हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व

आज के डिजिटल युग में मनुष्य अपनी ही बनाई दौड़ में थककर गिर रहा है, तब प्रकृति हमें एक शांत, स्थिर और सुकून भरी पुकार देती है—

“रुक जाओ… मेरी गोद में आओ… मैं तुम्हें फिर से जीवन दूँगी।”

हरियाली केवल पेड़–पौधों का रंग नहीं है, यह जीवन का मूल भाव है। जिस दिन मनुष्य से पेड़ छिन जाते हैं, उसी दिन उसकी साँस, उसकी शांति, उसका अस्तित्व भी खोने लगता है। इसीलिए कहा जाता है—

“धरती हर बार देती है… बस लेने वाले हाथ हरे होने चाहिए।”

आज पर्यावरण संकट दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। प्रदूषण बढ़ रहा है, वर्षा घट रही है, तापमान असंतुलित हो रहा है, और धरती अपनी थकान का इजहार कर रही है। किंतु इससे बाहर निकलने का सबसे सुंदर, सरल और प्रभावी उपाय भी वही है—

प्रकृति।

एक पौधा लगाना किसी दान से कम नहीं। यह ऐसा पुण्य है जिसकी छाया हम नहीं, आने वाली पीढ़ियाँ पाती हैं।

जब हम बीज बोते हैं, तो सिर्फ एक बीज नहीं डालते…

हम धरती की धड़कन में एक नई धुन जोड़ते हैं।

बुज़ुर्ग कहते थे—

“पेड़ हमारी छाया नहीं, हमारी शिक्षा हैं।

सिखाते हैं—स्थिर रहो, देते रहो, और किसी से बदले में कुछ मत माँगो।”

हमारे गाँवों और कस्बों की पहचान कभी उनके बरगद, नीम, पीपल और आम के पेड़ों से होती थी। बच्चे पेड़ों पर खेलते थे, रास्ते में यात्री छाया पाते थे, और घरों में हवा ठंडी बहती थी। पर आज इन पेड़ों की कमी ने हमारे जीवन से ठंडक, ताज़गी और अपनापन छीन लिया है।

समय आ गया है कि हम फिर से प्रकृति को उसके सम्मान की जगह दें।

ग्रीन मोटिवेशन का अर्थ सिर्फ पौधा लगाना नहीं, बल्कि अपनी सोच को हरियाली से भरना है।

घर की छत पर दो गमले लगाना—छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव लाती है।

बच्चों को पौधों की देखभाल सिखाना—यह उनके चरित्र में संवेदनशीलता बोता है।

प्लास्टिक कम करना और मिट्टी को जगह देना—यही धरती की असली पूजा है।

हर त्यौहार, हर शुभ काम पर एक पौधा समर्पित करना—यह संस्कृति को हरियाली से जोड़ देता है।

हरियाली कोई विकल्प नहीं… यह जीवन का आधार है।

अगर आज पेड़ बचे रहेंगे, तो कल हमारी पृथ्वी सांस ले सकेगी।

अगर आज हम पौधे लगाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें धन्यवाद देंगी।

आइए मिलकर एक संकल्प लें—

“जहाँ हम खड़े हों, वहाँ जीवन उगे।”

प्रकृति हमें कभी खाली हाथ नहीं लौटाती।

बस हमें उसके साथ चलने की जरूरत है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९ – लघुकथा- नियति – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा  – “नियति।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९

☆ लघुकथा- नियति ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

“सुन बेटा! आम मत लाना। मगर, मेरे घुटने दर्द कर रहे हैं, उसकी दवा तो लेते आना,”  बुजुर्ग ने घुटने पकड़ते हुए कहा।

“हुँ! ” बेटे ने बेरुखी से जवाब दिया, “दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हो। घुटने दर्द नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?  यूं नहीं कि थोड़ा घूम लिया करें। हाथपैर सही हो जाए।”

बुजुर्ग चुप हो गए मगर पास बैठे हुए दीनदयाल ने कहा, ” सुनो बेटा। यह आपके पिताजी हैं। बचपन में…. . “

“हां हां, जानता हूं अंकल,”  कहते हुए बेटे ने अपने पुत्र का हाथ पकड़ा और बोला, “चल बेटा! तुझे बाजार घुमा लाता हूं।”

यह देखसुन कर दीनदयाल से रहा नहीं गया और अपने बुजुर्ग दोस्त से बोला, “क्या यार! क्या जमाना आ गया? ऐसे नालायक बेटों से उनका पुत्र क्या सीखेगा?”

