हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८९ ☆ मिट्टी की गोद से झाँकता जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना मिट्टी की गोद से झाँकता जीवन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८९ ☆

मिट्टी की गोद से झाँकता जीवन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

जून का महीना केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन के नवसृजन का संकेत भी है। पहली वर्षा की बूंदें जैसे ही धरती को स्पर्श करती हैं, प्रकृति का मौन संसार जाग उठता है। सूखी प्रतीत होने वाली मिट्टी के भीतर छिपे बीज अचानक अंकुरित होने लगते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अनेक पौधे ऐसे भी उग आते हैं जिन्हें किसी ने बोया नहीं होता; वे केवल अनुकूल समय और थोड़ी नमी की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

अंकुर अर्थात-

 

बीज से निकलने वाली पहली कोमल कोंपल

किसी नए विचार, स्वप्न या संभावना की शुरुआत

विकास और प्रगति का प्रथम चरण

धरती माँ की गोद में, अंकुर होता बीज।
मिट्टी की महिमा अमर, शुभाशीष को दीज।।

छोटे से आकार में, बड़ा हुआ विस्तार।
बीजों का अंकुर बना, वन का सारा सार॥

अंकुर को केवल पौधे की कोंपल नहीं, बल्कि आशा, धैर्य, संभावना और जीवन के नवप्रारंभ के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है।

मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हमारे भीतर अनेक संभावनाएँ, सद्गुण और सपने बीज के समान सुप्त पड़े रहते हैं। सही वातावरण, सकारात्मक विचार और थोड़ा-सा प्रयास उन्हें अंकुरित कर सकता है। प्रकृति हमें सिखाती है कि विकास का आरम्भ हमेशा एक छोटे से अंकुर से होता है।

जून की यह आहट हमें एक और संदेश देती है। यदि हम हर वर्ष इस मौसम में एक पौधा भी रोपें और उसकी देखभाल का संकल्प लें, तो आने वाले वर्षों में हरियाली का एक विशाल संसार निर्मित हो सकता है। वृक्ष केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करते, वे जीवन में शीतलता, संतुलन और आशा भी लाते हैं।

आइए, इस वर्षा ऋतु का स्वागत केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि सृजनकर्ता बनकर करें। एक पौधा लगाएँ, एक अंकुर को जीवन दें और प्रकृति के साथ अपने संबंध को और गहरा करें। हर अंकुर भविष्य की हरियाली का वचन है, और हरियाली ही जीवन का सबसे सुंदर उत्सव।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१६ ☆ सुरेश पटवा एक “अल्हदा और नए तरह के लेखक” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१६ ☆

?  व्यक्तित्व और कृतित्व – सुरेश पटवा एक “अल्हदा और नए तरह के लेखक” ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

सुरेश पटवा” “कलम और कदम का अनूठा समन्वय है।

जब हम समकालीन हिंदी साहित्य के परिदृश्य को देखते हैं, तो हमें कई तरह के लेखक मिलते हैं, कुछ जो कमरों में बैठकर कल्पनाएं बुनते हैं, और कुछ जो इतिहास के पन्नों को पलटते हैं। लेकिन आज मैं एक ऐसे अनूठे ‘सृजन साधक’ की बात करने जा रहा हूँ, जिनकी कलम में इतिहास की गंभीरता भी है और जिनके कदमों में पूरी दुनिया को नाप लेने का कौतूहल भी। मैं बात कर रहा हूँ, सुरेश पटवा की।

अक्सर लोग बैंक से रिटायर होने के बाद आराम की जिंदगी चुनते हैं, लेकिन सुरेश पटवा जी बैंक की दीर्घकालीन सेवा के बाद अपने जीवन की सबसे ऊर्जावान पारी जी रहे हैं। 74 वर्ष की इस युवा उम्र में, वे 34 प्रकाशित कृतियों और 16 से अधिक राष्ट्रीय सम्मानों के साथ हमारे बीच साहित्य की एक जीती-जागती धरोहर हैं। “

उनके लेखन की सबसे अनूठी और रोचक बात उनका यायावर होना है। वे सिर्फ मेज पर बैठकर लिखने वाले साहित्यकार नहीं हैं। उन्होंने नर्मदा जी की परिक्रमा की, तो ‘सौंदर्य, समृद्धि, वैराग्य की नदी नर्मदा’ लिख दी। उन्होंने मोटर साइकिल उठाई और सिक्किम, भूटान, नेपाल, लद्दाख और उत्तराखंड की दुर्गम वादियों को छान मारा। कार से कोलकाता से कन्याकुमारी और वहां से द्वारकापुरी तक की तटीय यात्रा कर डाली। अमेरिका और यूरोप घूम आए।

