हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४५ ☆ लघुकथा – बयान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “बयान“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४५ ☆

 ✍ लघुकथा – बयान… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

 इंस्पेक्टर साहब, मेरा जन्म एक गरीब परिवार में हुआ । मेरे माता पिता गरीब जरूर थे पर संस्कारवान थे। धर्म में उनकी पूरी आस्था थी और न किसी का बुरा करते थे और न चाहते थे। विवाह योग्य उम्र होने पर उन्होंने मेरा विवाह सतीश के साथ कर दिया। सतीश पढे लिखे और समझदार आदमी थे। अपने माता-पिता तथा मेरा बहुत ख्याल रखते। घर में कोई कमी नहीं थी। जब मेरी बड़ी बेटी का जन्म हुआ तो उन्होंने बहुत खुशी मनाई। पूरे उत्साह के साथ। बेटी बड़ी होने लगी  उतना ही उसके साथ खेलने लगे।  दूसरी बार भी बेटी पैदा हुई तो उनका उत्साह कुछ कम दिखाई देने लगा।

बड़ी बेटी विवाह योग्य हुई तो उसका विवाह कर दिया। दामाद अच्छे मिले। अब छोटी बेटी की ही जिम्मेदारी रह गई । पता नहीं क्यों सतीश के व्यवहार में परिवर्तन आता गया। हफ्ते में एक दो बार शराब पीकर घर आने लगे। कुछ दिन मैं चुप रही पर जब उनका पीने का क्रम बढता गया तो टोका कि कोई टेंशन है क्या जो पीने लगे हो तो उन्होंने हाथ झटक दिया और मुझे एक थप्पड़ मार दिया। धीरे-धीरे रोज पीकर आने लगे। मैं कुछ बोलने के लिए जैसे ही मुंह खोलती तो तुरंत पीटने लगते। पीटने का क्रम रोजाना का क्रम बन गया। बस घर शराब पीकर आते और मेरी धुनाई शुरू कर देते। मेरा क्या अपराध था, मेरी समझ में कभी नहीं आया और न उन्होंने बताया। पड़ोसी बीच बचाव करने आते पर वे किसी की नहीं सुनते और दूसरे के सामने तो ज्यादा जोर से पीटते तथा गाली गलौज करते, तमाम अपशब्द कहकर मुझे नीचा दिखाते। कभी बेटी दामाद आते तो उनके सामने और ज्यादा पीटते गाली बकते। छोटी बेटी बीच में आती तो एकाध हाथ उसको भी पड़ जाता। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

पिछले महीने बेटी दामाद आए थे तो उनके सामने मुझे खूब पीटा गालियां दीं अपशब्द कहे। बेटी दामाद का कोई ख्याल नहीं रखा और वे अपने गांव चले गए। अभी एक हफ्ते पहले उन्होंने मुझे इतना पीटा कि मैं गिर गई। गिरी हुई होने पर भी लात मारते रहे। मेरे सिर के पीछे एक डंडा पड़ा था, जो मेरे हाथ पड़ गया और मैंने लेटे हुए ही वह डंडा सतीश के सिर पर दे मारा, वे गिर पड़े और मुझे क्या हुआ पता नहीं पर मैं उन्हें तब तक डंडे से मारती रही जब तक उनके प्राण न निकल गए। छोटी बेटी ने मुझे रोका और झिंझोड़ा तो मेरे हाथ रुके और सतीश को देखकर उनसे लिपट कर रोने लगी कि उन्हें यह क्या हो गया। बेटी ने बताया कि मां तुमने पापा को मार डाला। मैं घबरा गई और बेटी की सहायता से उनके शव को कमरे में अंदर ले गई ताकि कोई देख न ले। लेकिन मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि सतीश मर गए हैं। मुझे लगता रहा कि वे नशे में गहरी नींद सो गए हैं। ऐसे ही चार दिन बीत गए। मैं कुछ समझने लायक हुई तो पांचवें दिन उनके शव को आंगन में गड्ढा खोद कर गाड़ दिया। फिर बड़ी बेटी के यहां चली गई। बेटी और दामाद को सब बतला दिया।

मुझे नहीं मालूम इंस्पेक्टर साहब कि आपको कैसे पता चला और मुझे पकड़ लिया। पर सच में सतीश को मारना नहीं चाहती थी। आप ही बताइए कि हम दोनों में अपराधी कौन है। मैंने एकदम सच्चा बयान दिया है इंस्पेक्टर साहब, कुछ भी छुपाया नहीं है।

