योग-साधना / Yoga Sadhana ☆ स्वास्थ्य: मानव जाति के लिये परिसंपत्ति ☆ योगाचार्य सुभाष कळम्बे

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष 

योगाचार्य सुभाष कळम्बे 

 

(हम योगाचार्य सुभाष कळम्बे जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होने हमें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर स्वास्थ्य से संबन्धित अत्यंत उपयोगी आलेख “स्वास्थ्य: मानव जाति के लिये परिसंपत्ति” प्रकाशनार्थ अनुमति प्रदान की।  आप “योग साधना एवं व्यायाम “पुस्तक के लेखक हैं तथा वर्तमान में ॐ साईबाग योग आश्रम, पुणे में योग प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं।)

 

☆ स्वास्थ्य: मानव जाति के लिये परिसंपत्ति ☆

 

वर्तमानकालिक परिदृश्य में अगर कोई अपनी जिंदगी भर स्वस्थ और तंदुरुस्त रहता है, तो वह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। उसे हासिल करने में किसी को प्राप्त यश एक प्रच्छन्न लाभ है। विलासप्रिय शैलीयुक्त जीवन व्यतीत करने की वर्तमान प्रवृत्ति एक तरह से एक के बाद एक अनेक तकलीफ़ों को निमंत्रण देती है।

इंटेर्णास्वास्थ्य किसे कहते हैं? मानवी व्यक्तित्व का मनो-दैहिक संतुलन ही स्वास्थ्य है। स्वस्थ मन स्वस्थ शरीर पर नियंत्रण रख सकता है और स्वस्थ शरीर स्वस्थ मन के प्रति सकारात्मक अनुक्रिया दिखाता है। सरल शब्दों में, निर्दोष स्वास्थ्य यह सूचित करता है की आवश्यकता के अनुसार सभी शारीरिक प्रणालियों और अवयव उत्साह एवं उपयोगिता के साथ एक-दूसरे से समायोजन करें। तथापि अगर किसी वजह से मनो-दैहिक संतुलन अस्थिर हो जाता है, वह जीवन के लिए ऐसी खतरनाक व्याधियों को उत्पन्न करता है जो मानवी व्यक्तित्व को संकट-क्षेत्र के अंदर ले जा सकती है।

अस्थिर मनो-दैहिक संतुलन के परिणामस्वरूप शारीरिक एवं मानसिक बीमारियाँ/रोग, जैसे हृदय-विकार, दमा, मधुमेह, गुर्दात्रुटि, अपचन, कोश्ट्बद्धता, कैंसर, आर्थाराइट्स, (जोड़ों का दर्द), स्पोंडिलाइटिस, मोटापा, शारीरिक/मानसिक तनाव, उच्च/निम्न रक्तदाब, मानसिक अवसाद और निद्रानाश आदि। दूसरे शब्दों में ये व्याधियाँ/विकार आधुनिक विलासप्रिय जीवन शैली की देन है। मनो-दैहिक असंतुलन समूचे मानवी व्यक्तित्व को सीधे प्रभावित करता है, जिसका नतीजा अंततः मानसिक अवसाद की स्थिति को तुरंत निर्माण करता है। स्मरण रहे कि, मानसिक शांति बाज़ार से खरीदी नहीं जा सकती। उस की उपलब्धि केवल हमारी विलासप्रिय जीवन शैली में परिवर्तन ला कर और जीवन के प्रति सकारात्मक रुख अपनाने से ही संभव है। मानसिक शांति को बनाये रखने के लिए निराशावाद का विचारहीनता से अनुपालन करने की अपेक्षा सर्वशुभवाद सर्वोत्कृष्ट साधन है।  जब प्रकृति एक दरवाजे को बंद करती है, दूसरे दरवाजे को हमेशा खुला रखती है, बशर्ते कि आप उसे पहचानने के लिए पर्याप्त परिश्रमी हैं।

मनो-दैहिक संतुलन को अनुकूल स्थिति में कायम रखने के लिए सिर्फ स्वस्थ जीवन के निम्नलिखित सरल तथ्यों को याद रखिए :

जीने के लिए खा, कि खाने के लिए जिओ

स्वस्थ जिओ, स्वस्थ मरो।

संपत्ति का पीछा करने वाला व्यक्ति स्वस्थ जीवन के मूल तत्व को खो देता है। विलासमय जीवन शैली का आनंद लेने के लिए मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की अपूर्ण लालसा रहती है। इस प्रवृत्ति के कारण व्यक्ति अपना स्वास्थ्य और स्वस्थता की स्थिति, भोजन, सामाजिक, मानसिक शांति आदि की अपेक्षा करता है।  हर एक व्यक्ति के जीवन में मनो-दैहिक संतुलन प्रधान विषय रहना चाहिए। हमारे स्वास्थ्य के अनुरक्षण के लिए हमें किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अगर प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ है, तो समाज और राष्ट्र भी स्वस्थ बनते हैं। एक स्वस्थ देश नैसर्गिक विपत्तियों में प्रबल इच्छाशक्ति के साथ टिका रह सकता है।  इसके अतिरिक्त, अपनी मानसिक शांति बनाए रखने के लिए हमें कुछ स्वर्णिम नियमों को ध्यान में रखना चाहिए।  दूसरों के प्रति प्रेमभाव रखना सीखना चाहिए, जो कि लाभदायक जीवन का सत्व है।  औरों पर ईर्ष्या न कीजिये। अपने दिमाग में शत्रुता और घृणा को थोड़ी भी जगह मत दीजिये।  दूसरों के सुख में सहभागी बन कर उसका आनंद उठाइये। संभव हो तो  मदद के लिए हाथ आगे कीजिये, अगर किसी को जरूरत है।  इससे आप को अतिरिक्त मानसिक संतोष की प्राप्ति होगी। अगर हम किसी का भला नहीं कर सकते, तो बुरा करने से तो अपने आप को रोक सकते हैं।  सहायता नहीं दे सकते, तो बाधाओं का निर्माण मत करो। अपने दैनिक जीवन में सकारात्मक रुख अपनाओ।