“वही जो मैंने अपने बाप के साथ किया था और आज मेरा बेटा मेरे साथ कर रहा है। कल उसका बेटा वही करेगा,”  कह कर बिस्तर पर लेटे हुए बुजुर्ग दोस्त अपने हाथों से अपनी आंखों को पौंछ कर अपने घुटने की मालिश करने लगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७४ ☆ बाल गीत – पक्षी अपनी तान में… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७४ ☆ 

☆ बाल गीत – पक्षी अपनी तान में☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।

पैराओलंपिक है प्रेरक

हर बाधा को पार करो।

 *

शीतल ने बिन हाथों के ही

देश के लिए जीता मैडल ।

गौरव, सौरभ हुआ है उज्ज्वल

पैरों में अद्भुत है बल।

 *

जिनके हाथ साथ हैं साथी

प्रेरित हो उपकार करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।।

 *

हार नहीं मानी उनने भी

तन से अंग-भंग हैं चेते।

लक्ष्य बना मंजिल तक पहुँचे

नाव स्वयं ही रहे वे खेते।

 *

जिनका तन है सही सलामत

खुद में सदा सुधार करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।

 *

सदा देश हित जीना अच्छा

सार्थक जीवन करो मगर।

मुश्किल में भी मत घबराओ

तब होगी आसान डगर।

 *

मोबाइल में व्यर्थ न उलझो

कुछ तो अच्छे कार्य करो।

साहस करो जीत ही होगी

कर्म करो, पुरुषार्थ करो।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ८० ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ८० ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- “नो प्रॉब्लेम, बोला” वखरेसाहेब म्हणाले. मनाशी नेमकं कांहीच ठरवलेलं नसल्याने जे आपल्या मनात आहे ते सगळं हातचं काहीही राखून न ठेवता मोकळेपणानं बोलण्याशिवाय दुसरा पर्याय नव्हताच. गेल्या दोन दिवसात यासंदर्भात घडलेलं सगळं आणि त्यावरच्या माझ्या मनात उमटलेल्या त्या त्या वेळच्या प्रतिक्रिया यांचंच उत्स्फूर्त शब्दरूप माझ्याही नकळत मनाच्या तळातून उत्कटतेनं व्यक्त होत राहिलं..! )

“तसं पाहिलं तर प्रभूदेसाई आणि सहस्त्रबुद्धे दोघेही कालपरवापर्यंत तरी माझ्यासाठी अनोळखीच होते. ” मी म्हणालो. ” कदाचित दोघांनाही मी प्रथमच

भेटल्यामुळेही असेल घडलेल्या प्रसंगाकडे मी तिऱ्हाईत नजरेने पाहू शकलो. तरीही या सर्व प्रकरणात दोघांपैकी नेमकं कुणाचं चुकलं याचा खल मधे प्रदीर्घ काळ उलटून गेल्यानंतर आज करणं निरर्थकच वाटतं. तीन वर्षांपूर्वी घडून गेलेल्या गोष्टीचा आज पंचनामा करण्यासारखा तो केवळ एक उपचारच ठरेल. त्याऐवजी ही प्रदीर्घ काळ विलंबित राहिलेली तक्रार सहस्त्रबुध्देंनी विनाविलंब मागे घेण्यासाठी कांही करता येईल कां याचा विचार करणं याक्षणी गरजेचं आहे हे लक्षात घेऊन त्यासाठी काय करायला हवं ते ठरवूया. “

” पण सहस्त्रबुद्धे तक्रार मागं घ्यायला सहजासहजी तयार होतील? “

” सहजासहजी नाही होणार. तो त्यांच्यापुरता तरी प्रेस्टीज इश्यूच बनलेला आहे. प्रभूदेसाईंची भूमिकाही मला तरी तितकीच ताठर आहे असंच वाटतंय. सहस्त्रबुध्देंचं समाधान होईल अशी शिक्षा प्रभूदेसाईंना व्हायला हवी असा त्यांचा आग्रह आहे आणि तोच आपल्यासाठी मोठा अडसर ठरायची शक्यता आहे. प्रभूदेसाईंची चूक आहे असं एक वेळ गृहित धरलं तरी कोणत्या चुकीला काय शिक्षा करायची हे बॅंकेच्या नियमांप्रमाणेच ठरवायला हवं. पण त्याने सहस्त्रबुद्धेंचं समाधान होणं अवघड आहे. त्यांना समजावण्याचा प्रयत्न करावा लागेल पण ते त्यांचा कल पाहून. त्यातून कांही मार्ग सापडला तर प्रभूदेसाईंनाही थोडं नमतं घ्यायला लावणं हे ओघानं आलंच. पण ती नंतरची गोष्ट. “

