English Literature – Weekly Column ☆ Witful Warmth # 74 – The Next Token in the Scraping Queue… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his SatireThe Next Token in the Scraping Queue 

☆ Witful Warmth# 74

☆ Satire ☆ The Next Token in the Scraping Queue… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

In that God-forsaken backyard veranda, right where the post-wedding junk and crippled chairs were enjoying their retirement benefits, she was busy counting her final breaths. She—the legendary savior who once guarded the family’s social status by sweeping every bit of dirt with her chest—was now crouched against the wall like a discarded floor rag. Her plastic fibers and twigs were scattered like the shattered dreams of a middle-aged father whose kids just moved to Canada. She and I were basically twins. As long as our spines could take the load, we carried everyone’s garbage and gifted them spotless corners. But the moment our discs slipped, the darkness of the dump welcomed us with open arms. It is the golden rule of capitalist affection. As long as you are useful, you are the deity of the threshold. The moment your warranty expires, you become the clutter that needs to be Marie Kondo-ed out of existence. Looking at her dust-covered remains, I was hit by severe nostalgia of my own glory days when people actually respected my presence, compared to now, when they just trip over me and swear.

Late at night, while the entire household was comfortably snoring on memory-foam mattresses, a bizarre rustling echoed from that dark corner. If you listened closely, it was not an emotional sob, but the dry, tragic friction of one broken twig hitting another. I peeked through the window only to find the lady of the house standing tall, armed with a shiny, newly unboxed vacuum cleaner. With the grace of a professional footballer, she kicked that old bundle of twigs straight into the municipal garbage truck. As she departed, that broom managed to flick her remaining dust right into my face, leaving behind a silent, haunting reminder.

“Today it is me, tomorrow it is you.”

Right on cue, the lady’s shrill voice cut through the silence from the living room.

“Hey, can you please fire this old servant too? He makes too much noise and is just wasting premium carpet area.”

My soul instantly left my body. The broom was officially gone, but before leaving, she had successfully delivered the ultimate spoiler alert for the rest of my life.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “आज के हालात” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “आज के हालात” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

2/4 कुछ दिन पहले सोना (Gold) खरीदने की ताकत नहीं होने पर कड़का होने की शर्मिंदगी महसूस होती थी … अब मुझे देश भक्त होने का अभिमान होता है, गर्व होता है ।

आने वाला कल 🙂

मैं, आप और हम जैसे करोड़ों देशभक्तों के बल पर भारत  फिर से अपने स्वर्णिम युग में लौटेगा। फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा। और एक वर्ष बाद हर कड़के स्वर्णता सैनानी क़ो गोल्ड मेडल दिया जायेगा।

(कृपया इस मेसेज को अपने मोबाइल से पैदल-पैदल फारवर्ड करें।)

डीजल बचाइये और सेहत बनाइये✌️

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विश्व तम्बाकू निषेध दिवस – तम्बाकू का जाल और युवाओं का भविष्य… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ तम्बाकू का जाल और युवाओं का भविष्य…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई) पर विशेष)

“बस एक बार ट्राय कर रहा हूँ…

आदत थोड़ी लगेगी।”

कॉलेज के बाहर खड़े उस किशोर ने हँसते हुए अपने दोस्त से कहा।

कुछ दोस्तों ने भी मुस्कुराकर उसका साथ दिया।

लेकिन शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि कई बार “सिर्फ एक बार” से शुरू हुई चीज़ पूरी जिंदगी पर भारी पड़ जाती है।

 

आज का दौर आधुनिकता, तकनीक और तेज़ जीवनशैली का दौर है।

लेकिन इसी चमकदार दुनिया के पीछे एक ऐसा खतरा भी तेजी से फैल रहा है, जो चुपचाप लाखों लोगों की जिंदगी निगल रहा है – तम्बाकू।

तम्बाकू केवल एक नशा नहीं है।

यह धीरे-धीरे शरीर, मन, परिवार और समाज को कमजोर करने वाला एक ऐसा जहर है, जो अक्सर शुरुआत में दिखाई नहीं देता।

हर वर्ष 31 मई को “विश्व तम्बाकू निषेध दिवस” मनाया जाता है।

यह दिन केवल जागरूकता का अभियान नहीं, बल्कि समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि तम्बाकू उद्योग किस प्रकार लोगों की कमजोरियों, जिज्ञासाओं और भावनाओं का उपयोग करके उन्हें अपने जाल में फँसाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर वर्ष दुनिया भर में लगभग 80 लाख लोगों की मृत्यु तम्बाकू सेवन के कारण होती है। भारत में भी लाखों लोग कैंसर, हृदय रोग और श्वसन संबंधी बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि तम्बाकू उद्योग का सबसे बड़ा निशाना युवा पीढ़ी बन चुकी है। पहले सिगरेट और बीड़ी तक सीमित यह बाजार अब ई-सिगरेट, वेपिंग और फ्लेवर्ड निकोटीन उत्पादों के माध्यम से किशोरों तक पहुँच रहा है।