इसके अलावा, अपनी आवश्यकताओं से ज्यादा चल और अचल संपत्ति का संचय शांति के बजाए दुश्चिंता और तनाव को पैदा करता है।  आपके नित्य जीवन में सहनशील रहिए। भूत या भविष्य की चिंता मत कीजिये; वर्तमान में रहिए। मानसिक सांत्वना एवं मन-शुद्धिकरण की खोज में लोग आध्यात्मिकता, धर्म, पुराणशास्त्र, सत्संग, आदि मार्गों का अनुगमन कराते हैं। ये सभी गतिविधियां जीवन में वस्तुतः आश्चर्यजनक भूमिका निभाते हैं, बशर्ते कि, हर हालत में मानवी अहं का समर्पण किया गया हो। पुराण-शास्त्र अभिगम के बिना विचार एवं जीवन के तथ्यों को बिना जाने, स्वीकारे व्यक्ति को लाभ के बजाय नुकसान पहुंचाएगा। अपने जीवन में उच्चतम लक्ष्यों की उपलब्धि एक अद्भुत पहलू हैं, अगर व्यक्तिगत योग्यता और अभिवृत्ति अनुकूल हो तो। जहां तक जीवन के लक्ष्य एवं उद्देश्य का सवाल है, कई विकल्प अवश्य रखिए, क्योंकि मानवी इच्छाओं का अंत नहीं है।  बिना विकल्प के इच्छाओं, लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की प्राप्ति में विफलता मनः शारीरिक विकार उत्पन्न करके स्वस्थ्य पर सीधा बुरा प्रभाव डालेगी। कुल मिलाकर, बचपन से ही हमारे विचारों में सांस्कृतिक विरासत की साथ स्वास्थ्यकर जीवन शैली का पोषण किया जाना चाहिए।  आपके शरीर एवं मन को कुछ न कुछ सकारात्मक, रचनात्मक एवं उपयोगी बातें करने में व्यस्त रखिए।  साथ ही साथ, स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन (और प्रतिक्रम से) की सुरक्षा के लिए आपके दैनिक नित्यक्रम में कुछ ऐरोबिक व्यायाम, योग, ध्यान और कैलोरीज़ की व्यक्तिगत आवश्यकतानुसार पौष्टिक भोजन के आहार-विधान को समाविष्ट कीजिये। अधिकांश स्वास्थ्य समस्याओं को निपटाने या रोकने के लिए कार्यकाल में समुचित विश्राम कीजिये। अधिकांश स्वास्थ्य समस्याओं को निपटाने या रोकने के लिए कार्यकाल में समुचित विश्राम कीजिये और रात को कम से कम 7-8 घंटे की गहरी नींद लीजिये। सप्ताह में 5 बार 30 मिनटों के लिए निर्धारित हृदयस्पन्दन अनुपात को बनाए रखकर द्रुत-भ्रमण (तेज चलना), जॉगिंग, साइक्लिंग, तैरना, आदि आपके स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाएँगे। इसलिए उपर्युक्त बातें ध्यान में रखकर किसी दुर्घटना को टालने के लिए आपके दिन की योजना बनाइये। यहाँ यह उक्ति स्मरणीय है :

शरीरमाद्यम खलुधर्मसाधनम

धर्म के मार्ग पर प्रामाणिकता से अनुगमन करने के लिए आपके शरीर और मन का स्वस्थ होना जरूरी है।  मन जो भी सोचता है, शरीर उसको प्रतिबिम्बित करता है।  इसलिए मानवी जीवन में मानसिक सुस्थिति को बनाए रखने में ध्यान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरल शब्दों में ध्यान का अर्थ “किसी बात पर मन में निरंतर सोचना” है।  आपकी दिनचर्या में आगे के कार्य में मन और आत्मा डालकर, उत्कृष्ट रूप में करने के लिए अपने शरीर और मन को प्रेरित कीजिये, जिससे अतिरिक्त शारीरिक एवं मानसिक तनाव में कमी आएगी। एक समय एक ही काम साधिए। स्थानबद्ध जीवनशैली जैसे दूरदर्शन देखते रहना, गप्प, इंटरनेट पर ब्राऊसिंग, अति-निद्रा, धूम्रपान, तंबाकू चबाते रहना, अति भोजन आदि का अतिरेक जीवनरेखा को घटाता है। इसलिए दोषरहित स्वास्थ्य की उपलब्धि के उद्देश्य से मनो-दैहिक संतुलन के अनुरक्षण के लिए किस प्रकार जवान एवं स्वस्थ रहें इस बारे में कुछ संकेत संक्षेप में देए गए हैं।

  1. हँसिये और विनोदप्रिय रहिए। खिन्न न रहें।
  2. विगत को विगत ही रहने दें। भूतकाल के बारे में सोचते रहने से अनावश्यक तनाव पैदा होता है।
  3. जल्दी सोएँ और जल्दी उठें; यह स्वास्थ्यकर और अच्छा है।
  4. दुबले रहिए; केवल 30% अति भार भी हानिकारक है।
  5. अध्ययन, पठन, सामाजिक कार्य चालू रखें। सतर्कता और सक्रियता मन-मस्तिष्क की कोशिकाओं को स्वस्थ रखती है।
  6. मनोनुकूल काम करना जारी रखें। निवृत्त न हों, उससे आपका शरीर मंद बनेगा।
  7. अपने जीवन के स्वामी स्वयं बनिए। आप औरों द्वारा धकेले गए तो उससे तनाव पैदा होगा।
  8. दवा की अत्यधिक गोलियों से शरीर का विनाश होता है। उतनी ही लें; जितनी अनिवार्य हो।
  9. भारवृद्धि और कमी के बीच झूलते रहना गलत है। 1.
  10. 10. व्यायाम कीजिये; धूम्रपान करना छोड़ दीजिये और चर्बीवाले अन्न कम खाइये।
  11. स्वास्थ्य और मृत्यु की चिंता मत कीजिये; सिर्फ जीवन के साथ आगे बढ़िए और उसका आनंद उठाइये।