“प्रभूदेसाईचं खरंच काही चुकलंय असं वाटतंय तुम्हाला? “

“ति-हाईतपणे विचार केला तर हो. मुख्य म्हणजे ‘साॅरी’ या शब्दाचं महत्त्व आणि शक्ती कुणीही कधीच विसरू नये. या प्रकरणात प्रभूदेसाईंनी ती ओळखली नव्हती. स्वत:चं कांहीतरी चुकलंय हे त्यांना योग्यवेळी जाणवलं असतं तर वाद सुरू होण्यापूर्वीच मिटला असता. एक पाऊल योग्यवेळी मागं घेणाराच दहा पावलं पुढं जाऊ शकतो. प्रभूदेसाईंना हे या प्रकरणामुळे कायम लक्षात राहिल असं वाटतं.

दुसरी गोष्ट प्रभूदेसाईंना सहस्त्रबुद्धे आजोबा हे नेहमीच तक्रारखोर म्हणून ‘अनवाॅंटेड कस्टमर’च वाटत असत. उलट

वस्तूस्थिती ही आहे कीं सहस्त्रबुध्दे हे एक साधे पेन्शनर कस्टमर आहेत. बँकेत ते फक्त दोन कारणांसाठीच यायचे. पेन्शन काढायला आणि महागाईभत्ता वाढीचा ठराविक अंतराने मिळणारा फरक जमा झालाय कां हे पहायला. सेंट्रल व स्टेट गव्हर्नमेंट पेन्शनर्सची खाती आणि त्या संदर्भात येणाऱ्या सर्क्युलर्सचा अभ्यास करून देय रक्कम योग्य वेळेत पेन्शनर्स खातेदारांच्या पेन्शनखात्यांमधे जमा करणे ही खरंतर बँकांचीच जबाबदारी. दैनंदिन कामातल्या बिझी शेड्यूलमधे ही किचकट कामे नेहमीच दुर्लक्षित रहाणं हा सार्वत्रिक अनुभवच आहे. बऱ्याच ब्रॅंचेसमधे सहस्रबुद्धेंसारख्या अभ्यासू आणि जाणकार पेन्शनरला एखादा क्लार्क मदतीला देऊन ती सर्क्यूलर्सची माहिती समजून घेऊन त्या कामांना प्राधान्य देणं जाणीवपूर्वक केलं जातंही. स्वतःची नेमकी अडचण सांगून, सहस्त्रबुध्देंशी मोकळेपणाने बोलून पेन्शनर्सच्या संदर्भातली कामे प्रभूदेसाई अशा पद्धतीने सहजसुलभपणे पूर्ण करू शकले असते. पण तसं न करता त्यांच्यावर ‘तक्रारखोर’ असा शिक्का मारून त्यांना मोडीत काढणं प्रभूदेसाईंना सोयीचं वाटलं आणि मन कलुषित व्हायला तेच कारणीभूत ठरलं. निदान ब्रॅंचमॅनेजर या पदावर काम करणाऱ्याने तरी सामोपचार आणि सहकार्य यांचं महत्त्व ओळखून नियमानुसार काम करतानाही सर्वांच्याच हिताचं ठरेल असा अॅप्रोच ठेवायलाच हवा असं मला वाटतं.