इन उत्पादों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है मानो वे आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा हों। रंगीन पैकेजिंग, मीठे फ्लेवर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और फिल्मों में धूम्रपान का ग्लैमर –

यह सब किसी संयोग का हिस्सा नहीं है।

यह एक सुनियोजित रणनीति है।

तम्बाकू उद्योग अच्छी तरह जानता है कि यदि किशोर अवस्था में किसी को निकोटीन की आदत लग जाए, तो वह लंबे समय तक ग्राहक बना रह सकता है।

“तम्बाकू उद्योग उत्पाद नहीं बेचता,

वह धीरे-धीरे निर्भरता बेचता है।”

आज सोशल मीडिया पर वेपिंग को “कूल”, “स्टाइलिश” और “स्ट्रेस रिलीफ” के रूप में दिखाया जाता है।

कई युवा यह मान बैठते हैं कि ई-सिगरेट सामान्य सिगरेट की तुलना में सुरक्षित है।

लेकिन वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से बताते हैं कि वेपिंग भी शरीर के लिए गंभीर रूप से हानिकारक है।

इन उत्पादों में निकोटिन, भारी धातुएँ और ऐसे रसायन पाए जाते हैं, जो फेफड़ों, मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि निकोटिन केवल शरीर को नहीं, सोचने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन को भी प्रभावित करता है। किशोर अवस्था में मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है। ऐसे समय में निकोटिन की लत ध्यान क्षमता, स्मृति और निर्णय लेने की शक्ति को कमजोर कर सकती है।

कई युवा तनाव और चिंता से बचने के लिए धूम्रपान या वेपिंग शुरू करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे मानसिक राहत मिलेगी।

लेकिन सच इसके बिल्कुल विपरीत है।

निकोटिन कुछ समय के लिए दिमाग को उत्तेजना देता है, लेकिन धीरे-धीरे वही बेचैनी, चिड़चिड़ापन और मानसिक निर्भरता का कारण बन जाता है। यही कारण है कि जो व्यक्ति शुरुआत में “तनाव कम करने” के लिए तम्बाकू लेता है, वही कुछ समय बाद उसके बिना असहज महसूस करने लगता है।

तम्बाकू का प्रभाव केवल सेवन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

परोक्ष धूम्रपान यानी सेकेंडहैंड स्मोक भी उतना ही खतरनाक है। घर में धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के कारण बच्चे, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएँ भी गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करती हैं।

बच्चों में अस्थमा, फेफड़ों की कमजोरी और बार-बार संक्रमण जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।

तम्बाकू का एक बड़ा प्रभाव आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। कई परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा नशे पर खर्च कर देते हैं। बीमारियों के इलाज में आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है।

धीरे-धीरे यह लत व्यक्ति के आत्मविश्वास, रिश्तों और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करने लगती है।

हालाँकि सकारात्मक बात यह है कि तम्बाकू छोड़ने का लाभ बहुत जल्दी दिखाई देने लगता है।

धूम्रपान छोड़ने के कुछ ही घंटों बाद शरीर में ऑक्सीजन का स्तर सुधरने लगता है। कुछ महीनों में फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है और कुछ वर्षों बाद कैंसर तथा हृदय रोग का खतरा काफी कम हो जाता है।

लेकिन तम्बाकू छोड़ना केवल इच्छाशक्ति का विषय नहीं होता। यह शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की लड़ाई होती है। इसलिए परिवार, मित्रों और समाज का सहयोग बहुत जरूरी है।

विद्यालयों और घरों में बच्चों के साथ खुलकर संवाद होना चाहिए। उन्हें केवल डराकर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर जागरूक करना होगा।

माता-पिता को यह भी समझना होगा कि बच्चे केवल शब्दों से नहीं सीखते, वे व्यवहार से सीखते हैं।

यदि घर का वातावरण तम्बाकू मुक्त होगा तो बच्चों पर उसका सकारात्मक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

सरकार द्वारा बनाए गए कानून, चेतावनी चित्र और प्रतिबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। जब तक समाज स्वयं जागरूक नहीं होगा, तब तक इस समस्या पर पूरी तरह नियंत्रण पाना कठिन रहेगा।

आज आवश्यकता केवल तम्बाकू विरोधी अभियानों की नहीं है, बल्कि ऐसी जीवनशैली विकसित करने की है जहाँ युवा तनाव से बचने के लिए नशे नहीं, बल्कि खेल, संवाद, योग, संगीत और सकारात्मक गतिविधियों का सहारा लें।