यानी पटवा जी पहले जमीन पर अपने ‘कदम’ चलाते हैं, अनुभूतियों को जीते हैं, और फिर उनकी ‘कलम’ चलती है। यही कारण है कि जब वे ‘सगरमाथा से समुंदर तक’ या ‘सुरम्य सतपुड़ा’ लिखते हैं, तो पाठक सिर्फ पढ़ता नहीं है, वह पटवा जी की आंख से उस भूगोल की यात्रा करने लगता है।

उनका विषय वैविध्य विस्मित करने वाला है। जब उन्हें इतिहास पढ़ते हुए भारत की गुलामी की पड़ताल करती कोई मुकम्मल किताब नहीं मिली, तो उन्होंने खुद शोध किया और खड़ी कर दी—’गुलामी की कहानी’। एक तरफ वे गोंडवाना के विलुप्त इतिहास पर गंभीर शोध करते हैं, ‘वेदों से वेदांत’ जैसी आध्यात्मिक कृति लिखते हैं, तो दूसरी तरफ ‘हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग’ लिखकर हमारे भीतर के सिनेमाई नोस्टेल्जिया को जगा देते हैं। मिर्जा गालिब पर उनका शोधपूर्ण उपन्यास उनके विधा वैविध्य का अनूठा प्रमाण है। “

“पटवा जी केवल गंभीर इतिहासकार या यात्रा-वृत्तांत लेखक नहीं हैं। उनकी कविताएं और व्यंग्य समाज का मुखपत्र हैं। हाल ही में आए उनके व्यंग्य ‘पेटीकोट-पजामा स्टार्ट-अप’ और पुस्तक ‘व्यंग्य पच्चीसी’ सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार हैं।

उनकी कविताओं की एक खास बात है, जो मुझे बहुत प्रभावित करती है, उनकी कविताएं समाज की व्यवस्था से शिकायत तो करती हैं, जिम्मेदार लोगों पर तंज भी कसती हैं, लेकिन उनमें कहीं भी रोना-चीखना या करुणा का प्रदर्शन नहीं है। वे दृढ़ता के साथ, गरिमा में रहकर अपनी बात कहती हैं और चेतावनी देती हैं। यही एक सच्चे साहित्य का धर्म है, जिसका निर्वहन पटवा जी बखूबी कर रहे हैं। “

“आज पटवा जी दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के संयुक्त सचिव और अखिल भारतीय कला मंदिर के उपाध्यक्ष जैसी अनेक संस्थाओं के माध्यम से नई पीढ़ी के मार्गदर्शक बने हुए हैं।

किताबों की इस आपाधापी भरी भीड़ में, सुरेश पटवा जी का लेखन अपनी सहजता, प्रामाणिकता और रोचक शैली के कारण बिल्कुल ‘अल्हदा’ है। वे जटिल से जटिल ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों को इतनी सरलता से परोसते हैं कि वह सीधे पाठक के दिल और दिमाग में उतर जाती है।

पटवा जी का जीवन और उनका साहित्य हमें यह सिखाता है कि सीखने, घूमने और लिखने की कोई उम्र नहीं होती। बस भीतर एक जीवंत कलाकार जिंदा रहना चाहिए। पटवा जी को उनके समृद्ध सृजन संसार के लिए नमन करता हूँ और उनके दीर्घायु व सतत लेखन जीवन की कामना करता हूँ।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३८ – आलेख – मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख  मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जीकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३८

☆ आलेख – मानवतावादी व सबसे कम उम्र के कुलपति डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

भारतीय इतिहास में सबसे कम उम्र में कुलपति बनने का गौरव प्राप्त करने वाले डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। आपका जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में कोलकाता विश्वविद्यालय के संस्थापक उप कुलपति आशुतोष मुखर्जी के घर पर हुआ था। आप का बचपन से ही मेघावी, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, विचारक, गहन चिंतन और शिक्षा के प्रति विशेष लगाव रहा है।