त्यादिवशी ज्या मन:स्थितीत सहस्त्रबुद्धे बँकेत आले होते याचा विचार केला तर ब्रँचमधे प्रवेश केल्यापासूनचा प्रभूदेसाईंचा त्यांच्या बाबतीतला अॅप्रोच कुणालाही खटकणं सहाजिकच होतं. सहस्त्रबुद्धेना पाहून ‘आता हा माणूस सकाळी सकाळी माझं डोकं खायला कशाला आलाय? ‘ हाच विचार प्रभूदेसाईंच्या मनात आल्यासारखं ते त्यांना सातत्याने टाळतच राहिले होते. त्यांच्यानंतर आलेल्या महत्वपूर्ण ग्राहकाला प्राधान्यक्रमाने अटेंड करणं चुकीचं नसलं तरी निदान सहस्त्रबुद्धे दुसऱ्यांदा केबिनमधे आले तेव्हा तरी त्यांचं (वरवर कां होईना) हसतमुखाने स्वागत करून, ”काय काम आहे? ” असं अगत्याने विचारून कामाचं स्वरूप ते जाणून घेऊ शकले असते. फक्त बॅंकेचाच विचार करायचा म्हंटलं तरीही क्षणार्धात हातावेगळं करता आलं असतं इतकं किरकोळ काम होतं त्यांचं. पण सहस्त्रबुध्देंच्यासाठी तेच काम अतिशय निकडीचं तर होतंच आणि तितकंच महत्वाचंही. त्या कामाचं स्वरूप समजल्यानंतर तरी प्रभूदेसाई अकाऊंटंला बोलावून त्याच्यावर ते काम सोपवू शकले असते आणि प्रश्न निर्माण होण्यापूर्वीच सुटला असता. पण घडलं वेगळंच. ‘मी बोलावल्यानंतरच त्यांनी केबिनमधे यायला हवं.. ‘ हा प्रभूदेसाईंचा दुराग्रह समर्थनीय नक्कीच नव्हता. निदान एका जबाबदार ब्रॅंच मॅनेजरकडून तरी हे अपेक्षित नव्हतं असं मला वाटतं. बायको नुकतीच गेल्यानंतरची समोर उभ्या एका वृध्द ग्राहकाची मनोवस्था ब्रॅंचमॅनेजरला माहित नसणं गृहित धरलं तरी कांही कामानिमित्त केबिनमधे

आलेल्या सामान्य ग्राहकाला निदान आपुलकीची वागणूक देण्याचं भान तरी त्यांनी राखायला हवं ना? ते राखलं गेलं असतं तर त्या ग्राहकाचं काम लक्षपूर्वक समजून घेता आलं असतं. आणि त्यामुळे त्या वृध्द ग्राहकाच्या मन:स्थितीची जाणीवही त्याने न सांगताच झाली असती. त्यानंतर आपसूकच आलेले सांत्वनाचे दोन शब्दही त्याचं समाधान करायला पुरेसे ठरले असते. पण ते काय सांगताहेत याच्याकडे प्रभूदेसाईंचं पूर्ण लक्षच नव्हतं. या माणसाला कसं घालवायचं एवढाच विचार ते करत होते. त्यामुळे नेमकी वस्तुस्थिती त्यांना समजूच शकली नाही. शिवाय त्यानंतरचं त्यांचं लागट असं तोडून बोलणं तर कुणालाही संताप यावा असंच होतं. या पार्श्वभूमीवरची त्या विशिष्ट मन:स्थितीत सहस्त्रबुध्देंकडून उमटलेली टोकाची प्रतिक्रिया त्यांच्याबद्दल कुणालाही किंव वाटावी अशीच होती. याक्षणी नकळत कां असेना आपल्याकडून अक्षम्य चूक झालीय ही जाणीव प्रभूदेसाईंना होणं अपेक्षित होतं. आणि ती न होणंच पुढच्या अरिष्टाला आमंत्रण देणारं ठरलं. हे सगळं सांगण्यामागे प्रभूदेसाईंच्या सारख्या स्टार परफॉर्मरला दोष देण्याचा माझा उद्देश नाहीये. निर्माण झालेल्या परिस्थितीचं ति-हाईत नजरेनं विश्लेषण करताना जे जाणवलं ते मांडणं आवश्यक वाटलं एवढंच. या सगळ्यामुळे निर्माण झालेलं सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या मनातलं दुखावलेपण समजून घेऊन त्याची तीव्रता कमी करायचा प्रयत्न करणं अगत्याचं आहे असं मला वाटतं. तरच निर्माण झालेला हा प्रश्न पुढे योग्य पद्धतीने सोडवणं सोपं जाईल. “

माझं बोलणं लक्षपूर्वक ऐकत असताना वखरे साहेब कांहीसे गंभीर झाले होते. मी बोलायचं थांबताच ते भानावर आले.