☆ ☆ ☆ ☆

टिप्पणी:  8 तारीख के दैनिक भास्कर पुणे में एक समाचार देखा कि एक स्त्री ने पीट पीट कर अपने पति को मार डाला प्रकाशित हुआ।इस समाचार ने मुझे झकझोर दिया और इस लघुकथा की कल्पना हुई।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९४ – नवजीवन… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नवजीवन।)

☆ लघुकथा # ९४ – नवजीवन श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अरे! सुबह-सुबह अलार्म क्लॉक की तरह आ जाती है उठाने, क्या तुझे ठंडी नहीं लगती कमल जी ने दरवाजा खोलते हुए अपनी नौकरानी झुमरी से कहा?

झुमरी ने कहा-बीबी  ठंडी लगती है लेकिन आप बताओ पेट की आग कैसे बुझेगी?

बीबी जी आपको चाय नाश्ता देना है और दो घरों में और काम करना है हम काम करने वालों को क्या ठंडी क्या गर्मी और क्या बरसात बस गोलू के बॉल की तरह दिन रात काम करना है।

और मेरे पास तो दो बेटियां हैं उनकी पढ़ाई की चिंता रहती है अब वह बड़ी भी हो रही है।

कमल जी ने मुस्कुराते कहा हां सब पता है चल चाय बना और मुझे भी पिला और तू भी पी उसके बाद काम करना।

ठीक है बीबी जी झुमरी ने कहा।

बीबी आज आपको स्कूल नहीं जाना क्या?

जाना है ठंड के कारण अब स्कूल का टाइम बदल गया है।

दीदी जब से भैया लोग बाहर रहने चले गए हैं आप स्कूल में पढ़ाते  हो और फिर पार्क में गरीब बच्चों को भी पढ़ते हो आप बहुत ही नेक काम करते हो। दीदी आप तो मेरी हर मदद करते हो और आराम करने को बोलते हो बोलते हो आज नहीं कल काम कर लेना और घरों में तो सब लोग ज्यादा काम करवाते हैं मजाल है जो जरा देर सांस भी ले लूं?

कमल जी ने कहा गंभीर स्वर में तुझे तो कितने बार कहा है कि मेरे घर में ही बस काम कर और सब घर छोड़ दे लेकिन तू मानती ही नहीं।

दीदी आप मेरे लिए बहुत कुछ करते हो लेकिन आप पर मैं कितना बोझ बनूँ आपके घर में तो अकेले हो कुछ काम भी नहीं रहता।

चलो दीदी बातों में मत उलझाओ आप तैयार हो जाओ अच्छा झुमरी तुम्हारे नाम से एक मेरे घर में चिट्ठी आई है?

दीदी मुझे कौन चिट्ठी लिखेगा झुमरी ने कहा?

दीदी आप पढ़ कर मुझे बताओ ना इसमें क्या लिखा है?

ठीक है सुन यह चिट्ठी किसी विनोद नाम के व्यक्ति ने लिखी है. यह विनोद कौन है अरे दीदी वही मेरा शराबी पति उसको छोड़कर मैं बच्चों को लेकर मायके आ गई थी ना मेरी दो बेटियां हैं मेरी कहानी तो आपको पता ही है ना?

अब क्यों वह मुझे याद कर रहा है अपने भाई भोजाई के साथ रहे ना।

कह रहा एक बार तुझे और बच्चों को देखना चाहता है।

आपको तो पता है दीदी जीवन के कुछ घाव भरते नहीं है ये दिल की चोट है दीदी आपको भी सब ने छोड़कर चले गए दूसरी औरत के चक्कर में और मेरे आदमी ने भी मुझे दो बेटी होने के बाद छोड़ दिया।

आज उसके खत में मुझे अतीत की याद दिला दी आंखों के सामने संपूर्ण दृश्य  घूमने लगा है

दीदी आप भी तो अपनी जिंदगी में आगे ही बढ़ गए बच्चे भी आपको छोड़कर चले गए।

कमल जी ने कहा-हां  झुमरी क्या करूं?

तेरी दोनों बेटियां अच्छे से पढ़ लिख ले बस यही चाहती हूं तू भी एक उद्देश्य को लेकर चल।

जीवन एक नदी की तरह है  जैसे नदी सारी कठिनाई को पार करते हुए समुद्र में मिलती है और जिस जिस शहर नगर से हो गुजरती है वहां सभी को नवजीवन देती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २९४ ☆ तरही… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २९४ ?