क्योंकि अंततः तम्बाकू केवल शरीर को ही नहीं जलाता, वह धीरे-धीरे जीवन की संभावनाओं को भी धुएँ में बदल देता है।

शायद इसलिए विश्व तम्बाकू निषेध दिवस हमें केवल यह नहीं सिखाता कि तम्बाकू कितना हानिकारक है।

यह हमें यह भी याद दिलाता है कि जागरूकता, आत्मसंयम और सही निर्णय ही स्वस्थ समाज की सबसे बड़ी शक्ति हैं।

“तम्बाकू छोड़ना केवल एक आदत छोड़ना नहीं,

“बल्कि अपने जीवन, अपने परिवार और अपने भविष्य को बचाने का निर्णय है।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६६ ☆ # “बुझी बुझी आंखें…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुझी बुझी आंखें…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६६ ☆

☆ # “बुझी बुझी आंखें…” # श्री श्याम खापर्डे ☆

 ☆

बुझी बुझी आंखें

ना जाने

आकाश में क्या ढूंढती रहती है ?

मन ही मन बुदबुदाते हुए

ऊपर वाले से क्या पूछती रहती है ?

कब बदलेंगे हमारे हालात

कब होगी हम पर

सुखों की बरसात

कब बीतेगी यह काली रात

कब आएगी

जीवन में नई प्रभात

 

काल तो घात लगा कर बैठा है

अहंकार में अपनी गर्दन ऐंठा है

हमारे घर और

 हमारी झोपड़ियों को

बुलडोजर से मिटाया है

हमें खुले आकाश के तले

चिथड़ो में लिपटे

प्रचंड गर्मी में बैठाया है

परिवार और बच्चे

रो रहे हैं

महिलाओं संग वृद्ध

अपना आपा खो रहे है

मुंह में अन्न का

नहीं कोई निवाला है

पानी के लिए भी

नहीं कोई पूछने वाला है

पूरी बस्ती में

त्राहि त्राहि मचा है

विधाता तूने

यह कैसा खेल रचा है

हमारी उपासना का

क्या हमें यह मिला फल है ?

कितना भयानक

हमारा आने वाला कल है ?

 

कुछ सियासतदानों  ने

अपनी सियासत के लिए

हमें यहां बसाया था

क्या उन्हें हमारे आशियां को

उजाड़ते हुए

तरस नहीं आया था ?

 

किसी सरमायेदार की

यहां कॉलोनी

बनने वाली है

इसीलिए हमारी बस्ती

जबरदस्ती हमें

करनी पड़ी

खाली है

सब नियम कानून

ताक पर रखे हैं 

हम सब यहां पर

चिंतित और हक्के-बक्के हैं 

 

हम जानते हैं

इस सत्य को मानते हैं

उस कॉलोनी में

तुम्हारा भव्य मंदिर बनेगा

पूजा पाठ के लिए

एक पूजा स्थल तनेगा

तुम्हारा पुजारी और ट्रस्ट

बनेगा मालामाल

हम जैसे भक्त

सीढ़ियों पर बैठकर

हाथ में कटोरा लिए

भीख मांगते

सदा रहेंगे बेहाल

 

क्या हम और हमारी पीढ़ियां

भीख पर ही जिंदा रहेंगी ?

क्या अपने गरीब इंसान होने पर

शर्मिंदा रहेंगी?

क्या कभी होगा चमत्कार ?

क्या दूर होगा यह अंधकार ?

कब सुध लोगे  तुम पालनहार ?

क्या हमारे जीवन में कभी आएगी

झूमती हुई खुशियों की बहार ?

 

कभी यह इंतजार

अन्याय और अत्याचार

कोई सैलाब लायेगा

तो यह कॉलोनी

और तुम्हारा मंदिर भी

उस तूफान में

बह जाएगा /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००६ ⇒ पंचनामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचनामा।)

?अभी अभी # १००६ ⇒ आलेख – पंचनामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

न जाने क्यों, पंच से मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर याद आ जाती है। परमेश्वर तो एक होता है,लेकिन जब पाँच सयाने एक जगह इकट्ठा हो जाते हैं, तो वे परमेश्वर ही तो कहलाते हैं। पंच विक्रमादित्य की तरह पंचायत में न्याय तो करते ही हैं,दोषी को दंड भी सुनाते हैं। न्याय का हथौड़ा जब प्रहार करता है, तब वह भी एक तरह का punch ही तो होता है।

पुलिस बरामद सामग्री का पंचनामा बनाती है। कुछ गवाहों के सामने वस्तुओं को सील कर दिया जाता है और एक दस्तावेज तैयार किया जाता है, जिस पर सभी के हस्ताक्षर होते हैं। बैंकों में लॉकर भी सील किए जाते हैं और अदालत बजावरी भी चस्पा करती है। एक महान मुक्केबाज मोहम्मद अली भी हुए थे, जिनका पंच, विरोधी मुक्केबाज को दिन में तारे दिखला देता था।।

