श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – प्रारब्ध…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तरक़्क़ी की हक़ीक़त वो नहीं जो आंकड़े कहते…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३१ ☆
तरक़्क़ी की हक़ीक़त वो नहीं जो आंकड़े कहते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “भारत की पहचान… “।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का रंग।)
☆ लघुकथा # ९५ – जीवन का रंग☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
सुनो पूजा! तुम रोज-रोज खाना बनाकर क्यों बाहर को फेंक देती हो और मैं तुम्हें दो-चार चीज बनाने को बोल देता हूं तो तुम्हारा मुंह बन जाता है?
कमल जी ने गुस्से से अपनी बहु रानी की ओर देखा।
पूजा ने कहा – मम्मी जी आप मुझे देख रही है सुबह से मैं काम में व्यस्त हूं बाहर मैंने कब खाना फेंक दिया?
देखो बहू मैं क्यों झूठ बोलूंगी कल भी शाम को बाहर खाना पड़ा था और आज अभी यह देखना रोटी और यह सब्जी कितने अच्छे से उसके अंदर डाली हुई है रोल बनाकर?
मम्मी जी यह कौन कर रहा है?
मेरे पास इतनी फुरसत थोड़ी ना है कि मैं खाना बनाकर फेंकूंगी और आपको तो पता है कि मैंने आज आलू की सब्जी कहां बनाई?
ऐसी हरकतें कौन कर रहा है सामने वाली भाभी जी की यहां सीसीटीवी लगा हुआ है उसमें देख कर आती हूं। कौन है यह मेरे घर के सामने खाना फेंक कर घर में झगड़ा करवा रहा है?
बहु सामने वाली रागिनी भाभी जी के दरवाजे पर दस्तक देती है।
भाभी जी दरवाजा खोलिए थोड़ा काम है।
क्या हुआ? आज लग रहा है खाना जल्दी बन गया आपका – मुस्कुराते हुए रागिनी ने पूछा।
नहीं आज मेरा खाना जल्दी नहीं बना है बल्कि घर में युद्ध हो गया है। रागिनी तुम अपने सीसीटीवी में देखकर बताओ कि मेरे घर के सामने रोज-रोज खाना कौन रख रहा है?
रागिनी और पूजा ने जब सीसीटीवी में देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि उनके बगल वाली भाभी ही उनके घर के सामने रोज खाना रखकर, कुछ टोटका कर रही थी।
इसका वीडियो बना लेती हूं और मम्मी जी को दे देती हूं मुझे बहुत परेशान करके रखा है।
पूजा ने वापिस घर आकर अपनी सास को बताया कि – मम्मी जी आप मेरे मोबाइल में यह वीडियो देख लीजिए अब आपको पता चल जाएगा कि खाना कौन बना बनाकर फेंक रहा है वरना आपके बेटे के आने के बाद आप मेरी ही शिकायत करती।
अरे बहु यह क्या कह रही है मैं अभी इसकी खबर लेती हूं।
फिर वे पड़ोसन झुमरी बहू से मिलकर बोली – आजकल के व्हाट्सएप पर मोबाइल ज्ञान को सुन सुनकर यह तुझे क्या हो गया कि बाबा के चक्कर में पड़कर तू यह सब काम क्यों कर रही है? इस सब में तू अपना समय और घर दोनों को बर्बाद कर देगी। प्रेम और श्रद्धा से भगवान की पूजा कर और मानवता के धर्म को समझ।
कमल जी की बातें सुनकर उनकी पड़ोसन झुमरी एकदम सन्न रह जाती है उसके चेहरे का रंग उड़ जाता हैं। वह रोने लगती है और कहती है मम्मी जी अब ऐसा कभी नहीं होगा। अब मैं सही राह पर चलूंगी।
कमला जी ने कहा ठीक है आज मैं तुम्हें माफ कर रही हूं। बेटा जीवन के रंग अजब-गजब होते हैं खुशी-गम धूप-छाँव की तरह आते जाते है। तुम्हारी कोई समस्या है तो मेरे पास आओ।
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
गुरूदेव रविंद्रनाथ टागोरांना संगीताचं सखोल ज्ञान होतं. ते स्वत: लिहिलेल्या गीतांना स्वत: संगीतबद्ध करत. अशी दोन हजारहून अधिक वैशिष्ट्यपूर्ण गाणी ‘रविंद्र संगीत‘ या नावाने भारतात व भारताबाहेरही प्रसिद्ध आहेत व गायली जातात. टागोरांनी सहा नवीन तालांची निर्मिती देखिल केली आहे. कदाचित म्हणूनच गीतांजलीत वारंवार गायन, वादनाचे उल्लेख आढळतात.