 

अंतिम परंतु कम मत्वपूर्ण नहीं –

हमेशा याद रखिए

स्वास्थ्य परिसंपत्ति है, उसे संभाल कर रखिए।

©  Yogacharya Subhash Kalambe

Yoga Therapist, Health & Fitness Consultant
BPE, MPE, NIS (Athletics), Dip. Yoga (Kaivalyadham), Dip. SportsMedicine & SportsManagement, Black Belt (Marshal Art)

7, Parishram Housing Society, Near Baker Factory, Viman Nagar PUNE – 411 014.Maharashtra (India)
Phone: 020-26630475Mobile: 9822094849, Email: subhash.kalambe@gmail.com

 

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ आओ हम सब मिल नित योग करें ☆ – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष 

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव 

 

(डॉ. प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी की  अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष कविता।)

 

☆ आओ हम सब मिल नित योग करें

 

आओ हम सब मिल नित योग करें,

हम सब भारत माता की संतान हैं।

निरोग रहें हम एवं सब शक्ति से भरें,

देश की हम आन बान और शान हैं।।

आओ – – – – – – – – – – – – – – – – -करें।

 

आओ हम सब मिल कर संकल्प करें,

योग ज्ञान से सकल जगत अंजान है।

स्वस्थ रहने का सबमें हम विकल्प भरें,

जगद्गुरु बनने का अब स्वप्न  संधान है।।

आओ – – – – – – – – – – – — —— – करें।

 

निज सभ्यता संस्कृति का हम मान करें,

देख रहा सारा जग हमें इसका भान है।

भू नभ जल वायु अग्नि का सम्मान करें,

पर्यावरण संरक्षण अब हमारी आन है।।

आऔ – – – – – – – – – – – – – – – – – -करें।

 

जैव विविधता संरक्षण का संधान करें,

जीव जंतु वनस्पतियां हमारी शान हैं।

क्रोध लोभ मोह अहं हिंसा मर्दन करें,

वसुधैव कुटुम्बकम मंत्र हमारी शान है।।

आऔ——————————शान हैँ।।

 

डा0.प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव

9412939877

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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ☆ पावसाच्या कविता ☆ – सुश्री विजया देव

सुश्री विजया देव

 

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री विजया देव जी  की  वर्षा ऋतु के आगमन पर एक भावप्रवण मराठी कविता।)

 

☆ पावसाच्या कविता ☆

 

या धरेच्या रांजणात बरसतो

पाऊस हा

जीवनाचा अर्थ काही सांगतो

पाऊस हा

मित्र हा  क्रुषिवलांचा करी क्रुपा त्यांचेवरी

शेत हिरवीगार कराेनी सुखवितो

पाऊस हा

काेरड्या झाल्या मनाच्या भावना

संवेदना

प्रेमवर्षावात तेव्हा भिजवतो

पाऊस हा

वाट हिरवी चालताना मातीला

येई सुवास

काय अत्तराचे सुगंध शिंपतो

पाऊस हा

विरह आणि मिलनाचे  हा धडे देतो कशाला

प्रेमिकाना जागवितो जागतो

पाऊस हा

जाण याला संगिताची हा असे कां

गायक

रिमझीमणारी गझल गातो

रिझवतो पाऊस हा

 

©  विजया देव, पुणे 

 

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प चौथा #4 – ☆ कॉर्पोरेट जगत ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

 

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं  ।  अब आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  आज इस लेखमाला की शृंखला में पढ़िये “पुष्प चौथा  – कॉर्पोरेट जगत” ।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – पुष्प चौथा #-4 ☆

 

कॉर्पोरेट जगत 

 

जमाना बदलतोय असे एकीकडे म्हणायचे अन दुसरी कडे मात्र नावावरुन, जातीवरून त्याला काम द्यायचे का नाही हे ठरवायचे हेच सर्वत्र पहायला मिळते.

बारा बलुतेदारी पद्धत गेली. अठरा पगड जातीचा समाज कामासाठी देशाच्या कानाकोपर्यात विभागला गेला. त्या जात बांधवाचे एकीकरण करण्याचे काम युद्ध पातळीवर सुरू झाले आहे त्यात कार्पोरेट जगत मागे नाही.

मोठमोठय़ाल्या फीया भरून, डोनेशन देऊन पदवीधर झालेले हे लक्ष्मीपुत्र ठरावीक ठिकाणी बरोबर कामाला लागतात.  एखादा वरच्या हुद्द्यावरील अधिकारी  आपले युनिट तयार करताना,  आपल्या हाताखालील कामगारांची भरती करताना आपल्या गणगोताला प्राधान्य देतो.  बहुतांश कंपनीत अशी साखळी तयार झाली आहे. कामगारांची संख्या, भरती जातीनिहाय होत नाही पण कामाची विभागणी मात्र जातीनिहाय केली जाते. कम्युनिकेशनचे गोंडस नाव देऊन ही साखळी  एकेक विभाग सांभाळू लागते. काही दिवसांनी जेव्हा प्रमोशन ची वेळ येते तेव्हा हे वाद  विवाद  चव्हाटय़ावर येतात.  त्याचा बाॅस त्याला दुसऱ्या विभागात जाऊ देत नाही. आपला माणूस  आपल्या हाताखाली  कार्यरत रहावा  यासाठी राजकारणी डावपेच खेळले जातात.