☆ तरही… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

(ओळीसाठी डॉ.कैलास गायकवाड यांचे आभार )

 

चंद्रा इतका मोहक हा चेहरा असावा

माझ्या मधला खोटा सुद्धा खरा असावा

पाहू कशास दर्पण,माझ्या मनात छाया

 हे बिंब जळातील नितळ पोहरा असावा

 *

आडामधले पाणी सुद्धा अमृत वाटे

त्याच्या खाली पुण्याईचा झरा असावा

 *

समजत नाही स्वतःस कोणी महान मीही

थोडासा पणहा आवाका  बरा असावा

 *

 इवलेसे हे अस्तित्व अधिक छान भासते

आयुष्याचा हा छोटा कोपरा असावा

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२७ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२७ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

दाम दूल्हों के जैसे सोने हैं, 

मात्र शिक्षक के औने-पौने हैं, 

माफिये बिक रहे करोड़ों में 

क्या हुआ काम यदि घिनौने हैं।

0

साँप नेवले सभी हमारे दिल में पलते हैं, 

जैसे मन अपने हों वैसे रंग बदलते हैं, 

ये अपने कुविचारों-सुविचारों के प्रतिनिधि हैं, 

युद्ध हमेशा दो प्रवृत्तियों में ही चलते हैं।

0

प्यार के मौसम जब भी आये, 

लोगों ने पत्थर बरसाये, 

फिर आफत आने वाली है, 

तुमने फिर गेसू लहराये।

0

अफवाहों ने पंख लगाये, 

खौफनाक फिर मंजर आये, 

अम्न-चैन के जो दुश्मन हैं, 

उनने तिल के ताड़ बनाये।

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९२ ☆ “सम्मान–पथ…” – लेखक… श्री अमरेंद्र नारायण ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री अमरेंद्र नारायण  जी द्वारा लिखित  “सम्मान–पथ…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९२ ☆

☆ “सम्मान–पथ…” – लेखक… श्री अमरेंद्र नारायण ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पुस्तक चर्चा

“सम्मान–पथ”( प्रेरक उपन्यास)

लेखक.. अमरेंद्र नारायण

प्रकाशन.. बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन

चर्चा  विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

यह उपन्यास सुप्रसिद्ध चिंतक और वरिष्ठ लेखक अमरेन्द्र नारायण जी का समाज और व्यक्ति के बीच के रिश्ते को सम्मान, प्रेम और मूल्य चेतना के आधार पर पुनर्गठित करने का आग्रह है। इसमें लेखक समकालीन युवा की भटकी हुई आकांक्षाओं, भोगवाद और नैतिक संकट को केवल नियमों से नहीं, बल्कि “मन के शिक्षण” और सामाजिक सह अनुभूति से बदलने की बात करते हैं।

श्री अमरेन्द्र नारायण

लेखक ने यह शाश्वत सत्य प्रतिपादित किया है कि मन और विचार ही मानव जीवन का केन्द्र हैं। मन ही जीवन में सुख दुख, सफलताअसफलता और नैतिकता अनैतिकता की दिशा तय करता है। यदि मन को ज्ञान, विवेक और सकारात्मक अनुभवों से संयमित नहीं किया जाए, तो वही ऊर्जा स्वार्थ, हिंसा और विकृति में बदल जाती है। इसलिए मन का शिक्षण, चरित्र–निर्माण की पहली सीढ़ी माना गया है। उदाहरण के तौर पर लेखक बताता है कि आज के कई युवा ऊँचे पद और अधिक धन तो चाहते हैं, परन्तु अपने कर्तव्य, श्रम और समाज के प्रति जिम्मेदारी को गौण मान लेते हैं, जिससे उनके जीवन में खालीपन और असंतोष बढ़ता जाता है।

आधुनिक युवा पीढ़ी ऐसी सामाजिक स्थितियों से घिर गई है कि वह भोगवादी संकट से गुजर रही है।

पुस्तक में आज के युवा को तकनीक समृद्ध, परन्तु लक्ष्य विहीन और मानसिक रूप से अस्थिर बताया गया है, क्योंकि उसने “अदृश्य सुख” को ही जीवन लक्ष्य मान लिया है। वह उस मरीचिका के पीछे भाग रहा है। लेखक कथानक इस प्रकार बुनता है कि पाठक के सम्मुख स्पष्ट चित्र बनते चलते हैं। करियर, प्रतियोगिता और उपभोग के दबाव में युवा अपने भीतर की नैतिक शक्ति को भूल कर केवल तात्कालिक लाभ की दौड़ में शामिल होता दिख रहा है। वे संकेत करते हैं कि कुछ युवा तेज़ी से पैसा कमाने के लिए अनैतिक साधन अपनाते हैं, जबकि वही ऊर्जा, यदि समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण या सृजनात्मक कामों में लगाई जाए, तो वे स्वयं भी संतुष्ट होंगे और समाज का भी कल्याण होगा। अमरेंद्र जी युवाओं में व्यवहारिक प्रेम, लज्जा और सामाजिक अनुशासन के उदाहरण देते हुए अपना मंतव्य कुशलता से पाठकों के सम्मुख रखते हैं।