“हे खरंच खूप विचित्र आहे. यापुढं हे प्रकरण आणखी न चिघळता सामोपचारानं मिटवायलाच हवं. प्रभूदेसाईला हे सांगणं फारसं अवघड नाही. मी बोलेन त्याच्याशी. पण सहस्त्रबुद्धेंचं काय? ते हटूनच बसले तर? “

“मी उद्या सकाळीच भेटतो सहस्त्रबुद्धेना. बोलतो त्यांच्याशी. बाकी कांही नाही तरी ते कसा प्रतिसाद देतात हे तरी समजेल. “

त्या दिवसापुरता हा विषय असा अधांतरीच राहिला. मनात विचार सुरू झाले ते उद्या सकाळी त्यांना भेटल्यानंतर काय बोलायचं याचेच.

नियोजित एम्. डी. मिटींगमुळे

निर्माण झालेल्या गंभीर परिस्थितीची थेट कल्पना सहस्त्रबुध्देना देणं आमच्या निर्णयप्रक्रियेत अडसर निर्माण करणारं ठरू शकतं असतं. कदाचित ते ऐकून सहस्त्रबुद्धे प्रभूदेसाईना अडचणीत आणण्यासाठी तडजोड करणं नाकारतील ही भीती होतीच. अधिक उशीर न होता सहस्त्रबुध्देना लवकरात लवकर न्याय मिळावा ही माझ्या मनातली प्रामाणिक भावना योग्य पद्धतीने त्याच्यापर्यंत पोचवणं एवढंच माझ्या हातात होतं. त्यांनी त्याला सकारात्मक प्रतिसाद द्यावा ही इच्छा असूनही मी त्यासाठी काहीच करू शकत नव्हतो. काय करायचं ते ‘तो’ पाहून घेईल असं म्हणून सगळं त्या’च्यावर सोपवण्याशिवाय माझ्या हातात दुसरं होतंच काय?

त्या त्या क्षणापुरते आपल्यासाठी अतिशय महत्त्वाचे ठरणारे असे प्रसंग कधी ना कधी प्रत्येकाच्याच आयुष्यात अचानक निर्माण होतात आणि आता एखादा चमत्कार घडल्याशिवाय यातून मार्ग निघणं शक्यच नाही असं वाटण्याइतके आपण हतबल होऊन जातो. मीही याला अपवाद नव्हतो. अशा प्रत्येकवेळी माझ्या मनावरचं सगळं ओझं ‘तो’च आपसूक उतरवून घेतो. मग जे कांही घडतं ते सहजपणे योगायोगानेच घडलंय असं वाटावं असंच असतं, पण माझ्यापुरता त्या क्षणी तरी तो चमत्कारच असतो. अतिशय अकल्पित आणि ‘त्या’चा परीसस्पर्शच वाटावा इतका अतर्क्यही..!

दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी सहस्रबुद्धे आजोबांच्या दारावरची बेल वाजवली तेव्हा मनात विचार होते ते आता त्यांच्याशी काय बोलायचं याचेच. मनातली हतबलता कधीच विरून गेली होती. अनिश्चिततेचा तर लवलेशही नव्हता. हीच पुढे घडू पहाणाऱ्या चमत्काराची सुरूवात आहे याची मात्र मला त्याक्षणी कल्पनाही नव्हती!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ वाढदिवस… लेख क्र. २२ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे ☆

सौ. गीता वासुदेव नलावडे

? मनमंजुषेतून ?

 ☆ वाढदिवस… लेख क्र. २२ ☆ सौ. गीता वासुदेव नलावडे

पहिलीच्या वर्गात एक मुलीचा वाढदिवस होता, बाहेर तिची आई बसली होती, म्हटलं, “आज लेकीचा वाढदिवस ना? मग काय विशेष बेत ठरलाय? “

तशा त्या गप्पच बसल्या, मी जेव्हा परत विचारलं, तेव्हा नाईलाजाने म्हणाल्या, “बाई, आम्ही सांगतच नाही तिचा वाढदिवस आहे ते. कारण मग ती हट्ट करते चॉकलेट वाटायचा, सर्व मुलांना घरी बोलवायचा. घरी माझे धाकटे दीर राहतात, असा काही कार्यक्रम असला, कोणी पाहुणे येणार आहेत हे माहित असलं, की मुद्दाम ते दारू पिऊन येतात आणि धिंगाणा घालतात. “

त्या बाई आणि तिचे यजमान आमच्या शाळेच्या मागच्या इमारतीत घरकाम करतात, दोघेही खूप कष्ट करतात. पण मुलीचा वाढदिवस – साधेपणाने का होईना – साजरा करू शकत नाहीत, कारण दारू पिणारा दीर.