————-
गीत : ४
Life of my life, I shall ever try to keep my body pure, knowing that thy living touch is upon all my limbs.
I shall ever try to keep all untruths out from my thoughts, knowing that thou art that truth which has kindled the light of reason in my mind.
I shall ever try to drive all evils away from my heart and keep my love in flower, knowing that thou hast thy seat in the inmost shrine of my heart.
And it shall be my endeavour to reveal thee in my actions, knowing it is thy power gives me strength to act.
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२८ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी : वैश्विक स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक मूर्ति ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८९ ☆
आलेख – स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी : वैश्विक स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक मूर्ति श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
स्वतंत्रता का कोई आकार नहीं होता, पर जब वह न्यूयॉर्क हार्बर के मध्य लिबर्टी द्वीप पर अथाह जलधारा के बीच खड़ी हो कर हवाओं से बातें करती है तो वह एक वैश्विक जीवंत प्रतीक बन जाती है। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी अर्थात “लिबर्टी इनलाईटिंग द वर्ल्ड” की कहानी फ्रांस द्वारा वर्ष 1886 में अमेरिका को भेंट किया गया विचारों, संघर्षों और दोस्ती की उस स्वतंत्र यात्रा की प्रतीकात्मक भेंट है जो मनुष्य को मनुष्यता के पथ पर चलने की राह दिखाती है।
फ्रांस में बैठे बुद्धिजीवियों ने जब उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यह सोचा कि अमेरिका को एक ऐसी भेंट दी जाए जो आज़ादी और मानव गरिमा की आकांक्षा को व्यक्त कर सके, तब शायद उन्होंने भी कल्पना न की होगी कि यह प्रतिमा एक दिन पूरी दुनिया में अमेरिका का भावनात्मक प्रतीक बन जाएगी। यह प्रतिमा रोमन देवी लिबर्टस से प्रेरित है। मूर्ति के हाथों में अमेरिका की स्वतंत्रता , 4 जुलाई 1776 की तारीख की तख्ती है । फ्रांस ने अमेरिकन क्रांति में दोस्ती के प्रतीक स्वरूप इसे अमेरिका को भेंट किया था। 28 अक्टूबर 1886 को इस स्मारक का उद्घाटन हुआ था। स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की मूर्ति 151 फीट ऊंची है। पैडस्टल सहित स्मारक की कुल ऊंचाई 305 फीट है। तांबे की आवरण परत के कारण ऑक्सीडेशन से इसका रंग हरा पड़ गया है।1984 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था।
फ्रांसीसी विचारक और सहयोगियों ने आज़ादी और मानवाधिकारों का संदेश देती विराट प्रतिमा का विचार रखा और मूर्तिकार बार्थोल्डी ने उसे रूप देना शुरू किया। यह मूर्ति कठोर सम्मिश्रित धातु की चादरों से गढ़ी गई, पर इसमें मानवीय भावनाओं का भावनात्मक ताप भी भरा हुआ था। इसके भीतर का ढांचा इंजीनियरों की बुद्धिमत्ता का प्रमाण है, जिसने इसे समुद्री हवाओं की मार से भी सुरक्षित रखा हुआ है। यह प्रतिमा अपने आप में कला और विज्ञान का संगम था, जैसे किसी छंद में पिरोई सुंदर कविता के पीछे पंक्तियों में छिपा गणित ।
जब प्रतिमा आकार ले रही थी, तब उसे अमेरिका में खड़े करने के लिये मजबूत पेडेस्टल बनाने की ज़िम्मेदारी अमेरिकी जनता ने उठाई। फंड जुटाने के अनगिनत प्रयास हुए, नाटकों से लेकर प्रदर्शनियों तक, व्यापक जन भागीदारी हुई और अंततः यह सहयोग दोनों देशों की आम जनता की मित्रता की एक अनूठी मिसाल बन गया। तैयार प्रतिमा सैकड़ों टुकड़ों में समुद्र पार भेजी गई और जब वह न्यूयॉर्क पहुंची, तब लोगों ने उसे सिर्फ धातु का ढांचा नहीं, एक उम्मीद का पैगाम समझ दिल से उसका स्वागत किया। पेडेस्टल पूरा होते ही , स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी खड़ी की गई और उसकी ऊंचाई आसमान को छूते हुए मनुष्य की वैश्विक स्वतंत्रता की मुखर नैसर्गिक आकांक्षा का स्थायी स्मारक बन गई। जिस दिन इसका लोकार्पण हुआ, उस दिन यह तय हो गया कि यह प्रतिमा सिर्फ अमेरिका की नहीं, उन सबकी अभिव्यक्ति का भाव है जो प्रगति और स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।