जात  एकत्रीकरण तळागाळातून देखील सुरू झाले आहे. त्याचा फार मोठा फायदा काॅरपोरेट जगतानं उचलला आहे.  पेपरविक्रेते,  दूधविक्रेते – उत्पादक संघटना,  कृषी उत्पन्न समित्या,  हमाल पंचायत, बाजार समिती,  बचत गट,  अंगण वाडी,  अनाथाश्रम, वसतिगृहे , पतसंस्था, बॅका सर्व ठिकाणी नोकरीच्या संधी उपलब्ध करून देताना जातीचा विचार केला जातो.  इतकेच काय व्यवसाय प्रशिक्षण देताना देखील जातीनिहाय सवलती देऊन प्रशिक्षण दिले जाते. शिक्षण संस्था देखील यामध्ये मागे नाहीत. ही जातीनिहाय  एकत्रिकरणाची साखळी जन्मदाखल्यापासून सुरू होते. विविध  संस्थेच्या संचालक पदाच्या निवडणुकीत पॅनेल मधून ही जातीयता ठळक पणे निदर्शनास येते.

मुलाला शिक्षण देतात संस्थेचा नावलौकिक पहाण्यापेक्षा संचालकांचे जातकूळ त्याची माहिती काढली जाते.  सोशल नेटवर्किंग साइट्स वरून जरी प्रवेश परीक्षा दिल्या जात  असल्या तरी प्रत्यक्षात राखीव जागेच्या कोट्यातून राजकारण खेळवले जाते.  व्यापारी संघटनांमधे हा जातीयवाद मोठ्या प्रमाणावर जाणवतो. काॅरपोरेट जगताचे लागेबांधे शेअर्स,  डिबेंचर्स , भांडवलदार यांच्याशी  इतके  घट्ट  असतात की ‘विश्वासाची माणस’ या नावाखाली जातीनिहाय एकत्रिकरण राजरोस केले जाते. विविध राजकीय पक्षांच्या पाठबळावर हे काॅरपोरेट क्षेत्र उत्तुंग भरारी घेते आहे.

एकमेकां साह्य करू, किंवा तू मला  ओवाळ आता, मी तुला  ओवाळतो या न्यायाने पैशाच्या जोरावर माणूस  आपापल्या जातीतल्या व्यक्तीना रोजगार देऊन,  व्यवसाय प्रशिक्षण देऊन सशक्त बनवित आहे. जस  छापा  आणि काटा  या नाण्याचा दोन बाजू पाहिल्या जातात तश्या ‘सिन्सियर ‘  या  छत्राखाली या जातीवली तयार केल्या जातात. हे केवळ एकत्रिकरणावर थांबत नाही तर  जातीनिहाय  एकत्रिकरण झाले की संघटीकरण सुरू होते. आणि संघटीकरण झाले की आरक्षण वाद सुरू होतो. गुणवत्ता डावलून सांभाळून घेण्याची वृत्ती  आली की जातीयवाद बोकाळतो. विविध संघटना मध्ये गटातटाचे राजकारण होते  आणि याचा फायदा सर्वाधिक काॅरपोरेट जगताला होतो आहे.

पर्सनल सेक्रेटरी पासून  ऑफिस बाॅय पर्यंत सर्व ठिकाणी हे गट तट पहायला मिळतात. नोकर्‍या मिळवून देणाऱ्या संघटनेत याची सविस्तर माहिती  उपलब्ध होते.

दोष  एकत्रिकरण किंवा संघटीकरणाचा नाही तर दोष जातीयवादी दरी निर्माण करणाऱ्या समाजकंटकांचा आहे.  काॅरपोरेट क्षेत्राचा मूळ उद्देश  एकत्रिकरण,संघटन,  उत्पादन, विकसन आणि सेवा उपलब्धी हे  असल्याने  इथे हा जातीयवाद कॅन्सर सारखा समाजमनात पसरत चालला आहे.

माणसाने माणसाकडे माणूस म्हणून पहायला शिकले हा जातीयवाद काही अंशी कमी होईल. असे मला वाटते. पण  ‘आपला’ हा शब्द माणसाला चिकटला  आणि माणूस जातीच्या रूळावरून चालायला लागला. हे रूळ समांतर रेषा बनून धावतात  आणि तिथेच काॅरपोरेट क्षेत्र विस्तृत होत जाते. जात  आणि पैसा यांच्या पारडय़ात तोलला जाणारा माणूस  या  काॅरपोरेट क्षेत्रात आपण जगतो कुणासाठी,  कशासाठी हेच विसरला  आहे काॅरपोरेट जगतात  माणूस माणसाला दुरावला आहे हेच खरे वास्तव आहे.

हे  वास्तव स्विकारायचे कि बदलायचे हे ही  आता माणसानेच ठरवायचे. ही जातीयवादाची पोकळी भरून काढण्यासाठी काय पाऊले उचलायची हे व्यक्ती निहाय.

 

✒  © विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकारनगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

 

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Yoga Day 2019: Yoga By The Sea & Eight Limbs Of Yoga Practice ☆ Shri Jagat Singh Bisht

International Yoga Day 2019

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer,  Author, Blogger, Educator and Speaker.)

 

Yoga Day 2019: Yoga By The Sea & Eight Limbs Of Yoga Practice

 

Please click on picture or text for video >>  Yoga by the sea 

On the eve of #YogaDay2019, we present an inspiring video of #yoga by the sea. It includes a brief description of the eight limbs of yoga practice.

These pictures were shot one morning at the Beach Haven wharf in North Shore, Auckland, New Zealand. It depicts Radhika, yoga teacher, performing some asanas.

Yoga Sutras of Patanjali:

Yoga is the control of the patterns of consciousness.