कार्टून और व्यंग्य सृजन की ऐसी विधा है, जिसमें punch का प्रयोग किया जाता है। Punch तत्कालीन व्यवस्था एवं विसंगति पर एक ऐसा करारा तमाचा है कि जिसका न तो बचाव संभव है और न ही प्रतिकार। तानाशाहों को इस प्रहार की आदत नहीं होती इसलिए अक्सर अभिव्यक्ति की आज़ादी के इन पंचों पर उनकी सदा वक्र दृष्टि ही रहती चली आई है। कई बार इन पंचों का ही पंचनामा बना दिया जाता है और उन्हें सेंसर यानी प्रतिबंधित कर दिया जाता है।

कलम तलवार से अधिक खतरनाक होती है। इसका जितनी बार सर कलम करो, यह उतनी ही पैनी होती चली जाती है। कार्टून और व्यंग्य में अगर पंच ना हो वह किसी बिना तड़के वाली फीकी दाल से कम नहीं।

इंग्लैंड से प्रकाशित कार्टून मैग्जीन punch अपने १५१ वर्ष पूर्ण कर सन् १९९२ में आख़िरी सांसें लेने को मजबूर हो गई। वे लोग भाग्यशाली रहे जिन्होंने अंग्रेजी में प्रकाशित पत्रिका Shankar’s Weekly का आनंद लिया। हिंदी में भी शंकर्स वीकली का कुछ समय के लिए प्रकाशन हुआ, लेकिन इसका भी बेड लक खराब ही निकला।

टाइम्स ऑफ इंडिया में आर.के.लक्ष्मण लगातार कई वर्षों तक व्यवस्था की परवाह किए बगैर अपने तीखे, करारे और तिलमिलाते कार्टून परोसते रहे। व्यवस्था को जनता से उतना खतरा नहीं होता जितना प्रिंट मीडिया से होता है। एक आपातकाल ने ऐसा सबक सिखाया, सब लाइन पर आ गए। आज न आर.के.लक्ष्मण का कॉमन मैन है और न ही धर्मयुग के कार्टून कोने में ढब्बू जी। बस व्यंग्य और कार्टून के नाम पर लालू,पप्पू और ममता से ही काम चला लो। साफ सुथरे,शालीन व्यंग्य और कार्टून जो आप घर में बच्चों के साथ भी देख सकें।।

एक चेन्नई के पत्रकार,कार्टूनिस्ट चो रामास्वामी हुए थे और एक मुंबई के शिवाजी बाल ठाकरे,जो राजनीति के घिघौने चरित्र पर प्रहार ही नहीं करते थे, उसका डटकर सामना भी करते थे और आज हालत देखिए।

व्यंग्य और कार्टून की खेती के लिए भूमि का उर्वरा होना भी जरूरी है। श्रीलाल शुक्ल कांग्रेस के जमाने में शिवपालगंज ढूंढ पाए, तो राग दरबारी का सृजन संभव हुआ,  आर.के.लक्ष्मण के समय में नेहरू और इंदिरा जैसे चरित्र थे, जिनके चेहरे को देख, कम से कम कूची तो चलाई ही जा सकती थी। आज सभी साफ सुथरे, कोमल, निष्पाप, निष्कलंक चेहरों पर क्या कार्टून बनाए जाएं और क्या वर्तमान राज पर व्यंग्य लिखा जाए। बड़ा धर्मसंकट है। डर है, कहीं कार्टून और व्यंग्य जैसी विधा का पंचनामा ही ना बनाना पड़ जाए …!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०९ – ये दुनिया, ये दुनिया… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ये दुनिया, ये दुनिया।)

☆ अभिव्यक्ति # १०९ ☆

☆ ये दुनिया, ये दुनिया☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

ये दुनिया, ये दुनिया

कैसी है, ये दुनिया,

जैसी नज़र से देखोगे,

लगेगी वैसी ही दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

*

जन्म अकेला, पास न कोई,

सफ़र अकेला, साथ न कोई,

दूर है मंजिल, लंबा रास्ता,

कभी है, समतल, कभी चढ़ाई,

राह नहीं देती ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

कभी सुख, कभी दुख मिलता,

जीवन ऊपर नीचे चलता,

*

लोग मिलेंगे, और छूटेंगे,

जीवन भर का साथ न मिलता,

रंग बिरंगी दिखती है पर,

रंगीन नहीं है, ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

*

सुख में ये, अपनी बन जाती,

दुख में, दूर नजर है आती,

सुख दुख हो या जीना मरना,

चलती रहती, ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ ताठा… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ ताठा… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