आप की शिक्षा-

यही कारण है कि आप ने 1917 में मैट्रिक, 1921 में बीए, 1923 में वकालत की उपाधि बहुत ही बेहतरीन अंको से प्राप्त की थी। आप ने हरेक परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं। आपको गणित के अध्ययन में विशेष रूचि थीं । इस कारण आप 22 वर्ष की उम्र में एमए करने के बाद विदेश चले गए। आप की प्रतिभा से प्रभावित हो कर लंदन की मैथमेटिक्स सोसाइटी ने आपको मानद सदस्यता सम्मानित किया गया था। यह किसी भारतीय व्यक्ति के लिए बहुत ही गौरव की बात थीं।

वैवाहिक जीवन-

लंदन से आप से 1926 में वकील बनकर भारत आ गए। इसी वर्ष आपका विवाह सुधा देवी से हो गया। मगर आपका वैवाहिक जीवन ज्यादा लंबा नहीं चला। कुछ ही वर्षों में आपकी पत्नी का देहांत हो गया। इसके बाद आपने आजीवन शादी न करते हुए मानवता की सेवा को अपना लक्ष्य बना लिया।
शिक्षा जगत में ख्याति-

जब आपकी उम्र 23 वर्ष की थी तभी आप पिता का देहांत हो गया था। उसी समय आपको कोलकाता विवि विद्यालय की प्रबंध समिति में ले लिया गया। यही से आपके कार्यों की वजह से बहुमुखी प्रतिभा सभी के सामने प्रकट होने लगी। आपके प्रखर विचार, शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व विद्वत्ता को देखते हुए आप को 33 वर्ष की अल्पायु में कोलकाता विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया।

भारतीय शिक्षा इतिहास में आपको सबसे कम उम्र के कुलपति बनने का श्रेय आप को प्राप्त हुआ है।

आप का जीवन लक्ष्य-

आपने छात्र जीवन से अपने मूल लक्ष्य तय कर लिए थे। आप आध्यात्मिक तथा विज्ञान से युक्त शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। अध्यात्मवाद, सहनशीलता, मानवता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा सांस्कृतिक विचारों की एकता के विचारों पर आजीवन दृढ़ता से चलते रहें। यही वजह है कि अपनी पत्नी के निधन के बाद आपने अपना पूरा जीवन मानवता, उसके विकास और वैज्ञानिक गतिशीलता के लिए समर्पित कर दिया था।

परिवार का जीवन पर प्रभाव–

आपके जीवन पर अपने परिवार के सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, राजनीति जीवन का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। आप का लालन-पालन जिस परिवार में हुआ था वहां आशुतोष मुखर्जी जैसे सुलझे विचारों के धनी पिता, शिक्षामित्र, विद्वान तथा ओजस्वी वक्ता की छत्रछाया आप को प्राप्त हुई थीं। साथ ही घर में होने वाले विभिन्न आयोजनों, गोष्ठियां, विचार-विमर्श, चिन्तन-मनन, सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिकों वातावरण का आप के जीवन पर सकारात्मक व दृढ़ प्रभाव पड़ा। यही वजह है कि आपके मन में भारत की पुरातन संस्कृति के प्रति विशेष प्रेम, विज्ञान के प्रति लगाव, मानवता के प्रति विशेष अनुराग पैदा हुआ।

आपकी अनुकरणीय प्रतिभा–

आप की प्रतिभा को इसी बात से समझा जा सकता है कि आपने जितनी भी परीक्षाएं उत्तीर्ण की थीं उन सभी में आप प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 8 अगस्त 1934 से 7 अगस्त 1938 रहते हुए अनेक विश्वविद्यालय के सम्मेलनों का नेतृत्व किया। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और नए विचार दिए। इस कारण आपकी गिनती उस समय के भारत के शीर्षस्थ शिक्षाविदों में होने लगी थी।

आपके उल्लेखनीय कार्य–

तत्कालीन समय में भारतीय जनता की स्थिति बहुत दयनीय थीं। भारतवासी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक दृष्टि से बेहतर स्थिति में नहीं थे। अंग्रेज कूटनीति द्वारा भारत का विभाजन की चाल चल रहे थे। इस कारण आप ने भारत की जनता के उत्थान और उसके सामाजिक कल्याण के लिए कार्य करने के लिए सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। ताकि आप अपनी संपूर्ण ऊर्जा से मानवता की सेवा कर सके।