Eight parts of yoga discipline:

1. Yama: self-restraints

2. Niyama: fixed rules

3. Asana: postures

4. Pranayama: breath control

5. Pratyahara: withdrawal

6. Dharana: concentration

7. Dhyana: meditation

8. Samadhi: samadhi

The five yamas:

  1. Non-violence
  2. Truth
  3. Honesty
  4. Sensual abstinence
  5. Non-possessiveness

The five niyamas:

  1. Cleanliness
  2. Contentment
  3. Austerity
  4. Self-study
  5. Surrender to God

Asana:

Steady and comfortable should be the posture.

Pranayama:

The asana having been done, pranayama is the cessation of the movement of inhalation and exhalation. Fitness of the mind for concentration develops through pranayama.

Pratyahara:

Pratyahara is, as it were, the imitation by the senses of the mind by withdrawing them from their respective objects. There is highest mastery over the sense organs by pratyahara.

Dharana:

Concentration (dharana) is binding the mind to one place.

Dhyana:

Uninterrupted stream of the content of consciousness is Dhyana.

Samadhi:

That state (of dharana and dhyana) becomes samadhi when there is only the object appearing without the consciousness of one’s self.

(This is only a demonstration to facilitate practice of the asanas. It must be supplemented by a thorough study of each of the asanas. Careful attention must be paid to the contra indications in respect of each one of the asanas. It is advisable to practice under the guidance of a yoga teacher.)

 

Jagat Singh Bisht  and Smt. Radhika Bisht 

Founder: LifeSkills

Seminars, Workshops & Retreats on Happiness, Laughter Yoga & Positive Psychology.
Speak to us on +91 73899 38255
lifeskills.happiness@gmail.com

 

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – तृतीय अध्याय (40) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

तृतीय अध्याय

( अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा )

( काम के निरोध का विषय )

 

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।

एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌।।40।।

 

इंद्रिय मन औ” बुद्धि काम के प्यारे ठौर ठिकाने हैं

जो आच्छादित कर लेते खुद,ज्ञान को नित मनमाने हैं।।40।।

 

भावार्थ :  इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है। ।।40।।

 

The senses,  mind  and  intellect  are  said  to  be  its  seat;  through  these  it  deludes  the embodied by veiling his wisdom. ।।40।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य- पुस्तक समीक्षा – ☆ बँटा हुआ आदमी ☆ डॉ मुक्ता (समीक्षक – श्रीमती माधुरी पालावत)

भाव कथा संग्रह  – बँटा हुआ आदमी – डॉ. मुक्ता 

समीक्षक – श्रीमती माधुरी पालावत

बँटा हुआ आदमी (भाव कथा संग्रह) : लेखिका डॉ. मुक्ता,

प्रकाशक – पेसिफिक बुक्स इन्टरनेशनल, 108 फ़र्स्ट फ्लोर, 4832 /24 प्रहलाद स्ट्रीट, अंसारी  रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110002

मूल्य – 220/…रू.

फ्लिपकार्ट लिंक –  बँटा हुआ आदमी (भाव कथा संग्रह)

 

श्रीमती डॉ. मुक्ता जी की भाव रचनाओं की नवीन कृति है ‘बँटा हुआ आदमी’ स्वत: सिद्ध है । उनका भावुनुभूति का क्षेत्र अधिक सक्रिय है । उनके मानस में जो सहज स्पन्दन हुए है वे लिखती गई । उनकी भावना और संवेदना से प्रेरित यह कृति प्रकाशित हुई है । इसीलिए इस कृति में मणि को निर्मिति की प्रक्रिया पूरी हुई । डॉ. मुक्ता जी ने अपनी अनुभूति विशेषकर अन्तर्निहित भावानुभूति को अक्षरबद्ध किया है और इस प्रकार उनका मन रचनाओं को मणि बना सका है और बिना किसी कलात्मक करतूत या कौशल के स्वयं रचना के एक विशेष रूप या प्रकार में ढ़ल गई जैसे कार्बन हीरा बन गया हो ।

“बँटा हुआ आदमी” जैसी साहित्यिक कृति बौद्धिक तनाव, जटिल संरचना और भाव रहित, संवेग विहीन यांत्रिक सभ्यता के इस दौर में अपनी प्रासंगिकता उपलब्ध कर लेती है ।

डॉ. मुक्ता जी हिन्दी की प्रसिद्ध लेखिका है । साहित्य जगत के लिए अपरिचित नाम नहीं है वरन एक सशक्त हस्ताक्षर है । कथा साहित्य, लेख, व्यंग्य, कविता आदि लेखन में उनका विशेष योगदान है और उनकी वरिष्ठता का साहित्य में पूर्णत: आभास मिलता है । इस नवीन कृति में मानवीय जीवन के जीवंत प्रश्नों को उदघाटित किया है और विवेक जागृत कराने का पुरुषार्थ किया है । इस सन्दर्थ में मुझे किसी महापुरुष की ये पंक्तियां स्मृति में आ रही है-

“जीवन सच्चा सूत्र, उलझ कर अकल बिगाड़े, पक्ष विपक्षी लक्ष, इसे उलझा देता है

यूं दक्ष करे वो आंत गांठ से रक्ष, मूल यारी कारण ताड़े, जीवन सच्चा सूत्र …..”