किताब में कई सांस्कृतिक धार्मिक प्रसंगों और लोक परम्पराओं के उदाहरण से बताया गया है कि समाज पहले प्रेम, लज्जा और आपसी सम्मान से ही स्व नियंत्रित रहता था। एक स्थान पर नवरात्र या अन्य पर्वों के संदर्भ में वर्णन आता है कि किस तरह पूरा गाँव स्वच्छता, सादगी और सामूहिक पूजा अनुष्ठान के माध्यम से एक दूसरे के प्रति संवेदनशील और अनुशासित होता था। वहाँ नियमों से अधिक “संकोच” और “आपसी नज़र” लोगों को गलती से रोकती थी। एक अन्य प्रसंग में भजन कीर्तन और लोकगीतों के माध्यम से स्त्रियों की परस्पर भागीदारी, सामूहिक श्रम और साझा उत्सव का चित्रण है, जो दिखाता है कि संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मूल्य संरक्षण का माध्यम भी है।

सम्मान पथ जीवन के समाधान का रास्ता सुझाता प्रेरक उपन्यास बन पड़ा है।

लेखक के अनुसार वर्तमान वैश्विक संकट की जड़ यह है कि युवा पीढ़ी ने “आत्मिक कार्य भाव” खो दिया और केवल निजी लाभ को छोड़ किसी बड़े उद्देश्य से नहीं जुड़ पा रही।

सच है आजादी के आंदोलन में अपनी जान दांव पर लगा देने वाली तत्कालीन युवा पीढ़ी ही तो थी।

इस उद्देश्य हीनता से सारी पीढी स्वयं हताश है और समाज में अपराध, हिंसा और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। इसलिए “सम्मान पथ” का मंतव्य है, अपने प्रति सम्मान, दूसरों के प्रति करुणा और समाज के प्रति कर्तव्य बोध को फिर से जन जीवन केन्द्र बनाना। लेखक ऐसे नागरिक की कल्पना करता है जो अपनी निजी सफलता के साथ साथ गाँव की सफाई, नशामुक्ति अभियान, स्त्री सम्मान या शिक्षा प्रसार जैसे कार्यों में भी सक्रिय रहे। उसके लिए यही वास्तविक “आत्म सम्मान” और “राष्ट्र सम्मान” है।

साहित्य का दायित्व और पाठक की भूमिका संप्रेषित करने में उपन्यास पूर्णतः सफल हुआ है।

पुस्तक इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि सिर्फ प्रश्न उठाने से समाज नहीं बदलता। साहित्य का दायित्व है कि वह दिशा भी दिखाए और पाठक के भीतर परिवर्तन की इच्छा जगाए। इसीलिए लेखक ने लेख, संस्मरण, धार्मिक प्रसंग और लोक गीतों का मिश्रण रचती शैली में स्वयं को अभिव्यक्त किया है। लेखक चाहता है कि पाठक केवल बौद्धिक बहस न करे, बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़कर अपने जीवन में सम्मान, प्रेम और नैतिकता को सर्वोच्च जगह दे। इस अर्थ में “सम्मान पथ” प्रेरक और मूल्य केन्द्रित कृति है, जो आज के भटके हुए सामाजिक वातावरण में मनुष्य को फिर से मनुष्य बने रहने की राह दिखाने की कोशिश करती है।

किताब हर साहित्य प्रेमी को पढ़नी और गुननी चाहिए।

स्कूल, कॉलेज, ग्राम पंचायतों, सार्वजनिक पुस्तकालयों, हेतु किताब संग्रहणीय बन पड़ी है, जो प्रत्येक पाठक के मर्म को स्पर्श कर उसमें स्व परिवर्तन के भाव जगा सकेगी। भारतीय समकालीन संदर्भों में उपन्यासकार एक सामाजिक चेतना जगाने की महत्वपूर्ण भूमिका में कलम चलाते नजर आते हैं। बधाई।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०० – साथ निभाना साथी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “साथ निभाना साथी…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २००  – साथ निभाना साथी… ☆