इथे कोणी कुणाचाही खराअंदाज बांधेना

बळी ठरतोय शंकांचा तरी तो शांत बोलेना

*

सुखाचा शोध घेतांना हसाया लागली दुनिया

जरी बदनाम झाली ती तरीही सत्य सांगेना

*

मनाचा तोल ढळलेला कळाया लागले तेव्हा

फिरे मोकाट का वेडा कुणाला हात मागेना

*

पुढे जाणार होता तो गती घेवून जोमाने

तरी पायातल्या बेड्या मनाने तोच तोडेना

*

कसा हा वादळी वारा सुटाया लागला येथे

कुठे शोधून ही त्याला जरा आधार भेटेना

*

फसाया लागला तेंव्हा खचाया लागला होता

तरी ही गर्व झालेला कसा तो आज सोडेना

*

बळाचा येवढा ताठा कसा तो दावतो आहे

किती ओझे शिरी त्यांच्या तरी कमरेत मोडेना

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचनाएँ/Information ☆ संपादकीय निवेदन – “वुमेन आयकॉन अवॉर्ड” – डॉ. भारती माटे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

💐 अ भि नं द न !! 💐 हार्दिक अभिनंदन !!!💐

☆ “वुमेन आयकॉन अवॉर्ड” – डॉ. भारती माटे – अभिनंदन ☆

‘वुमेन वर्ल्ड रेकॉर्ड्स’ द्वारे “वुमेन आयकॉन अवॉर्ड ” हा विशेष असा एक पुरस्कार दरवर्षी दिला जातो, आणि त्यायोगे प्रेरणादायी आणि अपवादात्मक कार्य करणाऱ्या स्त्रियांच्या यशोगाथांचा आणि त्यांनी केलेल्या उल्लेखनीय कामाचा सन्मान करण्यात येतो.

… आणि अतिशय आनंदाची गोष्ट म्हणजे, २०२६ सालच्या या प्रतिष्ठित सन्मानासाठी पुणे येथील फाइन आर्टमधील प्रसिद्ध व्हिज्युअल प्रॅक्टिशनर डॉ. भारती माटे यांना निवडले गेले.

… डॉ. भारती माटे या आपल्या ई – अभिव्यक्ती साहित्य- मंचाच्या पहिल्या दिवाळी विशेषांकापासून गेली सतत चार वर्षं या अंकाचे अतिशय सुंदर आणि आकर्षक मुखपृष्ठ तयार करून देणाऱ्या आपल्या समूहातील ज्येष्ठ सदस्या आहेत.

डॉ. भारती माटे यांनी फाइन आर्ट पेंटिंगच्या क्षेत्रात अतिशय उल्लेखनीय आणि सर्जनशील कामगिरी करून दाखवली आहे. भारतीय संस्कृतीतील ‘रांगोळी’ सारख्या प्राचीन लोककलेला स्वतःच्या नवनव्या सिद्धहस्त प्रयोगांतून साकार केलेल्या भावपूर्ण आणि अर्थपूर्ण कलाकृतींद्वारे त्यांनी एक नवे आणि सुंदर रूप दिले आणि त्याद्वारे जमिनीवर असणारी रांगोळी त्यांनी कॅनव्हासवर आणली आहे …जी फ्रेम करून भिंतीवर लावता येते.

ललित कलांच्या दालनात समृद्ध आणि सुंदर भर घालणाऱ्या या कामातले त्यांचे कौशल्य आणि त्यातली त्यांची सफाई विलक्षण आहे. व्हिज्युअल आर्ट्सबद्दलची त्यांची उत्कटता, त्यांच्या नवनवोन्मेषशाली कल्पना आणि सौंदर्यशास्त्राबद्दलचा त्यांचा गाढा अभ्यास आणि त्यासोबतच त्यांचा वचनबद्धपणा यामुळे या विशेष क्षेत्रात त्यांनी स्वतःचा मोठाच ठसा उमटवलेला आहे. याच्या जोडीनेच त्यांच्या या कलात्मक प्रवासाद्वारे उद्याच्या उदयमान कलाकारांना प्रेरणा देत असतांनाच, सांस्कृतिक आणि सर्जनशील अभिव्यक्तीना समृद्ध करण्यात त्या मोठेच योगदान देत आहेत.

त्यांना देण्यात आलेला हा जागतिक पातळीवरचा विशेष पुरस्कार म्हणजे त्यांच्या प्रतिभेचे, प्रयोगशीलवृत्तीचे, चिकाटीचे आणि फाइन आर्ट्सच्या जगातील त्यांच्या मौल्यवान योगदानाचे प्रमाणपत्र आहे. आणि आपल्या समूहासाठी ही नक्कीच अतिशय आनंदाची आणि अभिमानाची बाब आहे.