जब मानव लोक पक्ष…विपक्ष में उलझ जाता है तो एक सरल स्री जिन्दगी को रेशम के धागे में पडी गांठों की तरह उलझा देता है जिससे जीवन का सच्चा सूत्र अर्थात धागा उलझ जाता है और मानव अपनी अकल के बिगड़ जाने के करण सदा परेशान बना रहता है । जीवन को विभीषिकाओं से त्रस्त हर पल स्वयं से जूझते, आत्म संघर्ष करते मुखौटे क्रो धारण करने को विवश हो जात्ता है और ऐसी परिस्थिति में अनबूझ पहेली बनकर जीवन रह जाता है । इससे उसके जीवन में सुख…दुख, खुशी-गम, हंसी-रूदन एक छलावा मात्र हो जाता है । वह हालात का आरा, संवेदन शून्य, अस्तित्वहीन और बँटा हुआ सा प्रतीत होता है । आज जिसे देखो वह उलझनों, परेशानियों में जकड्रा हुआ नजर आता है । उसे जीवन में शिकवा-शिकायतें, तनाव आदि घेर लेते है और जब तक तनाव रहता है सब कुछ असंतुलित, बिखरा-बिखरा, बोझिल सा जीवन लगता है तथा यह खुबसूरत सी जिन्दगी समस्याओं का पिटारा बन कर रह जाती है । दिलों-दिमाग में हर समय चिन्ताओं का धुँआ छाया रहता है ।

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। ) 

वर्तमान में जीवन मूल्य बिखर रहे हैं, अनास्था का बोलबाला बढ़ रहा है, रिश्तों की अहमियत नहीं के बराबर हो गयी है, पारस्परिक स्नेह…सौन्दर्य से वह दूर होता जा रहा है । मानव मशीन बन कर रह गया है । उसके जीवन का ध्येय बस अधिकाधिक धन कमाना व येन…केन अपना रूतबा प्रदर्शित करने में लगा रहता है जिसके लिए वह उचित-अनुचित कार्यों की भी परवाह नहीं करता है परिणाम स्वरूप वह चारों ओर सन्देह, भय, आशंका, अविश्वास व संत्रास में घुला

रहता है । मुक्ता जी द्वारा रचित यह पुस्तक इतनी गहरी व निराली है कि सागर के तत्वों से मुक्ता ला कर देती है । मानव की आशुप्रज्ञा दर्पणवत बनाती है । जीते तो सब ही है लेकिन जीने का अर्थ समझाती है यह पुस्तक न केवल रास्ता बताती है बल्कि मंजिल का साक्षात्कार भी कराती है ।

सभी महापुरुषों ने कहा है “मनुष्य भव दुर्लभ है”, जब इतनी दुर्लभ जिंदगी हमें मिली है तो क्यों न इसका लाभ उठाकर अपना जीवन सार्थक करें । सच तो यह है मानव जीवन जब तक है तब तक चुनौतियों आयेंगी, प्रतिकूलताएं, बाधाएं व परीक्षाएं भी आएंगी ऐसे में इन सबके लिए तैयार रह कर अपने जीवन को सार्थक बनाएँ जैसे सूर्य की किरणे अंधियारे क्रो हरने के लिए हैं वैसे ही हर चुनौती हमारी किस्मत की किताब का नया अध्याय रचने के लिए है । प्राप्त मानव जीवन को सुन्दर तरीके से जीएं । यह पुस्तक जीवन जीने का सही अन्दाज देती है मन की समझ को अनेकायामी विस्तार देती है, सही निर्णय लेने की कुशलता का उपहार देती है । इस कृति में लेखिका ने 118 विषयान्तर्गत क्रमशः ‘विषम परिस्थिति’ से ‘मदर्स डे’ तक रचित की है जो इंगित करते है कि मानव का व्यवहार कैसे संतुलित रह सकता है ।

आज इक्कीसवीं सदी में आधी आबादी के समानाधिकारों व आधी जमीन की मांग छोरों पर है, कानून भी इसका साक्षी बना है, पर हकीकत इसके विपरीत है । आज भी पुरुष वर् औरत/महिला/स्त्री को दोयम दर्जें के रूप में समझता है, जबकि यह ममत्व, वात्सल्य, प्रेम अर्थात् सत्यं शिवम सुन्दरम् को व्याख्यायित करती है । इस कृति की रचियता स्वयं महिला है अतएव इस विषय को उन्होंने गहराई से लेकर अनेकों लेख/अपने भाव पुस्तक में महिमा मंडित किए हैं जो संवेदनशील भावनाओं में उन गहराईयों तक पहुँचने का प्रयास है जो दिखायी तो नहीं देती परन्तु अभाव, पीडा, उपेक्षा और अपेक्षाओं का जाल बुनकर जीवन पथ पर अवरोधक अवश्य खड़े कर देती है । लेखिका ने भाव अभिव्यक्ति और संवाद के माध्यम से वर्तमान के धरातल पर बिखरे हुए प्रश्न, टूटत्ते रिश्ते और अनुभूतियों को ऊंची-नीची भूमि पर छाये छलनामय कोहरे में झांक कर सच्चाई तक पहुंचने का प्रयास किया है ।

‘बँटा हुआ आदमी’ की  ये भाव कथाएँ यथार्थ के तप्त धरातल की निर्ममता और कड़वाहट, दुर्भावनाए, दुश्चिन्ताए, भयावह, विषाक्त वातावरण व पनप रही अनास्था, अजनबीपन, संवेदन शून्यता, स्वार्थपरता व अलगाव की त्रासदी का दस्तावेज है धूल भरे गुब्बारे में गुब्बार में तैरते  बिन्दु हैं, जो समन्वय व सामंजस्य लाने का यथासंभव प्रयास करती हैं जिससे सुन्दर व स्वस्थ समाज का सपना साकार हो सके।

