोकरी मिळवली पाहिजे, त्यांच्या आपल्याकडून ज्या अपेक्षा आहेत त्या आपण पुर्ण केल्या पाहिजेत असं तिला कधी वाटलंच नाही “

“खरंय तुमचं पण आपलंही काही चुकलं असं मला वाटत नाही. आपल्याला ज्या सुखसोयी मिळाल्या नाहीत त्या आपल्या एकूलत्या एक मुलीला मिळाव्या असं आपल्यालाही वाटणं साहजिकच होतं. आता तिलाच या गोष्टींची जाणीव नाही तर आपणही काय करणार?

त्यात एवढंच सुख म्हणावं की तिनं प्रेमाबिमाच्या काही भानगडी नाही केल्या. नाहीतर आपल्या डोक्याला अजून ताप झाला असता “

“खरंच. ही देवाचीच कृपा समजायची कारण कितीही चांगले संस्कार केले तरी या मुली कधी भरकटतील सांगता येत नाही. पहातेय ना कसं मुलींना फसवून मग त्यांना मारुन टाकलं जातंय ते “

माधवीच्या अंगावर शहारे आले. ती म्हणाली

“असं काही घडण्याच्या आतच नयनाचं लग्न उरकून टाकलं पाहिजे “

 

एक महिना असाच गेला. त्यात नयना दोन ठिकाणी इंटरव्ह्यूला जाऊन आली पण दोन्ही ठिकाणी तिची निवड झाली नाही. या दरम्यान बंगलोरचं एक स्थळ चालून आलं. मुलगा एकुलता एक होता, देखणा होता. बारा लाखाचं पॅकेज होतं. आणि सहा महिन्यांनी ते सोळा लाख होणार होतं. फक्त लग्न झाल्यावर मुलीने नोकरी करावी अशी मुलाकडच्यांची अट होती. त्यात विनायक आणि माधवीलाही काही गैर वाटलं नाही. मुलामध्ये दोष काढण्याकरीता कोणतेच मुद्दे नसल्याने नयनाही नाही म्हणू शकली नाही. शेवटी तीन महिन्यांनी नयनाचं लग्न थाटामाटात पार पडलं.

एक महिन्याने माधवीनं नयनाला सहजच फोन केला.

“कशी आहेस बेटा? “

“आई तशी मी मजेत आहे. सासूबाई आणि नवरा दोघंही स्वभावाने चांगले आहेत पण इथे खुप कामं करावी लागतात. सकाळी सहा वाजताच उठावं लागतं “

” का? “

” अगं माझ्या नवऱ्याला फिटनेसचं वेड आहे म्हणून तो सकाळी पाच वाजताच जिमला जातो. सासूसासरेही सकाळी साडेपाचलाच माॅर्निंग वाॅकला जातात. सुरुवातीला मी माझ्या सवयीने एकटीच नऊ वाजेपर्यंत झोपलेली असायचे. तसं मला कुणी बोलत नव्हतं पण त्यांच्या चेहऱ्यावरुन माझं असं उशीरापर्यंत झोपणं त्यांना आवडत नाहिये असं माझ्या लक्षात आलं. मग नाईलाजाने मलाही सकाळी सहा वाजता उठावं लागतं. नवरा, सासूसासरे सकाळी घरी आले की त्यांना लगेच चहा करुन द्यावा लागतो. मग नाश्त्याची तयारी. माझी झोपच होत नाही आजकाल. वरुन घरात सतत लोकांचं येणं जाणं असतं. दिवसभर चहापाणी करुन मी थकून जाते. त्यातून आता नवरा आणि सासू दोघंही माझ्या मागे लागलेत मी नोकरी करावी म्हणून. सासूबाई म्हणतात ‘तू इतकी शिकली आहेस त्याचा उपयोग तुझ्या आईवडिलांना नाहितर आम्हांला तरी होऊ दे “

“काय चुकीचं म्हणताहेत त्या? मिळत असेल तर कर नोकरी “

” हो पण घरातली कामंही मलाच करावी लागणार ना? सासूसासऱ्यांना थोडीच कामं सांगता येतील! “

माधवीला हसू आलं. माहेरी नोकरी करतांना जो रुबाब नयना दाखवायची तो आता तिला सासरी दाखवता येणार नव्हता.

“ठरव मग काय करायचं ते “आपलं हसू दाबत ती म्हणाली.

“तू बोल ना जरा माझ्या सासूबाईंशी. त्यांना म्हणा कमीत कमी लग्नाचं एक वर्ष तरी तिला एंजॉय करु द्या “

“नाही गं बाई! मी तुझ्या संसारात अजिबात ढवळाढवळ करणार नाही. तू आणि तुझ्या सासरचे काय ठरवायचं ते ठरवा. तुमच्या घरात भांडणं लावायची माझी अजिबात इच्छा नाही “

“बरं “

– क्रमशः भाग दुसरा 

© श्री दीपक तांबोळी

जळगांव

मो – 9209763049

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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