मेरा साथ निभाना साथी।

मुझे छोड़ मत जाना साथी।।

*

फेरे लिए अग्नि-पथ के हैं ।

प्रेम सुधा बरसाना साथी।।

*

सुख-दुख तो आना-जाना है।

इससे मत घबराना साथी।।

*

जीवन पथ पर चलें निरंतर।

कुछ भी नहीं छिपाना साथी।।

*

मेरा जो वह सब तेरा है।

ऐसे भाव मिलाना साथी।।

*

पथ पथरीले राह कठिन है।

उलझन सभी मिटाना साथी।।

*

ऊँचीं-ऊँचीं बनीं सीढ़ियाँ।

गहकर हाथ चढ़ाना साथी।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

27/11/25

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४८ – रिटर्न गिफ्ट ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा रिटर्न गिफ्ट ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४८ ☆

🌻लघु कथा🌻 🎁रिटर्न गिफ्ट 🎁

घर में परिवार छोटा हो या बड़ा। गृहणी पर घर की जिम्मेदारियों का बोझ सर्वाधिक होता है। घर में किसी का जन्मदिन हो, किसी का आना- जाना हो, शादी – ब्याह हो, दुख- सुख हो, चाहे किसी भी प्रकार का आयोजन, रसोई घर से लेकर साज- सज्जा, मंदिर से लेकर हाट- बाजार सभी में उसकी सहभागिता होती है।

और उसके बिना कुछ काम होता भी नहीं है। भोजन व्यवस्था में खाने की फरमाइश सबकी अलग-अलग, सभी के पसंद- नापसंद का ख्याल रखते गृहणी सारा दिन रसोई में।

आज ऐसा ही जन्म दिवस का उत्सव मनाया जा रहा था। घर में सुबह से हल्ला-गुल्ला, गीत – संगीत, और खुशी का माहौल। काम करते-करते वह थक चुकी थी।

वह सब का इंतजाम करते-करते जब रात्रि भोजन पर सबके साथ बैठी तो आज अनायास उसके मुँह से निकला – – – वह बोल पड़ी – मुझे ना एक बात याद आ रही है भोजन बनाते- बनाते व्यवस्था देखकर जब मैं मरूंगी तो भगवान भी मुझे फिर से रसोईया ही बनाकर भेज देंगे।

पतिदेव ने बड़े प्यार से देखा और मुस्कुराते हुए कहा– अरे तुम्हें तो कम से कम रसोईया बनाकर भेजेंगे। हम तो न जाने तैतीस करोड़ जीव- जंतुओं में कहाँ भटकेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं है।

तुम्हें तो गर्व होना चाहिए तुम फिर से रसोईया बनकर इस धरा पर आओगी।

क्या? यही है मेरा रिटर्न गिफ्ट गृहणी सोचने लगी। नाहक ही मैं परेशान होती हूँ। मेरे बारे में कितना अच्छा सोचा जाता है। मेरी भावनाओं के लिए, इतनी अच्छी बातें, विचार आते ही खुशी से आँखें भर आई।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५६ – देश-परदेश – गोल गप्पा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५६ ☆ देश-परदेश – गोल गप्पा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गोल गप्पे खाना भी एक कला हैं। हर व्यक्ति के खाने का तरीक़ा अलग अलग होता हैं। कभी गोल गप्पे के ठेले पर चटोरे लोगों को कुछ दूरी से इत्मीनान से देखिए, कसम से मुंह में पानी की बाढ़ ना आ जाय।

आज उपरोक्त समाचार को पढ़ा तो किसी जमाने में इस पर की गई रिसर्च याद आ गई। यदि आप चार लोगों से कम के ग्रुप में है, और खाने की गति धीमी है, फिर तो आप नुकसान में रहेंगे। कुछ लोग तो मुंह के अंदर बहुत दूर तक उंगलियों के सहारे गोल गप्पे को अंदर तक सुरक्षित छोड़ कर, आंनद प्राप्त करते हैं। कुछ अन्य लोग जिनका मुंह कुछ छोटा होता है वो गोल गप्पे को जिह्वा पर रख, एक उंगली से अंदर धकेल देते हैं। कुछ लोग तो टुकड़ा कर गोल गप्पे खा पाते हैं। इनके मुंह का आकार बहुत छोटा होता है, लेकिन ये लोग बड़ी बड़ी बातें खूब करते हैं। इनको देख कर ही “छोटा मुंह, बड़ी बात” जैसी किंवदंती का जन्म हुआ होगा।