कहते हैं जब समाज टूटता है या बँटता है तो सभ्यता, संस्कृति, मर्यादा और परम्पराएं आँसू बहाती हैं, परिवार टूटता है तो जड़े हिल जाती हैं उसे बाँधे रखने वाली आत्मीयता, अपनापन, रिश्ते-नाते क्रन्दन करके भी अपने आँसुओं का गम अन्दर ही अन्दर पीते रहते है, पर जब व्यक्ति टूटता है तो मानों जीवन का दर्पण ही टूट गया हो, जो फ्रेम में लगा रहकर भी अनेक टुकडों में बँट जाता है तो जीवन के सारे अभाव, अधूरापन, सपने, अपेक्षाएं, आकांक्षाएँ सब कुछ बिखर जाते है । दूर…दूर तक, यदि कोई टुकड़। पाव के बीच में आ गया तो रहे सहे व्यक्तित्व को भी लहुलुहान कर देता है । यदि उठाकर देख लिया तो एक ही दर्पण में अपना चेहरा सैकड़ों टुकडों में बँटा नजर आता है । समझ में नहीं आता कि असली कौन सा है? किसे अपना कहा जाए और आपसी सम्बन्धों को टूटन, बेरूखी,बिगड़ती स्थितियाँ, उलझे हुए मोड़ से सब ओर हताशा का अंधेरा और अकेलापन नजर आता है । इसी आधार पर डॉ. मुक्ता जी ने नवीन कृति की रचना की है।

मैं आशा करती हूँ कि मुक्ता जी की यह कृति ‘बँटा हुआ आदमी’ निश्चय ही बृहद पाठक समुदाय को आकर्षित करने में सफल हो सकेगी । जैसे फटे हुए बादलों के उगने से सूर्य चमकने लगता है वेसे ही कृति को पढ़कर पाठक झूम उठेगा तथा मानवता का कण…कण सुशोभित होगा। इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए लेखिका बधाई की पात्र है ।

बँटा हुआ आदमी (भाव कथा संग्रह) : लेखिका डॉ. मुक्ता,

प्रकाशक – पेसिफिक बुक्स इन्टरनेशनल, 108 फ़र्स्ट फ्लोर, 4832 /24 प्रहलाद स्ट्रीट, अंसारी  रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110002

मूल्य – 220/…रू.

समीक्षक श्रीमति माधुरी पालावत

साभार – जगमग दीपज्योति (मा.), महावीर मार्ग, अलवर (राज ) 30300

 

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – #2 ☆ भारत में चीन ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक के व्यंग्य”  में हम श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्य आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्यों को “विवेक के व्यंग्य “ शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे।  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य “भारत में चीन”

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी व्यंग्य लेखन हेतु प्रतिष्ठित ‘कबीर सम्मान’ से अलंकृत 

हमें यह सूचित करते हुए अत्यंत हर्ष एवं गौरव का अनुभव हो रहा है कि ई-अभिव्यक्ति परिवार के आदरणीय श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी को ‘साहित्य सहोदर‘ के रजत जयंती वर्ष में व्यंग्य लेखन हेतु प्रतिष्ठित ‘कबीर सम्मान’ अलंकरण से अलंकृत किया गया। e-abhivyakti की ओर से आपको इस सम्मान के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें।  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – #2 ☆ 

 

☆ भारत में चीन☆

 

मेरा अनुमान है कि इन दिनो चीन के कारखानो में तरह तरह के सुंदर स्टिकर और बैनर बन बन रहे होंगे  जिन पर लिखा होगा “स्वदेशी माल खरीदें”, या फिर लिखा हो सकता है  “चीनी माल का बहिष्कार करें”. ये सारे बैनर हमारे ही व्यापारी चीन से थोक में बहुत सस्ते में खरीद कर हमारे बाजारो के जरिये हम देश भक्ति का राग अलापने वालो को जल्दी ही बेचेंगे. हमारे नेताओ और अधिकारियो की टेबलो पर चीन में बने भारतीय झंडे के साथ ही बाजू में एक सुंदर सी कलाकृति होगी जिस पर लिखा होगा “आई लव माई नेशन”,  उस कलाकृति के नीचे छोटे अक्षरो में लिखा होगा मेड इन चाइना. आजकल भारत सहित विश्व के किसी भी देश में जब चुनाव होते हैं तो  वहां की पार्टियो की जरूरत के अनुसार वहां का बाजार चीन में बनी चुनाव सामग्री से पट जाता है .दुनिया के किसी भी देश का कोई त्यौहार हो उसकी जरूरतो के मुताबिक सामग्री बना कर समय से पहले वहां के बाजारो में पहुंचा देने की कला में चीनी व्यापारी निपुण हैं. वर्ष के प्रायः दिनो को भावनात्मक रूप से किसी विशेषता से जोड़ कर उसके बाजारीकरण में भी चीन का बड़ा योगदान है.

चीन में वैश्विक बाजार की जरूरतो को समझने का अदभुत गुण है. वहां मशीनी श्रम का मूल्य नगण्य है .उद्योगो के लिये पर्याप्त बिजली है. उनकी सरकार आविष्कार के लिये अन्वेषण पर बेतहाशा खर्च कर रही है. वहां ब्रेन ड्रेन नही है. इसका कारण है वे चीनी भाषा में ही रिसर्च कर रहे हैं. वहां वैश्विक स्तर के अनुसंधान संस्थान हैं. उनके पास वैश्विक स्तर का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले अपने होनहार युवकों को देने के लिये उस स्तर के रोजगार भी हैं. इसके विपरीत भारत में देश से युवा वैज्ञानिको का विदेश पलायन एक बड़ी समस्या है. इजराइल जैसे छोटे देश में स्वयं के इन्नोवेशन हो रहे हैं किन्तु हमारे देश में हम बरसो से ब्रेन ड्रेन की समस्या से ही जूझ रहे हैं.  देश में आज  छोटे छोटे क्षेत्रो में मौलिक खोज को बढ़ावा  दिया जाना जरूरी है. वैश्विक स्तर की शिक्षा प्राप्त करके भी युवाओ को देश लौटाना बेहद जरूरी है. इसके लिये देश में ही उन्हें विश्वस्तरीय सुविधायें व रिसर्च का वातावरण दिया जाना आवश्यक है. और उससे भी पहले दुनिया की नामी युनिवर्सिटीज में कोर्स पूरा करने के लिये आर्थिक मदद भी जरूरी है. वर्तमान में ज्यादातर युवा बैंको से लोन लेकर विदेशो में उच्च शिक्षा हेतु जा रहे हैं, उस कर्ज को वापस करने के लिये मजबूरी में ही उन्हें उच्च वेतन पर विदेशी कंपनियो में ही नौकरी करनी पड़ती है, फिर वे वही रच बस जाते हैं. जरूरी है कि इस दिशा में चिंतन मनन, और  निर्णय तुरन्त लिए जावें, तभी हमारे देश से ब्रेन ड्रेन रुक सकता है .