अशी किती छोटी बाळं असतील की ज्यांना वाढदिवस म्हणजे काय हेच माहित नसेल.

मला आठवण झाली ती २००५ साली माझ्या वर्गात असलेल्या आणखी एका अशाच मुलाची. तो गावाहून शिक्षणासाठी मुंबईत त्याच्या काकांकडे आला होता. अभ्यासात ठीक ठीकच होता, दुसऱ्यांना मदत करण्यात मात्र आघाडीवर असायचा.

त्याच्या वाढदिवशी, शुभेच्छा पत्र (ग्रीटिंग कार्ड) देऊन त्याचं अभिनंदन केलं, तेव्हा त्याने मला विचारलं, “बाई, वाढदिवस म्हणजे काय? या कार्डाचं मी काय करू? “

मग मी त्याला वाढदिवस म्हणजे काय ते नीट समजावून सांगितलं. रंगपेटी आणि चित्रकलेचं पुस्तक त्याला भेट दिलं. त्याला खूप आनंद झाला.

शेतात अहोरात्र राबणाऱ्या त्याच्या आईवडिलांना बहुधा वेळही नसेल त्याचा वाढदिवस साजरा करायला, किंवा पैसेही नसतील. कामाच्या रगाड्यात कदाचित त्याचा वाढदिवस त्यांच्या लक्षातही राहत नसेल.

अशा मुलांना एखादी छोटीशी भेटवस्तूही आनंद देऊन जाते, आणि त्यांच्या चेहऱ्यावरचा आनंद पाहून आपल्यालाही आनंदित करते.

– लेख क्र. २२ 

© सौ गीता वासुदेव नलावडे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०३ – ☆ कविता – केवल बुद्धि विलास न हो… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “केवल बुद्धि विलास न हो” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०३ 

☆ केवल बुद्धि विलास न हो… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

साथ कलम के कदम चले

तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो

अन्तर भी सच्चा हो ।

*

पन्नों पर पन्नें भरते हैं

बड़ी-बड़ी बातें करते हैं

लिखा, कहा जो भी है, उस पर

खुद ही कहाँ अमल करते हैं,

तोलें खुद को, फिर बोलें तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो…।

*

जीवन में कुछ ऐसा कर दें

सबके मन में खुशियां भर दें

अंधियारा हो जहाँ, वहाँ पर

दीपक आशाओं का धर दें,

रोते शिशु को अगर हँसा दें, कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो…।

*

जन-मन में अमृत रस घोलें

मीठे बोल सभी से बोलें

ऊंच-नीच वर्गों के बंधन

समता की चाबी से खोलें,

निश्छल मन सब गले मिले तो कितना अच्छा हो

केवल बुद्धि विलास न हो, अंतर भी सच्चा हो।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२४ ☆ पहरुए ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “पहरुए ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२४ ☆ पहरुए ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

अब उनको समझाना क्या है

सब जाना, अनजाना क्या है।

 *

घोर अराजकता का दलदल

इसमें भला ठिकाना क्या है ।

 *

वो चलता है चालें टेढ़ी

बचना और बचाना क्या है।

 *

अरे पहरुए जागो भाई

हाथ मले पछताना क्या है।

 *

जीवन रिसता एक घड़ा सा

उम्र का ताना-बाना क्या है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२८ ☆ हो गया है मर के भी वंदा अमर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “हो गया है मर के भी वंदा अमर“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२८ ☆

✍ हो गया है मर के भी वंदा अमर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

प्यार की मुझको निशानी दे गया

ज़िंदगानी को रवानी दे गया

 *

हो गया है मर के भी वंदा अमर

मुल्क को अपनी जवानी दे गया

  *

उसकी ख़ुशबू चाहता था लम्स कर

और वो है रातरानी दे गया

 *

आशिक़ी कुर्बानियों का नाम है

इश्क़ को मेरे मआनी दे गया

 *

ख़ुदकुशी कर ली किसी मजबूर ने

गाँव को रचने कहानी दे गया

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ३५ – विस्तारित सम्प्रभुता… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – विस्तारित सम्प्रभुता।)