ह्याशिवाय कविता, ललित लेखन, भरतकाम, विविध विषयांवरील संशोधनात्मक लेखन, आणि ही अंगभूत कला आणखी विकसित करण्यासाठी करत असलेली विविध प्रांतांमधली डोळस भटकंती.. अशी त्यांची चौफेर मुशाफिरी नित्य चालूच असते.

आपल्या सर्वांतर्फे भारतीताईंचे अगदी मनःपूर्वक अभिनंदन आणि यापुढेही या वेगळ्याच क्षेत्रातली त्यांची विलक्षण म्हणावी अशी वाटचाल याहूनही जास्त दैदिप्यमान ठरो या त्यांना अगदी मनःपूर्वक शुभेच्छा.

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मी आणि AI -☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

मी आणि AI – ☆ विभावरी कुलकर्णी

माझे आत्ता पर्यंत जे व्यक्ती विशेष (थोडक्यात म्हणजे बावळटपणा किंवा मूर्खपणा) मी लिहिले आणि आपण वाचले त्यात अजून एक भर पडली. खूप दिवस AI नामक सर्वज्ञात असलेल्या जीन विषयी ऐकत होते. फारसा विश्वास नव्हताच! पण म्हंटले बरेच लोक प्रशंसा करत आहेत, तर बघावे हा जीन काय काय करतो? कारण नवीन नवीन शिकणे, विविध प्रयोग करणे हे जणू रक्तातच आहे.

आज एका वस्तूवर अडले. इमेज तर दिसली आणि उत्सुकता वाढली. म्हणून सर्वज्ञ AI कडे धाव घेतली, तर त्या वस्तुच्या फोटोत आणि याच्या उत्तरात काहीच साम्य नाही. शेवटी त्या विषयी योग्य माहिती घरातूनच मिळाली. म्हणजे आपण पूर्वेचा रस्ता विचारावा आणि AI ने आकर्षक पद्धतीने उत्तरेला नेऊन सोडावे. कालच एक वसंत कानेटकर लिखित एक प्रसिद्ध नाटक बघून आले. वाटलं AI ला कथानक विचारावे. तर मूळ विषय सोडून काहीही कथा येऊ लागल्या. पुन्हा शेवटी प्रश्न आहेच. मी अजून काही मदत करु शकतो का? दोन तास त्यात घालवले तरी इतक्या प्रसिद्ध नाटकाची कथा त्याने अजून सांगितलीच नाही. मग इतर गोष्टी लांबच!

मग या विषयी जे सध्याचे तंत्रज्ञान वापरतात म्हणजे आपलीच लेकरे, त्यांच्याशी चर्चा केली. तर असे कुठे विचारतात का? म्हणून त्यांनी वेड्यातच काढले. मग आमची चर्चा आणि मध्यंतरी काही वाचले होते ते आठवले.

AI विरुद्ध मानव (AI vs Human) हा सध्याच्या तंत्रज्ञानाच्या युगातील सर्वात मोठा चर्चेचा विषय आहे. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) वेगाने प्रगत होत असली तरी, मानवी बुद्धिमत्तेला तिचा पर्याय नाही, असे अनेक तज्ज्ञांचे मत आहे.

मानवी क्षमता सर्वश्रेष्ठ आहे. मुंबईतील ७७% प्रोफेशनल कामाचे मोठे निर्णय घेताना AI पेक्षा स्वतःच्या निर्णयावर विश्वास ठेवतात.

AI ची उपयुक्तता: ७३% प्रोफेशनल AI चा वापर मसुदा तयार करण्यासाठी उपयुक्त मानतात, पूर्ण निर्णयासाठी नाही.

 AI मानवाची जागा घेणार नाही, तर मानवी क्षमतेत वाढ करेल. हे मानवी भावना आणि यंत्रांचे तर्कशास्त्र यांचे मिश्रण असेल.

एआयचे जनक जेफ्री हिंटन यांनीही एआयच्या घातक परिणामांबद्दल चिंता व्यक्त केली आहे, ज्यामुळे नोकऱ्या जाण्याची भीती आहे.

एआय चॅटबॉट्सचा चुकीच्या कामासाठी वापर (उदा. डीपफेक) समाजासाठी घातक ठरू शकतो.

योग्य नियोजन आणि मर्यादित वापर केल्यास AI मानवी जीवनासाठी वरदान ठरू शकते, परंतु मानवी विवेकबुद्धीला पर्याय नाही.

एआय आणि मानव यांच्यातील मुख्य फरक

मानव

माणूस सर्जनशील आहे.

उच्च कल्पना आणि भावनांवर आधारित निर्मिती करु शकतो. निर्णय क्षमता भावना, नैतिकता आणि अनुभव यावर आधारित असतात.