गोल गप्पे की ख्याति पूरे विश्व में हो चली हैं। अमेरिका जैसे देश के सबसे बड़े ब्रांड आउटलेट “कास्को” तक ने गोल गप्पों की बिक्री आरंभ कर दी हैं। गोल गप्पे शर्त लगा कर खाए जाने की परंपरा देश में विगत कई दशकों से चल रही है।

जब हम गोल गप्पे खाते थे, तो जब भी ठेले वाले से पूछते थे, हो गए क्या ? उसका एक ही जवाब होता था, बस एक और बचा है, जिसको मीठी चटनी, बिना पानी के ग्रहण किया जाता था। पत्ते की कटोरी से, कागज की प्लेट से चाइना क्ले की प्लेट में गोल गप्पों का रस्वादन के अलावा कई बार ठेले वाले के हाथ से ही सीधा मुख में ही गप्प कर जाते थे।

व्हाट्स ऐप पर गोल गप्पों को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई गई, लेकिन गोल गप्पों की खपत दिन दो गुनी और शाम चौगुनी बढ़ रही हैं। इसलिए ऊपर छपी खबर से डरना नहीं है। हमारे कुछ पाठक तो आलेख को मध्य में छोड़ कर गोल गप्पों के ठेले पर भाग गए है, आप क्यों नहीं गए, अभी तक?

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… पंढरीची गोष्ट – भाग – ६७ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… पंढरीची गोष्ट – भाग – ६७ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

पंढरीची गोष्ट

एक दिवस आई (सासुबाई) मला म्हणाल्या, ” सुभद्रावहिनींनी तुला बोलावले आहे. येशील का?”

“ हो चालेल ना. जाऊया की. ” मी म्हणाले.

अर्थात नेहमीप्रमाणेच कुटुंबातलं सुभद्रावहिनींशी आपलं नातं काय याचा गोंधळ माझ्या डोक्यात होताच. आईंना ते न सांगताच समजले.

“सुभद्रा वहिनी म्हणजे पंढरीनाथची पत्नी. पंढरीनाथ म्हणजे गोपाळचा मोठा भाऊ. नानांचा ज्येष्ठ मुलगा.” 

ही सगळी लिंक सुद्धा ओपन करायला मला बराच वेळ लागला पण आलं लक्षात.

नाना म्हणजेच भिकाजीशेठ भांडारकर. आबांच्या (माझे सासरे) चार भावांपैकी दुसऱ्या नंबरचे मोठे भाऊ. पंढरी त्यांचा ज्येष्ठ मुलगा.

आई कधीकधी मला सांगत सुभद्रावहिनींबद्दल.

“खूप रुबाब होता तिचा कुटुंबात. सर्वात मोठी सून म्हणून. तिला जर कधी बरं नसलं, प्रकृती अस्वस्थ असली तर तिचं जेवणाचं ताट माडीवर त्यांच्या खोलीत नेलं जायचं पण आता बघा काय अवस्था झाली आहे! पंढरीने असं नको होतं करायला. पदरात चार मुली, एक मुलगा. असा भरला संसार टाकून जाताना थोडा तरी विचार करायचा होता. निदान आपल्या मागे त्यांचं नक्की काय होऊ शकतं याची कल्पना तरी त्याने करायला हवी होती.”

“लक्ष्मी गल्ली” मधली सगळीच घरं तीन मजली. ऐसपैस, वाडा सदृश आणि या सर्वच घरांमधून भांडारकर कुटुंबाचं वैभवशाली एकत्र वास्तव्य. वास्तविक अमळनेर मध्ये या गल्लीला भांडारकर गल्ली असेच म्हटले जाते.