निश्चित ही विकास हमारी मंजिल है. इसके लिये  लंबे समय से हमारा देश  “वसुधैव कुटुम्बकम” के सैद्धांतिक मार्ग पर, अहिंसा और शांति पर सवार धीरे धीरे चल रहा था.  अब नेतृत्व बदला है, सैद्धांतिक टारगेट भी शनैः शनैः बदल रहा है. अब  “अहम ब्रम्हास्मि” का उद्घोष सुनाई पड़ रहा है. देश के भीतर और दुनिया में भारत के इस चेंज आफ ट्रैक से खलबली है. आतंक के बमों के जबाब में अब अमन के फूल  नही दिये जा रहे. भारत के भीतर भी मजहबी किताबो की सही व्याख्या पढ़ाई जा रही है. बहुसंख्यक जो  बेचारा सा बनता जा रहा था और उससे वसूल टैक्स से जो वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति चल रही थी, उसमें बदलाव हो रहा है. ट्रांजीशन का दौर है .

इंटरनेट का ग्लोबल जमाना है. देशो की  वैश्विक संधियो के चलते  ग्लोबल बाजार  पर सरकार का नियंत्रण बचा नही है. ऐसे समय में जब हमारे घरो में विदेशी बहुयें आ रही हैं, संस्कृतियो का सम्मिलन हो रहा है. अपनी अस्मिता की रक्षा आवश्यक है. तो भले ही चीनी मोबाईल पर बातें करें किन्तु कहें यही कि आई लव माई इंडिया. क्योकि जब मैं अपने चारो ओर नजरे दौड़ाता हूं तो भले ही मुझे ढ़ेर सी मेड इन चाइना वस्तुयें दिखती हैं, पर जैसे ही मैं इससे थोड़ा सा शर्मसार होते हुये अपने दिल में झांकता हूं तो पाता हूं कि सारे इफ्स एण्ड बट्स के बाद ” फिर भी दिल है हिंदुस्तानी “. तो चिंता न कीजीये बिसारिये ना राम नाम, एक दिन हम भारत में ही चीन बना लेंगें.  हम विश्व गुरू जो ठहरे. और जब वह समय आयेगा  तब मेड इन इंडिया की सारी चीजें दुनियां के हर देश में नजर आयेंगी चीन में भी, जमाना ग्लोबल जो है. तब तक चीनी मिट्टी से बने, मेड इन चाइना गणेश भगवान की मूर्ति के सम्मुख बिजली की चीनी झालर जलाकर नत मस्तक मूषक की तरह प्रार्थना कीजीये कि हे प्रभु ! सरकार को, अल्पसंख्यको को, बहुसंख्यकों को, गोरक्षको को, आतंकवादियो को, काश्मीरीयो को,  पाकिस्तानियो को, चीनियो को सबको सद्बुद्धि दो.

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 

ए-1, एमपीईबी कालोनी, शिलाकुंज, रामपुर, जबलपुर, मो ७०००३७५७९८

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #4 ☆ उपहार ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। श्री ओमप्रकाश  जी  के साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  शिक्षाप्रद लघुकथा “उपहार ”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #4 ☆

 

☆ उपहार ☆

 

नन्ही परी का जन्मदिन मनाया जा रहा था .

उस की प्यारी टीचर भी आई हुई थी.

जैसे ही परी ने मोमबत्ती को फूंक मारा वैसे ही सभी ने एक स्वर में कहा , ” हैप्पी बर्थ डे टू यू …………… हैप्पी बर्थ डे टू परी, ” और सभी बारी-बारी से परी को केक खिलाने लगे .

अंत में पापा ने परी से पूछा , “ बोलो ! तुम्हें कौन सा उपहार चाहिए ?”

यह सुनते ही परी ने टीचर की तरफ देखा. टीचर ने मम्मी की पेट की तरफ इशारा कर दिया.

इसलिए परी ने तपाक से कहा, ” पापा ! मुझे यह बेबी चाहिए .”

यह सुन कर मम्मी-पापा दंग रह गए.

कहीं परी ने उन की बात तो नहीं सुन ली थी कि वे इस बच्ची को दुनिया में नहीं आने देंगे.

वे क्या बोलते. चुप हो गए .

और परी बार-बार यही दोहरा रही थी ,” पापा ! मुझे यह बेबी चाहिए.”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

 

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 4 – ऋतू हिरवा…. ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

 

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं। इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं। श्री सुजित जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – सुजित साहित्य” के अंतर्गत  प्रत्येक गुरुवार को  आप पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी कविता ऋतू हिरवा….)

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #4 ☆ 

 

☆ ऋतू हिरवा….☆ 

 

येता आभाळ भरून मन झराया लागते

मग आधार शोधण्या तुझा आसरा मागते..

 

येता आभाळ भरून कसे डोळे पाणावती

पावसाच्या थेंबामध्ये आयुष्यच डोकावती…

 

येता आभाळ भरून वारा वाहे पानोपानी

भेटायला येईल ती अशी हाक येई कानी…

 

येता आभाळ भरून तन मन भारावते

बरसता थेंबसरी विरहाचे गीत होते…

 

येता आभाळ भरून पाऊसही ओला झाला

तुझ्या माझ्या भेटीसाठी ऋतू हिरवा जाहला…

 

 

…..सुजित कदम

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