वेग व स्मृती मर्यादित असतात. संदर्भ हे नैसर्गिक समज व भावनांवर आधारित असतात.

AI

सर्वजनशीलता मर्यादित डेटा वर आधारित असते. वेग प्रचंड असतो. निर्णय क्षमता डेटा आणि अल्गोरिदमवर आधारित असते.

संदर्भ हे शिकवलेल्या माहितीवर आधारित असतात.

AI हे एक साधन आहे साध्य नाही.

आत्ता पर्यंत एवढेच समजले. अजून काही ज्ञानात भर पडेलंच! या कामी आपणही मदत कराल ना?

© विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ‘पुन्हा एकदा ‘नीट’…’- भाग २ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर ☆

श्री प्रदीप केळुस्कर 

?जीवनरंग ?

☆ ‘पुन्हा एकदा ‘नीट’…’- भाग २ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर 

(‘टोटल आठ लाख देना पडेगा.. पर कन्फर्म करनेका पाच.. बादमे देढ.. देढ दो बार.. और ये दो दिन मे..

त्या मुलीने फोन ठेवला.. पाठोपाठ एक मेसेज आला.

त्यावर एका बँकेचा अकाउंट नंबर आणि कोडनंबर आला.

 हे सारे आठवत असताना बाहेर स्कुटर वाजली.. तिने ओळखले मुग्धा आली.. तिने गॅस बारीक केला आणि ती लगबगीने दार उघडायला गेली.) 

– इथून पुढे – – 

आईला बघताच मुग्धा धावली आणि तिने आईला कडकडून मिठी मारली..

‘आई शेवटी आपण जिंकलो.. शिरा दे आधी..

‘हो बाई.. शिरा करून तुझीच वाट पहाते आहे… सहाशेच्या वर निश्चित ना? कारण त्या मुल्लाना अजून दिढ द्यायचे आहेत..

‘हे शेवटचे ना आई? आणि नाही दिले तर?

‘अग त्या लोकांचे हात वरपर्यत पोचलेले असतात.. ते पासाचे नापास करू शकतात.. सारी यंत्रणा पोखरली आहे ग यांनी..

‘पण आता हे पैसे कसे जमवणार?

‘मुग्धा.. बाबांना लपवून पैसे उभे करणे सोपे नव्हे. मी हे सर्व माझ्या जबाबदारीने तुझ्यासाठी केल… बाबांनी पैसे खाल्ले असते तर असे पैसे सहज देता आले असते.. पण तुझे बाबा म्हणजे तत्वाचा माणूस.. पहिले पाच लाख देताना आईने लग्नात घातलेल्या बांगडया विकल्या.. मग दिढ लाख देताना चेन विकली.. आता पाळी या पाटलीची..

‘पण आई.. बाबांना कळले नाही ना अजून?

‘त्यांचे माझ्या दागिन्याकडे लक्षच नसते.. त्यांची पुस्तके आणि वाचन.. डुप्लिकेट दागिने घालून सध्या मी मिरवते आहे..

‘आई.. तू काळजी करू नकोस.. मी फक्त डॉक्टर होउदे.. तुझे सर्व दागिने परत तूझ्या गळ्यात घालते कीं नाही बघ..

‘हो ग बाई.. तू मोठी हो. स्वतः पैसे मिळव.. आमच्यासारखे नवऱ्यावर अवलंबून राहू नकोस..

‘बघच आई… मी किती पैसे मिळवते ते..

दोघी शिरा खाता खाता बोलत होत्या.

आपली सोन्याची पाटली विकून मंजुने मुल्लासरांचे पैसे पुरे केले. पुन्हा एकदा डुप्लिकेट पाटली तिच्या हातात आली.

रिझल्टला वेळ असल्याने मुग्धाने नॉर्थ ईस्टची ट्रिप करण्याचा निर्णय घेतला. तिच्या बाबांनी आनंदाने सर्व खर्च केला.. ट्रिपचे फोटो ती आईबाबांना पाठवत होती आणि प्रत्येक ठिकाणची वर्णने पण टाकत होती.

मुग्धाला फिरायला, ट्रेकिंग करायला फार आवडे.. पण शाळेचा आणि मग नीट परीक्षेचा अभ्यास असल्याने तिला हा छंद बाजूला ठेवायला लागला होता.

मंजू आनंदात होती.. मुग्धा ट्रिप एन्जॉय करत होती.. आता काही दिवसात नीट परीक्षेचा निकाल लागायचा होता.. त्यात ती सहाशेच्यावर स्कोर करणार होती.. मग टॉप मेडिकल कॉलेजमध्ये किंवा एम्समध्ये तिला ऍडमिशन मिळणार होत…. पण?