सन 1939 में राजनीति में प्रवेश करने के साथ आपने अपनी कार्यशैली में आमूल-चूल परिवर्तन कर लिया। इस कारण आपने गांधीजी की अहिंसा वादी नीति का घोर विरोध किया। आप कहते थे कि गांधीजी की अहिंसावादी नीति भारत के लिए उपयुक्त नहीं है। इसी वैचारिक मतभेद के कारण आप कांग्रेस और गांधीजी की नीतियों के और विरोधी हो गए थे।

अकाल में आप की मानवतावादी सेवा–

इसी दौरान 1943 में भारत के बंगाल प्रांत में भयंकर अकाल पड़ गया। चूंकि आप मानवता के प्रखर और प्रबल समर्थक थे, इस कारण आपने बंगाल में आए इस संकट के लिए बड़े पैमाने पर सहायता व राहत कार्य किया। इसके लिए राजनेताओं, व्यापारियों, समाजसेवियों, धर्मगुरुओं आदि की सहायता से जरूरतमंदों और पीड़ितों की भरपूर सहायता पहुंचाने के लिए बंगाल राहत समिति का गठन किया। जिसे बाद में हिंदू महासभा राहत समिति नाम दिया गया था।

लोगों ने इसमें बड़ी-बड़ी और छोटी-छोटी नगद राशियों से अकाल पीड़ित जनता की भरपूर सहायता कीं। इससे लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सका। आप के इस मानवतावादी कार्य से राष्ट्रीय एकता, सामाजिक प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक व धार्मिक एकता का परिचय के साथ-साथ वहां की जनता को राष्ट्रीय एकता व एकजुट्ता की प्रेरणा प्राप्त हुईं।

आप के प्रभावाकारी विचार–

आप सांस्कृतिक एकता के प्रबल समर्थक थे। आपका मानना था कि सभी व्यक्ति सांस्कृतिक रूप में एक ही है। इनका धार्मिक रूप से विभाजन करना गलत है। आप इस नीति के घोर विरोधी थे। आप कहते थे कि हम सब में एक ही रक्त, एक ही भाषा, एक ही संस्कृति रची बसी है, इसलिए आपको प्रति सभी धर्मों के लोगों की आप पर संपूर्ण आस्था थीं। आपको हरेक धर्म, संस्कृति व सम्प्रदाय के लोगों का संपूर्ण समर्थन प्राप्त था।

आप का राजनीतिक जीवन और उल्लेखनीय कार्य-

आपके विचारों की वजह से आपको बंगाल प्रांत का वित्त मंत्री बनाया गया था। जहां आप ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एमके फजलूल हक के समय 12 दिसंबर 1941 से 20 नवंबर 1942 तक वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। इसके पूर्व भी आप बंगाल विधान परिषद में सांसद की हैसियत से 1927 से 1947 तक काम करते रहे हैं।
आप 15 अगस्त 1947 को भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्री बने। 6 अप्रैल 1950 तक आप इसी पद पर बने रहे। 1947 को आप को स्वतंत्र भारत के वित्त मंत्रालय का कार्यभार दिया गया था।

यह मंत्रालय सरदार वल्लभ भाई पटेल के कहने से दिया गया। क्योंकि वे उस समय गांधीजी व कांग्रेसियों की नीति के विरोधी थे। इस दौरान आप ने चितरंजन में रेलवे इंजन का कारखाना, विशाखापट्टनम में जहाज बनाने का कारखाना और बिहार में खाद बनाने के कारखाना खोला। ताकि यहां की जनता की दयनीय व करुणाजनक स्थिति में सुधार हो सके।

आप का प्रबल विरोध–

इसी दौरान आपने विभिन्न प्रांतों की यात्राएं कीं। आप भारतीय जनता की शोचनीय दशा से चिंतित थे। कश्मीर में अलग वजीर-ए-आलम यानी प्रधानमंत्री, अलग झंडा और उस को विशेष दर्जा दे रखा था। आप आरंभ से ही एक भारत, एक झंडे और एक प्रधानमंत्री के प्रबल समर्थक थे। इस पर आपके और सरकार के बीच मतभेद हो गए। आप 370 धारा खत्म करने की प्रबल समर्थक थे। जबकि सरकार इसे बनाए रखना चाहती थी।