माझं लग्न झालं तेव्हा कुटुंब तसं बरंच विखुरलं होतं. मात्र आमच्या घराच्या समोरच्या इमारतीत वरच्या मजल्यावर सुभद्रावहिनी त्यांची मुले म्हणजेच शरद, माणिक, हेमा, चारू यांच्या समवेत राहत असत. सुभद्रावहिनींना मी ओझरतंच पाहिलं होतं. माझा त्यांच्याशी कधी फारसा संवादही झाला नव्हता. मात्र चारू, हेमा कधी खाली ओट्यावर येऊन माझ्याशी बोलायच्या. मलाही त्यांच्याशी गप्पा करायला आवडायचे. शाळेत शिकणाऱ्या या कुमारवयीन मुली अतिशय बुद्धिमान असल्या पाहिजेत इतके मात्र मला त्यांच्याशी बोलताना जाणवायचे पण त्याचवेळी त्या सगळ्यांच्या चेहऱ्यावर बापाविना वाढणारी मुलं म्हणून एक पोरकेपण त्यांच्या जीवनाला वेढलेलं आहे असं वाटायचं आणि त्याचं मला फार वैषम्य वाटायचं. एका वैभवशाली कुटुंबाचा तेही भाग होते मग असं का? हा प्रश्न मला नेहमी पडायचा. कधीकधी मी आईंना आडून, जरा बिचकतच विचारायची तेव्हा त्या म्हणायच्या,” असंच असतं ग बाई एकत्रात. हात अनेक पण सारी सूत्रं मात्र एकाच्या हातात. कुटुंबाची चाकं त्यांच्याच मर्जीने फिरणार. तसं म्हटलं तर पंढरीच काय सगळेच भरडले जात होते. आबांनी कमी समजावलं का आप्पांना? पंढरीची खूप बाजू त्यांनी मांडली पण शेवटी आबा धाकटेचना भावंडांमध्ये? त्यांचं कोण ऐकणार? मात्र आबांजवळ बुद्धी आणि संयम दोन्ही होतं. जेव्हा जेव्हा त्यांनी मांडलेले अनेक उपयुक्त प्रस्ताव डावलले गेले तेव्हा अक्रस्ताळेपणा अथवा माथेफिरुपणा न करता शांतपणे त्यांनी त्यांचे मार्ग मात्र आखले पण डोळ्यादेखत कुटुंबाची होणारी पडझड मात्र ते फारशी नाही रोखू शकले.”

माझ्यात आणि आईंच्यात होणाऱ्या संवादाची हीच गंमत असायची. सुरुवात एखादा वेगळाच विषय घेऊन व्हायची आणि तो विषय मागे राहून बोलणं दुसरीकडेच जायचं. खूप वेळा आईंचही बोलणं गूढ, अस्पष्ट असायचं. त्यात त्यांचा राग जाणवायचा, नाराजी डोकावयाची. त्यामुळेच सुभद्रावहिनी आणि पंढरीनाथ यांच्या सहजीवना विषयी, नात्याविषयी माझ्या मनात अनेक अनुत्तरीत प्रश्न उरायचे. विलास कडून मला पंढरी या व्यक्तीविषयी तसं बरंच कळलं होतं. त्याच्या बोलण्यात मात्र भाऊ म्हणून पंढरीविषयी प्रेम आणि अभिमान जाणवायचा.

“पंढरी खूप हुशार होता. रसिक होता. तो इतकं सुंदर गायचा! स्वप्नाळू तर होताच तो पण आयुष्याबद्दल त्याच्या काही स्वतंत्र कल्पना होत्या. त्याचं मन या कुटुंबात रमायचं नाही. त्याला काहीतरी वेगळं करायचं होतं. परदेशी जायचं होतं आणि त्यासाठी तो नानांजवळ म्हणजेच वडिलांजवळ पैसे मागत असे. म्हणून तो गृहद्रोही, भेदी, विभाजक ठरला. कोणीच त्याला समजून घेतलं नाही. संपूर्ण कुटुंब त्याच्या विरोधात. हळव्या मनाच्या पंढरीची ताकद कमीच पडली. तो आधी एककल्ली होताच पण त्यानंतर तो एका खोल कोषातच गेला असावा, कधी कधी खिडकीत बसून एकटाच गायचा, रडायचा, हिंसकही व्हायचा. घरातून पळून जाण्याच्या धमक्या द्यायचा तेव्हा घरातली ज्येष्ठ मंडळी त्याला घरात कोंडूनही ठेवायचे. नानांनी चाबकाने फोडलेही होते एकेकदा त्याला. खूप तंग वातावरण असायचं घरात. मात्र त्याच्या अंतरातला आवाज ऐकावा असं कुणालाही वाटलं नाही. त्याला सुधारण्याचे, त्याच्या विचारापासून परावृत्त करण्याची त्यांची हीच साधनं होती. एक वेळ अशी आली की दोन दिवस पंढरी घरीच आला नाही. संपूर्ण गावात शोधाशोध झाली. चव्हाट्यावर नाना चर्चाही घडल्या असतील. शेतावर राहणाऱ्या पावरीला(राखणदार) विहिरीजवळ काढलेल्या चपला आणि कपडे दिसले म्हणून त्यांनी विहिरीत डोकावले. पंढरीचा मृतदेह पाण्यावर तरंगत होता.”