स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के हर हिस्से की अपनी प्रतीकात्मक भाषा है। हाथों में मशाल एक राह दिखाती है जो तमाम अंधेरों को पीछे छोड़ कर प्रकाश की ओर चलने की प्रेरणा देती है। दूसरी भुजा में टेढ़े मेढ़े रास्तों का संक्षेप है, जिस पर तख्ती में अमेरिकन क्रांति की वह तिथि अंकित है जब मनुष्यों ने यह घोषित किया था कि किसी भी शासन से ऊपर मानव की स्वतंत्र इच्छा है। उसके चरणों के समीप टूटी जंजीरें इस बात की गवाही देती हैं कि गुलामी चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हो, उसे तोड़ने का साहस एक दिन जरूर जागता है। यही साहस इस प्रतिमा को वैचारिक रूप से उसकी ऊंचाई से भी ऊंचा स्थान देता है।
बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में जब लाखों प्रवासी समुद्र पार कर अमेरिका की ओर चले, तब यह प्रतिमा उनके लिये खुले सपनों की पहली झलक थी जिसने दिल को आश्वस्त किया कि वे एक नए वैश्विक स्वतंत्र अध्याय की रचना करने बढ़ रहे हैं। अनगिनत आंखों ने इसे देखा और अपनी उम्मीदों को इसके साथ जोड़ लिया। यही वह क्षण है जब यह प्रतिमा मनुष्य के सामूहिक सपने की प्रहरी बन गई। आगे चलकर इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिला और समय समय पर इसके संवर्द्धन होते रहे, पर इसके अर्थ की भावनात्मक ऊंचाई कभी नहीं घटी।
आज जब आधुनिक दुनिया की जटिलताएं बढ़ रही हैं, तब भी स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी अपनी जगह पर अडिग खड़ी है और मानवता को याद दिलाती है कि स्वतंत्रता किसी राष्ट्र की नहीं, पूरी मानव जाति की प्राकृतिक आवश्यकता है। वह सिखाती है कि अधिकार सिर्फ मिलते नहीं, उनकी रक्षा भी करनी पड़ती है। वह यह भी याद दिलाती है कि आज़ादी का कोई अंत नहीं, उसका सफर हमेशा चलता रहता है।
समुद्र की लहरें उसके पांवों से टकराती हैं, हवाएं उसकी मशाल को छूकर आगे निकल जाती हैं, पर वह डगमगाती नहीं। उसे पता है कि वह केवल तांबे और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि मनुष्य की आंतरिक शक्ति का जीवंत रूप है। इसी कारण हर आने वाला युग हर नई पीढ़ी उसे अपने संदर्भ में पढ़ती है और हर देखने वाली आंख उसके अर्थ को अपने अंतस में खोजती है। यही स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की असली महानता है कि वह स्मारक होकर भी जीवित है और प्रतीक होकर भी मनुष्य के दिल की धड़कनों से बात करती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के निहित संदेश और भी प्रासंगिक हो चले हैं।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “हस्तरेखा”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४९ ☆
🌻लघुकथा🌻 🤲हस्तरेखा 🤲
सदियों से चली आ रही ज्योतिष विद्या, हस्त रेखा, टोना – टोटका, उपाय कोई मानता कोई नहीं मानता।
परन्तु जहाँ पर काम बन जाए सभी एक साथ।
एक हस्त रेखा वाले बाबा की दुकान चल पड़ी। 20-25 लोग सदैव लाईन पर खड़े ही मिलते।
अपना हुलिया इस कदर बना रखें थे कि सच में देखने वाला मोहित हो जाता था। हर बात सच्ची जान पड़ती थी।
अचानक एक हाथ आगे बढ़ा। बाबा जी ने देखा—तुम्हारी हस्त रेखा कह रही है तुम्हें किसी का मालिकाना मिलेगा। बिना कमाए ही सब मिलेगा।
जब तक कुछ और कहते उनको एक पर्ची दिखने लगी लिखा था – – चुपचाप स्वागत करके अपनी जगह मुझे बिठा दो। वरना – – हस्त रेखा मुझे भी बनाना आता है। पीछे की पंक्ति में माँ खड़ी है।
बिजलियाँ कौंध गई। अपनी गर्भवती स्त्री को मारते मारते अधमरा छोड़ बाबा बनने का ढोंग अब समाप्त होता दिखने लगा। मेरी हस्त रेखा में ढूँढ निकालने का योग बना हुआ है।