अचानक टीव्हीवर बातम्या येऊ लागल्या..

“नीट परीक्षेत गडबड… सरकारने परीक्षा रद्द केली.. पुन्हा नीट परीक्षा होणार.

मुग्धाने मोबाईलवर ही बातमी वाचली. तिच्या काळजात धस्स झाले.. तिने टीव्ही लावला.. तीच बातमी होती.

एव्हड्यात तिच्या नवऱ्याचा फोन आला..

‘नीट परीक्षा रद्द केल्याची बातमी आहे… परत परीक्षा होणार आहे.. मुग्धाला फोन करून सांग आणि बोलावून घे..

‘हो. हो.. बोलावते तिला..

धडधडत्या काळजाने तिने उत्तर दिले.

तिने माधवला फोन लावला.. कारण नीटसाठी त्यानेच फिल्डिंग लावली होती… माधवचा फोन बंद होता.. तिने त्याच्या बायकोला म्हणजे मधूला फोन लावला.. तिचाही फोन बंद.. तिने माधवच्या शेजाऱ्यांना फोन लावला.. त्यांनी सांगितले.. काल पासून त्यांचे घर बंद आहे.. बरीच लोक त्यांना शोधत आहेत.

मंजुने रडत रडत मुग्धाला फोन लावला..

‘अग बाई.. नीट परीक्षेतील घोटाळा बाहेर आला आहे..

तिकडे मुग्धाला धक्का बसला.

किंचाळून तिने विचारले..

‘काय? घोटाळा बाहेर आला? परीक्षा रद्द? परत परीक्षा होणार? अरे देवा.. मला मग मेडिकल विसरायला हवं..

‘अग गधडे.. या तूझ्या नीट पायी माझे दहा लाखाचे दागिने विकले.. त्या माधवच्या नादाला लागून, आता तो आणि मधू नाहीसे झालेत.. तू ताबडतोब इकडे ये बघू.. मला कस तरी होतंय.. बर हे मी नवऱ्यापासून दडवून केलंय..

टीव्हीवर बातम्या येत होत्या.. भारतभर छापे टाकणे सुरु होते. सी बी आयकडे प्रकरण गेले होते.. पेपर फोडणाऱ्या शिक्षकांना ताब्यात घेतले जात होते.. आणि मुल्लाला अटक झाल्याची बातमी आली.. एकएकजण ताब्यात येत होता..

दोन दिवसांनी मुग्धा घरी आली. आल्या आल्या रडायला लागली..

‘आई.. मी किती स्वप्न पाहिलं होत माहित आहे… मी मोठी डॉक्टर होणार होते.. मोठं हॉस्पिटल बांधणार होते.. मोठी गाडी…

चिडून मंजू ओरडली..

‘जळूदे तुझं हॉस्पिटल.. आणि गाडी.. स्वतः अभ्यास करायचा नाही.. आणि डॉक्टर व्हायचंय तुम्हाला… तूझ्यापायी माझ्या नवऱ्याशी खोटे बोलले मी… त्याला न सांगता दागिने विकले आणि लंकेची पार्वती झाले.. तुम्हा मुलांना फक्त डॉक्टर व्हयचंय असत किंवा इंजिनीरिंग किंवा शासकीय अधिकारी.. बस्स.. खूप पैसे मिळवायचे असतात.. त्यासाठी आम्हा पालकाचा बळी जातो.. तूझ्या हट्टापायी मी माधवला शब्द टाकला आणि त्याने असा अघोरीं मार्ग सांगितला. माझीच चूक झाली.. मी एका चरित्र्यवान सरकारी अधिकाऱ्याची बायको आहे.. हे मी विसरले… आता सीबीआय चौकशी करते आहे.. पेपर फोडणारे शिक्षक, क्लासवाले सापडले आहेत.. मुल्लाला पकडले आहे.. कदाचित मुल्लाकडे कुणाकुणाला पेपर दिलेत.. याची लिस्ट मिळाली तर..

भोवळ येऊन मंजू खाली कोसळली आणि मुग्धा.. ‘आई, आई करत.. धावली.

सीबीआयने नीट परीक्षा गैरव्यवहाराची पाळेमूळे खणली.. मुल्लाचे सर्किट सापडले… माधवला अटक झाली..

दुसऱ्या दिवसाच्या पेपरमध्ये आणि चॅनेलवर ठळक बातमी होती..

‘नीट परीक्षेतील गैरव्यव्हार पैकी मुख्य आरोपी मुल्ला कडून पैसे देऊन आपल्या मुली साठी पेपर मिळविल्याबंद्दल नायब तहसीलदाराला अटक आणि नोकरीतून बडतर्फ…

समाप्त

© श्री प्रदीप केळुसकर

मोबा. ९४२२३८१२९९ / ९३०७५२११५२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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