हीच ती पंढरीची गोष्ट माझ्या मनात आजही टोचत राहते. त्या काळाची मनावर साकारलेली अनेक चित्रं मग दृश्यमान होतात.

गौरवर्णी, ठुसका आकर्षक बांधा सदैव जरीचं काठ पदरी चापून-चोपून नेसलेलं नऊवारी लुगडं, गळ्यात, हातात भरगच्च सुवर्णांचे अलंकार, बुद्धिमान रसिक स्वप्नाळू व्यक्तीची पत्नी, पाच मुलांची आई, मोठी सून. जेव्हा जेव्हा माझ्या मनात अशा सुभद्रावहिनींचा विचार येतो तेव्हा सहज वाटते की त्या आपल्या पतीला आत्मघातापासून का नाही परावर्तित करू शकल्या? त्याच्या स्वप्नपूर्तीसाठी लागणारं धन त्या फक्त देहावरच का बाळगत होत्या? ते वापरण्याचा त्यांना अधिकार नव्हता का? त्या एका विशिष्ट काळाने त्यांना रोखलं असेल का असा निर्णय घेण्यापासून? याची समाधानकारक उत्तरे मला मिळालीच नाहीत. त्या काळाचं ते अवघड आव्हान त्या तेव्हा पेलवू शकल्या असत्या तर त्यांच्या वैयक्तिक आयुष्याचं चित्र निराळं नसतं का?

मला नेहमीच वाटतं की उणीवा, त्रुटी, कमतरता भरून काढण्याचं सामर्थ्य स्वतःतच असायला हवं. परिस्थितीपुढे हार मानून सहानुभूती मिळवत जगणं हे जीवन उजळवणारं कसं ठरेल?

त्यादिवशी ठरल्याप्रमाणे मी आणि आई सुभद्रा वहिनींना भेटायला गेलो. थोरल्या जाऊबाई म्हणून त्यांना मी वाकून नमस्कार केला. त्यांनी माझ्या पाठीवर हात फिरवला. आम्हाला बसायला चटई अंथरली. चुलीजवळ असलेल्या शिशवी पाटावर त्या खुरमांडी घालून बसल्या. हेमाने आणि चारुने चहा पोहे बनवले. आम्ही आल्यामुळे त्यांचे चेहरे खूप आनंदले होते. आई आणि सुभद्रावाहिनी बोलत होत्या. मी फक्त ऐकत होते. कारण त्या दोघी ज्या अनेक विषयांवर बोलत होत्या ते सारे विषय माझ्यासाठी अनोळखी, परके होते. मात्र मध्येच सुभद्रावहिनी माझी दखल घेत, “घेगं! चहा घे, साखर घालू का अजून? पोहे ही घे बरं का? आवडतात नं तुला? का गं! तू मुंबईची, तुला अमळनेरला आवडतं का?” असं काहीबाही अगदीच जुजबी पण बोलत होत्या.

 तास दीड तासाने आम्ही घरी परत आलो पण सुभद्रावहिनींच्या त्या भेटीत मला सतत जाणवला तो त्यांच्या चेहऱ्यावरचा कधीही न मिटणारा उपहास. त्यांच्या स्मितहास्यामागे दडला होता फक्त उपहास. मला उगीचच वाटले, त्यांच्या संपूर्ण देहावर काळाने मारलेल्या चाबकाचे अदृष्य वळ आजही आहेत.

॰ गेल्या ५० वर्षात कुटुंबात मी पाहिलेले अनेक चेहरे विझले असले तरी माझ्या अंतर्मनाने टिपलेल्या त्या कृष्णधवल छटा मात्र अमीट आहेत. अजूनही प्रश्नांकित आहेत.

 क्रमशः…

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६१ – प्रतिष्ठा के नाम पर ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – प्रतिष्ठा के नाम पर।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६१ – प्रतिष्ठा के नाम पर ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

आयोजित होते हैं कार्यक्रम

लम्बी रकम देकर बुलाये जाते हैं

बाहर से लोग।

जब वे नहीं आ पाते

या कम आते हैं

तब नगर की प्रतिष्ठा का वास्ता देकर

फोकट में बुलाये जाते हैं नगर के लोग

जैसे

बाहरी लोगों को टिकिट देकर

की जाती है उन्हें जिताने की अपील

नगर की प्रतिष्ठा के नाम पर

सोचता हूँ

प्रतिष्ठा भी क्या चीज है

किसी के लिए अंडर गारमेन्ट

किसी के लिये

उतरी हुई कमीज है।

कुछ भी हो

प्रतिष्ठा बड़ी चीज है।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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