इस मतभेद के कारण आपको मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। कारण, आप कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय चाहते थें। इसलिए आपने प्रजातंत्र पार्टी बनाकर कश्मीर में प्रवेश किया। उस समय अटल बिहारी वाजपेई (तत्कालीन विदेश मंत्री), वैद्य गुरुदत्त बर्मन, टेकचंद आदि के साथ में 6 मई 1953 को जम्मू के के लिए कूच किया। चूंकि बिना अनुज्ञा के आपने कश्मीर में प्रवेश किया था इस कारण आपको जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।

मानवता के इस पुजारी की 40 दिनों तक जेल में बंद रहने के बाद 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय मृत्यु हो गई। भारतीय जनसंघ पार्टी के संस्थापक व्यक्तित्व का इस तरह चला जाना भारत की जनता के लिए अपूरणीय क्षति थीं। मगर आप अपने पीछे अपने कार्यों से ऐतिहासिक यादगार छोड़कर चले गए जो हमें सदैव आपका स्मरण कराती रहेगी।

—–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

06-06-2022

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९८ ☆ बाल सजल – फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९८ ☆ 

☆ बाल सजल – फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

दूध-जलेबी खाते मिट्ठू।

मीठा गीत सुनाते मिट्ठू।।

 *

रोज हमें विज्ञान पढ़ाते

खुशियाँ रोज लुटाते मिट्ठू।।

 *

पढ़ते रामायण , गीता हैं

सच में ज्ञान बढ़ाते मिट्ठू।।

 *

कभी न करते ऊधमबाजी

जीवन कला सिखाते मिट्ठू।।

 *

कितने प्यारे लगें दुलारे

बिस्किट ,चावल खाते मिट्ठू।।

 *

रोज भोर में जग जाते हैं

कभी न आलस लाते मिट्ठू।।

 *

संग – साथ में रहें सदा ही

फुर्र – फुर्र उड़ जाते मिट्ठू।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४७ ☆ धूप का किला☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “धूप का किला” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४७ ☆

☆ धूप का किला ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पानी रे पानी रे

चोंच नहीं डूबी चिड़िया की

कितना उथला पानी रे।

 

बह गया पसीना

काया तो गीली तक

हुई नहीं

बादल ने धरती की

छाया भी अभी तलक

छुई नहीं

 

छानी रे छानी रे

खपरैलों से झरती,गढ़ती

धूप का क़िला छानी रे।

 

मारती है चाँटा

रेत नदिया के गालों पर

टँगते हैं कलश

भरें अब तक शिवालों पर

 

धानी रे धानी रे

चाहती है धरती की देह

चूनर उजली धानी रे

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५४ ☆ गुमान छोड़ के जीना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गुमान छोड़ के जीना है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५४ ☆

✍ गुमान छोड़ के जीना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

गुनाह मौन जो देखो छुपी रज़ा होती

बशर गलत न सहे दिल में जो अना होती

 *

दरख़्त नीम के जैसी पिता की फ़ितरत है

घनी दे छाँव भले कड़वी जायका होती

 *

ग़ुरूर जिस्म पै इतना न करो तुम साहिब

जो रूह ओढ़े है वो ख़ाक की रिदा होती

 *

किसी भी मुद्दे की उड़ती ख़बर पे आँख रखें

न सच हो झूठ सरासर नहीं हवा होती

 *

गुमान छोड़ के जीना है आजज़ी अपना

ये मर्ज़ ऐसा है कुछ और कब दवा होती

 *

ये ख़ास होते नुमाइंदे मान लो रब के

फ़कीर की  ज़ुबाँ पै सबको है दुआ होती

 *

हसीन कोई न मेकप से सिर्फ लगता है

हसीन वो है अगर आँख में हया होती

 *

अगर हाँ , देखते हैं, बोले तो, सही नेता

कोई भी काम बताओ नहीं मना होती

 *

अरुण ज़ुदा है जो महबूब से उसे पूछो

फ़िज़ा खिज़ा सी जुदाई में बारहा होती

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५८ – देखें हैं पतझड़… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – देखें हैं पतझड़।)

☆ हेमंत साहित्य # ५८ ☆

✍ देखें हैं पतझड़… ☆ श्री हेमंत तारे  

सब्ज़ थे, अब ये ज़र्द होने लगे हैं

पत्तों के रंग, अब बदलने  लगे हैं

देखें हैं पतझड़,  बहारें भी इन ने

उमंगों के दिन  अब ढलने लगे हैं

 

शजर संजीदा ओ गुमसुम खडे हैं

पतझड  के डर से  सहमने लगे हैं

 