✍ विस्तारित सम्प्रभुता… ☆ श्री हेमंत तारे  

इससे पहले कि,

खो जाये स्वतंत्र पहचान,

और हो जाये विलय,

किसी डबरे,

पोखर,

तालाब,

नदी या नाले में

 

पानी के हर टपके ने

बनाया

वर्तुल वलय एक

और,

मना लिया उत्सव

अपनी सम्भावित

विस्तारित सम्प्रभुता का ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “जिजीविषा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆

✍ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वैज्ञानिकों का मत है कि करीब बीस अरब वर्ष पहले एक बड़े धमाके के साथ सृष्टि का वर्तमान क्रम चालू हुआ।  तारों में सौर मंडल, उसमें पृथ्वी का जन्म, फिर उसका ठंडा होना, जल ऊपर आना और प्रारंभिक जीव वनस्पतियों का उद्गम। अनुमान यह है कि मछली से मानव तक कुल विकास गत 60 करोड़ वर्षों का है। इस विकास क्रम का भी अपना इतिहास है। कहते हैं कि प्रत्येक जीव जंतु का शरीर कोशिकाओं का गोदाम है और सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन तथा खाद्य अणु पहुंचाना और फालतू कचरा बाहर निकालना शरीर द्वारा होता है। व्यवस्था और प्रणाली भिन्न भिन्न हैं परंतु मैलिक कार्य में कोई अंतर नहीं है। धरती पर प्रजनन सर्व प्रथम पानी में ही हुआ और उसके बाद गीली और फिर सूखी भूमि पर। ऑक्सीजन प्राप्त की जाती रही पर बाद में श्वसन प्रणाली भी विकसित हुई। अनुभूति इंद्रियां, हृदय, स्मृति सबका विकास हुआ परंतु इच्छा कैसे पैदा हुई और उसका विकास क्रम का पता नहीं।

बिना इच्छा के तो कुछ होता ही नहीं परंतु जीने की इच्छा का क्या मतलब। जन्म हुआ है तो जीना ही पड़ेगा। फिर जीने की इच्छा हो या न हो, जीना ही होगा। परंतु फिर भी जीने की इच्छा है और वह सदा जीने की, अमर होने की। आध्यात्मिक मत है कि यह सृष्टि ब्रह्म से पैदा हुई, उसकी एक से अनेक होने की इच्छा हुई और वह अनेक हो गया। क्यों हुआ यह कोई नहीं जानता। लाभ हानि के हिसाब से अच्छी बुरी इच्छा का वर्गीकरण भी हुआ। आज संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह मानव इच्छा का ही परिणाम है। इच्छा प्रकट करने के लिए भाषा बनी, लिखना शुरू हुआ। विभिन्न ग्रंथ लिखे गए। सभ्यता बनीं, सिद्धांत बने। रहने के लिए महल बने। चलने के लिए सड़क बनीं और उन चलने के लिए अनेक वाहन। भूमि कम पड़ी तो जल और आसमान में भी वाहन चलने लगे। फिर भी इच्छा पूरी नहीं हुई।एक पैदा होती है और उसके पूरी होने पर दूसरी सामने आकर खड़ी हो जाती है।

आध्यात्मिक गुरु कहते हैं कि इच्छा त्यागो, जबकि यह कहना भी एक अच्छा है।  मृत्यु होने पर संसार से छुटकारा मिल जाता है परंतु फिर भी मुक्ति की इच्छा है। किससे मुक्ति की इच्छा? यह भी तो एक इच्छा है। औरों की सुधारने की इच्छा भी बड़ी प्रबल होती है। अमर होने की इस इच्छा ने कितने जीव जंतुओं मानवों का विनाश किया है, इसका कोई हिसाब नहीं।  उत्पत्ति सृष्टि है अपने आप होती है और विनाश किया जाता है जो इच्छा से होता है।  अब जीने की इच्छा को अदम्य साहस के रूप में भी देखा जाने लगा है। फिर भी इच्छा का उत्स नहीं पता।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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