सुक़ूं से था मैं, हसरते थी ग़ाफ़िल

नज़र आये वो अरमां सुलगने लगे हैं

 

मैख़ाना था बन्द हम प्यासे खडे थे

साक़ी  के आते  ही बहकने लगे हैं

 

खौफ़ ए सैय्याद अब बाकी रहा ना

परिंदों के बच्चे  अब चहकने लगे हैं

 

ग़ुंचे तो हसीं थे पर ख़ुशबू नदारद

आते ही उनके ग़ुल महकने लगे हैं

 

कुछ तो हुआ है ‘हेमन्त’ यहां पर

अपने भी अब तो परखने लगे हैं

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆ लघुकथा – उपयोग… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “उपयोग“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆

✍ लघुकथा – उपयोग… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

जबसे बच्चे अलग रहने लगे हैं तबसे वह बदल गई है। किसी से कोई शिकायत नहीं करती। बेटे बहू नहीं चाहते कि उनकी माँ जीवन काम करती रहे इसलिए खाना बनाने के लिए बाई नियुक्त करदी है। पूरे समय सोना आसान नहीं है। बाकी के लोग अपने काम में लगे रहते हैं।उसे व्यर्थ की राजनीति की बातें अच्छी नहीं लगती। इसलिए यूट्यूब पर भगवान कृष्ण संबंधी कार्यक्रम सुनती रहती है। आपने एक बार कोई कार्यक्रम यूट्यूब पर देखा तो दूसरे दिन अपने आप एक दर्जन कार्यक्रम आज जाते हैं और उनमें से चयन करना पड़ता है। अब सर्च नहीं करना पड़ता।

एक दिन एक रेसिपी का वीडियो अपने आप आ गया। उसने देखा तो हर रोज नये नये रेसिपी वीडियो आने लगे। उसे वे अच्छे लगने लगे। न सास बहू का टेंशन न नंद भौजाई की नोंक झोंक, क्योंकि पारिवारिक वीडियो में यही सब कुछ रहता है। इसलिए आज उसने एक नई डिश बनाई भाप पर और फिर एक चम्मच तेल से छोंक दिया। चखने के लिए कहें या खाने के लिए, एक पति ही उपलब्ध है तो सारे एक्सपेरीमेंट उसी पर। पति को अच्छी लग गई तो पड़ोसियों को भी अच्छी लगेगी इसलिए बाँट आई। उसके बाद देखा गया कि उस नई डिश का जो कुछ बचा खुचा था उसे वह खा रही थी।डिस्कवरी और डिश बनाने का उपाय करती रहती है खाने को तो दो ही जाने हैं तीसरा तो कोई है कुछ बना करके और कोशिश करने लगी कोई अच्छा करें वह वही करें वह अपने लिए बचा कुछ खाने को बैठे हैं । मेरी समझ में नहीं आया लोग अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाते हैं और खाते हैं लेकिन  यह महिला है कैसी कि अपने लिए ना बनाकर औरों के लिए बनाती है। हालांकि अब उम्र का प्रभाव हो गया है और अब उतना कम नहीं कर पाती फिर भी दूसरों के लिए काम करने की भावना उसमें है । रेसिपी के नये वीडियो उसका समय अवश्य काटने में मदद कर रहे हैं। लगता है मोबाइल का अच्छा उपयोग सीख लिया है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – टूटता हुआ घर।)

☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

संध्या धीरे-धीरे रात की बाँहों में समा रही थी। आँगन में रखे तुलसी चौरे का दीपक टिमटिमा रहा था। हल्की हवा में चमेली की भीनी सुगंध घुली थी, पर घर के भीतर वातावरण भारी और उदास था।

रसोई में खड़ी सविता दर्द से कराहते हुए भी चुपचाप खाना बना रही थी। सुबह से पैरों में सूजन थी, शरीर बुखार से तप रहा था, लेकिन पति और परिवार की चिंता में उसने अपनी तकलीफ़ को जैसे भीतर ही कैद कर लिया था।

चूल्हे की आँच से उसका चेहरा लाल हो गया था। माथे से पसीने की बूंदें लगातार टपक रही थीं।

उधर बैठक में बैठे उसके पति विकास बार-बार घड़ी देख रहे थे। स्वभाव से वह अत्यंत गुस्सैल और अहंकारी थे। उन्हें ज़रा-सी देरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी।

सविता ने थरथराती आवाज़ में कहा—

“खाना तैयार है…”

बस इतना सुनना था कि विकास भड़क उठे।

“अब याद आया खाना? क्या कर रही थी इतनी देर से?”

उन्होंने क्रोध में भरी गरम दाल की थाली उठाकर ज़ोर से फर्श पर फेंक दी।

थाली पलट गई।

उबलती दाल पास खड़ी सात वर्ष की बेटी गुड़िया के हाथ और चेहरे पर गिर गई।

“माँऽऽ…!”

उसकी दर्दभरी चीख पूरे घर में गूँज उठी।

सविता का कलेजा काँप गया।

वह बदहवास होकर बेटी को सीने से चिपकाए अस्पताल की ओर भागी।

डॉक्टर मरहम लगाते हुए बोले—

“जलन तो ठीक हो जाएगी… लेकिन बच्ची बहुत डर गई है।”

गुड़िया लगातार काँप रही थी।

उसकी छोटी-सी उँगलियाँ माँ का आँचल कसकर पकड़े थीं।

सविता की आँखों से आँसू बहते रहे।

शायद दर्द बेटी के हाथ से ज्यादा उसके अपने हृदय में था।

रात गहरा चुकी थी। घर लौटकर वह चुपचाप बरामदे में बैठ गई।

पास ही बैठी दादी सब देख रही थीं। उनकी बूढ़ी आँखों में अनगिनत प्रश्न तैर रहे थे।

उन्होंने मन ही मन सोचा—

“कैसा दुर्भाग्य है… लोग मंदिरों में सिर झुकाते हैं, रामायण-महाभारत देखते हैं, पर अपने भीतर बैठे रावण को नहीं पहचानते।”

इतने में दरवाज़ा खुला।

विकास भीतर आए।

चेहरा बुझा हुआ था। हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में टूटा हुआ अभिमान।

माँ ने धीरे से पूछा—

“क्या हुआ बेटा?”

विकास कुर्सी पर ढहते हुए बोले—

“आज मेरा प्रमोशन रुक गया…

बॉस ने साफ कह दिया—

‘जिस इंसान को अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं, वह दूसरों का नेतृत्व नहीं कर सकता।’”

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

माँ उठीं, बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—

“बेटा…अहंकार इंसान से पहले उसका सुख छीनता है, फिर अपनों का विश्वास… और अंत में उसका सब कुछ।”

फिर उनकी भर्राई आवाज़ कमरे में गूँज उठी—

“अहंकार की आग में, जल जाते संबंध, रावण जैसा ज्ञान भी, नहीं बचा पाया वंश।”

विकास की नज़र धीरे-धीरे गुड़िया के जले हाथों पर गई…

फिर सविता के सूजे पैरों पर…

और अंत में अपने हाथ में पकड़े अस्वीकृत प्रमोशन पत्र पर टिक गई।

उन्हें पहली बार एहसास हुआ—

आज उनका प्रमोशन नहीं रुका था…

आज उनका घर टूटते-टूटते बचा था।

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

वह धीरे से सविता के पास गए और काँपती आवाज़ में बोले—

“सविता… मुझे माफ़ कर दो…

मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि तुम्हारा दर्द भी नहीं देख पाया।”

सविता ने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी आँखों से बहते आँसू वर्षों से दबे दर्द की कहानी कह रहे थे।

उधर तुलसी चौरे का दीपक अब भी जल रहा था—

धीमा, शांत…मानो टूटते रिश्तों को फिर से रोशनी देने की प्रार्थना कर रहा हो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१७ ☆ गझल… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१७ ?

☆ गझल ☆  प्रभा सोनवणे ☆

मी मानले स्वतःला गंधाळता धुलीकण,

सारे समग्र जीवन केले तुलाच अर्पण

*

त्या पावसात जाता,वारा मुजोर झाला,

सारे ऋतू सुखाचे मी ठेवलेत तारण !

*

गेल्या बुजून तेव्हा साऱ्या वसंतवाटा,

मग शुष्क भावनांनी केली पुन्हा भलावण !

*

नाही,नको म्हणाले घेण्यास उंच झोका,

आकाश चांदण्याचे त्याने दिलेच आंदण !

*

आल्या फुलून बागा,वणवा विझून जाता,

 आयुष्य सांजवेळी झाले कसे विलक्षण !

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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